श्रीमद्भगवदगीता- पहला अध्याय

धृतराष्ट्र: उवाच।
धर्मक्षेत्रे कुरूक्षेत्रे समवेता युयुत्सव:।
मामका: पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय:॥1॥

अनुवाद:- धृतराष्ट्र ने कहा, हे संजय। धर्मभूमि कुरूक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से इकठ्ठे हुए मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?

संक्षिप्त टिप्पणी :-

कुरूक्षेत्र- एक अत्यंत प्राचीन पवित्र तीर्थस्थल है। जो अम्बाला से दक्षिण तथा दिल्ली से उत्तर में है।
रचनाकार परिचय:-
अजय कुमार सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया) में अधिवक्ता है। आप कविता तथा कहानियाँ लिखने के अलावा सर्व धर्म समभाव युक्त दृष्टिकोण के साथ ज्योतिषी, अंक शास्त्री एवं एस्ट्रोलॉजर के रूप मे सक्रिय युवा समाजशास्त्री भी हैं।

धर्मक्षेत्र- वैदिक संस्कृति का मुख्य केन्द्र होने के कारण कुरूक्षेत्र को “धर्मक्षेत्र” अर्थात पुण्य भूमि कहा गया है। बारह वर्ष वनवास एवं एक वर्ष अज्ञातवास बीत जाने के पश्चात अपना राज्य वापस पाने हेतु पाण्डव दुर्योधन के पास एक दुत भेजते है। किंतु दुर्योधन दूत के आग्रह को ठुकरा देता है। अंतत: श्रीकृष्ण शांतिदूत बनकर हस्तिनापूर जाते है। श्रीकृष्ण पितामह भीष्म, महात्मा विदुर, आचार्य द्रोण एवं राजा धृतराष्ट्र से भरे दरबार मे पाण्डवो के लिए न्याय माँगते है किंतु कालचक्रग्रस्त दुर्योधन एक सुई की नोक जितनी भूमि बिना युद्ध को देने के लिए तैयार नहीं होता हौ। क्रोध से भरकर वह श्रीकृष्ण को भी बंदी बनाने का असफल प्रयास करता है। पाण्डव युद्ध को अनिवार्य जानते हुए तैयारे आरंभ कर देते है। फिर दोनो सेनाओं के दोनो पक्ष अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित होकर कुरूक्षेत्र मे एक दूसरे के सामने आ जाते है। युद्ध की स्थिति को देखने के लिए महर्षि व्यास धृतराष्ट्र को दिव्य नेत्र प्रदान करना चाहते है पर, धृतराष्ट्र अपनी कुल की हत्या युद्ध मे अपनी ऑखो से नहीं देखना चाहते है किंतु युद्ध का सारा वृतांत अवश्य सुनना चाहते है। अत: महर्षि व्यास ने संजय को दिव्य दृष्टि देकर कहा कि “ये संजय तुम्हे युद्ध का वृतांत सुनायेंगे। युद्ध की समस्त घटनाओं को ये प्रत्यक्ष देख सकेगे इनसे कोई भी बात छुपी नही रह सकेगी। इस प्रकार संजय दिव्य दृष्टि के माध्यम से युद्ध की सारी घटन्नों को धृतराष्ट्र को सुनाते हुए आगे कहते है।

संजय उवाच
दृष्टवा तु पाण्डवानीकं व्यूढ़ं दुर्योधनस्तदा।
आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत॥2॥

अनुवाद:- संजय ने कहा- दुर्योधन ने व्यूह मे खड़ी हुई पाण्डवो की सेना को देखी द्रोणाचार्य के पास जाकर यह कहा।

पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम।
व्यूदां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता॥3॥

अनुवाद:- हे आचार्य! आपके बुद्धिमान शिष्य द्रुपदपुत्र (धृष्टद्युम्न) द्वारा व्यूहाकार खड़ी की पाण्डवों के इस विशाल सेना को देखिए।

अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथ:॥4॥

धृष्टकेतुश्चेकितान: काशिराजश्च वीर्यवान।
पुरूजित्कुंतिभोजश्च शैव्यश्च नरपुंणव:॥5॥

युधामन्युश्च विक्रांत उत्तमौजाश्च वीर्यवान।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथा:॥6॥

अनुवाद:- इसमे शूर, धनुर्धर, भीम तथा अर्जुन के तुल्य योद्धा सात्यिकि, विराट, महारथी द्रुपद , धृष्टकेतु, चेकिस्तान, बलवान काशीराज, पुरूजित, कुंतिभोज और मनुष्यों मे श्रेष्ठ शैव्य, पराक्रमी युधामन्यु, बलवान उत्तमौजा, सुभद्रापुत्र अभिमन्यु एवं द्रौपदी के (पाँचो) पुत्र, ये सब महारथी है।

अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम।
नायका मंम सैन्यस्य संज्ञार्थ तान ब्रवीमि ते॥7॥

अनुवाद:- हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! हमारे पक्ष में भी जो प्रधान है, उनको आप समझ लिजिए। आपकी जानकारी के लिए, मेरी सेना के जो-जो सेनापति है उनको मै बतलता हूँ।

भवांभीष्श्च कर्णश्च कृपश्च समितिंजय:।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च॥8॥

अनुवाद :- उनमे आप और भीष्मपितामह, कर्ण, संग्रामजित कृपाचार्य, अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा है।

अन्ये च बहव: शूरा मदर्थे व्यक्तजिविता:।
नानाशस्त्रप्रहरणा: सर्वे युद्ध विशारदा:॥9॥

अनुवाद:- इनके अलावा और भी बहुत से वीर, मेरे लिए प्राणों की ममता का त्याग किए नाना प्रकार से शस्त्रों से प्रहार करने वाले तथा युद्ध के बड़े प्रवीण है।

अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम॥10॥

अनुवाद:- हे महानुभाव, भीष्मपितामह से भलीभांति रसा प्राप्त हमारे सेना विशाल है। भीमसेन से रक्षित पाण्डवों की सेना छोटी है।

अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिता:।
भीष्ममेवाभिरक्षंतु भवंत: सर्व एव हि॥11॥

अनुवाद:- अब आप सब वीरजन व्यूहों के मार्गो पर स्थित होकर भीष्म की रक्षा करें।

तस्य संजन्यन्हर्ष कुरूवृद्ध: पितामह:।
सिंहनादं विनद्योच्चै: शड्खं दध्मौ प्रतापवान॥12॥

अनुवाद: दुर्योधन को हर्षित करते हुए भीष्मपितामह ने सिंह के समान गर्जनयुक्त शंड्ख बजाया।

क्रमश:
---------------------------

7 comments:

  1. गीता पर अनेक अनुवाद उपलब्ध हैं। यदि अच्छी व्याख्यायें उअपलब्ध हों तभी यह स्तंभ सार्थक बन सकेगा।

    उत्तर देंहटाएं
  2. स्तंभ का स्वागत, शेष मैं अनिल भाई से सहमत हूँ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. मुझे गीता का भावार्थ हमेशा से कठिन लगा है आशा है..आपसे बेहतर सीख सकूंगा...

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत ही उम्दा प्रयास है आपका ।

    उत्तर देंहटाएं
  5. अच्छा आलेख है। इस प्रयास को और विवेचनात्मक बनायें।

    उत्तर देंहटाएं

आपका स्नेह और प्रस्तुतियों पर आपकी समालोचनात्मक टिप्पणियाँ हमें बेहतर कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करती हैं.

पुस्तकालय

~~~ साहित्य शिल्पी का पुस्तकालय निरंतर समृद्ध हो रहा है। इन्हें आप हमारी साईट से सीधे डाउनलोड कर के पढ सकते हैं ~~~~~~~

डाउनलोड करने के लिए चित्र पर क्लिक करें...

आइये कारवां बनायें...

साहित्य शिल्पी, हिन्दी और साहित्य की सेवा का मंच, एक ऐसा अभियान.. जो न केवल स्थापित एवं नवीन रचनाकारों के बीच एक सेतु का कार्य करेगा अपितु अंतर्जाल पर हिन्दी के प्रयोग और प्रोत्साहन का एक अभिनव सोपान भी है, अपने सुधी पाठको के समक्ष कविता, कहानी, लघुकथा, नाटक, व्यंग्य, कार्टून, समालोचना तथा सामयिक विषयो पर परिचर्चाओं के साथ साहित्य शिल्पी समूह आपके समक्ष उपस्थित है। यदि राष्ट्रभाषा हिदी की प्रगति के लिए समर्पित इस अभियान में आप भी सहयोग देना चाहते हैं तो अपना परिचय, तस्वीर एवं कुछ रचनायें हमें निम्नलिखित ई-मेल पते पर प्रेषित करें।
sahityashilpi@gmail.com
आइये कारवां बनायें...

Followers

Google+ Followers

Get widget