देश हमारा
हम है इससे
हम है राजा, प्रजा भी हैं हम
फिर भी भान हुआ जाता है
सीमाएँ हम लाँघ रहे हैं
आजादी की हर इक हद की.
छोटे बडे है बनकर बैठे
जैसे बड़े बने है छोटे
बेटा बन जाता है बाप लगे यूँ
बेटी सास की सास बने ज्यूँ
क्यों होता है भास ये ऐसे??
जैसे छीनी हो आजादी
इस पीड़ी ने उस पीड़ी से
उम्र नहीं है छीन पाते
पर हाँ ! छीनते हैं वो अख्तयार
जो मिला है उस पीढ़ी को
बीते मौसम जिसने काटे.
वाह वाह गाँधी जी !!!!
क्या आजादी का अर्थ है बदला
देकर आज़ादी तुम हमको
ख़ुद

आज़ाद हुए हर बँधन से
मुक्ति का वो द्वार जो खोला
बहुत हुआ है चौड़ा अब
देता रहता है आजादी
ज्यादा, बहुत ज़ियादा कुछ यूं
जो पीढी दर पीढी को
आज़ाद करती जा रही है
खुद से, हर उस बँधन से
लाँघ रही जो मर्यादा की सीमाएं
जिसमें बँधी हुई है
संस्कारों की वो पोटली
जो मिली थी उन पूर्वजों से

उनकी माँ पिता, दादा, दादी को.
क्यों बख्शी आज़ादी ऐसी
रही न जिसमें कोई परिधी
जो बाँध सके उन रिश्तों को
आजादी के दाइरे में॥
कहाँ गया वो स्वाभिमान ???
अभिमान हुआ करता था जिसपर
क्या मोल चुकाया आपने
ओढ़ फकत एक लँगोटी
किस मूल्य खरीदा है मान,
अपमान की सीमा लाँघकर
नग्नता नाच रही है
शीलता भँग हो रही है
कत्ल आम हो रहा है इन्सानियत का॥
नहीं चाहिये वह आज़ादी
जो घर में देस न ला सके
स्वतँत्रता जो हक़ है हर मानव का
चारदीवारी में न ला सके
जहाँ आजादी से साँस ले
छोटा बड़ा, बिन घुटन के
जिये वो शान से मरे वो शान से॥

5 comments:

  1. साहित्य शिल्पी पर गाँधी जी क ले कर अनेकों रचनायें प्रस्तुत हुईं। राष्ट्रपिता को इस तरह राद करना सुखद लगा।

    नागरानी जी की यह कविता बहुत उत्कृष्ट है।

    उत्तर देंहटाएं
  2. हम है राजा, प्रजा भी हैं हम
    फिर भी भान हुआ जाता है
    सीमाएँ हम लाँघ रहे हैं
    आजादी की हर इक हद की.
    छोटे बडे है बनकर बैठे
    जैसे बड़े बने है छोटे
    बेटा बन जाता है बाप लगे यूँ
    बेटी सास की सास बने ज्यूँ
    क्यों होता है भास ये ऐसे??

    बडी सोच से भरी कविता

    उत्तर देंहटाएं
  3. यह रचना गाँधी जी के विचारों को नई दृष्टि देती है तथा सोचने को बाध्य करती है।

    उत्तर देंहटाएं

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