कल बाद दिवस है। बच्चों के लिये चाचा नेहरू का जन्मदिवस। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू के अनेक रूप हैं; वे एक लेखक थे, एक इतिहासविद, दार्शनिक-चिंतक, स्वतंत्रता सेनानी, कुशल वक्ता और कामयाब नेता। उनके विराट व्यक्तित्व पर जितनी भी चर्चा हो कम है। भारतवर्ष की आत्मा तथा प्रथम प्रधानमंत्री पं जवाहर लाल नेहरू का जन्म 14 नवम्बर 1889 में कश्मीरी वंश के सारस्वत ब्राह्मण वकील मोतीलाल नेहरू और स्वरूप रानी नेहरू जी के घर इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश मे हुआ। वे बचपन से ही रामायण और महाभारत की कहानियाँ सुनते हुए संस्कारित हुए।


रचनाकार परिचय:-

अभिषेक सागर का जन्म 26.11.1978 को हुआ। अपनी साहित्यिक अभिरुचि तथा अध्ययन शील प्रवृत्ति के कारन आप लेखन से जुडे।

आप साहित्य शिल्पी के संचालक सदस्यों में हैं।
नेहरू जी के बचपन की यह घटना है। उनके घर पिंजरे में एक तोता पलता था। पिता मोतीलालजी ने तोते की देखभाल का जिम्मा अपने माली को सौंप रखा था। एक बार जब नेहरूजी स्कूल से वापस आए तो तोता उन्हें देखकर जोर-जोर से बोलने लगा। नेहरूजी को लगा कि तोता पिंजरे से आजाद होना चाहता है। उन्होंने पिंजरे का दरवाजा खोल दिया। तोता आजाद होकर एक पेड़ पर जा बैठा और नेहरूजी की ओर देख-देखकर कृतज्ञ भाव से कुछ कहने लगा। उसी समय माली आ गया। उसने डाँटा- 'यह तुमने क्या किया! मालिक नाराज होंगे।' बालक नेहरू ने कहा- 'सारा देश आजाद होना चाहता है। आजादी सभी को मिलनी चाहिए।' बचपन से ही इस उच्चकोटि के विचारक थे नेहरू जी।

नेहरू जी की स्कूली शिक्षा हैरो और कॉलेज की शिक्षा लंदन के ट्रिनिटी कॉलेज तथा लॉ की पढाई कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से हुई। विदेश में रहते हुए, देश की पुकार सुन उन्होने लिखा – “यह हिन्दुस्तान क्या है जो मुझपर छाया बन हुआ है और मुझे बराबर अपनी ओर बुला रहा है”। वे इंग्लैड में 7 साल बिता कर 1912 मे भारत लौट आये तथा वकालत शुरू की। 1916 मे कमला नेहरू जी से इनकी शादी ही और उन्ही की प्रेरणा से पं. नेहरू स्वतंत्रता संग्राम मे कुद पडे।
1917 मे होम रूल लीग से आरंभ होता है स्वतंत्रता सेनानी पं. जवाहर लाल नेहरू का सफर और फिर जब रॉलेट अधिनियम के खिलाफ गाँधी जी ने अभियान शुरू किया तो नेहरू जी प्रमुख सहयोगी के रूप में इस आन्दोलन में इसमे कूद पडे। 1920-1922 में असहयोग आंदोलन में सक्रिय हिस्सा के दौरान पहली बार वे गिरफ्तार किए गए और कुछ महीनों के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया। 1924 में नेहरू जी इलाहाबाद नगर निगम के अध्यक्ष चुने गए और दो वर्ष तक इस पद पर रहे। इसी समय की एक घटना है नेहरूजी तब इलाहाबाद नगर पालिका के अध्यक्ष थे। अधिशासी अधिकारी ने उनकी स्वीकृति से कुछ ऐसे लोगों के पानी की आपूर्ति काट दी, जिन्होंने काफी समय से जल कर जमा नहीं किया था। उनमें नेहरूजी के घर का कनेक्शन भी था और वह उनके पिता मोतीलालजी के नाम था। 1926 में उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों से सहयोग की कमी का हवाला देकर इस्तीफा दे दिया। 1926 से 1928 तक, जवाहर लाल ने अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के महासचिव के रूप में सेवा की। दिसम्बर 1929 में, कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन लाहौर में आयोजित किया गया जिसमें जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष चुने गए। इसी सत्र के दौरान एक प्रस्ताव भी पारित किया गया जिसमें भारत की स्वतंत्रता की मांग की गई। 26 जनवरी, 1930 को लाहौर में जवाहरलाल नेहरू ने स्वतंत्र भारत का झंडा फहराया। गांधी जी ने भी 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन का आह्वान किया। आंदोलन खासा सफल रहा और इसने ब्रिटिश सरकार को प्रमुख राजनीतिक सुधारों की आवश्यकता को स्वीकार करने के लिए मजबूर कर दिया। ब्रिटिश सरकार ने भारत अधिनियम 1935 प्रख्यापित किया तब कांग्रेस पार्टी ने चुनाव लड़ने का फैसला किया। नेहरू चुनाव के बाहर रहे लेकिन ज़ोरों के साथ पार्टी के लिए राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया। कांग्रेस ने लगभग हर प्रांत में सरकारों का गठन किया और केन्द्रीय असेंबली में सबसे ज्यादा सीटों पर जीत हासिल की। नेहरू कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए 1936, 1937 और 1946 में चुने गए थे। उन्हें 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गिरफ्तार भी किया गया और 1945 में छोड दिया गया। 1947 मे आज़ादी के बाद वे देश के प्रथम प्रधानमंत्री बने तथा आधुनिक भारत के निर्माण में सक्रिय भूमिका अदा की।

वे नितांत संवेदनशील थे। नवंबर 1947 में वे जब अपनी कश्मीर यात्रा के समय बारमूला में गए तो वहाँ पाकिस्तानी तत्वों द्वारा जनता पर किए गए अत्याचारों के बारे में सुनकर उनकी आँखें भर आईं। लौटते समयएक स्थान से उन्होंने कुछ फूल चुनकर अपने पास रख लिए। जब नेहरूजी से यह पूछा गया कि वे इन फूलों का क्या करेंगे तो उन्होंने हृदयस्पर्शी भाव में बड़े दुःखी स्वर में उत्तर दिया- 'दिल्ली पहुँचकर मैं इन फूलों को पूज्य बापू के चरणों में भेंट चढ़ाकर कहूँगा कि बारामूलामें अब केवल इतनी ही सुंदरता और सभ्यता शेष रह गई है।' एसी ही एक घटना है; वे तीन मूर्ति भवन के बगीचे में पेड़-पौधों के बीच से गुजरते घुमावदार रास्ते पर चाचा टहल रहे थे। तीन मूर्ति भवन प्रधानमंत्री का सरकारी निवास था। एकाएक उन्हें किसी बच्चे के बिलखने की आवाज आई; आस-पास देखा तो उन्हें झुरमुट में एक दो माह का बच्चा दिखाई दिया जो दहाड़े मारकर रो रहा था। इसकी माँ कहीं भी नजर नहीं आ रही थी। नेहरू जी नें झुककर बच्चे को उठाया, उसे बाँहों में झुलाया, उसे थपकियाँ दीं। बच्चा चुप हो गया और उसकी मुस्कान खिल उठी। एसे थे चाचा नेहरू। पंडित नेहरू अपना अधिकतर समय बच्चों के साथ बिताते और उस समय स्वयं भी बच्चे बन जाते थे। “पिता के पत्र पुत्री के नाम” केवल उनका अपनी पुत्री इंदिरा गाँधी को लिखे गये पत्रों का संग्रह ही नहीं है यह बच्चों के लिए ग्यान का भंडार है।

'आराम-हराम है' का नारा उन्होंने ही दिया था। स्वयं वे कठोर परिश्रम करते थे। म.प्र. के पूर्व पुलिस प्रमुख रुस्तमजी को थोड़े समय के लिए नेहरूजी के सान्निध्य में कार्य करने का अवसर मिला। अपने संस्मरण में उन्होंने लिखा है, 'मैं उन्हें देख हैरान हो जाता हूँ। कैसे एक वृद्ध-सा व्यक्ति अट्ठारह-अट्ठारह घंटे लगातार काम किए चला जाता है! मध्य रात्रि को लगभग तीन सौ पत्र लिखवाए जाते, जो सुबह उनकी मेज पर हस्ताक्षर के लिए तैयार रहने चाहिए। हमने देखा, वे कार से जा रहे हैं किंतु आँखों पर चश्मा चढ़ाए, नजर फाइल पर गड़ी है। इसके बावजूद आदिवासियों के वस्त्र पहनकर नाचने, रामलीला देखने और राबर्ट फ्रॉस्ट की कविता पढ़ने का समय निकाल लेते थे।' अपने लोंगों की उन्हें गहरी परख थी, वे भारत के आम जन की नब्ज जानते थे। एक बार नेहरूजी पंजाब के एक स्थान पर एक सिंचाई योजना का उद्घाटन करने गए, तो अधिकारियों ने उन्हें चाँदी का फावड़ा थमाकर योजना का उद्घाटन करने का अनुरोध किया। नेहरूजी ने चाँदी का फावड़ा फेंककर पास में पड़ा लोहे का फावड़ा उठाकर उद्घाटन करते हुए कहा- 'भारत का किसान क्या चाँदी के फावड़े से खेती करता है?'। शायद यही कारण है कि उनकी जनप्रियता का आज भी कोई मुकाबला नहीं है।

नेहरू जी अपनी विदेश नीति, पंचशील तथा गुटनिर्पेक्षता के लिये भी जाने गये। वे वर्ष 1955 में भारत के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मनित किये गये। प्रधानमंत्री नेहरू ने चीन की तरफ मित्रता का हाथ भी बढाया था, लेकिन 1962 में चीन ने धोखे से आक्रमण कर दिया। नेहरू जी के लिए यह सदमा था और शायद उनकी मौत भी इसी कारण हुई। 27 मई, 1964 को जवाहरलाल नेहरू को दिल का दौरा पडा और वे पंचतत्व में विलीन हो गये।

9 comments:

  1. abhishek bahut shrm kiya hai .is ke liye shubhkamnayen
    aajadi ke bad ka pridrishy aaj bhi vivadaspd hai bahut kuchh desh ke sath vh huaa jo nhi hona chahiye tha us ka khamiyaja aaj bhi desh bhugt rha hai shanti aur pnchshil esi hi bhynkr bhool thiyh bhool hi aaj naasoor bn rhi hai aajadi ke bad gandhi ji ko kisi ne poochha nhi netik man dndon ko dkiyanoosi ghosit krva diya pr chlo prmpra nirvhn ke liye sb thik haifir se shubhkamna
    dr. ved vyathit

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  2. बाल सिवस की शुभकामनायें। बहुत सारगर्भित आलेख है।

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  3. चाचा नेहरू के जन्‍मदिन पर इतने अच्‍छे आलेख के लिए शुक्रिया .. भारत के सारे बच्‍चों को बालदिवस की बधाई !!

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  4. बाल दिवस की हार्दिक शुभकामनायें।

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  5. बाल दिवस की हार्दिक शुभकामनायें।
    सारगर्भित लेख पर बहुत -बहुत बधाई.

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  6. ABHISHEK JI
    CONGRATS ON THE SPECIAL DAY.
    GOOD ONE AS INFORMATIVE, INNOVATIVE AND WEEL SENTENCED.

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  7. अभिषेक जी,
    अपने देश के महापुरुषों के प्रति सच्ची श्रद्घा रखना देशभक्ति की निशानी है.अपने आलेख में नेहरु जी के व्यक्तित्व के संवेदनशील पक्ष को उजागर कर के प्रशंसनीय कार्य किया है.
    बालदिवस के अवसर पर बाल - पाठकों को एक अनमोल उपहार मिला है.
    ----किरण सिन्धु.

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  8. बाल उपयोगी गभीर लेख... बधाई

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  9. अभिषेक जी, aapke aalekh me कल बाद दिवस है। likha hai jo ki galat hai use बाल दिवस kar le dhanyavaad..........shiv dwivedi JBP

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