“हमकलम अभिव्यक्ति मंच” डॉ. संतोष गोयल द्वारा स्थापित, साहित्यकारो का एक एसा मंच है जहाँ हिंदी भाषी ही नहीं अन्य भाषाओं जैसे - उर्दू, बंग्ला, अंग्रेजी, आदि के लेखकों का भी स्वागत होता है। “हमकलम” संस्था की मासिक संगोष्ठी निरंतर होती रहती है जिसमें साहित्य के विभिन्न पहलुओ पर चर्चा के साथ साथ पुस्तक चर्चा, समीक्षायें, मीडिया के विबिन्न पहलुओ पर विमर्श आदि होते रहे हैं।
इसी क्रम में दिनांक 31. अक्टूबर को “हमकलम” की बैठक/गोष्ठी पद्मश्री शीला झुंझुनवाला के निवास पर सम्पन्न हुई।
इस गोष्ठी में प्रमुखत: दो सत्र सम्पन्न हुए; प्रथम सत्र में श्रीमति मृदुला सिन्हा की कहानी “औरत और चूहा” तथा श्रीमति मीरा सीकरी की कहानी “पालतू पिल्ला” का पाठ हुआ। प्रस्तुत दोनो ही कहानियों में अकेले पन की मानसिकता को चित्रित किया गया था। उसके पश्चात वरिष्ठ पत्रकार तथा लेखिका श्रीमति शीला झुंझुनवाला नें पत्रकारिता क्षेत्र में सन्निहित अपने संघर्षों पर आधारित संस्मरण प्रस्तुत किया।
गोष्ठी के द्वतीय सत्र मे कवितापाठ हुए। पद्मश्री डॉ. शेरजंग गर्ग नें प्रस्तुत किया -

मत पूछिये क्यों पाँव में रफ्तार नहीं है
ये कारवाँ मंजिल का तलबगार नहीं है

डॉ. संतोष गोयल नें कहा -

बहुत वक्त बीता
तब पता चला कि
प्यार का अर्थ झुकना नहीं
न ही मात्र सुरक्षा पाना है
न लेन देन है
न संबंध का वायदा कोई..

डॉ. सुनीती रावत नें बाजारवाद पर दो कविता सुनाई – मोल भाव और मिलावट। एक बानगी प्रस्तुत है -

दुनिया ये बाजार है यारो
जितने रंग जमाये जो
खूब मिलावट करके दिन भर
हलवा पूडी खाये वो।

डॉ. मंजू गुप्ता नें कविता पाठ किया-

कविता लिखना छोड कर
मैं आज कल कविता जी रही हूँ

वरिष्ठ साहित्यकार चंद्रकांता जी ने कविता सुनाई -

अकेली पडी सी
कभी खेलती कभी गुम होती
वह आधे अधूरे खेल

श्रीमति निशा भार्गव नें व्यंग्य कविता प्रस्तुत की –

जब मैं होती हूँ जल्दी में
सहमा सा उत्तर
मिलता है
प्रश्न निर्भीक होता है
उत्तर सटीक होता है
जल्दी घाटी का युद्ध होता है

डॉ अमरनाथ अमर नें गीत सुनाया –

तिनका तिनका हम बटोरें, उस घरोंदे के लिये
हम फ़िदा थे उस तुम्हारी, दंतुरित मुस्कान पे

डॉ वेद व्यथित तथा उषा महान नें बाजारवाद पर मुक्तक प्रस्तुत किये। डॉ व्यथित का एक मुक्तक प्रस्तुत है -

मैं गया एक दिन यों ही बाजार को
टांगते लोग बाहर जहाँ प्यार को
उसके उपर लिखा था बिकाऊ है ये
क्यों बनाया बिकाऊ यहाँ प्यार को

गोष्ठी में “साहित्य शिल्पी” राजीव रंजन प्रसाद भी उपस्थ्ति थे। उन्होंने अपना एक गीत प्रस्तुत किया –

बहुत है कर्ज, मर जाओ, सुकूं की नींद तो आये
है कम रस्सी, लटक जाओ, इसी फंदे में दो बहनें
न देखो, सच है वो, उसने कभी कपड़े नहीं पहने।

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9 comments:

  1. sahityashilpi ke krmnishth snyojk rajiv rnjn prshad vun ke jaise hi un ke shyogi net pr hindi sahity ki jo amuly seva kr rhe hain bdhai ke patr ahi kripya swikar kren mujhe prsnnta hoi sahityashilpi ne sahityik gtividhiyan prkashit kr ptrika ke sahityik smrpn ka sakshy prstut kiya hai vh schche arthon men sahityik ptrika hai punh sadhuvad
    dr. ved vyathit

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  2. बहुत अच्छी रिपोर्ट। रचना-अंश पढ कर अच्छा लगा।

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  3. साहित्य समाचार के लिये धन्यवाद। बहुत अच्छी रिपोर्ट है।

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  4. सुन्दर प्रस्तुति... इस तरह के आयोजन हिन्दी के प्रसार व विस्तार के लिये अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं. विभिन्न मंचों पर हिन्दी की सेवा के लिये उद्यत संसाधन एंव प्रयास यदि एकजुट हो जायें तो कोई वाधा हिन्दी को जन जन तक पहुंचने से नहीं रोक सकती

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