आज कजरी को गए करीब ५ दिन हो गए थे। कुछ ख़बर नही दी उसने। उस की आदत सी पड़ गई थी। रवि यही कोई ५ साल का था जब वो यहाँ आई थी और दीपा १ साल की थी। आज दीपा अपने पति के साथ बेंगलौर में खुशी खुशी रह रही है और ये रवि, उफ़ कितना बदमाश था! अजय से हमेशा लडाई होती थी इस की। हम तो सोचते थे कि पढेगा ही नही। पर देखो ऍम.बी.ए. कर लिया और अमेरिका की एक कम्पनी से बुलावा आया, चला गया। १ साल हो गया, डैलस में रहता है। पर मुझको ई-मेल बराबर लिखता है। लेकिन अबकी जो कजरी के साथ गया तो आज इतने दिनों में कोई ई-मेल नही किया। अपनी इसी उधेड़-बुन में मैं लाइट जलना ही भूल गई। अवि ने आ के जलाई और बोले "क्या बात है? क्या सोच रही हो जो तुम को अन्धेरे की जरूरत पड़ गई?"

साहित्य शिल्पीरचनाकार परिचय:-

रचना श्रीवास्तव का जन्म लखनऊ (यू.पी.) में हुआ। आपनें डैलास तथा भारत में बहुत सी कवि गोष्ठियों में भाग लिया है। आपने रेडियो फन एशिया, रेडियो सलाम नमस्ते (डैलस), रेडियो मनोरंजन (फ्लोरिडा), रेडियो संगीत (हियूस्टन) में कविता पाठ प्रस्तुत किये हैं। आपकी रचनायें सभी प्रमुख वेब-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं।

"कजरी की याद आ रही थी। जबसे आई है साथ रहने, कभी भी अलग नहीं हुई। हर बात में मुझसे ही पूछना, ये कैसे होगा और वो कैसे होगा। आप तो हमेशा काम में लगे होते है, वो ही थी एक मेरा सहारा।"
"अच्छा जी! मैने तो कुछ भी नही किया आप के लिए है.... न ये घर परिवार और........"
"आप भी न! चलिए छोडिये। अब खाना खाते हैं। भूख लगी है।"
खाना खा के ये बेडरूम में चले गए। सुबह से ईमेल चेक नही किया था तो मै उसे चेक करने बैठ गई। मेल खोला तो देखा रवि का ईमेल आया था:
"आदरणीया बड़ी माँ!
हम यहाँ ठीक से आ गये है। पर थोड़ा व्यस्त था तो आप को मेल नही लिख पाया। आप की ये जो सहेली हैं न, इन को यहाँ अच्छा नही लग रहा था। कहती हैं कि हम को दीदी के पास छोड़ आओ। अब आप ही बताएं, यहाँ से इतनी जल्दी-जल्दी आना जाना कहाँ सम्भव है। पर सच तो ये है बड़ी माँ कि मुझको भी आप की बहुत याद आती है। आज मै जो कुछ भी हूँ, आप की वजह से ही हूँ वरना मै भी कहीं छोटा मोटा काम कर रहा होता, बापू की तरह। आप तो हम सभी के लिए भगवान है। हम सभी आप के आगे नत मस्तक है।
अब देखिये, आप रो रही हैं न..." सच में मेरे आँसू चश्मे से हो के गालों तक लुढ़क आए थे। कुछ भी साफ़ दिख नहीं रहा था। चश्मा पोंछ के मैंने आगे पढ़ना शुरू किया, "बड़ी माँ! रोइए मत। मैं तो चाहता हूँ कि आप भी एक बार यहाँ आइये। मेरे और अजय भइया के साथ रहिये। इस दुनिया को भी देखिये। इस बारे में सोचियेगा। चलिए बड़ी माँ! अभी बन्द करता हूँ। माँ आप को प्रणाम कह रही है। जल्दी ही फ़ोन करूँगा।
प्रणाम!
आपका,
रवि"

मेल बन्द कर के मै भी बेड-रूम मै आ गई। अवि अभी भी पढ़ रहे थे। मुझको देख के बोले, "क्या बात है स्नेह! बहुत देर लगा दी।"
"रवि की मेल आई थी, वही पढने लगी।"
"अच्छा क्या लिखा था? कजरी कैसी है?"
जो भी रवि की मेल में लिखा था, मैंने बता दिया।
"अवि देखा न! रवि कितनी बड़ी बड़ी बातें करने लगा है। मुझको भगवान का दर्जा दे डाला।"
"कोई ग़लत नही कहा उस ने। जो तुम ने उन लोगों के लिए किया है, कौन करता है आज कल! अपना परिवार चले, वही बहुत है। तुम ने दीपा, रवि और अजय में कभी कोई अन्तर नहीं समझा। क्या नही किया, पढ़ाई से ले के सभी कुछ तो तुम ने किया। मैं तो इस बात के खिलाफ था। एक और परिवार की जिम्मेदारी आसान नही थी। कहीं कुछ हो जाये तो... यही सोच के मैं नही चाहता था कि तुम ऐसा करो। पर तुम ने किया और बहुत खूब किया। मुझे तो पता भी नहीं चला। तुम ने कजरी को हरिया की जगह नौकरी दिला दी। कुछ पैसे वहाँ से मिल जाते थे और कजरी घर का जो काम करती थी, उस के पैसे भी तुम देतीं थीं। तुम ने उनके आत्मसम्मान का भी पूरा ख्याल रखा। मुझे तुम पर मान है। तुम सच में देवी हो।"
"नहीं, ये आप क्या कह रहे हैं? मैं कुछ नही हूँ। मैं इस सम्मान के लायक नही हूँ।" रोकते रोकते भी नयन गागर छलक गई।"
"अरे! क्या हो गया?"
"नहीं, कुछ नहीं! बस ऐसे ही..." मैं अवि के गले लग के रोती रही। ये प्यार से मेरा सर सहलाते रहे। और मै कब रोते रोते सो गई, पता भी न चला।
सुबह अवि नाश्ता करते हुए बोले "स्नेह! क्या हुआ था कल? तुम इतना रो क्यों रही थीं?"
"कुछ नहीं... आप ऑफिस जाइये न! देर हो रही है।"
"ऑफिस!! अरे, अभी कल ही तो रिटायर हुआ हूँ। भूल गईं! आज से मैं आप का नौकर हूँ। क्या हुक्म है, मेमसाहब!"
"अरे हाँ! मैं तो भूल गई थी। एक आदत सी पड़ गई थी, ९:३० हुए नहीं के लगता है कि आप को जाना है। आप को बुरा लग रहा होगा। है न!"
"सच कहूँ तो हाँ! इतनी व्यस्त ज़िन्दगी से अचानक ये खालीपन, ऐसा लगता है बहती नदी पे पुल बाँध दिया गया हो। सब कुछ स्थिर सा हो गया है। पर फ़िर भी, मैं दुखी नहीं होऊँगा। तुम हो न मेरे पास। तुम को टाइम नही दे पाया इस काम के कारण.. अब मै तुम्हारा ख्याल रखूँगा। बताओ क्या करूँ??"
और हम हँस दिए। शाम को चाय पीते हुए ये बोले, "स्नेह! एक बात कहूँ... मैंने कई बार एक बात महसूस की है कि तुम कुछ कहते कहते रह जाती हो। दिल की गहराइयों में बन्द ऐसी कौन सी बात है जो बार बार बाहर आना चाहती है और तुम जबरदस्ती उस को अन्दर धकेलती रहती हो। कह लो... बोझ हल्का हो जाएगा।"
'नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं है। आप को ऐसे ही लग रहा है।"
बात आई गई हो गई। हम दोनों फ़िर से अपने पुराने दिनों में चले गए थे। अजय, रवि, दीपा सभी अपनी दुनिया में मगन थे। कजरी भी बेटे के पास खुश थी। हम ने एक घोंसला बनाया था। परिवार बढ़ा। घोसला भी बढ़ा। अंडे से बच्चे निकले, बड़े हुए और उड़ गए। अब पुनः वही घोसला है और हम दो हैं। शाम को हम टहलते। पुरानी बातें करते। लाफ्टर क्लब में जाते और बिना बात के हँसते।
"आज तो इतनी ज़ोर की बारिश हो रही है कि लगता है सब कुछ बहा ले जायेगी। तुम को याद है जब अजय होने वाला था, हम मन्दिर गए थे। लौटते समय ऐसे ही बारिश हो रही थी। हम कितनी देर मन्दिर में ही बैठे थे और तुम को दर्द शुरू हो गया था।"
"हाँ जी, कैसे भूल सकती हूँ? मुझसे ज्यादा तो आप परेशान थे। फ़िर किसी तरह से आप कार चला के मुझको हॉस्पिटल तक लाये थे।"
"हाँ, आँधी-पानी में हुआ था अपना अजय। कितना अजीब लग रहा था इस को छूते हुए। कहीं गिर ही न जाए ऐसा लगता था। नर्स तो कह रही थी कि आप तो ऐसे पकड़ रहें हैं जैसे किसी और का बच्चा हो।"
हम दोनों मुस्कुरा दिए। "बेगम! तो हो जाए इसी बात पर चाय... मैं स्टेडी में जा रहा हूँ। वहीं ले आना।" चाय ले के स्टेडी में आई तो देखा कि इन के हाथ में मेरी डायरी है। कुछ पढ़ रहे हैं।
"अवि! नहीं, मत पढ़ो।" कह के डायरी इनके हाथ से ले ली। देखा, तो वही पेज खुला था। अब तो मैं सर से पाँव तक काँप गई। "स्नेह! मैं इसको पढ़ना नहीं चाहता था। मैं सफाई कर रहा था तो ये हाथ लग गई। मैंने बस अभी खोला ही था। मैं तुम्हारे मुँह से सुनना चाहता हूँ। आज कह ही डालो, दिल के दरवाजे खोलो और मुझे अंदर आने दो। तुम ने ये दरवाजे मुझसे क्यों बंद कर रखे हैं, मालूम नहीं।" मेरे हाथ को पकड़ के बोले, "स्नेह! तुम ने सुख बाँटा है, अपना दर्द नहीं बाँटोगी?"
"अवि! ऐसा नही है। मैंने आज तक इस बात के अलावा तुम से कुछ भी नहीं छिपाया है। तुम को सब उसी समय बताना चाहती थी, पर डरती थी कि तुम नाराज हो जाओगे।"
'कोई बात नही आज तो बोलो मै सुनना चाहता हूँ। "
"आप को याद है जब आप की पोस्टिंग गोरखपुर में हुई थी। उसी समय आप की तरक्की भी हुई थी... कमिशनर के पद पर। नई जगह, नया पद! सब कुछ बहुत अच्छा था। बहुत बड़ा बंगला मिला, माली, ड्राइवर, रसोइया सभी मिले थे। अजय ने १२वीं पास कर के आई.आई.टी. की प्रवेश-परीक्षा दी थी। सभी कुछ बहुत अच्छा जा रहा था। याद है न!"
'हाँ हाँ! भगवान की दया से अजय का आई.आई.टी. कानपुर में चुनाव हो गया। हम सभी बहुत खुश थे।"
"जी हाँ, उस समय बधाई देने वालों का ताँता लग गया था। साहब का बेटा था तो लोग इस अवसर को कैसे छोड़ते... बस आते गए लोग। मिठाई पे मिठाई... जो भी आता मिठाई लेके आता। सभी को साहब की नजर में ऊँचा उठना था। इसी बीच हम अजय के जाने की तैयारी में व्यस्त हो गए। उस की जरूरत की छोटी बड़ी सारी चीजों की लिस्ट बना ली थी। हम माँ-बेटे जा के ले आते थे। आप के पास पास टाइम कहाँ था? पहली बार बेटा घर से अलग जा रहा था। दिल बहुत घबरा रहा था। पर जाना तो था ही न... हम दोनों अजय को कानपुर छोड़ने गए थे। है न!'
"हुम!" अवि धीरे से बोले। वापस घर आए तो आप अपने काम में लग गए, पर मुझे तो ये बड़ा घर काटने को दौड़ता था। पूरा दिन खाली खाली। पर दिल तो लगाना ही था। मैं घर के कामों में अपने आप को लगाये रखती। अजय के जाने की धुन में देखा नहीं था, पूरा फ्रिज़ मिठाइयों से भरा था। जो अच्छी जगह की मिठाइयाँ थी और जो ठीक बचीं, वो किसी किसी के घर भिजवा दीं और जो बचीं वो नौकरों में बाँट दीं। तब जा के थोड़ी सफाई हुई। इस तरह से घर जो नौकरों के भरोसे था वो अब मेरी निगरानी में रहता। घर का कोना कोना मैने साफ करवा दिया। आप भी तो बहुत खुश रहते थे, कहते थे कि ये घर कम, होटल ज्यादा लगता है। हम बहुत हँसते इसी बात पर। मुझे तो बस बताना होता था। काम तो नौकर ही करते थे। उस दिन सन्डे था। हम शाम को साथ साथ बगीचे में टहलते थे।
"हाँ, याद है!"
तो फ़िर ये भी याद होगा कि फूल मुरझा रहे थे। क्यारी सूखी हुई थी। मैंने अपने ड्राईवर से कहा कि जरा हरिया को बुला दे, जो कि हमारे माली का नाम था। तो वो बोला कि मेमसाहब वो तो एक हफ्ते से नहीं आ रहा है। "क्या एक हफ्ते से किसी ने मुझको बताया क्यों नहीं।" मैं बहुत गुस्सा हुई थी तो तुम ने कहा था, "कोई बात नहीं, आ जायेगा। चलो छोटे, तुम ही पानी दे दो।"
पर इसी तरह १० दिन बीत गए, मुरारी नहीं आया। ११वें दिन देखा कि उसकी बीवी काम कर रही है। "अरे तू! हरिया कहाँ है? कहीं शराब पीके पड़ा होगा घर में। तुम इस को छोड़ क्यों नहीं देतीं। कितना परेशान करता है ये तुम को।"
वो बहुत धीरे से बोली, "मेमसाहिब! हरिया हम का छोड़ के चला गै।"
"क्या कहा? किसके साथ? तुझ जैसी को छोड़ के वो कैसे जा सकता है।"
"नाहीं, नाहीं मेमसाहिब! केहू के साथै नाहीं..."
"तब???"
"दुनिया ही छोड़ देहलें। मुइ गईलें...." और वो जोर जोर से रोने लगी।
"कब??? क्या हो गया था?"
"कछु नाहीं। दुपहरिया के इ आइलें खाना खाए के। कान कहाँ से जिलेबी लाइल रहिलें। उहे खाई के सुत गइलें। बस थोडी देर मा उलटी सुरु हो गइल। जब तक अस्पताल ले के पहुँचली, तब तक ता......." और वो फ़िर से बहुत ज़ोर ज़ोर से रोने लगी।
"जलेबी...." मैं सोचने लगी। "अरे वो तो...." आप ने कितनी बार कहा था कि न बासी खाया करो, न किसी को दिया करो।"
"हाँ! क्यों कि कितनी बार तो लाइट जाती है; चीजें ख़राब हो जाती हैं।"
"पर मैंने आप की बात पर ध्यान नहीं दिया और जानते हैं, जब मैं मिठाई बाँट रही थी तो ये जलेबी मैंने ही उसको दी थी..."
"क्या?? क्या कहा तुम ने!!!!!!!!!!!!!!!"
"हाँ, मैंने ही दी थी वो जिलेबी उस को।" मेरा दर्द पिघल के आँसू बन बह रहा था।
"फ़िर?"
"उस के बाद तो मेरा दिमाग शून्य हो गया। मैं गिर पड़ी। सभी दौड़े... मुझे पानी का छींटा मारा। सभी कह रहे थे कि कितनी नरम दिल हैं.. हरिया के जाने का दुःख सह नहीं पा रहीं हैं... पर मैं ही जानती थी कि क्या हुआ था। जब थोड़ा सँभली तो घर के अंदर आ गई। हरिया की बीवी को भी अंदर बुला लिया।
"क्या नाम है तुम्हारा?"
"कजरी"
"कौन कौन है तुम्हारे घर में?"
"एक गो बिटवा है, ५ साल के और एक बिटिया है १ साल के। अब हमार का होई, मेमसाहिब! हमका काम पे राखि लो.."
"हाँ, हाँ! तुम ऐसा करो, यहीं पीछे जो कमरा बना है, उसी में आ के रहो। तुम को हरिया की जगह रख लेंगे।"
कजरी मेरे पैर छूने लगी "आप भगवान बानी। बहुत दया वाली बानी। जिन्नगी भर उपकार मानिब..." वो बोलती जा रही थी और रोती जा रही थी। पर मैं तो न किसी से कुछ कह सकती थी, न ही रो सकती थी। उस के वचन कानो में चुभ रहे थे "आप भगवान बानी.." मैं तो हत्यारिन थी, उस के हरिया की। यदि उस को पता चल जाए तो शायद मुझे कभी माफ़ नही करेगी। आप ने मेरे कहने से उस को हरिया की जगह पे रखवा दिया था। हमारा तबादला हो गया यहाँ तो वो नहीं मानी और हमारे साथ यहाँ आ गई। आज तक जो भी मैंने किया, उसी पाप को धोने की छोटी सी कोशिश थी।
"स्नेह! इतनी बड़ी बात तुम ने मुझसे छिपाई। तुम ने मेरी बात नही मानी, तुम्हारी एक छोटी सी भूल ने एक जीवन ले लिया और साथ में मरा एक पूरा परिवार..."
"मैं क्या करती... मैं डर गई थी। आज तक मैं इसी बोझ के साथ जी रही हूँ। इन लोगों के लिए जो भी करती हूँ, बेमानी लगता है।"
अवि ने मेरे आँसू पोंछते हुए कहा, "स्नेह! तुम ने जो किया है, वो अपराध तो है पर उस की जो सजा तुम ने अपने को दी है; जो प्रायश्चित किया है; वो प्रशंसा के काबिल है। तुम ने अपने बल पर उस परिवार का भविष्य बना दिया है। हरिया होता तो इतना कुछ न कर पाता।"
तभी दरवाजे की खट से हम दोनों का ध्यान उस ओर गया। देखा तो कजरी ओर रवि खड़े थे। मैं तो हड़बड़ा गई। कजरी रो रही थी और रवि पथराई आँखों से मुझको देख रहा था। घर में हम चार थे पर अजीब सी खामोशी थी। बात जो सालों से छुपी थी, आज हवाओं में थी।
"कजरी! प्लीज मुझको माफ़ कर दो। मैंने जान के कुछ नही किया।"
"दीदी! मैंने उनको तड़पते देखा है। अपनी दुनिया को अपने सामने उजड़ते देखा है। उस समय यदि आप ये कहतीं तो शायद मैं आप को कभी माफ़ न कर पाती। पर दीदी, आप यदि चाहतीं तो हम को जीवन की धूप में जलने को छोड़ सकती थीं। लेकिन आप ने मुझे और मेरे बच्चों को अपने आँचल के साये तले समेट लिया। हमारे आँसुओं को प्रेम के गंगाजल से धो दिया। आप दर्द की जिस अग्नि में पूरे जीवन भर जलती रहीं हैं, उसको मैंने महसूस किया है। पर तब मैं कुछ जानती नहीं थी। आज समझ पा रही हूँ। इतने पश्चाताप पर तो भगवान भी माफ़ कर देगा फ़िर मै तो इन्सान हूँ।"
मैं कजरी के गले लग गई। पीड़ा की जो नदी मेरे अंदर थी, बहती रही और उसका आँचल भिगोती रही। प्यार, जो डर के धागे में बँधा था, उन्मुक्त हो हमारे बीच बह रहा था।

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