दो घनघनाहट के बाद फोन की घंटी बजनी बंद हो गयी। उसने घडी की ओर देखा, पौने दस बज रहे थे। एस टी डी की आवाज सुनकर वह समझ ही चुकी थी कि फोन कहीं दूर से ही आ रहा होगा। दिनभर तो अडोस पडोस के घरों से आए फोन की वजह से घंटी बजती ही रहती है, सामान्‍य दूरी वाली जगहों से भी फोन रविवार को दिनभर या अन्‍य दिन सात आठ बजे के आसपास आ ही जाता है। पर जब साढे नौ बजे के बाद फोन की घंटी बजती है, वह समझ जाती है कि फोन किसी दूर शहर के किसी नजदीकी रिश्‍तेदार का हो सकता है, जो लंबी बातचीत के लिए पल्‍स रेट कम होने के इंतजार में इतनी रात गए कॉल करना पसंद करते हैं। पर यदि फोन की घंटी बार बार बजकर कटती रहती है, तो वह समझ जाती है कि फोन लगाने की कोशिश गांव में रहनेवाली उसकी भाभी ही कर रही होगी। वहां का टावर ठीक न होने से घंटो कोशिश करने के बाद ही वे बातचीत कर पाती हैं। भैया को कहां इतना धैर्य हैं, कोशिश करती हुई भाभी को ही कभी कभी सफलता हाथ लगती है। फोन की घंटी फिर से बजकर बंद हो गयी। अब तो उसे पक्‍का विश्‍वास हो गया कि फोन गांव से ही आ रहा है।

साहित्य शिल्पीरचनाकार परिचय:-

संगीता पुरी का जन्म 19 दिसम्‍बर 1963 को झारखंड के बोकारो जिला अंतर्गत ग्राम - पेटरवार में हुआ। रांची विश्‍वविद्यालय से अर्थशास्‍त्र में 1984 में स्‍नातकोत्‍तर की डिग्री ली।

उसके बाद झुकाव अपने पिताजी श्री विद्या सागर महथा जी के द्वारा विकसित की गयी ज्‍योतिष की एक नई शाखा गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष की ओर हुआ और सब कुछ छोडकर इसी के अध्‍ययन मनन में अपना जीवन समर्पित कर दिया। गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष पर आधारित अपना साफ्टवेयर भी वे बना चुकी हैं।

सितम्‍बर 2007 से ही ज्‍योतिष पर आधारित अपने अनुभवों के साथ ब्‍लागिंग की दुनिया में हैं। अनेक पत्र पत्रिकाओं के लिए लेखन करती आ रही हैं। ज्‍योतिष पर आधारित एक पुस्‍तक 'गत्‍यात्‍मक दशा पद्धति: ग्रहों का प्रभाव' 1996 में प्रकाशित हो चुकी है।

फोन की घंटी बजे या दरवाजे की, किसके द्वारा बजाया गया होगा, उसे अच्‍छी तरह अनुमान होता है। दरवाजे की घंटी बजते ही दूधवाला होगा या सब्‍जीवाला, पेपरवाला होगा या पोस्‍टमैन, मिसेज गुप्‍ता होगी या मिसेज सिन्‍हा, महरी होगी या भिखारी .. और दरवाजा खोलते ही उसका अनुमान सही निकलता है। वास्‍तव में शहर में लोग समय के इतने पाबंद होते ही हैं, तभी तो वह अनुमान कर पाती है। गांव से जब भी फोन आता है, वह चिंते में पड जाती है, कोई बात हो गयी क्‍या? क्‍यूंकि गांव से ऐसे फोन आता भी नहीं, इतनी दिक्‍कत और परेशानी मोल लेकर भला फोन करेगा भी कौन? चार बार घंटी बजने पर निश्चिंत होने के बाद ही उसने फोन उठाया। उसका अनुमान बिल्‍कुल सही था, पर फोन पर भाभी नहीं, भैया थे। उसका मन किसी अनहोनी से आशंकित हो उठा, पर शीघ्र ही भैया की हंसी से यह भ्रम मिटा।


‘मीनू कैसी हो ?’

‘ठीक हूं भैया, आप सब कैसे हैं ?’ वह खुश हो गयी थी।

‘सबलोग अच्‍छे हैं’ भैया ने कहना आरंभ किया, ‘कल सुबह की ट्रेन से नीतिश दिल्‍ली जा रहा है। एक सप्‍ताह की ट्रेनिंग है उसकी। अभी अभी आकर उसने तुम्‍हारा पता लिया है। वह तुम्‍हारे पास भी जाएगा। गांव की किसी वस्‍तु की जरूरत हो तो कहो, मै उसके द्वारा भेज दूंगा। इसलिए ही मैने तुम्‍हें फोन किया है‘

भैया के मुंह से नितीश का नाम सुनकर ही उसका दिमाग भन्‍ना गया, वह यहां आ रहा है, क्‍या करने आ रहा है, भैया ने उसका पता नीतिश को क्‍यूं दिया।

‘क्‍या सोंच रही हो, कुछ चाहिए तो कहो’ भैया ने उसकी सोंच में खलल डालते हुए पूछा।

’नहीं भैया कुछ नहीं चाहिए , यहां सबकुछ मिल जाता है’ उसने जानबूझकर ये बातें कही, ताकि नीतिश को यहां आने का कोई बहाना न मिले।

भैया के बारे में सोंचकर उसका मन उल्‍लास से भर गया। कितना प्‍यार है भैया को उससे, यह बात तो भाभी भी पूछ सकती थी, दरअसल भैया को मालूम है न कि उसे ग्रामीण वस्‍तुएं और व्‍यंजन कितना पसंद है। गांव के स्‍वादिष्‍ट व्‍यंजनों की सोंधी खूश्‍बू उसके नाकों में बस गयी। इन स्‍वादिष्‍ट वस्‍तुओं के नाममात्र से ही तो उसकी भूख जग जाया करती थी। कोई और मौका होता तो न जाने कितनी फरमाइशें कर डालती। बडी मां के हाथ के बेसन के लड्डू, चाची के हाथ की गुझिया, भाभी के हाथ की आटे की मोइनदार खस्‍ती नमकीन, बडी, पापड, अचार और न जाने क्‍या क्‍या? वह कितनी भी मेहनत करे, वैसी स्‍वादिष्‍ट चीजें नहीं बना सकती। कुछ अनुभवहीनता के कारण तो कुछ शहरों के बाजार से मंगाए गए सामान में मिलावट के कारण। फोन रखने के बाद उसका मन तो ललच उठा, पर भैया को मना करना उचित था, वह नीतिश से सामान क्‍यूं मंगवाए? उसका मन तो था कि भैया को फोन पर ही मना कर दे नीतिश को यहां भेजने के लिए, पर वह वैसा नहीं कर सकी थी और चुपचाप फोन रख दिया था।

पर फोन रखने के बाद वह गुस्‍से से भडक उठी। ‘इस नीतिश के बच्‍चे की इतनी हिम्‍मत, वह मुझसे मिलने आएगा, वह मुझे समझता ही क्‍या है ? मैं इतनी गयी बीती हूं, उससे मिलूंगी। वह मेरे सुखी परिवार में आग लगाना चाहता है। मैं ऐसा हरगिज नहीं होने दूंगी। आखिर उसमें ऐसी क्‍या खूबियां और विशेषताएं हैं, जो मोहित में नहीं। रंगरूप, गुणस्‍वभाव, पद प्रतिष्‍ठा, पैसा हो या चरित्र सबमें मोहित के सम्‍मुख नीतिश को खडा भी नहीं किया जा सकता। सहसा दरवाजे की घंटी बजी, लगता है ये आ गए, आदतन उसके मन में आया। दरवाजा खोली, तो सचमुच मोहित ही खडे थे, उसके अपने मोहित, क्‍या नाम रखा था इनके मां पिताजी ने , नाम के अनुरूप ही सबके मन को मोह लिया करते थे। जहां भी जाते, सबको अपना बना लेते।

‘क्‍या सोंचकर दरवाजे को छेंक रखा है, आज अंदर आने देने का विचार नहीं क्‍या’ मोहित ने कहा तो वह झेंपकर दरवाजे से हटकर सीधा किचन में चली गयी थी।

रात्रि का खाना पीना निबटाकर अपने बिस्‍तर पर आयी, तो नींद आंख से कोसों दूर थी। न चाहते हुए भी वह अतीत में खो गयी। प्रकृति की गोद में बसा शहर से मात्र 10 किमी दूर बसा था उसका गांव। उसके पूर्वज कहां से आकर यहां बसे थे, किसी को मालूम न था, क्‍यूंकि वे सैकडों वर्षों से यहीं रह रहे थे। उस वक्‍त उनके समुदाय के बहुत सारे लोग भी आए थे, जो उनके अगल बगल के गांवों में भी बस गए थे। व्‍यवसाय कला में निपुण उन लोगों ने औरतों के जेवरों को गिरवी रखकर उसके द्वारा उगाए गए पैसों से कारोबार आरंभ किया था। धीरे धीरे यहां एक अच्‍छा बाजार बन गया था, जहां न सिर्फ इस गांव के वरन् अगल बगल के गांव के लोग भी सामान खरीदने आया करते थे। बाजार के पिछवाडे जमीन खरीदकर उनलोगों ने अपने मकान बना लिए थे। समय के साथ सबके मकान दो तीन मंजिले हो गए थे। उन्‍होने खेती बारी के लिए भी कुछ जमीनें खरीद ली थी, और यहां के बाशिंदों के साथ अच्‍छे संपर्क बना लिया था।

उसके समुदाय के सभी लोगों के दुकान एक क्रम से सामने थे और ठीक पिछवाडे क्रम से सबके मकान। इस तरह रास्‍ते के पूर्वी भाग में बाजार उत्‍तर से दक्षिण तक काफी लम्‍बा फैल गया था। समय के साथ साथ यहां के मूल बाशिंदो ने भी रास्‍ते के पश्चिमी ओर भी क्रम से दुकाने खोल ली थी और इस तरह उसके घर के सामने की सडक मेन रोड की तरह हो गयी थी, जा दिनभर बस, रिक्‍शा, टेम्‍पो की आवाज , ग्राहको के भीड की शोर और सब्‍जीवालों, फलवालों और अन्‍य फेरीवालों की उंची आवाजों से गुंजायमान रहती। उसके मकान की निचली मंजिल को पूरा गोदाम बना दिया गया था और परिवार के सदस्‍यों को उपरी मंजिल में ही कमरा दिया गया था। मेन रोड के सामने का कमरा हो हल्‍ला के कारण किसी को नहीं भाता था, इसलिए घर के अधिकांश लोगों ने पीछे के कमरो को ही रहने के लिए चुना था।

मकान के सामने जितनी ही चहल पहल थी, पिछवाडे का हिस्‍सा उतना ही शांत और मनोरम। मकान के पीछे की ओर खुलती उसके कमरे से लगी एक बालकनी थी, वहीं बैठकर वह प्रकृति के अप्रतीम सौंदर्य को निहारा करती। वैसे तो यह पूरा प्रदेश ही प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर था, पर गांव के कुछ शौकीन लोगो ने अपनी मेहनत से इस गांव को और खूबसूरत बना दिया था। उसके अहाते के अंदर भी एक माली की नियुक्ति थी, सिजने सभी पेड पौधों को सुंदर आकार देकर, खूबसूरत पौधों को लगाकर , बेलों के गमलों को एक क्रम में सजाकर अहाते की सुंदरता में चार चांद लगा दिया था। अहाते के बाहर पिछवाडे एक तालाब था, चारो ओर से घाट बना हुआ, ग्रामीण मर्दो एवं औरतों के नहाने का स्‍थल।पर्व त्‍यौहारों में इस तालाब में लगी भीड देखते ही बनती थी। तालाब के बीचोबीच खिले कमल इसकी सुंदरता को बढा देते। इस बालकनी में बैठकर ही यह पिछवाडे पंक्तिबद्ध अशोक के पेडों, फूलों से लदी तरह तरह की बेलों, कलात्‍मक ढंग से कटे पेड पौधों, ताल तलैयों और उसमें तरह तरह की पंक्षियों, बत्‍तखों और हंसों की अठखेलियां देख करती। प्रकृति के इस सौंदर्य ने उसकी कितनी ही कविताओं को जीवंत किया था।

उसके पढने-लिखने, खेलने-कूदने, खाने-पीने यहां तक कि सहेलियों से बातचीत करने तक की यही बालकनी थी। उसकी बालकनी से दक्षिण उसके मकान के बाद ही एक आलीशान भवन था , बहुत बडे अहाते में नवीनतम ढंग से बना हुआ, सामने एक विशाल गेट था। कॉलेज आते जाते जब भी नजर पडती गेट पर एक बडा सा ताला नजर आता। उस सुंदर से मकान को उसी के समुदाय के किसी व्‍यक्ति ने बनाया था, जो सपरिवार विदेश में रहने लगे थे और इसलिए मकान यूं ही बंद पडा था। खबसूरत दीवालें, चौडे बरामदे, बडी बडी खिडकियों और नक्‍काशीदार दरवाजे वाले इस मकान का बहुत ही बुरा हाल था। पूरे अहाते में गंदगी बिखरी पडी थी। बेतरतीब से पेड पौधे, चारो ओर घास फूस, बिना रंग रोगन के कई वर्षों से यूं ही पडा यह मकान, बंद दरवाजे और खिडकियां, यह चील कौओं और चमगादडों का अड्डा बनती जा रही थी। इतनी बडी संपत्ति का यह हश्र ... उसे बडा बुरा लगता। लेकिन एक दिन उसकी उदासी खुशी में बदल गयी , जब उसने इस वीरान पडे मकान में रंग रोगन होते पाया। वह खुशी से दौडकर यह खबर करने भैया भाभी के पास गयी तो मालूम हुआ कि उस मकान को बैंक ने किराए पर ले लिया है, वह इस गांव में अपनी शाखा खोलनेवाली है।

‘चलो , अच्‍छा हुआ , कम से कम यह जगह साफ सुथरी तो रहेगी’ एक सौंदर्यप्रेमी के लिए यह सूचना सामान्‍य नहीं थी। मात्र पंद्रह दिनों की सफाई के बाद बाग बगीचा, आंगन पिछवाडा, घर बाहर सब खूबसूरत हो गया था। फिर दूसरे दिन जब वह कॉलेज से लौटी तो उस मकान के सामने बैंक का बोर्ड भी टंगा पाया। हाथ मुंह धोकर खाना खाकर पुस्‍तकें लेकर वह फिर बालकनी में पडी चौकी पर बैठ गयी थी। उस दिन ज्‍योंहि उसकी नजर किताब से उठकर उस मकान की ओर गयी, उसने नीतिश को भी अपनी ओर देखता पाया था, घबडाकर उसने अपनी नजर हटा ली थी। वह उसके बालकनी के सामने की खिडकी से सटकर लगी कुर्सी में बैठा था। फिर तो बार बार उनकी नजरें एक दूसरे से टकराने लगी थी। ‘ओह , अब तो यहां पढना भी दूभर हो गया’ वह गुस्‍से में कमरे में आ गयी थी। पर कमरे में उसका मन कहां लगता था, वह बार बार इंतजार करती कि कब बैंक बंद हो और उसे बालकनी में बैठने का मौका मिले। चार बजे जब खिडकी बंद हो गयी, तब वह बालकनी में आकर चैन से पढाई करने लगी। उसने हिंदी साहित्‍य में स्‍नातक की परीक्षा पासकर इसी वर्ष एम ए में प्रवेश लिया था। उसके कॉलेज में पी जी की पढाई सवेरे ही होती थी और वह ग्‍यारह बजे तक घर वापस आ जाती थी। बिना बालकनी में गए उसे दिनभर का समय काटना बडा मुश्किल लगता था, बैंक को बंद होने में कभी पांच तो कभी छह बज जाते थे, उसके लिए बडी मुसीबत हो गयी थी।

पर अगली सप्‍ताह सोमवार को जब वह कॉलेज से वापस आयी, उसने खिडकी के पास पडी उस कुर्सी को खाली ही पाया। ‘तो आज जनाब छुट्टी में हैं, मुझे आज बोर नहीं होना पडेगा।‘ वह खुश होकर बालकनी में पढने बैठ गयी थी। दूसरे और तीसरे दिन भी कुर्सी खाली देखकर उसे बडा आराम मिला, पर चौथे रोज भी कुर्सी खाली ही मिली, तो उसका मन घबडा गया। पता नहीं, वो काम पर क्‍यूं नहीं आ रहा , तबियत खराब हो गयी या मन नहीं लगा यहां, पता नहीं कहां से आया था वो, तबादला तो नहीं करवा लेगा, कहीं उसके साथ कोई अनहोनी तो नहीं हो गयी, सारे प्रश्‍न अनुत्‍तरित ही थे, पर आशंका को सोंच सोंचकर मन भारी हो रहा था। सुबह अनमने भाव से वह कॉलेज चली गयी थी, वहां भी उसका दिल नहीं लगा था। पर कॉलेज से लौटते वक्‍त गांव पहुंचने से थोडी देर पहले अपने बगल की सीट पर बैठे नवयुवक के चेहरे पर नजर पडी , तो वह चौंक ही गयी थी ‘आप यहां ?’ उसके मुंह से स्‍वयं ही निकल पडा था।

उसके बाद नीतिश से बातचीत करते हुए उसका बचा सफर आसान हो गया था, गांव पहुंचकर दोनो अपने अपने रास्‍ते चल दिए थे। बात करते वक्‍त वह नीतिश के हाव भाव से वह समझ चुकी थी कि वह बहुत अच्‍छा लडका है। छोटी सी एक ही मुलाकात में उसे नीतिश से कोई भय नहीं रह गया था और वह फिर से अपना हर काम बालकनी के चौकी पर ही करने लगी थी। कभी कभी कॉलेज आते जाते नीतिश से भेंट हो ही जाती थी , उसकी बातचीत का अंदाज ही निराला था, धीरे धीरे वह नीतिश के आकर्षण में बंधती जा रही थी। बहुत जल्‍द ही एक दिन अपने प्रेम का खुद ही इजहार कर बैठी, पर इस मामले में नीतिश गंभीर नहीं था। पहले तो उसकी बेवकूफी पर खूब हंसा, फिर उसे समझाने की पूरी कोशिश की कि यह मात्र आकर्षण है, जो क्षणिक होता है और हमें एक दूसरे को अच्‍छी तरह समझकर ही कोई निर्णय उठाना चाहिए।

फिर एक दिन शाम को भैया ने ड्राइंग रूम से आवाज लगायी थी ‘मीनू दो कप चाय लाना’ वह चाय तैयार कर उसे लेकर ड्राइंग रूम में पहुंची ही थी कि सामने नीतिश को भैया से बातचीत करते पाया था। दिल की तेज हुई धडकन को बडी मुश्किल से संभालती चाय की ट्रे सेंटर टेबल पर रखकर वह भागने ही वाली थी कि भैया ने उसे बिठाकर उन दोनो का एक दूसरे से परिचय करवाया था और वे कह भी नहीं सके थे कि वे दोनो एक दूसरे को जानते हैं। भैया ने उसे बताया कि यहां ट्रांसफर होने की बात पता लगने पर नीतिश ने अपने दोस्‍तो और रिश्‍तेदारों से इस गांव के एक दो लोगों के नाम पते मालूम कर लिए थे और मौका मिलते ही भैया से मिलने यहां आ गया था। भैया तो काफी मिलनसार स्‍वभाव के थे ही, इस बैंक से अक्‍सर उनका काम पडता तो शहर जाने की जरूरत होती थी , अब तो सारा काम यहीं हो जाएगा, यह सोंचकर उसने नीतिश की और अधिक आवभगत की थी। नीतिश के सामने उसकी प्रशंसा करते भैया थक नहीं रहे थे और वह शर्माकर भाग खडी हुई थी।

उसने सुना था कि टीन एज बडे महत्‍वपूर्ण होते हैं, युवावस्‍था के आगमन के बाद लडके लडकियों की गतिविधियों में बडा परिवर्तन देखने को मिलता है। पर उसके टीनएज में मां की आकस्मिक मृत्‍यु ने उसे स्‍वाभाविक जीवन जीने नहीं दिया था। बचपन से ही धीर गंभीर स्‍वभाव की वह अभी तक ऐसी ही बनी हुई थी। उसने सहशिक्षा वाले स्‍कूल कॉलेजों में ही पढाई की थी, लडकों से हमेशा उसके दोस्‍ताना संबंध रहे हैं। वे अक्‍सरहा उसके घर भी आया करते हैं, घर के लोगों को सबपर पूरा विश्‍वास है, उसने कभी उनके विश्‍वास को ठेस भी नहीं पहुंचायी है। उसने तो किताबों से नजरे उठाकर देखा भी था, तो किसी युवक में कुछ खास नजर नहीं आया था। पर अब क्‍या हो गया था? इस उम्र में नीतिश के प्रति आकर्षण को वह कोई नाम नहीं दे पा रही थी। वह चोरी चोरी नीतिश को देखा करती, दो चार दिन में ही उससे मिलने का कोई न कोई कार्यक्रम बनाया करती। भले ही किसी को मालूम हो न हो, उसे खुद भी महसूस होता कि उसका मजबूत दिल नीतिश से हार चुका था। यहां तक कि प्रकृति की सुंदरता और समाज की समस्‍याओं का चित्रण करनेवाली उसकी कविताएं भी अब प्‍यार और मुहब्‍बत के ही गीत गाने लगी थी। और एक दिन नीतिश ने भी प्‍यार का इजहार कर ही दिया, नीतिश की स्‍वीकृति मिल जाने पर उसके ख्‍वाबों को तो पंख लग गए थे, इशारे ही इशारों में, बातों ही बातों में उन्‍होने न जाने कितनी नजदीकियां तय कर ली थी।

पर कुछ ही दिनों में किसी तरह इसकी भनक भाभी को लग गयी थी, भाभी ने उसे बहुत समझाया, ‘एक सामान्‍य घराने का एक बैंक कर्मचारी, कितनी इज्‍जत है समाज में उसकी? तुम्‍हारी सभी बहनों का विवाह उच्‍च स्‍तरीय व्‍यवसायी या सरकारी कर्मचारियों से हुई है। खुद तुम्‍हारे लिए भी उच्‍च स्‍तरीय अधिकारी वर की खोज हो रही है, इस नीतिश में क्‍या खूबी है, जो तुम इसके आकर्षण में बंधी हो ?’

‘भाभी, मुझे खुद भी पता नहीं, पर हमें अलग न करें, हमारी शादी करवा दें आप, हम एक दूसरे के बिना नहीं जी सकते अब’

’ठीक है, मै तुमलोगों के विवाह की तैयारी करती हूं, पर तुम्‍हारे कारण लोग हमारी इज्‍जत धूल में मिल जाएगी, इसकी जरा भी परवाह है तुम्‍हें। सब यही कहेंगे न कि मां नहीं थी, इसलिए भाभी ने संभाला नहीं, बेटी बिगड गयी’

‘नहीं भाभी, ऐसा न कहो, तुमने मुझे बहुत प्‍यार दिया है, मैं अहसानमंद हूं तुम्‍हारी’

’तो तुम जो कर रही हो वही इस अहसान का बदला है न’

इसके बाद और कुछ भी सुनने की हिम्‍मत उसे न थी , अपने बिस्‍तरे पर आकर फूटफूटकर रो रही थी और उसके आंसू पोछनेवाला तक कोई नहीं था। आज पहली बार ‘मां’ और ‘मां समान’ में अंतर स्‍पष्‍टत: दिख रहा था। आज मां होती तो वह रूठकर शायद सबको मना लेती। पर रोते रोते उसने गंभीर निर्णय ले लिया था और उसे नीतिश को सुनाने में एक दिन की भी देर न की थी। सुनकर नीतिश को तो काठ ही मार गया था, पर पूरी बात सुनने के बाद उसे मजबूर भी नहीं कर सका था। इतने बडप्‍पन युक्‍त व्‍यक्तित्‍व को अपना पति नहीं बना सकने पर अपने भाग्‍य पर तो वह सिर्फ रो ही सकती थी। ऐसी परिस्थिति में उसका अध्‍ययन भी बाधित हो गया होता यदि वह कुछ ही दिनों में विवाह बंधन में न बंध गयी होती।एक बडी आई टी कंपनी में घरवालों के स्‍तर के अनुरूप एक हाई फाई लडके से उसका विवाह हो गया था और उसने यहां दिल्‍ली में ही अपनी पढाई पूरी करने का निश्‍चय किया था। पापा और भैया की मर्जी तो थी कि वह वहीं से पढाई पूरी करे, पर वह उस परिवेश से पूर्णतया दूर होना चाहती थी, जिसने उसे इतना कमजोर बना डाला था। शादी तय होने या मंगनी होने के बाद नीतिश ने कभी भी उससे मिलने की कोशिश नहीं की थी।

भैया के साथ उसका संबंध दिन ब दिन प्रगाढ होता जा रहा था, इसलिए उसका घर पर आना बेरोकटोक जारी था, पर वह तभी आता जब वह कॉलेज में होती। वैवाहिक कार्यों में भी उसने भैया का पूरा हाथ बंटाया था, पर कभी उसके नजदीक आने की कोशिश नहीं की थी। कभी कभार आते जाते उसने नीतिश के चेहरे पर पीडा का अनुभव अवश्‍य किया था, पर इसपर ध्‍यान न देना ही उसके लिए जरूरी था। शादी के बाद पति के रूप में उसे मोहित जैसा समझदार परिपक्‍व और भरपूर प्‍यार करनेवाला व्‍यक्तित्‍व प्राप्‍त हुआ था। मोहित के प्‍यार में वह नीतिश को कबका भूल चुकी थी। अपनी गृहस्‍थी और दाम्‍पत्‍य जीवन को सुखी बनाने के लिए उसने गांव की ममता का भी परित्‍याग कर दिया था। पर इतने दिन बाद नीतिश यहां आकर उसके गार्हस्‍थ्‍य जीवन में आग लगाएगा, उसने उम्‍मीद न की थी। रातभर उसे अच्‍छी तरह नींद भी नहीं आयी। सुबह मोहित को बाहर जाना था। हर माह के अंत में ऑफिस के आवश्‍यक कार्यों को निबटाने हेतु मोहित बाहर दौरे पर रहते हैं एवं अगले माह की पहली तारीख को ही घर वापस लौटते हैं। मोहित के लिए लंच बॉक्‍स तैयार कर नाश्‍ता कराके उसने उन्‍हें विदा किया। नींद पूरी न होने की वजह से दिनभर तबियत खराब महसूस होती रही, परंतु फिर भी उसने आवश्‍यक कार्यों को निबटाया, नहा धोकर पूजापाठ किए और ईश्‍वर से सारी परिस्थितियों को नियंत्रित करने की विनती की।

तीन चार दिन उधेडबुन में ही व्‍यतीत हुए। इतने दिन दरवाजे की हर घंटी से वह चौंक पडती, हर वक्‍त उसे नीतिश के आने का ही अंदेशा होता। पर दरवाजा खोलने पर वहां दूधवाला, पेपरवाला, महरी मिसेज गुप्‍ता या मिसेज जोशी खडी मिलती। ‘धत्‍तेरे की , मेरे अनुमान को क्‍या हो गया’ अपनी मानसिक स्थिति को शांत रखने की जितनी ही चेष्‍टा करती, विफलता उतनी ही हाथ लगती। खैर पहली तारीख आ गयी और सुबह सुबह ही मोहित पहुंच गए। नहा धोकर, सारे काम निबटाते हुए ऑफिस की ओर चल पडे। ठीक पांच बजे शाम मोहित के आने का वक्‍त है, इसलिए पांच बजे घंटी बजते ही उनके इंतजार में सज संवरकर खडी उसे दौडकर दरवाजा खोलने की आदत पड गयी है। इसलिए आज शाम भी जैसे ही घंटी बजी, उसे उठकर दरवाजे खोलने में लेशमात्र भी देर न हुई, पर यह क्‍या? आज तो मोहित की जगह नीतिश खडा था। उसके दिल की धडकन तेज हो गयी। डरते हुए उसने नीतिश को ड्राइंग रूम में बैठाया।

तुरंत बाद ही मोहित पहुंच गए, तो वह सामान्‍य हुई। मोहित के सामने सामान्‍य ही बने रहने की चेष्‍टा करते हुए वह उनके साथ बैठकर गप शप में शामिल हो गयी। मोहित और नीतिश बहुत जल्‍दी घुलमिल गए। बातों ही बातों में मालूम हुआ कि नीतिश ने पता कर लिया था कि पांच बजे मोहित ऑफिस से आ जाते हैं, इसलिए उसने अपने आने के लिए यही समय चुना था। उसने यह भी मालूम कर लिया था कि हर महीने के अंत के दो चार दिन वे बाहर रहते हैं, इसलिए वह पहली तारीख को आया था। एक घंटे सब बातचीत करते रहे, बिल्‍कुल सहज और हल्‍की फुल्‍की। वह बीच में ही उठकर चाय नाश्‍ते के लिए रसोई में आ गयी थी, पर कान ड्राइंग रूम में ही लगे थे। कुछ ही देर में दोनो के ठहाकों से घर गूंजने लगा। फिर सबने साथ नाश्‍ता किया और चाय भी पी। उसकी नजर नीतिश के चेहरे पर पडी। चेहरे पर कोई शैतानी नहीं, वही भोलाभाला प्‍यारा सा मुस्‍कुराता चेहरा, वह तो मात्र उनसे मिलने आया था, और ये मन ही मन बात का बतंगड बना चुकी थी। अपनी बेवकूफी पर वह हंस पडी। और फिर नीतिश जाने के लिए उठ खडा हुआ, मोहित उसे डिनर के लिए बार बार रोकते रहे, उसकी भी इच्‍छा थी कि नीतिश रूक जाए, पर कह ना सकी। सबसे विदा लेकर वह चलता बना। नीतिश को छोडने बाहर आयी वो उसे जाते हुए गली के अंतिम छोर तक देखती ही रही। उसके दिल में नीतिश के लिए जगह और बढ गयी थी, नीतिश के सामने वह दोबारा हार चुकी थी।

13 comments:

  1. खूबसूरत प्रेम कहानी और बहुत ही सकारात्मक अंत।

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  2. बेहतरीन...प्रेमानुभूति दिल को छू गई.!

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  3. नीतिश नें संभवत: सही मायनों में प्रेम का मायना जाना है।

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  4. बहुत अच्छी कहानी है संगीता जी, बधाई।

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  5. मन को छू जाये यह एसी प्रेमकहानी है।

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  6. संगीता जी आपकी कहानी जिज्ञासा पैदा कर पाठक को जोडती है, नायिका के मनोविज्ञान और कश्मकश को उकेरती है और नायक को सुखद परिदृश्य में प्रस्तुत करती है। हार्दिक बधाई।

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  7. कहानी मधुर अहसासों पर है और जुडी हुए महसूस होती है।

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  8. बेहतरीन,कभी -कभी जिसे अपना समझ बैठने की भूल करते है वह तो नहीं समझ पाता मगर जो हमें समझना चाहता है उसे हम मौक़ा नहीं देते !

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  9. सहमत हूँ पी.सी गोदियाल जी से अक्षरश:।

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  10. जीवन की दौड में प्रेम वश कौन किस के पीछे दौड रहा है यह हमें समय रह्ते नहीं मालूम हो पाता.. शायद पीछे मुड कर न देखने की आदर के कारण...

    सुन्दर प्रेम कथा.

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  11. बेहतरीन.शब्द नहीं हैं मेरे पास.

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