कविता आत्मा का मौलिक व विशिष्ट संगीत है, जो मानव में संस्कार रोपती है। एक ऐसा संस्कार जो सभी को प्रदत्त है पर जरूरत है उसके खोजे जाने, महसूस करने और गढ़ने की। यही कारण है कि सम्वेदनाओं का प्रस्फुटन होते ही कविता स्वत: फूट पड़ती है। जब मानव हृदय में विचार कौंधते हैं तो सृजन की सतत् प्रक्रिया स्वत: आरंभ हो जाती है। अमूर्त विचार वक्त की लय के साथ धीरे धीरे रागात्मक शब्दों में ढलने लगते हैं। इसी के साथ कवि और उसके शब्द दोनों निखरते चले जाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे एक प्रसूता नारी। एक असहनीय पीड़ा के बाद मातृत्व की जो अनुभूति होती है, वैसी ही आनंदानुभूति कवि को काव्य-सृजन के पश्चात होती है।
रचनाकार परिचय:-

आकांक्षा यादव अनेक पुरस्कारों से सम्मानित और एक सुपरिचित रचनाकार हैं।

राजकीय बालिका इंटर कालेज, कानपुर में प्रवक्ता के रूप में कार्यरत आकांक्षा जी की कवितायें कई प्रतिष्ठित काव्य-संकलनों में सम्मिलित हैं।

आपने "क्रांति यज्ञ: 1857 - 1947 की गाथा" पुस्तक में संपादन सहयोग भी किया है।

कविता मात्र यथार्थ का अर्थगर्भित रूपक नहीं है वरन् वस्तुगत सच्चाइयों का अन्तर्संबंध भी है। कविता अपने भीतर एक और बड़ी लेकिन समानांतर दुनिया को समाये हुये है। कविता के शब्द मात्र शब्द भर नहीं हैं वरन् मनुष्य के अतीत, वर्तमान व भविष्य की अनेक आकांक्षाओं को अपने में समेटे हुए हैं। कविता सामाजिक व सांस्कृतिक जड़ता से लड़ने की शक्ति देती है। यही कारण है कि कविता के लिए विचारों की स्वतंत्रता और उन्मुक्त अभिव्यक्ति आवश्यक है। वस्तुत: कविता का मुख्य धर्म ही मानवीय परिस्थितियों, उसके परिवेश, उसके सरोकारों और सुख-दुख से जुड़ाव है। ऐसे ही कविता की बनावट और मिजाज लोकतांत्रिक है। वह अपनी बात कहती है पर दूसरों को उसे मानने के लिए बाध्य नहीं करती। दूसरे शब्दों में कहें तो कविता मांग और आपूर्ति के सांस्कृतिक दायित्व के विपरीत अपने होने में ही अपनी सार्थकता समझती है।


आज की कविता रचनाकार के साथ-साथ पाठक और श्रेाताओं को भी अभिव्यक्त करने में सहायता देने वाली है। वह चरमानंद की ऐसी सहज अनुभूति है जो जीवन के दुर्गम रास्तों पर भी साथ नहीं छोड़ती। आधुनिक परिवेश में प्रगतिशील सोच के अन्तर्विरोधों के बीच कविता निरा कलाकर्म या बौद्धिक कवायद भर नहीं है वरन् इसमें स्वाभाविक प्रेरणाओं के साथ अपेक्षित वैविध्य और विस्तार भी है। आपाधापी भरी इस जिन्दगी में कविता सृजन पथ पर आक्सीजन का कार्य करती है। तभी तो कवि सामान्य सी दिखने वाली वस्तुओं को कवि-कौशल से कविता में रूपान्तरित कर लोगों को चकित कर देता है और लोग बार-बार उसे नई अर्थ छवियों से उद्घाटित करते रहते हैं। कविता नवनिर्माण और विध्वंस दोनों को प्रतिबिंबित करती है। कविता है तभी तो शब्दों का लावण्य है, अर्थ की चमक है, प्रकृति का साहचर्य है, प्रेम की पृष्ठभूमि में सम्बन्धों की उष्मा है। कविता चीजेां को देखने की दृष्टि भी है और बोध भी। कविता सिर्फ कवि की नहीं होती बल्कि पाठकों और श्रोताओं की भी होती है। पाठक और श्रोता ही किसी कविता और उसके कृतिकार की असली कसौटी हैं। जो कविता पाठकों और श्रोताओं से सीधा सम्वाद नहीं स्थापित कर पाती, मात्र बौद्धिक आधार पर टिकी होती है, उसका कोई अर्थ नहीं। आलोचकों की मानें तो कवि अपनी आवाज के परदे के पीछे कुछ इस तरह छुप जाता है कि लगे, वह सबकी नहीं भी, तो कइयों की आवाज के परदों के पीछे से तो बोलता सुनाई ही पड़ता है। ऐसे में कवि सम्मेलनों की महत्ता और भी बढ़ जाती है क्योंकि इसमें कवि और श्रोता एक दूसरे से सीधे रूबरू होते हैं।

कविता लिखने की बजाय कहना सदैव से ज्यादा जटिल रहा है। कविता स्वत:सुखाय तो लिखी जा सकती है पर श्रोताओं के बीच प्रस्तुत करने हेतु कविता में सम्प्रेषणीयता के साथ-साथ सौन्दर्यानुभूति का होना अति आवश्यक है। इसके अभाव में शब्द अपना अर्थ खो बैठते हैं। छन्दमुक्त कविता के नाम पर कवि सम्मेलनों में आज कविता की अपनी रीझ-बूझ की बजाय दुरूहता ज्यादा हावी है और यही कारण है कि श्रोतागण इन कवि सम्मेलनों की तरफ आकर्षित नहीं होते। हाल के दिनो में कविता के शास्त्रीय उपमानों की बजाय यदि हास्य-व्यंग्य आधारित कविताओं की बहुलता कवि सम्मेलनों में बढ़ी है तो इसका एक प्रमुख कारण कविताओं की अनचाही दुरूहता ही है।

विचारधारा से कविता अछूती नहीं रही है। समाज में व्याप्त विभिन्न विचारधाराओं के अनुयायी अपने दृष्टिकोण से काव्य सृजन करते रहे हैं। इसके बावजूद कविता हवा में नहीं होती बल्कि वह अपनी स्वायत्त गरिमा के प्रति एवं लोक की अनुगूँज के प्रति सदैव सचेत रहती है। जीवन की तमाम हलचल कविता में प्रतिबिम्बित होती है। कविता सपनों को जीवन्त रखती है और भविष्य के प्रति आश्वस्त भी करती है। वैचारिकता के साथ-साथ कविता का एक भावनात्मक पहलू भी होता है, जो उसको पाठकों और श्रोताओं से जोड़ता है। कवि सम्मेलनों में इन दिनों ऐसी कविताओं की बहार है, जिनमें सिर्फ सपाट बयानबाजी होती है। कवि सम्मेलनों से लोगों को जोड़ने हेतु जरूरी है कि कविता में अनुभूति और संवेदना का भी मिश्रण हो, इसके अभाव में ये मात्र औपचारिकता बनकर रह जाते हैं।

एक समय था जब कवि सम्मेलन नवागन्तुकों को प्रोत्साहित करने के सबसे सशक्त माध्यम माने जाते थे और इनके माध्यम से अग्रज और परवर्ती पीढ़ियों के मध्य सृजनधर्मी संवाद का माहौल कायम होता था। आज के तमाम प्रतिष्ठित कवियों का रास्ता कवि सम्मेलनों से होकर ही गुजरा है पर दुर्भाग्यवश आज वे ही इससे कन्नी काटने लगे हैं। नतीजन, इन मंचों पर जो सार्थक बहस होनी चाहिए, उससे नई पीढ़ी अछूती रह जाती है। वय के अनुसार अग्रज व परवर्ती पीढ़ी के कवियों में द्वन्द भी उभरता है, क्योंकि दोनों के समयकाल और मन:स्थिति में काफी अन्तर होता है। ऐसे में पुराने कवि नये कवियों पर प्रश्नचिन्ह भी लगाते हैं, पर वे यह भूल जाते हैं कि हर कवि का अपना स्वर है और हर स्वर की अपनी मादकता। अत: ऐसा कोई नियम न बनाया जाय जिससे कि सभी कवि एक ही सुर में गाने लगें।

आमजन में कविता के प्रति क्रेज बढ़ाने में कवि सम्मेलनों की अहम् भूमिका रही है। एक दौर था जब कविता के रसिये रात-रात भर जगकर कविताओं का मजा लूटते थे और कवि भी श्रोताओं की दाद पाकर प्रफुल्लित होते थे तथा एक के बाद एक अनूठी प्रस्तुतियाँ करते थे। वक्त के साथ कवि सम्मेलनों पर व्यवसायिकता हावी होने लगी और भागदौड़ भरी इस जिन्दगी में लोगों के पास भी कवि सम्मेलनों में जाने की फुर्सत नहीं रही। पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने वाले कवि और कवि सम्मेलनों में उपस्थिति दर्ज कराने वाले कवियों में अन्तर किया जाने लगा। अर्थ प्रधान युग में कवि हेतु श्रोताओं की तालियों की गड़गड़ाहट और वाह-वाह नहीं बल्कि पधारने हेतु प्राप्त गिफ्ट और धनराशि महत्वपूर्ण हो गई तो श्रोताओं हेतु कविता की गम्भीरता नहीं बल्कि उसकी सहजता व सम्प्रेषणीयता महत्वपूर्ण हो गई। कवि और श्रोता का सम्बन्ध उपभोक्तावादी दौर में कहीं-न-कहीं ग्राहकोन्मुख हो गया। श्रोता यदि अपने व्यस्त रूटीन में से समय निकालकर कविता सुनने जाता है तो उसका उद्देश्य ज्ञानार्जन नहीं बल्कि मनोरंजन है। एक ऐसा मनोरंजन, जिसके लिए उसे अपने दिलो-दिमाग पर ज्यादा जोर देने की जरूरत नहीं पड़े। ऐसे में कवियों को भी श्रोताओं की भावनाओं का ख्याल रखते हुए हल्की-फुल्की कवितायें सुनानी पड़ती हैं। कवि सम्मेलनों का स्वर्णिम अतीत, उनकी महत्ता, कवियों की प्रसिद्धि और कविता के शास्त्रीय उपमान धरे के धरे रह गये हैं, बस रह गया है तो क्षणिक मनोरंजन।

12 comments:

  1. हँसी ठहाकों में मंच से कविता कहीं खो गई है हालांकि अभी भी कुछ लोग इस प्रथा को जिन्दा रखे हैं किन्तु वो गिनती के ही बचे हैं.

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  2. आकांक्षा जी आपने सही मुद्दा उठाया है। कवि सम्मेलन अब फूहडता भर रह गये हैं। मैने तो उनमे जाना भी छोड दिया है।

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  3. आपने ध्यानाकर्षण तो किया है बदलाव तो होना चाहिये।

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  4. आकांक्षा जी आपके आलेख हमेशा नये विचारों से सजे होते हैं।

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  5. कविता सामने नहीं आती क्योंकि उसे सही मंच नहीं मिलता और सही मंच जो होना चाहिये उस पर विदूषक किस्म के लोगों का कब्जा है। क्या राजू श्रीवास्तव और ......... में आप कोई अंतर पाते हैं?

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  6. aap ka aalekh kvi or kvita pr hai prntu is men kvi smmeln tokhi dikhai nhi de rha aakhir vh khan kho gya use bhi dhundhen tbhi shirshk poora hoga
    dr.vedvyathit@gmail.com

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  7. kshma kren kuchh glt fhmi ke karn yh hua hai poora aalekh to kilik krne pr pdha jata hai jb ki kvita sidhi hi pdh li jati hai istrh use pdh kr likh diya tha kvismmeln pr aap ne achha likha hai
    dr.ved vyathit

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  8. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  9. जैसा की राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त कहते हैं...
    केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए
    उसमे उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए..

    आपके आलेख सजग इशारा कर रही है. आज कविता एक विमर्श के दौर से गुजर रही है. चिंतन, व्यापक दृष्टिकोण जरुरी है.

    - सुलभ

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  10. फूहड मनोरंजन और मांग के अनुरूप कविता की पूर्ति ने सद्मुल्यों और सामजिक सरोकारों से कविता को विलग कर दिया है ! जिससे कविता का स्वरूप विकृत होना लाजमी है ! परंतु आज के शब्द-साधक फिर भी मौन है ! आश्चर्य ! एक चिंतनीय मुद्दा उठाने और विचार का व्यापक फलक तैयार करने की आपकी कोशिश को नमन एवं साधुवाद !
    रवि पुरोहित

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  11. वर्तमान मे कविताओं और कवि सम्मेलनो की बहुत ही सुन्दर और यथार्थ चित्रण... बधाई

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