जहाँ पर वर्ण्य (प्रस्तुत) और अवर्ण्य (अप्रस्तुत) का एक ही धर्म स्थापित किया जाये, वहाँ दीपक अलंकार होता है.

तुल्ययोगिता और दीपक में अंतर यह है कि प्रथम में प्रस्तुत और प्रस्तुत तथा अप्रस्तुत और अप्रस्तुत का धर्म समान होता है जबकि द्वितीय में प्रस्तुत और अप्रस्तुत दोनों का समान धर्म बताया जाता है.

कवि प्रस्तुत औ' अप्रस्तुत, का कहता सम धर्म.
जहाँ-वहीं होता 'सलिल', दीपक समझें मर्म..

प्रस्तुत और अप्रस्तुत का, धर्म समान बताय.
अलंकार दीपक 'सलिल', कहता कवि समुदाय..

दीपक वर्ण्य-अवर्ण्य में, कहता धर्म समान.
कारक माला आवृत्ति, तीन भेद लें मान..

उदाहरण:

१.
चंचल निशि उदवस रहें, करत प्रात वसिराज.
अरविंदन में इंदिरा, सुन्दरि नैनन लाज..

२.
नृप मधु सों गजदान सों, शोभा लहत विशेष.


कारक दीपक:

जहाँ अनेक क्रियाओं में एक ही कारक का योग होता है वहाँ कारक दीपक अलंकार होता है.
उदाहरण:१.
हेम पुंज हेमंत काल के इस आतप पर वारूँ.
प्रियस्पर्श की पुलकावली मैं, कैसे आज बिसारूँ?
किन्तु शिशिर में ठंडी साँसें, हाय कहाँ तक धारूँ?
तन जारूँ मन मारूँ पर क्या मैं जीवन भी हारूँ..

२.
इंदु की छवि में, तिमिर के गर्भ में,
अनिल की ध्वनि में, सलिल की बीचि में.
एक उत्सुकता विचरती थी सरल,
सुमन की स्मृति में, लता के अधर में..


माला दीपक:

जहाँ पर पूर्वोक्त वस्तुओं से उत्तरोक्त वस्तुओं का एकधर्मत्व स्थापित होता है वहाँ पर माला दीपक अलंकार होता है.
उदाहरण:

१.

घन में सुंदर बिजली सी, बिजली में चपल चमक सी.
आँखों में काली पुतली, पुतली में श्याम झलक सी.
प्रतिमा में सजीवता सी बस गर्भ सुछवि आँखों में.
थी एक लकीर ह्रदय में, जो अलग रही आँखों में..


आवृत्ति दीपक:

जहाँ पर अर्थ तथा पदार्थ की आवृत्ति हो वहाँ पर आवृत्ति दीपक अलंकार होता है.

इसके तीन प्रकार पदावृत्ति दीपक, अर्थावृत्ति दीपक तथा पदार्थावृत्ति दीपक हैं.

पदावृत्ति दीपक:
जहाँ भिन्न अर्थोंवाले क्रिया-पदों की आवृत्ति होती है वहाँ पदावृत्ति दीपक अलंकार होता है.

उदाहरण:
१.
तब इस घर में था तम छाया,
था मातम छाया, गम छाया,
-भ्रम छाया.

२.
दीन जान सब दीन, नहिं कछु राख्यो बीरबर.

अर्थावृत्ति दीपक:
जहाँ एक ही अर्थवाले भिन्न क्रियापदों की आवृत्ति होती है, वहाँ अर्थावृत्ति दीपक अलंकार होता है.

उदाहरण:
१.
सर सरजा तब दान को, को कर सकत बखान?
बढ़त नदी गन दान जल उमड़त नद गजदान..

२.
तोंहि बसंत के आवत ही मिलिहै इतनी कहि राखी हितू जे.
सो अब बूझति हौं तुमसों कछू बूझे ते मेरे उदास न हूजे.
काहे ते आई नहीं रघुनाथ ये आई कै औधि के वासर पूजे.
देखि मधुव्रत गूंजे चंहु दिशी, कोयल बोली कपोतऊ कूजे..

पदार्थावृत्ति दीपक:
जहाँ पद और अर्थ दोनों की आवृत्ति हो वहाँ,पदार्थावृत्ति दीपक अलंकार होता है.

उदाहरण

१.
संपत्ति के आखर तै पाइ में लिखे हैं, लिखे भुव भार थाम्भिबे के भुजन बिसाल में.
हिय में लिखे हैं हरि मूरति बसाइबे के, हरि नाम आखर सों रसना रसाल में.
आँखिन में आखर लिखे हैं कहै रघुनाथ, राखिबे को द्रष्टि सबही के प्रतिपाल में.
सकल दिशान बस करिबे के आखर ते, भूप बरिबंड के विधाता लिखे भाल में..

दीपक अलंकार का प्रयोग जानकारी के अभाव में कम ही हो पता है जबकि इसका प्रयोग कविता में चमत्कार उत्पन्न कर उसे अधिक हृद्ग्राही बनाता है..

*****
रचनाकार परिचय:-आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' नें नागरिक अभियंत्रण में त्रिवर्षीय डिप्लोमा. बी.ई.., एम. आई.ई., अर्थशास्त्र तथा दर्शनशास्त्र में एम. ऐ.., एल-एल. बी., विशारद,, पत्रकारिता में डिप्लोमा, कंप्युटर ऍप्लिकेशन में डिप्लोमा किया है।
आपकी प्रथम प्रकाशित कृति 'कलम के देव' भक्ति गीत संग्रह है। 'लोकतंत्र का मकबरा' तथा 'मीत मेरे' आपकी छंद मुक्त कविताओं के संग्रह हैं। आपकी चौथी प्रकाशित कृति है 'भूकंप के साथ जीना सीखें'। आपनें निर्माण के नूपुर, नींव के पत्थर, राम नम सुखदाई, तिनका-तिनका नीड़, सौरभ:, यदा-कदा, द्वार खड़े इतिहास के, काव्य मन्दाकिनी २००८ आदि पुस्तकों के साथ साथ अनेक पत्रिकाओं व स्मारिकाओं का भी संपादन किया है।
आपको देश-विदेश में १२ राज्यों की ५० सस्थाओं ने ७० सम्मानों से सम्मानित किया जिनमें प्रमुख हैं : आचार्य, २०वीन शताब्दी रत्न, सरस्वती रत्न, संपादक रत्न, विज्ञानं रत्न, शारदा सुत, श्रेष्ठ गीतकार, भाषा भूषण, चित्रांश गौरव, साहित्य गौरव, साहित्य वारिधि, साहित्य शिरोमणि, काव्य श्री, मानसरोवर साहित्य सम्मान, पाथेय सम्मान, वृक्ष मित्र सम्मान, आदि। वर्तमान में आप अनुविभागीय अधिकारी, मध्य प्रदेश लोक निर्माण विभाग के रूप में कार्यरत हैं।

10 comments:

  1. आभार ज्ञानवर्धन का, आचार्य जी!!

    उत्तर देंहटाएं
  2. कवि प्रस्तुत औ' अप्रस्तुत, का कहता सम धर्म.
    जहाँ-वहीं होता 'सलिल', दीपक समझें मर्म..

    प्रस्तुत और अप्रस्तुत का, धर्म समान बताय.
    अलंकार दीपक 'सलिल', कहता कवि समुदाय..

    दीपक वर्ण्य-अवर्ण्य में, कहता धर्म समान.
    कारक माला आवृत्ति, तीन भेद लें मान..

    धन्यवाद सलिल जी।

    उत्तर देंहटाएं
  3. ज्ञान में वृद्धि हुई, संग्रहणीय आलेख का धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  4. हिन्दी और साहित्य में चमक लाने के लिए आपकी यह प्रस्तुति बहुत कारगर है..जानकारी बढ़ी आभार

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  5. आदरणीय संजीव सलिल जी के आलेखों की विशेषता उनकी सरलता है। अलंकारों पर जो सामग्री आपके द्वारा अंतर्जाल जगत को प्राप्त हो रही है वह सर्वदा शोधार्थियों के लिये संदर्भग्रंथ की तरह कार्य करेगी। एसे अनुपम उदाहरण और व्यापक आलेख कहाँ मिल पाते हैं। रस-छंद-अलंकार पर आपकी आलेख श्रंखला को पुस्तक रूप में प्रस्तुत किये जाना अवश्यंभावी है।

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  6. दीपक अलंकार एवं उसके विभेदों पर विधिवत जानकारी के लिये धन्यवाद।

    और धन्यवाद सचिन पर यह पोस्टर लगा कर भाषा के नाम पर रास्ष्ट्रीयता का बटवारा करने वाकों का विरोध करने के लिये।

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  7. प्रयोग में कठिन है यह अलंकार। अच्छे उदाहरण।

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  8. अनन्य जी !
    अभी तो अपने अलंकारों के प्रयोग का प्रयास ही नहीं किया है फिर कठिन कैसे लगा?, जो निरंतर लेखन करेगा उसकी रचनाएँ बिना प्रयास ही अनेक अलंकारों से समृद्ध हो जाएँगी, मेरी द्रष्टि में कोई अच्छी रचना अलंकार रहित नहीं होती. अभिव्यक्ति का वैशिष्ट्य ही अलंकार है. रूचि लेने और इस प्रस्तुति को सफल बनाने हेतु आप सब सहभागियों का आभार .

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