Story by Ravi Purohitरचनाकार परिचय:-
5जून, 1968 को श्रीडूंगरगढ में जन्मे श्री रवि पुरोहित अजमेर विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर हैं। विभिन्न सांस्कृतिक और साहित्यिक शोध कार्यों से जुड़े हुए तथा अनेक पुरुस्कारों से सम्मानित रवि पुरोहित 1986 से विभिन्न क्षेत्रीय और राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। राजस्थानी और हिंदी भाषा में अब तक आपकी छ: पुस्तकें विभिन्न विषयों पर छप चुकीं हैं। आपने कई स्तरीय पत्र पत्रिकाओं का संपादन भी किया है।

वे तीन थे। एक हिन्दू, दूसरा मुसलमान और तीसरा सिख। अलग-अलग कौम के पर तीनों मित्र थे। अंतरंग। हिन्दू एक बनिये के यहां मुनीम था। मुसलमान ने एक चौराहे पर लोहे का खोखा रख छोड़ा था। फटे पुराने कपड़ों की इस्त्री से सलवटें निकालता और अपना गुजारा करता। सिख ने बस-स्टैण्ड के पास एक छपरा डाल रखा था और दो-तीन पुराने मूढे उसके स्वामित्व में थे। चाय का ढाबा था। वह घर से आते वक्त सुबह स्टोव, चाय-चीनी के डिब्बे, पुरानी मैली केतली में दूध तथा चार-पांच किनारे टूटे या डण्डी झड़े कप-प्लेट लाता। दिन-भर दुकानदार बना रहता और रात को अपनी दुकानदारी पैबंदधारी, एक कस्से वाले थैले में समेट ले जाता।
तीनों अलग-अलग पेशे से सम्बन्धित थे पर तीनों आदमी थे। गूंगे थे या जान-बूझ कर बने हुए थे, कोई नहीं जानता। उन्हें कभी किसी से बोलते, किसी ने नहीं देखा। बस, मौहल्ले के लिए वे मात्र हिन्दू, मुसलमान और सिख थे। यही उनका परिचय था।
तीनों में गूंगेपन की समानता के साथ-साथ एक और बड़ी समानता थी। वह थी उनका निपट अकेला होना। न कोई आगे, न कोई पीछे। वे तीनों अपने चारों ओर स्वयं थे।
लोगों से हाथ-जोड़ 'रामरमी' के अलावा न घनिष्ठता थी तो न बैर। तीनों दुर्गा मौसी के यहां जरूर कभी-कभार चले जाते थे। क्यों जाते थे, वे स्वयं नहीं जानते। उनके लिए इतना काफी था कि मौसी उन्हें अच्छी लगती थी और अपनत्व देती थी।


मौसी के यहां वे कभी खाली हाथ नहीं गए क्योंकि वे मौसी की आर्थिक स्थिति से वाकिफ थे। इसीलिए मौसी के यहां जाने के दिन तीनों की स्वनियोजित जिम्मेदारी ओढी हुई थी। बनिये का मुनीम दो किलो आटे का पैकेट, तो सिख ढाबे पर बचा हुआ या फिर खरीदकर आधा किलो दूध और अखबार के कागजों में पुड़िया बांध कर थोड़ी-थोड़ी चाय-चीनी ले आता। धोबी के जिम्मे पत्तागोभी या फूल या फिर आधा किलो आलू व दो प्याज होते।
मौसी के घर जाते वक्त तीनों के चेहरे खुरदरे, आंखें पथरीली और पपड़ी जमे सूखे होठों पर सिकुड़न होती। वे मौसी के घर में खुल कर सांस लेते। बिलकुल आदमी की तरह। अनौपचारिक होकर रहते। बस, दुर्गा मौसी के साथ यही उनका सम्बन्ध था। मौसी सबकी मौसी थी, इसीलिए उनकी भी थी। वैसे वह उनकी कोई न थी।
जब वे मौसी के घर से लौटते होते तो उनके चेहरे सीलन-भरे से, आंखें भीगी-भीगी और होठों पर ललाई व फड़फड़ाहट होती।
मौसी का रहन-सहन और आचार-व्यवहार ही उसका परिचय था। निष्तेज आंखें, सूनी कलाईयां, बीहड़-सी विरान मांग और धोती रूपी अंगोछे पर नित्य बढते पड़-पैबंद ही मौसी की शख्सियत थी। मौहल्ले के घरों में झूठे बर्तन मांजना और दिनभर गुप्तांगों की गंदगी सहते कपड़ों की सफाई मौसी की जीवन गाथा। पर वह खुश थी। आपदाओं की कोई शिकन उनके चेहरे पर नहीं होती।
लता दुर्गा मौसी की इकलौती संतान थी। वयस्कता की दहलीज पर पांव रखने को आतुर अल्हड़ युवती। खूबसूरती का पारावार न था। मां-बेटी आपस में बहनें-सी लगती थी। दुर्गा मौसी भी उन दिनों 35-36 वर्षो की रही होगी।
तीनों मित्र चबूतरे पर बैठे थे।
अपने-अपने धंधे से लौट कर घण्टे-डेढ घण्टे साथ बैठना उनकी दैनिक क्रिया थी। वे चुप थे। हमेशा की तरह मुसलमान दोस्त गंदी हथेली में खैनी घोटने में तल्लीन था। सिख सूने गगन में न जाने क्या ढूंढ रहा था। हिन्दू अपनी टाँट खुजला रहा था। पलकें बार-बार झपक रही थी उसकी। वह एकाग्र न था। उद्विग्न-सा जेब से तुड़े-मुड़े नोट निकाल, गिनने लगा।
हथेली से थपकी मार खैनी का चूना उड़ाया गया। हल्के भूरे-काले रंग का नषा हथेली में तीनों के लिए तैयार था। तीनों ने चुटकियां भर होठों के भीतर जैसे छुपा कर मूंगा मोती रखा। बाकी का कूड़ा हाथ झाड़ कर गिरा दिया।
मुसलमान व सिख आदमी ने देखा, हिन्दू आदमी परेशान था। बार-बार नोट गिने जा रहा था। यह जानते हुए भी कि गिनने की आवृत्ति से नोट बढेंगे नहीं। दोनों कौमों की आंखें टकराई। तरल पदार्थ-सा आंखों में हिचकोले खाने लगा। पुतलियां गड्ड-मड्ड हुई। दोनों ने अपनी-अपनी जेबों में हाथ डाले। जितने भी रुपये थे, निकाले। गिने, पूरे दो सौ थे। हिन्दू की हथेली पर रख दिए।
उसने अंतिम बार टाँट खुजाई। आंखें एकाग्र हुई। फिर वह गहरा निश्वास छोड़ वह 'फिस्स' से हंस दिया।
अब तीनों निश्चिंत थे।
पास ही गोली चलने की आवाज सुन तीनों हड़बड़ा गये। एक-दूसरे को देखा। तीनों सलामत थे। वे अब भी आदमी थे। चबूतरे से नीचे उतरे। एक साथ झुके और चुटकी-चुटकी भर रेत उठा सर के लगा कर चबूतरे के पक्के फर्श पर डाली। 'ढिगली' बन गई। हल्के भूरे रंग की। सभी की रेत समान रंग की थी।
एक दूसरे को फिर देखा। सिख मित्र ने अनायास ब्लेड निकाल ली और अपनी चमड़ी कुरेदी। खून निकल आया। दोनों ने भी सिख आदमी का अनुसरण किया। तीनों का खून लाल था। रत्ती-भर भी फर्क नहीं।
फिर वे वहां एक पल भी न रुके। गोली की आवाज की दिषा में दौड़े। दो गली दौड़ने के बाद थम गये। देखा, दुर्गा मौसी के घर के आगे भीड़ थी। तीनों की रोमावली खड़ी हो गई। आतंकित-से इधर-उधर देखने लगे। भीड़ की फुसफुसाहट समेटने लगे और इस फुसफुसाहट में वाकया और इसका कारण टटोलने लगे।
पास ही खड़े लिजलिजी आंखों वाले आदमी ने रहस्योद्धाटन किया। दुर्गा मौसी की छोरी लता को जबरदस्ती जीप में डाल ले गये मरदुए। कौन बरजे? नेता का बेटा भी तो साथ था। एक-आध ने विरोध किया तो गोली चला दी। मौत के मुंह में अंगुली कौन देता? ले गये बेचारी को। जीवन तबाह कर देंगे गाय का। नालायक स्साले....। गहरा सांस ले वह एक तरफ हट गया।
तीनों ने देखा, वह आदमी था। हिन्दू, मुसलमान या सिख तो न था.....! फिर? गरीब कौम का रहा होगा कोई।
तीनों बौखलाये-से सिहरे। मन में भय समा गया। वे जानते थे कि विरोध का परिणाम घातक हो सकता था। जिन्दा बस्ती में बुलडोजर फिरवाया जा सकता था। या फिर रात के अंधेरे में उसे जला कर श्मसान की भस्मी बनाया जा सकता था। आंखें टकराई और फिर वे अलग-अलग दिशाओं में दौड़ गये।
देर रात गए आदमियों ने देखा, तीन नकाबपोश आदमी अंधाधुंध गोलियां बरसा रहे थे। एक-दूसरे पर। गोली किसी के नहीं लगी।
अगली सुबह तीनों को गिरफ्तार कर लिया गया। उन्होंने कोई प्रतिरोध न किया। यदि करते भी तो भी कुछ असर होने वाला नहीं था।
लता का कोई पता न लगा क्योंकि पता लगाया ही नहीं गया। मौसी की ओर से औपचारिक रिपोर्ट दर्ज कर ली गई। मौहल्ले के मौजीज आदमियों के बयान लिये गये, किसी को कुछ भी पता नहीं था। गरीब कौम वाले उस आदमी को भी नहीं।
तीनों को हवालात में डाल दिया गया पर वे खुष थे, क्योंकि सुरक्षित थे। उनके पास कुछ भी बरामद न हुआ। उन्होंने गोलियां क्यों चलाई, किसी ने नहीं पूछा। शायद जरूरत न रही होगी।
वे दिन-भर गहरी नींद सोते रहे। निर्द्वन्द्व, निर्विकार और निष्चिंत होकर। तीनों में से किसी को भी इससे मतलब न था कि उनके साथ क्या सुलूक किया जावेगा? वे वर्तमान में जी रहे थे, जो बेहद जर्जर और आतंकित करने वाला था। शाम को उनसे कड़ाई से पूछताछ की गई पर वे पत्थर थे। अंतत: उपलब्ध दो सौ सत्तर रुपये हड़प कर देर रात गये तीनों कथित उपद्रवियों को छोड़ दिया गया। बगैर किसी चेतावनी या जमानत के। वे हिरासत से मुक्ति नहीं चाहते थे पर सरकारी कायदे का पालन तो करना ही था।
बाहर उनके लिए कोई ठौर न थी। तीनों चबूतरे पर आकर अनमने-से लेट गये। रात को सब सो रहे थे। कल की घटना से बेखबर होकर पर वे तीनों जग रहे थे। उनकी नजरें सामने की दूधिया रोषनी से नहाई बिल्डिंग पर टिकी थी। वहां नारी आश्रम चलता था। यानि गरीब बेसहारा अबलाओं का सहारा था वह।
उनकी नजरों के सामने आश्रम का 'बैक डोर' था। जिसे सिर्फ संकटकालीन परिस्थितियों में उपयोग में लिया जाना होता था।
रात के तीसरे पहर उन्होंने आश्रम के पिछवाड़े के गेट पर एक कार रुकती देखी। एक स्वस्थ आदमी कार से उतरा। इधर-उधर देख कर तीन बार फाटक पर ठक-ठक की। गेट खुला और प्रबन्धिका ने आगन्तुक को देख, मुस्करा कर हाथ जोड़ दिए लगते थे। वे दोनों अन्दर चले गये।
तीनों ने अचकचाकर एक-दूसरे को देखा। आंखों की पुतलियां फुदकने लगी। आपस में एक-दूसरे का हाथ दबाया और पुन: उसी ओर देखने लगे।
वह आदमी एक लड़की को जबरदस्ती बाहों में उठाये ला रहा था। वह मचल रही थी, पर नारी थी। वे तीनों उकड़ू होकर बैठ गये। फिर वापस आंखें वहीं चिपका दी।
आदमी ने लड़की को कार की पिछली सीट पर डाल दिया और स्वयं भी बैठ गया। प्रबन्धिका ने हंसते हुए हाथ हिला कर आदमी को विदा किया और गेट बंद कर लिया। कार स्टार्ट हुई और पलक झपकते आगे बढ गई।
तीनों ने एक साथ लड़की में लता को देखा। उन्हें आदमी पर घिन्न हो आई। भीतर का आदमी जागा। तीनों की तनी हुई भींची मुट्ठियां एक साथ चबूतरे के फर्श पर पड़ी, पर वे स्थितप्रज्ञ थीं।
'आक....थू....!' उन्होंने एक साथ बलगम बाहर उछाला।
तीनों में मूक वार्ता हुई। लड़की को आश्रम से भगा ले जाने का आरोप कहीं उनके माथे न मढ दिया जावे, इसी चिंता से ग्रस्त थे।
फिर दुर्गा मौसी के यहां जाने का विचार किया पर मन नहीं माना। खुरदरे चेहरों से एक-दूसरे को टटोला। वे आदमी थे।
अगले दिन सिख ने दाढी मुंडवाई। हिन्दू ने नकली दाढी-मूंछे और भगवा वस्त्र पहने। मुसलमान ने इधर-उधर से कुछ मैले-कुचैले छोटे-छोटे चिकने पत्थर इकट्ठे कर संदूकची में भरे और फकीर बन गया।
तीनों ने वेष बदलकर एक-दूसरे को देखा और चौंक गये। वे तीनों ही खुद नहीं थे। आश्वस्त होकर बस्ती की अलग-अलग गलियों में फिसल गये।
दिन-भर इधर-उधर घूम-फिर कर रात को अंधेरे सूखे कुए की तलहटी पर तीनों मिले। एक-दूसरे को गहरी आंखों से देखा। गहरा निश्वास छोड़ जैसे एक-दूसरे को एकत्रित सूचनाओं से अवगत करवाया हो।
तीनों दुखी थे। मौसी की हालत रुला-रुला जाती थी पर कोई उपाय न था। वे रोते-सुबकते, भूखे-प्यासे वहीं पड़े सो गये।
दुर्गा मौसी ने अफसरों की खूब मिन्नतें की। लता नहीं मिलनी थी, सो नहीं मिली। लड़की को ढूंढने के आश्वासन के बदले, जो आया, वही मौसी को बरत गया। बिस्तर पर सो-सो कर दुर्गा खुद बिस्तर बन गई पर लता की कोई खोज-खबर न मिली। गरीब कौम वाले आदमी के अनुसार छोरी वहां के नेता की गिरफ्त में थी। सब जानते थे, पर वे अनजान थे। वह आदमी भी यह जानकारी सरकार की पीठ पीछे रखता था। आगे नहीं रखना चाहता क्योंकि उसके घर में भी जवान छोरी थी।
रात के गहराते सन्नाटे में गोलियां चलने की आवाज सुन उनकी नींद उचट गई। कान खड़े हो गये। अंधेरा आंखों में पसरने लगा। डर के मारे उनका बुरा हाल था। असुरक्षित होने की बात तीनों जानते थे, इसीलिए भयभीत थे।
पास ही के पेड़ पर बैठा उल्लू बोला। तीनों 'खम्म' खाकर उठ खड़े हुए। आंखों में अजीब-सी चमक थी। एक-दूसरे को देखा और फिर दौड़ते हुए अंधेरे में खो गये।
दंगाइयों से छीने हुए रिवाल्वर ही उनकी सुरक्षा के आधार बने। बस्ती रात-भर गोलियों की आवाज से गूंजती रही। कई कमजोर दिल वालों की श्वास-नलिकाएं अवरुध्द हो गई पर बारूद बरसता रहा। अविरल, अनवरत।
मामला संगीन था। स्थानीय नेता व उसके पुत्र की हत्या हो गई थी।
अगली सुबह अखबारों में छपी साम्प्रदायिक दंगे की सुर्खियां बस्ती की चर्चा का विषय थी। पुलिस ने तीन खूंख्वार दंगाइयों को गिरफ्तार कर लिया था और अभी धर-पकड़ जारी थी। उपद्रवियों की गिरफ्तारी बस्ती के लिए सुकून थी। गरीब कौम वाले आदमी के अनुसार उन तीनों की कभी-भी हत्या हो सकती थी, क्योंकि मारे गये नेता की कई सुदृढ शाखाएं थीं।
कुछ दिनों बाद सब कुछ सामान्य हो गया। दंगा इतिहास बन गया पर वे तीनों कथित दंगाई न्यायिक हिरासत में थे। तीनों निश्चिंत थे, क्योंकि वे सुरक्षित थे। सरकारी रोटी वक्त पर मिल रही थी। पीछे कोई रोने वाला था भी नहीं।
लता अपने घर पहुंच गई थी। नेताजी की मृत्यु के अगले ही दिन।
कई साल उन तीनों को सरकारी मेहमान बन कर रहना पड़ा। गिनती उनके लिए कोई मायने न रखती थी। फिर उनके द्वारा चलाई गई गोलियों को स्वयं की सुरक्षा के लिए उपाय मान तीनों को छोड़ दिया गया। बाहर के हालात सामान्य थे। इसलिए वे बाहर आकर भी खुश थे। वे तीनों चुपचाप चबूतरे पर आ बैठे। मुस्करा कर एक-दूसरे को देखा और फिर 'हुंह' की मुद्रा में गर्दन हिला तीनों ने गहरा सांस लिया।
चबूतरे से नीचे उतर कर चुटकी-चुटकी भर रेत उठाई और फर्श पर डाली। वह अब भी हल्के भूरे रंग की थी।
तीनों एक दूसरे के गले मिलने लगे ।
सम्पर्क से पता चला कि लता अब ब्याहता थी और मौसी ने 'भगवा' ले लिए। कुछ लोगों ने मौसी के गांव परित्याग को हत्या की आशंका से प्रभावित पलायन बताया, तो कुछ ने दबी जुबान में हत्या का संदेह भी जाहिर किया। अलबत्ता यह कोई नहीं जानता, मौसी कहां है? तीनों ने निराश मन से गांव छोड़ने का निर्णय लिया।

15 comments:

  1. साहित्यशिल्पी के मंच पर रवि जी का स्वागत है|
    एक बहुत सुंदर और मार्मिक कहानी बुनी है आपने| वैसे आजकल ये "आदमी" कम नहीं होते जा रहे!
    आपकी और भी रचनाओं की प्रतीक्षा रहेगी|

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  2. रवि जी बेहद अलग शैली में कसा हुआ कथानक।

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  3. कहानी ने सोचने को बहुत से आयाम दिये। वे पात्र जिन्हे ले कर कहानी कही गयी हैं आपकी कहानी को उठाते हैं।

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  4. साम्प्रदायिक सद्भाव का अनोखा सामन्जस्य तथा मानवता की सच्ची सेवा का अनुकरणीय उदाहरण । आप बधाई के पात्र हैं ।
    - डा. राधाकिशन सोनी,श्रीडूँगरगढ़

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  5. साम्प्रदायिक सद्भाव का अनोखा सामन्जस्य तथा मानवता की सच्ची सेवा का अनुकरणीय उदाहरण । आप बधाई के पात्र हैं । डा. राधाकिशन सोनी,श्रीडूँगरगढ़

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  6. साम्प्रदायिक सद्भाव का अनोखा सामन्जस्य तथा मानवता की सच्ची सेवा का अनुकरणीय उदाहरण । आप बधाई के पात्र हैं । डा. राधाकिशन सोनी,श्रीडूँगरगढ़

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  7. सुन्दर रचना । - डा रीमा सोनी

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  8. सुन्दर रचना । - डा रीमा सोनी

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  9. अद्भुत ! आज इसी तरह की रचनाएं पाठकों को रास आती है ! साहित्य शिल्पी परिवार से अपेक्षा है की वह ऐसी खूबसूरत रचनाएं निरन्तर पाठकों को देंगी ! शुक्रिया !
    पुष्पा

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  10. i will tell something after reading & analyzing the whole story..........

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  11. एक अच्छी कहानी लिखी है आपने, लेकिन ऐसे आदमी कहाँ हैं........ खैर जाने दो.

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  12. बेहद सुंदर रचना. शिल्प भी अनूठा. हार्दिक बधाई
    -मदन गोपाल लढा, महाजन

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