कविता, कहानी, संस्मरण, मुक्तक, आलेख आदि विधाओं के जरिये अपने आपको अभिव्यक्त करने वाली सुधा जी की पहली कहानी का आओ धूप में स्वागत है। सुधा जी कविताएं तो लिखती ही हैं, बच्चों के लिए भी खूब काम किया है। बाल कविताओं की तीन किताबें प्रकाशित और पुरस्कृत। बेंगलूर में पढाती हैं। इसका अपना ब्लाग भी है - sudhashilp.blogspot.com
सुधा जी की ये कहानी बेशक हमें जाने पहचाने माहौल में ले जाती है, बड़े बूढों का समाज से, अपनों से और कई बार अपने ही घर में उपेक्षित हो जाना हमारे लिए जाना पहचाना विषय है लेकिन सुधा जी की ये छोटी सी कहानी अपने अंत तक आते आते अचानक हमें चौंका देती है और हम अपने आप से से सवाल पूछने लगते हैं कि हम खुद जब इस मकड़जाल में फंसेंगे तो....। ये तो बहुत डरावना है। हम इस तो से बचना तो चाहते हैं लेकिन.... - सूरज प्रकाश


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' ओ आसरे ----राम आसरे|
-ओह माँ | तुम्हारी आवाज क्या कमरे से रसोई तक पहुँच सकती है एसी के इस शोर में| मुझे ही रामआसरे समझ कर कुछ काम बता दो| कुछ दिनों को यहाँ आती हूँ ताकि तुम्हारे कुछ काम कर सकूँ| कुछ तो मुझे भी सेवा का मौका दो| ससुराल से आई बेटी ने कहा|
-ओह चुन्नी | तू न जाने क्या बक बक कर रही है| अरे यह नौकर मेरे लिए ही रखा गया है| विक्की की सख्त हिदायत है कि वह पहले मेरे काम करे पर मेमसाहब के काम से फुरसत कहाँ| नौकर भी समझता है, मैं बेकार, लाचार, बस एक बोझ हूँ | उसे बुला ना|
रामआसरे की जान अधर में| बेचारा डरते-डरते आया और बोला - मेमसाहब ने बाजार भेज दिया था अम्मा, अभी गर्म रोटी लाता हूँ|
वह रोटी बनाने लगा और चुन्नी बड़े प्यार से माँ को रोटी खिलाने लगी| जर्जर मन से थकी माँ| मगर माँ ---अकेली खा न सकी और चुन्नी से भी खाने का आग्रह करने लगी | बिना भावज के चुन्नी को खाना अच्छा न लगा|

बूढ़ी माँ भड़क उठी - अरे तू किसके चक्कर में पड़ी है । वह तो नाश्ता करती ही नहीं| मुझे नौकर डबल रोटी कच्ची -पक्की सेंक कर भुजिया के साथ दे जाता है | उपदेश तो बहुत- यह मत खाओ, वह मत खाओ - पेट में दर्द हो जायेगा| भूख तो लगती है। कैसे भूखी रहूँ|
चुन्नी जानती थी - माँ कड़वा सत्य बोल रही है पर उन्हें शांत करती हुई इधर उधर की बातें करने लगी| पान और तम्बाखू की शौक़ीन माँ को एक बीड़ा लगाकर दे दिया| माँ की आँखों में आँसू आ गये | उसका हाथ पकड़ते हुए बोलीं -बेटा तू तो दो दिन बाद चली जायेगी फिर तो मुझे अकेले ही इस कमरे में जिन्दगी काटनी है| नूतन अपने कमरे में रहती है| कमरा क्या है महल है | फ्रिज, टी वी सभी तो है| बच्चे वहीं खाते -खाते टी.वी.देखते, खाली समय में कंप्यूटर चलाते हैं | खुद भी फ्रिज में से न जाने कौन -कौन से जूस पीती रहती है | मेरे लिए सेब नहीं खरीदे जाते| कहो तो सुनने को मिलता है - यहाँ फरीदाबाद में नहीं मिलते, शहर में मिलते हैं|
-अच्छा ला फ़ोन मिला - हेलो --आभा, तुमने तो फ़ोन ही नहीं किया शाम को आओ तो दो किलो सेब लेती आना| माँ अपनी बड़ी बहू को फ़ोन करके सो गईं|
चुन्नी को भी भूख लगने लगी थी| वह रसोईघर में गई, जो कुछ मिला उससे पेट भर लिया| तभी कमरे का दरवाजा खुला और छोटी भाभी की आवाज सुनी - जीजी, आपने खाना खा लिया क्या|
-हाँ | बहुत इन्तजार किया, ३ बज गये तो सोचा - खा लूँ|
नूतन बड़े इत्मीनान से खाने बैठ गई| चुन्नी उसकी ओर देखती रह गई| फिर सोच कर उठ गई - अपने ही तो हैं , यह तो मुझसे बहुत छोटी है , समय से सब समझ आ जायेगी | माँ से उसने इस बारे में कोई बात नहीं की | उन्हें बताने का मतलब था - उनको दुखी करना| उनका समय तो पिता जी की मृत्यु के बाद ही जा चुका था | विरक्ति वश अपने जीते जी एक विशाल साम्राज्य की मलिका होते हुए भी उसे अपने बहू-बेटों को सौंप दिया जिसका परिणाम ही वे भोग रही थीं| एक दिन छोटी बहू ने अपनी जिठानी को फ़ोन किया - अम्माजी को यहाँ से ले जा , वे मुझे बहुत परेशान कर रही हैं तब उन्हें अपने भूल का अहसास हुआ | पर बहुत देर हो चुकी थी| चुन्नी की माँ ने ७० वर्ष पूरे कर लिए थे और कभी-कभी लगता था जिन्दगी उधार की है|
दिन छिपते ही बड़ी बहू आभा और बेटा फल लेकर हाजिर हो गये| आभा की यह तारीफ थी कि सास के जबान हिलाते ही उनकी हर इच्छा पूरी करती थी| माँ ने की अबकी बार बड़े बेटे के पास जाना चाहा परन्तु वहाँ पहले से ही बेटे के ससुरालिया पौड़ लगाये थे, वे जाती कहाँ| कहने को तो इस कमरे में हर तरह का आराम था सजा -सजाया कमरा - फ़ोन, फ्रिज, फर्नीचर झोली भर पैसा| पर क्या वे सुखी थीं|
उस आधी रात अम्मा को भूख लगी तो चुन्नी सेब काटकर उन्हें देने लगी|
पूछा -माँ कैसी हो?
-बेटा, मैं लाल किले के तहखाने में बंद वह शाहजहाँ हूँ जिसकी मिलकियत छीन ली गई है और तुम्हारी भाभी उस पर और उसके राज्य पर शासन करना चाहती है| भाग्य के इस खेल में मैं हार चुकी हूँ | सुन कर वह सन्नाटे में आ गई | रोम-रोम एक अज्ञात आशंका से कांप उठा |
माँ को ४-५ दवाएँ दीं जिनकी वे आदी हो चुकी थीं| सबसे उनका जी भर चुका था पर दवाओं से नहीं| माँ डायेजापाम लेकर खर्राटें भरने लगीं । चुन्नी उन्हीं के पास लेट गयी | उनकी कमर में हाथ डालकर बुदबुदा उठी - माँ मैं तुम्हें बहुत प्यार करती हूँ | मुझे तुम्हारे प्यार की जरूरत है| इस तरह नींद की गोली लेकर मुझे न भूलो| जबकि वह जानती थी माँ सारे दुखों से छुटकारा पाने के लिए अपने को भूलने की कोशिश में है।
चुन्नी के पोर - पोर में टीस उठने लगी| काश| वह कुछ दिन माँ को अपने पास रख पाती पर माँ - वह तो एक पल को भी बेटों की नगरी से जुदा नहीं होना चाहतीं| सब समय तो उनकी आँखों में रहती है क्षमा और हिरदय में लहराता है वात्सल्य का समुन्दर | बड़े संकोच के साथ बेटी के यहाँ कुल मिलकर दो माह रही होंगी वह भी टुकड़ों -टुकड़ों में| कहती थीं - कन्यादान के बाद बेटी के घर का निवाला गले में अटक जाता है| क्या एक वृद्धा की मूक पीड़ा, असम्मान की जिन्दगी - इनकी चर्चा भाई के सामने करे| नहीं - नहीं - उसने तो घर के साथ साथ माँ की बागडोर भी पत्नी के हाथों थमा दी है| अब तो वे उसी के रहमोकरम पर हैं |
चुन्नी क्या करे, क्या न करे | खुद ही प्रश्न करती खुद ही जवाब दे देती | इस मकड़जाल में उसकी जान अटक कर रह गई |
उसके भी तीन बेटे हैं| अज्ञात भय से हिल गई | मस्तिष्क में हजारों डंक एक साथ चुभन देने लगे पर दूसरे ही क्षण आत्मघाती विचारों को परे फेंकती उठ खड़ी हुई और बुदबुदाई - मैं अपने भाग्य का सृजन स्वयं करूंगी|

3 comments:

  1. सुधा जी की पहली ही कहानी प्रभावित करती है।

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  2. sudha ji ki lekhni nirntr parivarik smbndhon ko ujagr krti hui un ke bdlav or thahrv ko vykt kr rhi hai yhan bhavj ke bina nnd ka roti n khana khani ko bda hi bhuaayami mod deta hai jis ka pathk apne trike se nishkrsh nikale yhi is khani kee uttmta or sarthakta hai
    bdhai
    dr.ved vyathit

    उत्तर देंहटाएं

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