समय की कद्र वो ही जानते हैं जो समय की पाबंदिओं का पालन करते हैं और उस दौर में अपना लक्ष्य भी हासिल करते हैं. समय के सैलाब में बहते हुए हम कभी दो पल रुककर ये नहीं सोचते की यह समय भी रेत की तरह हमारी बंद मुठियों से निकला जा रहा है. जाना कहाँ है, जा कहाँ रहे हैं? शायद वक्त की धाराओं के साथ बेमकसद ही रवां हो रहे हैं.
रचनाकार परिचय:-
11 मई 1949 को कराची (पाकिस्तान) में जन्मीं देवी नागरानी हिन्दी साहित्य जगत में एक सुपरिचित नाम हैं। आप की अब तक प्रकाशित पुस्तकों में "ग़म में भीगी खुशी" (सिंधी गज़ल संग्रह 2004), "उड़ जा पँछी" (सिंधी भजन संग्रह 2007) और "चराग़े-दिल" (हिंदी गज़ल संग्रह 2007) शामिल हैं। इसके अतिरिक्त कई कहानियाँ, गज़लें, गीत आदि राष्ट्रीय स्तर के पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। आप वर्तमान में न्यू जर्सी (यू.एस.ए.) में एक शिक्षिका के तौर पर कार्यरत हैं।.....

सब कुछ करते रहते हैं, खाने -पीने, मौज-मस्ती की महफिलों का हिस्सा बनने के लिए समय है,पर जो काम खुद की पहचान पाने के लिए करना है, उसके लिए समय नहीं! उस काम को न करने के बहाने सबब बन कर सामने आते हैं. अक्सर कहते हैं और सुनते हैं- " समय ही नहीं मिलता" सच है समय को कौन बांध पाया है जो हम बांध पाएंगे! पर उसी समय के चलते चक्रव्यूह से बाहर निकल कर एक और पहचान पा लेनी है जो सच का मापदंड है.

इस समय के सिलसिले में एक सुना हुआ किस्सा याद आया- एक बच्चे ने एक दिन अपने पिता से, जो काम से थका हारा लौटा था पूछा-" पिताजी आपको घंटे के काम के लिए कितने डालर मिलते हैं?" अजीब सवाल में न उलझ कर पिता ने कहा " २५ डालर."

बेटे ने पिता से जिद की कि वह उसे १० डालर दे. पिता ने दे तो दिए पर वह सोचने लगा - "कभी न मांगने वाला बेटा ये कैसी फरमाइश कर बैठा है?" कुछ सोचकर वह बेटे के कमरे में गया तो देखा वह कुछ डालर उन दिए हुए पैसों में जोड़ रहा था.

"क्या कर रहे हो? क्यों चाहिए तुम्हें इतने पैसे." पिता ने जानना चाहा. बेटे ने २५ डालर पिता कि ओर बढ़ाते हुए कहा " पिताजी क्या कल आप ऑफिस से जल्दी आकर मेरे साथ खाना खा सकते हैं, ताकि हम एक घंटा साथ-साथ बिताएं, यह $२५ मैंने उसीके लिए जमा किये हैं."

समय का मूल्यांकन तो उस मासूमियत ने लगाया जिसे समय कि दरकार थी, दौलत कि नहीं!!!

11 comments:

  1. बहुत उम्दा प्रसंग...महावीर जी के यहाँ शायद यह पढ़ी थी आपकी कथा.

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  2. समय की दरकार पर इस नितांत संवेदनशील लघुकथा का आभार।

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  3. बहुत सुन्दर है इसे पहले भी पढा है देवी जी को बधाई

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  4. वक्त की कमी वाले इस समय में यह संदेश अनमोल है

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  5. आ. देवी जी सशक्त गज़लकारा ही नहीं बढ़िया कथाकार भी हैं साहित्य शिल्पी के मंच पर ,
    खुशी हुई इन्हें पढ़कर
    स स्नेह,
    - लावण्या

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  6. Aap sabhi sahayogiyon ka dil se abhaar is manch par is katha ko pdhne ke liye. aapki rai anmol hai...

    उत्तर देंहटाएं

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