सूरज निकलता है
हर सुबह .....
सर्द पसरी रेत पर
टीलों के पीछे से
लेने अर्ध्य, आस्था..
सुनने.. जय जयकार..
हो सप्ताश्व रथ पर सवार
दौड़ाता है श्रमित अश्वों को
तप्त शरीर, लोकहित धीर

बालू पर घरौंदों में
घर नहीं बसते
लगता है बस मेला
और...
मेले की भीड़ में
परिवार नहीं बनते
मिलते हैं.... बस
अस्ताचल पर विछड़ने के लिये

ईश्वर और प्यार ...
दोनों ही अस्तित्वहीन
किन्तु चलते हैं,
किसी मुद्रा की भांति
ईश्वर ......
आस्था का व्यापार
प्यार......
रिश्तों के सांचों में...
स्वार्थ का आधार

गोधुलि में ......
मुंह फेर लेते हैं
घर वापस लौटते
पशु पक्षी... जन, गण....
अस्त होते सूरज से

वापस लौटता है
फिर भी वह,
हर शाम.... झोंपड़े में ...
चूल्हे की आग और
टिमटिमाती रोशनी के लिये..
हर घर में एक सूरज होता है
और सूरज हर दिन निकलता है

0 comments:

एक टिप्पणी भेजें

आपका स्नेह और प्रस्तुतियों पर आपकी समालोचनात्मक टिप्पणियाँ हमें बेहतर कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करती हैं.

पुस्तकालय

~~~ साहित्य शिल्पी का पुस्तकालय निरंतर समृद्ध हो रहा है। इन्हें आप हमारी साईट से सीधे डाउनलोड कर के पढ सकते हैं ~~~~~~~

डाउनलोड करने के लिए चित्र पर क्लिक करें...

आइये कारवां बनायें...

साहित्य शिल्पी, हिन्दी और साहित्य की सेवा का मंच, एक ऐसा अभियान.. जो न केवल स्थापित एवं नवीन रचनाकारों के बीच एक सेतु का कार्य करेगा अपितु अंतर्जाल पर हिन्दी के प्रयोग और प्रोत्साहन का एक अभिनव सोपान भी है, अपने सुधी पाठको के समक्ष कविता, कहानी, लघुकथा, नाटक, व्यंग्य, कार्टून, समालोचना तथा सामयिक विषयो पर परिचर्चाओं के साथ साहित्य शिल्पी समूह आपके समक्ष उपस्थित है। यदि राष्ट्रभाषा हिदी की प्रगति के लिए समर्पित इस अभियान में आप भी सहयोग देना चाहते हैं तो अपना परिचय, तस्वीर एवं कुछ रचनायें हमें निम्नलिखित ई-मेल पते पर प्रेषित करें।
sahityashilpi@gmail.com
आइये कारवां बनायें...

Followers

Google+ Followers

Get widget