अत्यंत दु:ख के साथ सूचित करना पड रहा है कि आज दिनांक २५ सितम्बर २०१० को सु-प्रसिद्ध साहित्यकार डा. कन्हैया लाल नंदन का निधन हो गया। हिन्दी जगत को यह अपूरणीय क्षति है। साहित्य शिल्पी परिवार उन्हे श्रद्धांजलि अर्पित करता है।


डॉ. प्रेम जनमेजय ने डा. कन्हैया लाल नंदन के साथ ३६ वर्षों तक रिश्ते निभाए हैं। पेश है प्रेम जी की श्रद्धांजलि।

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मैं पिछले 36 वर्षों से नंदन जी को व्यक्तिगत रूप से जानता हूं और हमारे रिश्ते की शुरुआत 36 के आंकड़े से ही हुई पर यह 36 का आंकड़ा जल्दी ही 63 के आंकड़े में बदल गया । मैं पहली बार सन् 1974 में मिला था और वह मिलना एक घटना हो गया । इस घटना पर आधारित एक लेख मैंनें लिखा था -- सही आदमी गलत आदमी। पर जैसे समय बीता, उसने बताया कि रिश्तो को सहेजकर रखने वाला तथा उसे बुरी नजरों से बचाने वाला कन्हैयालाल नंदन नामक यह जीव संबंधों में गलत नहीं हो सकता है। जो व्यक्ति अपनी बीमारी को भी लोगों की निगाह से बचाकर रखता हो,उसका जिक्र आते ही उसके साथ जुड़े अपने संबंधों को व्याख्यायित न करता हो, वो मानवीय रिश्तों में कैसे 36 का रिश्ता बर्दाश्त कर सकता है।

नंदन जी बीमार हैं। बीमारी ने उन्हें शारिरिक रूप से दुर्बल कर दिया है परंतु बीमारी सबंधों की आंच को धीमा नहीं कर पाई है। आज भी अपने किसी का निमंत्रण हो तो कैसे भी वहां पहुंचना उनकी पहली प्राथमिकता होती है। अस्वस्थता बहाना भी तो नहीं बन पाती है।

पिछले दिनों परंपरा के कार्यक्रम में वे अपने दोस्तों की फौज के साथ उसी तरह से मिलने का यत्न कर रहे थे जैसे पहले मिला करते थे। अपनी बीमारी का जिक्र आते ही एक मुस्कान चेहरे पर खेलकर जैसे कहती कि, ये अपना काम कर रही है मैं अपना। उस दिन उन्होने बताया कि मैं अपनी आत्मकथा के अगले खं डमें व्यस्त हूं। मैं और उत्सुकता जाहिर की तो बोले कि आ जाओ। बुध का समय तकय हुआ और इससे पहले कि मैं उनके घर के लिए निकलता,उनका फोन आ गया-राजे, अभी रहने दो, तबीयत जरा ठीक नहीं है।’ मैं समझ गया कि जिस तबीयत को वह जरा बता रहे हैं वो कुछ अधिक ही है वरना मिलने से जो मना करे वो नंदन नहीं हो सकता ।

मेरा मन था कि इस स्तंभ के लिए उनसे एक बातचीत की जाए। इस आयोजन के लिए मैंने कृष्णदत्त पालीवाल से आग्रह किया तो वे बोले- प्रेम, उनका स्वास्थ इस योग्य नहीं है।वे कुछ मना तो नहीं करेंगें पर उन्हें परेशान करना उचित न होगा।’ ऐसे में सोचा कि मैं ही उनके संदर्भ में,औरों का जोड़कर लिख दूं।

कन्हैयालाल नंदन के संबंध में लिखने को कुछ सोचता हूं कि एक विशाल चुनौती युक्त दुर्गम किंतु इंद्रधनुषी प्राकृतिक सौंदर्य से युक्त ,निमंत्राण देता पर्वत मेरे सामने खडा है। ऐसी चुनौतियों को स्वीकार करना मुझे अच्छा लगता है । और इतने बरस से नंदन जी को जानता हूं, इतनी यादे हैं कि उनपर लिखना बांए हाथ का खेल है । पर लिखने बैठा तो उंट पहाड के नीचे आ गया । पता चला कि दोनों हाथों , दिलो - दिमाग और अपनी सारी संवेंदनाओं को भी केंद्रित कर लूं तो इस लुभावने पर्वत के सभी पक्षों को शब्द बद्ध नहीं कर पाउंगा । नैनीताल के पास एक ताल है -- नौकुचिया ताल । कहते हैं इसके नौ कोणों को एक साथ देख पाना असंभव है । इस व्यक्तित्व में इतने डाईमेंशंस हैं कि ... । तुलसीदास ने कहा है कि जाकि रही भावना जैसी प्रभु मूरति देखी तिन तैसी । अब कन्हैयालाल नामक यह प्राणी प्रभु है कि नहीं अथवा नाम का ही कन्हैया ,यह खोज करना आधुनिक आलोचकों का काम है पर इस मूरति को लोग अनेक रूपों में देखते हैं , यह तय है। इस नौकुचिया ताल के कोणों में- कला,कविता,मंच, पत्रकारिता,मीडिया, संपादन,अध्यापन, मैत्री, परिवार आदि ऐसे कोण हैं जिन्हे किसी एक साथ देख पाना संभव नहीं है।

मेरी इस घोषणा पर कई महानुभाव त्योरी चढ़ाकर , आलोचकीय गंभीर मुद्रा ग्रहणकर , कह सकते हैं कि क्या इतना उलझाउ, गडमड, अबूझ और रहस्यात्मक व्यक्ति है कन्हैयालाल नंदन नामक जीव । और अगर ऐसा है तो हमारा दूर से लाल सलाम , काला सलाम या भगवा सलाम। हम तो सीधे साधे इंसान हैं और ऐसे ही इंसान को जानना चाहते हें । तो मिलिए न इस सीधे साधे इंसान से । दर्शन कीजिए पर्वत पर उतरती आलोकित किरणों का , देवदार से समृद्ध इस पर्वत के सौंदर्य को निहारिए नं । नीचे से ही इसकी उंचाई को देखकर प्रसन्नचित्त होईए नं ।अब आप एक पर्यटक बनकर इस व्यक्तित्व को जानना चाहते हैं या एक पर्वतारोही बनकर , ये आपकी इच्छा है। विभिन्न कोणों से युक्त इस पूरे ताल की तरल,स्नेहिल एवं विपुल राशि का आत्मीयता अनुभव करना उसी के लिए सहज है जिसके लिए नंदन जी सहजता से उपलब्ध करवाना चाहते हैं।


सारिका,पराग,दिनमान,नवभारत टाईम्स, संडे मेल, इंडसइंड जैसी अनेक कुरसियां बदली और कभी ये कुरसियां नहीं भी रहीं पर यह इंसान नहीं बदला । इसका कष्ट बहुतों को रहा और नंदन जी ने बहुतों को यह कष्ट मुक्त भाव से बहुत बांटा भी । दोस्तों से मिलने पर हंसी के जो फव्वारे मैंनें सारिका में छूटते देखेे थे वही सफदरजंग एंक्लेव के इंडसईड के कार्यालय में, जनपथ की कॉफी शाप में और अनेक साहित्यिक गोष्ठीयों में छूटते देखे हैं । यह फुव्वारे अपनों के लिए एक्सक्लुसिव हैं । अपरिचितों के बीच यही धीर गंभीर मुद्रा में बदल जाते हैं । अपने निजत्व में हर किसी को झांकने की इज्जात नहीं देता है यह व्यक्ति । कन्हैयालाल नंदल के विभिन्न समयों पर आवश्यकतानुसार बदलते इस सटीक बदलाव को देखकर लगता है जैसे आप किसी महाकाव्यात्मक उपन्यास के पात्रों को जी रहे हैं । जहां देश काल और चरित्रा के बदलते ही भाषा और शैली बदल जाती है । जो नंदन सिंह बंधु, बीर राजा, महीप सिंह गोपाल चतुर्वेदी के सामने टांग खिंचाई का मुक्त दृश्य प्रस्तुत करते हैं और उस माहौल में बातें कम ठाहके ज्यादा होते हैं वही अपने किसी आदरणीय से बात करते समय शब्दों के प्रति अतिरिक्त सचेत होते हैं । जो पसंद है उसपर समस्त स्नेह उडेलने और जो नहीं है उसपर टरकोलॉजी के बाणों का प्रयोग करने में सिद्धहस्त यह व्यक्ति आभास तक नहीं होने देता है और आप घायल हो जाते हैें । अगर आप पसंद आ गए तो आप दोतरफा घायल होंगें । ( हां अपनों से भी घायल होते , सही शब्द होना चाहिए आहत होते भी मैंनें इस दिल को देखा है । हिंदी साहित्य में आपके अनेक ऐसे ज्ञानी ध्यानी आलोचक मिल जाएंगें जो जब आपसे अकेले में मिलेंगें तो आपकी रचनाशीलता के पुल बांध देंगें , जो रचनाएं आपने लिखी नहीं हैं उनकी भी प्रशंसा कर डालेंगें और खुदा न खास्ता आप अपनी कुरसी के कारण महत्वपूर्ण हैं तो ऐसे प्रशंसात्मक पुलों का कहना ही क्या । पर यही ज्ञानीजन जब आपके बारे में लिखने बैठते हैं तो इनकी अंगुलिया थरथराने लगती है और कलम बचकर चलती हुई चलनें लगती है ।)

नंदन जी के मित्रों,शुभंकचिंतको,आलोचकों,प्रशंसको, राजनैयिकों, राजनैतिज्ञों, नौकरशाहों, अनुजों, अग्रजों आदि की एक लंबी फौज है। इस फौज का प्रत्येक अंश उनके साथ न जाने किस गोंद से जुड़ा है। इस फौज ने सुअवसर तलाश कर नंदन जी के व्यक्तित्व कृतित्व के संबंध में अपने विचार व्यक्त करने में कोई कृजूसी नहीं की है।उन सबके उद्धरण ही दूं तो ‘गगनांचल’ के तीन-चार अंक तो निकालने ही पड़ेंगें। चावल के दानों से कुछ हाजिर हैं।

इंदरकुमार गुजराल ,पूर्व प्रधानमंत्री
एक ऐसे दोस्त का तआरुफ करना,जिसकी जहानत और दानिशमंदी के आप कायल हों, उतना ही मुश्किल काम है जितना खुद अपना तआरुफ खुद करना।दोनो में यकसा मुश्किलें हैं।और फिर कन्हैयालाल नंदन के बारे में कुछ लिखना हो तो और भी मुश्किल है क्योंकि मैं यह तय नहीं कर पा रहा हूं कि उनकी शख़्सियत के किस पहलूं को लूं और किसे छोड़ूं।उनका हास्य, उनका व्यंग्य, उनकी दार्शनिक सोच, उनकी राजनीतिक टिप्पणियां, उनकी शानदा कविता या फिर अपने नन्हे-किशोर दोस्तों से बातचीत करने का उनका पुरलुत्फ़ अंदाज!’’

डॉ0लक्ष्मीमल सिंघवी,
कसाले बहुत सहे हैं उन्होंने, किंतु कड़वाहट नहीं है उनके विचारों में। पद,प्रतिष्ठा अधिकार और संपन्नता उनको अपना जरखरीद बंदी नहीं बना पाए। वे एक समर्थ, स्वाभिमानी साहित्यकार है जो कभी टूटा नहीं, कभी झुका नहीं।झुका तो केवल स्नेह के आगे।

महीप सिंह, सुप्रसिद्ध साहित्यकार
नंदन ने सबकुछ सहा सबकुछ झेला किंतु अपनी मधुर मुस्कराहट में रत्ती भर भी कमी नहीं आने दी और अत्यंत पीड़ाजनक स्थितियों में भी कनपुरिया मस्ती नहीं छोड़ी। मुझे नंदन के संपूर्ण काव्य -सृजन में यह मस्ती, अक्खड़ता, भावुकता और सबसे उपर मानवीयता दिखाई देती है ।

कृष्णदत्त पालीवाल
नंदन जी की कविताओं की अंर्तयात्रा करते हुए मुझे टी0एस0 एलियट की यह बात कौंधती है कि कविता अपनी परंपरा से निरंतर संवाद है। स्वयं नंदन जी कभी अज्ञेय जी को ‘मैं वह धनु हूं’ कभी ठाकुर प्रसाद सिंह को ‘ हमें न सूर्य मिलेगा न सूर्य बिंब’ कभी दिनकर जी को ‘चाहिए देवत्व पर इस आग को धर दूं कहां पर’ कभी अशोक वाजपेयी को ‘हमारे साथ सूर्य हो ’ कभी कैलाश वाजपेयी को ‘जंग की तरह लगा भविष्य’ कभी दुष्यंत कुमार को ‘हर परंपरा को मरने का विष मुझे मिला’ कभी गियोमिलोव को ‘आओ छाती में बम लेकर आसमान पर हमला करें’ - याद करते हैं।


सुरिंदर सिंह
नंदन के हर प्रेम-गीत की धड़कन उसकी पत्नी है- मूर्ख है मेरा यार!उसकी ‘रातों का हर सलोना झोंका’ हर ‘भीनी सी खुशबू’ एक वजूद से है। आजतक वह इंतजार कर रहा है उस रात का ज बवह अपने ‘इंद्रधनुष’ से पूछने का साहस जुटा पाए कि वह उसके सपनों में क्यों आता है...

गोपीचंद नारंग, उर्दू अदब की शख़्सियत
कन्हैयालाल नंदन की शायरी शउरे जात व काइनात की शायरी है। उन्होंने आम हिंदी के शायरों की तरह अपनी शायरी में खातीबाना बहना गुफ्तारी का मुज़ाहरा नहीं किया है बल्कि तमकिनत और कोमलता के साथ अपनी तख़लीकी इस्तेआशत को इज़्हारी कालब में ढाला है।

यह चेहरा इतना संवेदनशील है , और चश्में के पीछे छिपी आंखें इतनी बातूनी हैं कि लाख छुपाने पर भी दिल की जुबान बोलने लगती हैं । पहनने का ही सलीका नहीं बातों का भी सलका सीखना हो तो हाजिर है । अपनों के लिए धड़कता यह दिल प्यार के नाम पर कुछ भी लुटाने को तत्पर रहता है , और कोई इस लूट को नहीं लूटता है तो उस बौड़म पर गुस्सा आता है । मुझे याद है, एक बार खीझकर नंदनजी ने कहा था-- राजे इस बदमाशी का क्या मतलब है कि पत्रिका में यह छाप दो वो छाप दो कि रट लगाए लोग मेरे पीछे डोलते है और तुम कुछ भी छपवाने के लिए नहीं कहते । ’’ मैंनें पाया कि आंखें साफ कह रही हैं कि यह दर्द जेनुइन है । मैंनें कुछ नहीं कहा बस उन आंखों को अपनी आत्मीय मुस्कान दे दी । दिल ने बात समझ ली । शायद यही कारण है कि सितम्बर 1995 में गगनांचल का संपादकीय भार संभालते हुए संपादन सहयोग के लिए पूछा नहीं गया था, सूचित भर किया गया था कि यह काम करना है । सच कहूं पत्रिका निकालने की शाश्वत खुजली के कारण मैं ऐसे प्रस्ताव की प्रतीक्षा में था । मत चूके चौहान की शैली में हां कह दी । इस हां के अनेक सुख थे । सबसे बडा तो यही कि संपादन के विशाल अनुभव सम्पन्न व्यक्ति का साथ , सरकारी पत्रिका होने के कारण साधन जुटाने की चिंता से मुक्ति तथा कुछ करो इस चांदनी में सब क्षमा है जैसा संपादकीय अभयदान । इस अवसर ने अजय गुप्ता जैसा मित्र भी दे दिया । मैनें इस व्यक्तित्व से बहुत कुछ सीखा है । इस सीखने की प्रक्रिया में डांट अधिक खाई है शाब्बासी कम पाई है और कहूं कि पाई ही नहीं तो बेहतर होगा । इस श्रीमुख से शाब्बासी नहीं मिली है पर वाया भंटिडा आई इस श्रीमुखीन शाब्बासियों ने मेरा उत्साह बढाया है । यह अच्छा ही रहा , एक सारहीन अहं नहीं पलने दिया गया ।‘गगनांचल’ को 2003 में छोड़ने के बाद मैंने नंदन जी से कहा कि मैंने आपसे बहुत कुछ सीखा है। वे बोले-क्या सीखा है, राजे!’ मैं- वो फिर कभी बताउंगा।’ इसके बाद नंदन जी ने जब ‘व्यंग्य यात्रा’ के संपादन और प्रस्तुति की प्रशंसा की तो मैंनें कहा- यही सीखा है जिसने आप जैसे अनुभवी एवं वरिष्ठ संपादक से मेरे संपादकीय कर्म की निष्पक्ष प्रशंसा करवा दी।

नंदन जी का एक काव्य संकलन है, ‘ समय की दहलीज पर ’ ।‘ समय की दहलीज ’ समय - समय पर लिखी कविताओं को एक किताब में संकलित कर प्रस्तुत मात्रा करने का प्रयत्न नहीं है अपितु कविता को एक वैचारिक सलीके से अपनी सम्पूर्ण गम्भीरता के साथ पाठकों से संवाद करने का आत्मीय आग्रह है । संकलन के हर पन्ने पर कवि नंदन उपस्थित हैं । यही कारण है कि संकलन की भूमिका नारे बाजी से अलग, एक कवि की विभिन्न समय- अन्तरालों में संचित सोच और काव्य अनुभवों का गद्य - गीत है । कवि नें जिन्हें अपने नोट्स कहा है वे वस्तुतः सारगर्भित सूत्रा हैं जो कन्हैयालाल नंदनीय दृष्टि से अपने परिवेश को समझने के प्रयत्न का परिणाम हैं और अपने अनुभवों को बिना कंजूसी के बांटते हुए दृष्टिगत होते हैं । इन नोट्स के आधार पर ही कविता पर एक सार्थक बहस की जा सकती है । इस सागर में से कुछ बूंदें आपके सामनें प्रस्तुत हैं ---‘ किसी कविता में जितना सम्पूर्णता का अंश डाला जा सकेगा , वह उतना ही समयातीत हो सकेगी ..... तात्कालिकता से हटना अच्छी कविता की अनिवार्यता है । .... आत्मालोचन करने का गुण अगर कवि में पनप जाये तो उसे किसी अन्य आलोचक की जरूरत नहीं होती । ....... कविता मन भी है , मस्तिष्क भी है , दिल भी है दिमाग भी है ।...... सकारात्मक कविता नकारात्मक कविता से हमेशा बडी होती है । ....... प्रेम की ज्योति अपने स्थान और समय से आगे तक की रौशनी देती है ।......... कविता का अच्छा पाठक अपने अंदर एक कवि होता है । ...... कवि के अंदर कुतूहल का जिंदा होना उसकी रचनाशीलता को आयाम प्रदान करता है । ....... आभ्यांतरिक संघर्ष रचनाशीलता में सबसे अधिक सहायक होता है । ........ सिकंदर पर सुकारात की अहमियत का युग लौट सके ।.......... ’’


समय की इस दहलीज को कवि नंदन नें पांच कोणों से देखा है और हर कोण को एक नाम दिया है । ‘ राग की अभ्यर्थना ’ के अंर्तगत संकलित कविताओं में कवि को ‘आत्मबोध’ होता है , वह अपने ‘विस्तार’ में आकाश को छोटा पाता है , और ‘संस्पर्श का कलरव ’ उसे अनुभव देता है --- राग की अभ्यर्थना में / धरती को जल नें / जल को हवा ने / हवा को आकाश ने छुआ / वृक्ष के अंग अंग / डाल - डाल / फुनगी - फुनगी / फूट पडा अंखुआ । / पृथ्वी / जल / हवा / आकाश / सबके संस्पर्श से वृक्ष की देह में / नया कलरव हुआ ।’’ इन कविताओं में एक उत्कट जीजीविषा है । ‘ समय ठहरा हुआ ’ कितना भी क्यों न हो पर कवि के सपनों में एक ‘इंद्रधनुष’ रोज आता है और सांसों के सरगम पर तान छेड जाता है । प्रकृति के विभिन्न रंगों में डूबता उतरता कवि अपनी संवेदनाओं का आत्मीय संस्पर्श छोडता चलता है । ब्रहाण्ड की विराटता को अपनी बाहों में बांध लेने को लालयित कवि इस विशाल शून्य को अपने अंदर भर लेना चाहता है --- कहना कठिन है / कि शून्य को खाली कर रहा हूं / या शून्य को भर रहा हूं /सच यह है कि / फूल/ रंग / कोमलता की तलाश कर रहा हूं । ’’

कविता को गुनगुनाने और कंठस्थ करने वाले पाठको को आज लगता है कि कविता कहीं उनसे बहुत दूर हो गई । मंच पर जो कविता विराजमान है उससे मानवीय मूल्यो के लिए चिंतित सजग पाठक वितृष्णा करता है । ऐसे में नंदन की कविता एक सहज मार्ग दिखाती है । यह कविता शुद्ध भारतीय मन और परिवेश की है । इस संकलन की कविताएं पाश्चात्य वादों या विवादों में उलझी भारतीय मानसिकता का अनुवाद नहीं हैं । यह कविताएं निराशा के दलदल में नहीं डूबोती हैं अपितु तमाम विरोधों के बावजूद एक सशक्त सम्बल हाथ में थमाती हैं । अपनी मिट्टी की गंध का स्नेहिल स्पर्श देती इन कविताओं को पढना एक साहित्यिक उपलब्धि है ।

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नंदन जी का संक्षिप्त परिचय

जन्म- जुलाई १९३३ को गाँव परस्तेपुर (जिला फतेहपुर) में

निधन -25 सितम्बर 2010

शिक्षा - बी.ए. (डी.ए.वी कॉलेज, कानपुर), एम.ए. (प्रयाग विश्वविद्यालय), पीएच.डी. (भावनगर विश्वविद्यालय)

कार्यक्षेत्र- ४ वर्ष तक मुंबई विश्वविद्यालय से सम्बद्ध कॉलेजों में अध्यापन। १९६१ से १९७२ तक टाइम्स ऑफ इंडिया प्रकाशन समूह के धर्मयुग में सहायक संपादक। १९७२ से दिल्ली में क्रमशरू पराग, सारिका और दिनमान के संपादक। तीन वर्ष तक दैनिक नवभारत टाइम्स में फीचर संपादक, ६ वर्ष तक हिन्दी संडे मेल में प्रधान संपादक तथा १९९५ से इंडसइंड मीडिया में निदेशक के पद पर।

प्रमुख कृतियाँ- लुकुआ का शाहनामा, घाट-घाट का पानी, अंतरंग नाट्य परिवेश, आग के रंग, अमृता शेरगिल, समय की दहलीज, बंजर धरती पर इंद्रधनुष, गुजरा कहाँ कहाँ से।

सम्मान पुरस्कार- भारतेंदु पुरस्कार, अज्ञेय पुरस्कार, मीडिया इंडिया, कालचक्र और रामकृष्ण जयदयाल सद्भावना पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।

11 comments:

  1. कन्हैया लाल नन्दन को मेरी ओर से भावभीनी श्रद्धाजलि!

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  2. नन्दन जी को श्रद्धांजलि। मेरी उनसे एकाधिक मुलाकातें श्री से रा यात्री, प्रेम जनमेजय, हरीश नवल, आदि के साथ हुयीं और उनके सम्पादन काल में ही सारिका में प्रकाशित होने का अवसर मिला। अंतिम मुलाकात भोपाल के राजभवन में आयोजित कवि सम्मेलन में उदय प्रताप सिंह जी के साथ हुयी थी। दुर्भाग्य से उसी दिन सारिका के पूर्व सम्पादक कमलेश्वर जी के निधन का समाचार आया

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  3. कन्हैया नंदन जी की पुस्तक आग के रंग मेरे मानस पट्ल पर छाई हुई है| इस प्रकार की रचनाओं के जन्मदाता को मेरा शत -शत नमन|
    मेरी ओर से भावपूर्ण श्रद्धांजलि |

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  4. nndn ji ne ek sundr sahityik yug jiya vinmr shrddhanjli
    sahity shilpi ne yh sb taiyar krne vastv me bda prishrm kiya hai apne sahityik dhrm ko bdi lgn se nibhaya hai
    sahity shilpi ko sadhuvad

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  5. हिन्दी को यह नहीं भरने वाली क्षति है। कन्हैया लान नंदन जी को श्रद्धांजलि।

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  6. कन्हैया लाल नन्दन को मेरी ओर से भी श्रद्धाजलि!

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  7. ईश्वर यदा कदा ही नन्दन जी जैसे विद्युतपुंज हम जैसों
    की बैटरी चार्ज करने भेजते है उन अनुकरण योग्य चरणों में श्रध्दावनत.........

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  8. डा सुभाष राय25 सितंबर 2010 को 10:04 pm

    एक सम्वेदनशील साहित्यकार और एक मेधावी सम्पादक के रूप में नन्दन जी हमेशा हमारी स्मृति में बने रहेंगे. विनम्र श्रद्धांजलि.

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  9. मेरी ओर से हिन्दी के इस शिखर पुरुष को विनम्र श्रद्धांजली

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