Chattisgarh ke Teerth by Pr. Ashwini Kesarwani
छत्तीसगढ़ के अधिकांश शिव-मंदिर सृजन और कल्याण के प्रतीक स्वरूप निर्मित हुए हैं। लिंग रहस्य और लिंगोपासना के बारे में स्कंद पुराण में वर्णन मिलता है, उसके अनुसार भगवान महेश्वर अलिंग हैं, प्रकृति प्रधान लिंग है -
आकाशं लिंगमित्याहु पृथिवी तस्य पीठिका।
आलय: सर्वदेवानां लयनाल्लिंग मुच्यते।।

अर्थात् आकाश लिंग और पृथ्वी उसकी पीठिका है। सब देवताओं का आलय में लय होता है, इसीलिये इसे लिंग कहते हैं। हिन्दू धर्म में शिव का स्वरूप अत्यंत उदात्त रहा है। पल में रुष्ट और पल में प्रसन्न होने वाले और मनोवांछित वर देने वाले औघड़दानी महादेव ही हैं।
Chattisgarh ke Teerth by Pr. Ashwini Kesarwaniरचनाकार परिचय:-भारतेन्दु कालीन साहित्यकार श्री गोविं‍द साव के छठवी पीढी के वंशज के रूप में १८ अगस्त, १९५८ को सांस्कृतिक तीर्थ शिवरीनारायण में जन्मे अश्विनी केशरवानी वर्तमान में शासकीय महाविद्यालय, चांपा (छत्तीसगढ़) में प्राध्यापक के पद पर कार्यरत हैं। वे देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में तीन दशक से निबंध, रिपोर्ताज, संस्मरण एवं समीक्षा आदि लिख रहे हैं एवं आकाशवाणी के रायपुर एवं लासपुर केन्द्रों से उनकी अन्यान्य वार्ताओं का प्रसारण भी हुआ है। वे कई पत्रिकाओं के संपादन से भी सम्बद्ध हैं। अब तक उनकी "पीथमपुर के कालेश्वरनाथ" तथा "शिवरीनारायण: देवालय एवं परम्पराएं" नामक पुस्तकें प्रकाशित हैं और कुछ अन्य शीघ्र प्रकाश्य हैं|

छत्तीसगढ़ में राजा-महाराजा, जमींदार और मालगुजारों द्वारा निर्मित अनेक गढ़, हवेली, किला और मंदिर आज भी उस काल के मूक साक्षी है। कई लोगों के वंश खत्म हो गये और कुछ राजनीति, व्यापार आदि में संलग्न होकर अपनी वंश परम्परा को बनाये हुए हैं। वंश परम्परा को जीवित रखने के लिए क्या कुछ नहीं करना पड़ता? राजा हो या रंक, सभी वंश वृद्धि के लिए मनौती मानने, तीर्थयात्रा और पूजा-यज्ञादि करने का उल्लेख तत्कालीन साहित्य में मिलता है। देव संयोग से उनकी मनौतियां पूरी होती रहीं और देवी-देवताओं के मंदिर इन्ही मनौतियों की पूर्णता पर बनाये जाते रहे हैं, जो कालान्तर में उनके ‘‘कुलदेव’’ के रूप में पूजित होते हैं। छत्तीसगढ़ में औघड़दानी महादेव को वंशधर के रूप में पूजा जाता है। खरौद के लक्ष्मणेश्वर महादेव को वंशधर के रूप में पूजा जाता है। यहाँ लखेसर चढ़ाया जाता है। हसदो नदी के तट पर प्रतिष्ठित कालेश्वरनाथ महादेव वंशवृद्धि के लिए सुविख्यात् है। खरियार के राजा वीर विक्रम सिंहदेव ने कालेश्वर महादेव की पूजा अर्चना कर वंशवृद्धि का लाभ प्राप्त किया था। खरियार के युवराज डा. जे. पी. सिंहदेव ने मुझे सूचित किया है- ‘‘मेरे दादा स्व. राजा वीर विक्रम सिंहदेव ने वास्तव में वंशवृद्धि के लिए पीथमपुर जाकर कालेश्वर महादेव की पूजा और मनौती की थी। उनके आशीर्वाद से दो पुत्र क्रमश: आरतातनदेव, विजयभैरवदेव और दो पुत्री कनक मंजरी देवी और शोभज्ञा मंजरी देवी हुई और हमारा वंश बढ़ गया।‘‘ इसी प्रकार माखन साव के वंश को महेश्वर महादेव ने बढ़ाया। इन्ही के पुण्य प्रताप से बिलाईगढ़-कटगी के जमींदार की वंशबेल बढ़ी और जमींदार श्री प्रानसिंह बहादुर ने नवापारा गाँव माघ सुदी 01 संवत् 1894 में महेश्वर महादेव के भोग-रागादि के लिए चढ़ाकर पुण्य कार्य किया।


महानदी के तट पर छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध मालगुजार श्री माखनसाव के कुलदेव महेश्वर महादेव और कुलदेवी शीतला माता का भव्य मंदिर, बरमबाबा की मूर्ति और सुन्दर घाट है। सुप्रसिद्ध साहित्यकार पंडित मालिकराम भोगहा द्वारा लिखित श्रीशबरीनारायण माहात्म्य के अनुसार इस मंदिर का निर्माण संवत् 1890 में माखन साव के पिता श्री मयाराम साव और चाचा श्री मनसाराम और सरधाराम साव ने कराया है। माखन साव भी धार्मिक, सामाजिक और साधु व्यक्ति थे। ठाकुर जगमोहनसिंह ने ‘सज्जनाष्टक‘ में उनके बारे में लिखा है:-
माखन साहु राहु दारिद कहं अहै महाजन भारी।
दीन्हो घर माखन अरू रोटी बहुबिधि तिनहिं मुरारी।।
लच्छ पती सुद शरन जनन को टारत सकल कलेषा।
द्रव्य हीन कहँ है कुबेर सम रहत न दुख को लेषा।।
दुओ धाम प्रथमहिं करि निज पग काँवर आप चढ़ाई।
सेतुबन्ध रामेसुर को लहि गंगा जल अन्हवाई।।
चार बीस शरदहुं के बीते रीते गोलक नैना।
लखि असार संसार पार कहँ मूंदे दृग तजि चैना।।

उनके अनुसार माखनसाव क्षेत्र के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने बद्रीनाथ और रामेश्वरम् की यात्रा की और 80 वर्ष तक जीवित रहे। उन्होंने महेश्वर महादेव और शीतला माता मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। उनके पौत्र श्री आत्माराम साव ने मंदिर परिसर में संस्कृत पाठशाला का निर्माण कराया और सुन्दर घाट और बाढ़ से भूमि का कटाव रोकने के लिए मजबूत दीवार का निर्माण कराया। इस घाट में अस्थि विसर्जन के लिए एक कुंड बना है। इस घाट में अन्यान्य मूर्तियाँ जिसमें शिवलिंग और हनुमान जी प्रमुख हैं, के अलावा सती चौरा बने हुए हैं। महेश्वरनाथ की महिमा अपरम्पार है, तभी तो कवि स्व. श्री तुलाराम गोपाल उनकी महिमा गाते हैं:-
सदा आज की तिथि में आकर यहाँ जो मुझे गाये
लाख बेल के पत्र, लाख चावल जो मुझे चढ़ाये
एवमस्तु! तेरे कृतित्व के क्रम को रखने जारी
दूर करूँगा उनके दुख, भय, क्लेश, शोक संसारी

महानदी में बाढ़ आने पर नदी का जल महेश्वरनाथ को स्पर्श कर उतरने लगता है। ठाकुर जगमोहनसिंह ने प्रलय में इसका उल्लेख किया है:-
बाढ़त सरित बारि छिन-छिन में। चढ़ि सोपान घाट वट दिन मे।
शिवमंदिर जो घाटहिं सौहै। माखन साहु रचित मन मोहै।।
चटशाला जल भीतर आयो। गैल चक्रधर गेह बहायो।
पुनि सो माखन साहु निकेता।। पावन करि सो पान समेता।।

शिवरीनारायण के अलावा हसुवा, टाटा और लखुर्री में महेश्वर महादेव का और झुमका में बजरंगबली का भव्य मंदिर है। हसुवा के महेश्वर महादेव के मंदिर को माखन साव के भतीजा और गोपाल साव के पुत्र बैजनाथ साव, लखुर्री के महेश्वरनाथ मंदिर को सरधाराम साव के प्रपौत्र प्रयाग साव ने और झुमका के बजरंगबली के मदिर को बहोरन साव ने बनवाया। इसी प्रकार टाटा के घर में अंडोल साव ने शिवलिंग स्थापित करायी थी। माखन वंश द्वारा निर्मित सभी मंदिरों के भोगराग की व्यवस्था के लिए कृषि भूमि निकाली गयी थी। इससे प्राप्त अनाज से मंदिरों में भोगराग की व्यवस्था होती थी। आज भी ये सभी मंदिर बहुत अच्छी स्थिति में है और उनके वंशजों के द्वारा सावन मास में श्रावणी पूजा और महाशिवरात्रि में अभिषेक किया जाता है।

शिवरीनारायण के इस महेश्वरनाथ मंदिर के प्रथम पुजारी के रूप में श्री माखन साव ने पंडित रमानाथ को नियुक्त किया था। पंडित रमानाथ ठाकुर जगमोहनसिंह द्वारा सन् 1884 में लिखित तथा प्रकाशित पुस्तक सज्जनाष्टक के एक सज्जन थे। उनके मृत्यूपरांत उनके पुत्र श्री शिवगुलाम इस मंदिर के पुजारी हुए। फिर यह परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी इस मंदिर का पुजारी हुआ। इस परिवार के अंतिम पुजारी पंडित देवी महाराज थे जिन्होंने जीवित रहते इस मंदिर में पूजा-अर्चना की, बाद में उनके पुत्रों ने इस मंदिर का पुजारी बनना अस्वीकार कर दिया। सम्प्रति इस मंदिर में पंडित कार्तिक महाराज के पुत्र श्री सुशील दुबे पुजारी के रूप में कार्यरत हैं।

सम्प्रति माखन साव के वंशजों ने मंदिर का जीर्णोद्धार करके मंदिर को आकर्षक बनवा लिया है। महाशिवरात्रि को इस मंदिर में पूजा-अर्चन और अभिषेक कराया जाता है। इसी प्रकार दोनों नवरात्र में शीतला माता के मंदिर में ज्योति-कलश प्रज्वलित कराया जाता है।

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