अज्ञेय जो बकॊल ओम थानवी (जनसत्ता),अपने को सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन कहलवाना अधिक पसन्द करते थे, हिन्दी कविता की एक प्रमुख मुख्यधारा नयी कविता के प्रमुख कवि तो थे ही, अपनी ऒर नयी कविता के प्रमुख प्रवक्ता भी थे । आधुनिक काल में जीवन के हर हलके में नये अन्वेषण हुए हॆं । साहित्य भी इस दृष्टि से अछूता नहीं रहा हॆ । विषय ऒर रूप-शिल्प की दृष्टि से वह विविधताओं से भरा पड़ा हॆ । काव्य-शिल्प की दृष्टि से तो इस युग को क्रांतिकारी युग कहा जा सकता हॆ । यह वह समय हॆ जब सर्जक को अभिव्यक्ति के प्रचलित उपादान घिसे हुए ऒर अक्षम नज़र आने लगे । उनके प्रति नयी सॊन्दर्याभिरुचि से सम्पन्न कवि का नकारात्मक स्वर उभरने लगा । विशिष्ट कारण बताया गया ज़िन्दगी ऒर भावबोध का जटिल हो जाना । ऎसे में चले आ रहे शास्त्र ऒर काव्यशास्त्रियों से टकराहट होना सहज-स्वाभाविक ही था । कवियों के द्वारा अपनी कविता के हित में वक्तव्य देना न केवल प्रारम्भ हो गया बल्कि ज़रूरी भी कहा गया । कहा गया कि आलोचना को यह समझ लेना चाहिए था कि भारतीय काव्यशास्त्र की संभावनाएं रीति-काव्य के साथ समाप्त हो गईं ( जिरह, श्रीकांत वर्मा) । अज्ञेय ने यद्यपि यह कहा हॆ कि ’लेखक की बात का कभी विश्वास नहीं करना चाहिए, ख़ासकर उसके अपने लेखन के विषय में उसकी बात का’ (लिखी कागद कोरे, अज्ञेय), तो भी, अन्तत: उन्होंने यही मत व्यक्त किया हॆ -"आज जो कविता लिखी जा रही हॆ उसे अगर एक मुकदमें के रूप में प्रस्तुत करना हॆ तो उसका वकील उसी में से निकलना चाहिए - आज जो लिखा जा रहा हॆ उसका सच्चा वकील आज का लिखने वाला ही होना चाहिए । ...भूमिकाओं में अथवा वक्तव्यों में दी गई दलीलों पर विचार करना चाहिए ।" (चॊथा सप्तक, अज्ञेय ) । सच तो यह हॆ कि नये कवियों ऒर उनकी कविताओं ऒर कविता संबंधी उनके विचारों का जितना विरोध हुआ ऒर होता गया वे उतने ही अपनी कविताओं के वकील होते चले गए ।इसीलिए इनके विचारों की स्रोत-सामग्री भी बिखरी बिखरी हॆ । कमोबेश सभी भावधाराओं (या विचारधाराओं ) के नये कवि इस दृष्टि से एक ही मंच पर नज़र आते हॆं ।यह भी सच हॆ कि ऎसी शुरुआत छायावाद में हो चुकी थी । ऒर यह भी कि वे अपने को परम्परागत अर्थ में काव्यशास्त्री होने का दावा नहीं करते । इन कवियों का लक्ष्य तो कवि होने के नाते अपने समय की कविता की विशेषताओं को न्यायसंगत ठहराना रहा हॆ । इसी संदर्भ में इन्होंने वस्तु ऒर रूप ऒर ख़ासकर काव्य-शिल्प पर विचार किया हॆ । मसलन इनका बुनियादी सरोकार अपनी या अपने समय की कविता के शिल्प को केन्द्र में रखकर ’शिल्प’ पर विचार करना तो रहा हॆ किन्तु अनुसंधान-ग्रंथों ऒर शास्त्रीय समीक्षकों के समान ’शिल्प’ शब्द की प्राचीन अथवा पूर्वर्तियों द्वारा की गई परिभाषाओं का विवेचन करते हुए अपनी कोई स्पष्ट परिभाषा स्थिर करने का इनका कोई प्रयास दृष्टिगत नहीं होता । इसी प्रकार नये कवियों का लक्ष्य काव्य-भाषा पर काव्यशास्त्रीय ढंग से विचार करना नहीं रहा हॆ । अत: सभी नये कवियों ने सिलसिलेवार काव्य-भाषा के सभी आयामों पर विचार नहीं किया हे । अत: इनके संदर्भ में हम भाषा के उन्हीं पक्षों को अपने अध्ययन का केन्द्र बना सकते हॆं जिन पर इनके मत उपल्ब्ध हॆं । भाषा को भी, अलग-अलग विचारधाराओं के होते हुए भी प्राय: सभी नये कवियों ने समान महत्व दिया हे । यूं भी काव्य-शिल्प की चर्चा में नये कवियों का सर्वाधिक प्रिय विषय काव्य-भाषा या कविता की भाषा ही रहा हॆ । ऒर यह भी उल्लेखनीय हॆ कि जिन कुछ ही (मसलन मुक्तिबोध, शमशेर, केदारनाथ अग्रवाल, गिरिजाकुमार माथुर आदि) नये कवियों ने काव्य-शिल्प ऒर विशेष रूप से काव्य-भाषा के मुद्दे पर अपने विचार व्यक्त किए हॆं उनमें अज्ञेय अग्रिम पंक्ति में हॆ बल्कि कभी-कभी तो सर्वाधिक आगे सजग नज़र आते हॆं । इन्होंने भाषा के विभिन्न आयामों पर सर्वाधिक लिखा हॆ । इसीलिए अज्ञेय के शास्त्रीय रूप की अवहेलना नहीं की जा सकती । ऒर इस निष्कर्ष का यह आशय कदापि नहीं हॆ कि हम उनकी शास्त्रीयता के हर पक्ष से सहमत हों ही ।

यह तो सब जानते हॆं कि कविता के लिए खड़ी बोली हिन्दी के उपयोग की शुरुआत का क्रांतिकारी कदम तो भरतेन्दु युग में ही उठ गया था, द्विवेदी-युग में उसकी ओर पर्याप्त ध्यान दिया गया । लेकिन काव्य-भाषा के रूप में उसे परिष्कृत ऒर परिनिष्ठित रूप छायावाद में ही मिल सका । काव्य-भाषा के प्रति सजगता ऒर आग्रहशीलता बरती गई थी । अज्ञेय मूलत: ऎसी सजगता ऒर आग्रहशीलता को कवि के लिए उचित मानते हॆं यद्यपि ’व्याकरण-शुद्धि’ ऒर भाषा के प्रतिमानीकरण पर ही अधिक बल होने के कारण वे द्विवेदीयुगीन आग्रहशीलता को पूरा समर्थन नहीं दे पाते । असल में उनकी दॄष्टि में भाषा ऒर शब्द का संस्कार व्याकरण-शुद्धि से अधिक बड़ी ऒर गहरी बात होती हॆ ( आत्मनेपद, अज्ञेय) । इसीलिए अज्ञेय यह भी मानते हॆं कि रचनाशील भाषा अपूर्व या अतर्कित स्थिति में कोश का मुंह नहीं जोहती बल्कि नयी भाषा गढ़ लिया करती हे ऒर यही नयी गढ़न, भाषा के समग्र संस्कार के अनुरूप ही होती हॆ (स्रोत ऒर सेतु, सच्चिदानन्द वात्स्यायन) । स्पष्ट हॆ कि नये कवि के रूप में अज्ञेय अपने से पहले की दृष्टि को महत्व देते हुए भी उसकी कमज़ोरी की उपेक्षा नहीं करते बल्कि हस्तक्षेप करते हॆं । अत: जहाँ-जहाँ नज़र आता हॆ, अज्ञेय का विरोध, निरा विरोध भी नहीं माना जाना चाहिए । असल में नया कवि दोहरी समस्या से जूझ रहा था । छायावादी रुमानी भाव-बोध ऒर उसके शिल्प से तो उसकी टकराहट हुई ही, बच्चन आदि उत्तरछायावादी कवियों के द्वरा प्रदत्त लगभग बोलचाल को ही काव्य-भाषा का स्थान देना भी उसे उचित नहीं लगा (अर्थात, १९७५, त्रिलोचन)। अत: वह लोकप्रियता की कीमत पर भी कविता के शिल्प में नये-नये प्रयोग करने पर विवश हुआ । उसे पुराने हथियार नए ढ़ंग से इस्तेमाल में लाने पड़े ऒर साथ ही सर्वथा नए हथियार खोजने भी पड़े । नए कवियों द्वारा काव्य-भाषा को दिए गए महत्तव को इस प्रसंग में देखा जाना चाहिए । अज्ञेय ने तो काव्य-भाषा के पुन: सृजन (आलवाल, सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन) पर उत्तरोत्तर विचार किया जाना भी स्वीकार किया हॆ । यह बात अलग हॆ कि लुकास जॆसे विद्वान महान कवियों के द्वारा भाषा को बेहतर किया जाना तो कबूलते हॆं लेकिन पुन:सृजन नहीं (Style, F. Lucas ) । इलियट महोदय ने इस ओर विचार करते हुए माना हे कि कवि का सीधा दायित्व भाषा के प्रति हॆ ऒर कवि भाषा को जहाँ एक ओर सुरक्षित रखता हॆ वहीं दूसरी ओर विकसित एवं बेहतर भी बनाता हॆ (On Poetry & Poets, T. S. Eliot) | यहाँ प्रयुक्त विकसित शब्द पुन:सृजन के समकक्ष माना जा सकता हॆ । अज्ञेय लगभग यही बात दोहराते हॆं जब वे लिखते हॆं -" कवि का उद्देश्य केवल शब्द की निहित सत्ता का पूरा उपयोग करना नहीं बल्कि उसकी जानी हुई संभावनाओं के परे तक विस्तार करना हॆ" (आलवाल, सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन) । भाषा के महत्तव के संदर्भ में अज्ञेय का यह मत भी विचारणीय हॆ कि भाषा सबसे कमज़ोर साधन हॆ क्योंकि एक ओर तो भाषा का माध्यम सर्वाधिक कृत्रिम हॆ तथा दूसरी ओर शब्द का आत्यंतिक अर्थ नहीं होता, अर्थ थोड़ा उन्नीस- बीस होता रहता हॆ (आत्मनेपद, अज्ञेय ) । यह कोई ऎसी सोच या समस्या नहीं हॆ जिसे सर्वथा मॊलिक कहा जाए । शब्दों या भाषा की सीमा या तोड़े की बात तो बात-बात पर सुनने को मिल जाती हॆ । फ़िर भी अज्ञेय के इस निष्कर्ष से कोई आपत्ति नहीं हो सकती कि भाषा के माध्यम के प्रति पूरी तरह सजग रहना चाहिए ऒर उसकी शक्ति का दुरुपयोग नहीं किया जाना चाहिए (आत्मनेपद, अज्ञेय) । अज्ञेय के अनुसार ही, गोचर अनुभव भले ही भाषा के बिना भी हो सकते हॆं ,लेकिन जब हम उनको नाम देकर पहचानते हॆं, ऎसे रूप में पहचानते हॆं जिसका दूसरे तक सम्प्रेषण भी हो सकता हॆ, तो यह भाषा के बिना नहीं होता (अपरोक्ष, सच्चिदानंद वात्स्यायन)) । केदारनाथ अग्रवाल ने भी मूर्त जगत की वस्तुवत्ता ऒर कविता में प्रकट कविता की वस्तुवत्ता में गहरा संबंध मानते हुए भाषा के प्रति अतिरिक्त रूप से सचेत रहने की बात की हॆ (आधुनिक कवि १६) । बात सही भी हॆ । नाटक में भी जब अभिनेता भाषिक संवाद करता हॆ तो भाषा के महत्तव का प्रश्न खड़ा हो जाता हॆ । लेखक के संदर्भ में भाषा का प्रश्न ऒर भी अधिक ज़रूरी ऒर प्रासंगिक हॆ । एक ओर उसे भाषा के अवमूल्यन की गहरी चिन्ता बनी रह्ती हॆ ऒर दूसरी ओर उसे हर क्षण भाषा का अत्यधिक अर्थवान प्रयोग करना होता हॆ । ऎसी सोच के चलते ही नये कवियों के यहाँ कविता के अध्ययन के लिए भाषा को ही एक मूल्य (प्रतिमान) के रूप में भी देखा गया हॆ ।

अज्ञेय ने भाषा का दोहरा प्रयोजन माना हॆ । भाषा को वे जानने का भी साधन मानते हॆं ऒर जाने हुए के संप्रेषण का भी ( दूसरा सप्तक)। इस प्रकार, कह सकते हॆं कि अज्ञेय ने भाषा की परिभाषा या प्रयोजन में एक नया आयाम जोड़ा हॆ । उन्होंने नवीन मत की स्थापना की हॆ ।ग़ॊर करना होगा कि जानने में अनुभव करना भी निहित हॆ । अभी तक प्रचलित अर्थों में भाषा को प्राय: संप्रेषण के साधन के रूप में ही देखा गया था । नामवर जी के शब्दों में कहें तो " इस मान्यता की नवीनता यह हॆ कि इसमें भाषा को जानने का भी साधन माना गया हे । इससे पहले भाषा केवल अभिव्यक्ति का साधन मानी जाती थी" (कविता के नये प्रतिमान) । अज्ञेय से पहले एक विशिष्ट सदर्भ में इलियट ने भी भाषा को महसूस करने या अनुभव करने का माध्यम माना हॆ (I have just said"feel" in a new language and I mean something more than merely express their feelings in a new language, On Poetry and Poets ) । कुछ विद्वानों ने भाषा के दोहरे प्रयोजन की अवधारणा को ॠग्वेद में भी खोजने का प्रयत्न किया हॆ । बहरहाल अज्ञेय की इस नवीन सोच ने भाषा पर नये-नये ढ़ंग से सोचने पर विवश या प्रेरित किया हॆ । मसलन भाषा यदि कवि के अनुभव ऒर ज्ञान का साधन हॆ तो कविता का विश्लेषण करके उसके अनुभव की शक्ति को भी मापा जा सकता हे । इस प्रकार अनुभव की शक्ति ऒर अभिव्यक्ति कॊ शक्ति के रूप में भाषा एक हो जाती हॆ । नामवर जी ने तो यहाँ तक कहा हॆ -" इस सफ़ाई के लिए कोई गुंजाइश नहीं रही कि कवि ने अनुभव तो बहुत किया किन्तु भाषा की असमर्थता के कारण अपनी बात पूरी तरह नहीं कह पाया । तुरन्त यह सवाल उठेगा कि उसने बहुत अनुभव किया था, इसका प्रमाण क्या हॆ ?"( कविता के नये प्रतिमान) । हाँ , नामवर जी ने यह तो माना हॆ कि कथ्य ऒर शिल्प के पुराने द्वॆत को विलय करके यदि कोई कवि भाषा के प्रति सजग रहकर उसे महत्व देता हॆ तो उसे ’शिल्पवादी’ नहीं कहना चाहिए किन्तु उनके अनुसार ख़तरा तब बढ़ जाता हॆ जब मूल्यांकन में ’कथ्य’ की उपेक्षा होने लगती हॆ (आलोचना, १९६७) । अज्ञेय ने सिद्धन्त के रूप में ’शिल्पाग्रह’ ऒर "मताग्रह" दोनों को अनुचित माना हॆ क्योंकि दोनों प्रकार काव्यों पर रीति हावी हो सकती हॆ (तारसप्तक) । वे शिल्प की कलाबाजी को कविता नहीं मानते (लिखी कागद कोरे) । उन्होंने अपनी एक कविता के माध्यम से भी ’रूपाकार’ पर ’सार’का महत्व स्वीकार किया हॆ । कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हॆं -

नहीं रूपाकार को, उसमें
छिपा हॆ सार जो, वह वर
अनूभूति से मत डर
मगर पाखण्ड उसके दर्द का मत कर। (अरी ओ करुणा प्रभामय, अज्ञेय)

लेकिन अपनी-अपनी भाव-धारा के कारण नये कवियों के भाषा संबंधी सजगता या आग्रह को थोड़ा अलग-अलग करके समझने की भी जरूरत हॆ । ऊपरी समता तक ही नहीं थम जाना चाहिए । मसलन त्रिलोचन ऒर अज्ञेय के हवाले से नामवर सिंह ने लिखा हॆ कि "जीवन ऒर कविता के अन्त:सम्बन्धों में फ़र्क होने के कारण जहाँ त्रिलोचन कविता को जीवन की जीवंत भाषा प्रदान कर उसे पुन: जीवित कर सके ऒर कह सके हॆं कि ’भाषा की लहरों में जीवन की हलचल हॆ ’ वहाँ अज्ञेय जॆसे ’आत्माभिव्यंजावादी’ कवि अपनी अभिव्यक्ति को अधिक से अधिक प्रभावशाली रूप देने के लिए भाषा या शब्द की खोज करते हॆं (ज्ञानोदय, अगस्त, १९६३) । यहाँ एक दिलचस्प तथ्य या विचार की ओर ध्यान दिलाना चाहूंगा । आलोचना (जून १९६५, पृ० १३६ ) में विश्वम्भर मानव ने अज्ञेय के बारे में लिखा हॆ -"प्रारम्भ में ये प्रगतिवाद के प्रशंसक थे ।...लेकिन प्रारम्भ से ही प्रगतिवाद के समर्थकों आलोचकों ने इनका घोर विरोध किया । परिणाम यह हुआ कि इन्होंने काव्य ऒर आलोचना की दिशा मोड़ दी । श्री अज्ञेय के नेतृत्व के समस्त गुण विद्यमान हॆं । यादि प्रगतिवाद कॆम्प ने यह नेतृत्व इन्हें सॊंप दिया होता, तो मेरा अनुमान हॆ, हिदी में प्रगतिवाद की जड़ें बहुत मज़बूत हो गयॊ होतीं ।ख़ॆर यह कवि के विचार ऒर उसकी कविता के बारे में आलोचक की राय का मसला हॆ । यह बात तो तय हॆ कि न तो भाषा को सामाजिक संदर्भ से काट कर देखा जा सकता हॆ ऒर न ही रूप को विषय-वस्तु से ऒर दोनों को सामाजिक परिवेश से काट कर देखा जा सकता हॆ । ऒर नये कवि ऎसा ही मानते हॆं । केदारनाथ अग्रवाल का कहना हॆ कि यथार्वादी या प्रगतिशील कवि भी आत्माभिव्यकित करता हॆ लेकिन उसकी आत्मपरकता खोलली, दिमाग की बंद गलियों की वस्तु या खाली बॊद्धिक अहं न होकर यथार्थ के लोक से, भाषा से जुड़ी होती हॆ (विचारबोध, केदार्नाथ अग्रवाल) । जहाँ तक सॆद्धान्तिक विवेचन का प्रश्न हॆ अज्ञेय कवि के ’सामाजिक उत्तरदायित्व’ वाले पक्ष पर सर्वथा मॊन नहीं हॆं । उन्होंने भले ही सामाजिक मूल्यों के क्षेत्र ऒर रचनाप्रक्रिया के क्षेत्र को अलग अलग माना हो लेकिन यह कहने से नहीं चूके हॆं कि शब्द का संवेदन (सम्प्रेषण) बिना युग-सम्पृक्ति के नहीं हो सकता (तारसप्तक) । फ़िर भी यह नहीं भूलना चाहिए कि अज्ञेय ने तारसप्तक के नये संस्करण के पुनश्च में यह भी लिखा था कि " काव्य सबसे पहले शब्द हॆ । ऒर सबसे अंत में भी यही बात बच जाती हे कि काव्य शब्द हॆ " । यह मत कमोबेश एज़रा पाउण्ड के मत Great literature is simply language charged with meaning to the utmost possible degree, A B C of Reading) के करीब पड़ता हॆ । लेकिन यहाँ अर्थ की बात भी जोड़ दी गई हॆ । अज्ञेय युग-सम्पृक्ति की बात तो करते हॆं लेकिन उनका बल भाषा के रूप पर ही नज़र आता हॆ । यही कारण हॆ कि उनके वहाँ देसीपन नज़र नहीं आता जॆसा जीवनोन्मुख कवियों में आता हॆ । मुक्तिबोध ने भाषा को सामाजिक निधि माना हॆ ऒर शब्द के पीछे एक अर्थ-परम्परा को स्वीकार करते हुए अर्थ को जीवनानुभव से जोड़कर देखा हॆ । (एक साहित्यिक की डायरी ) । यहाँ यह भी उल्लेखनीय हॆ कि अज्ञेय के अनुसार कवि भाषा नही लिखता, शब्द लिखता हॆ । इसीलिए शब्द या पद के स्थान पर भाषा लिखने वाले कवियों को अज्ञेय ने ’छान्दस’ माना हॆ (भवन्ती ) । केदारनाथ सिंह के अनुसार भी-’शब्द के माध्यम से ही कविता घटित होती हॆ , जो अपने आप में एक समग्र इकाई हॆ (कलावार्ता) । शब्द संबंधी अपनी धारणा में अज्ञेय स्पष्ट ऒर दृढ़ प्रतीत होते हॆं । उन्होंने तारसप्तक में लिखा था कि ध्वनि, लय ऒर छ्न्द की निरपेक्ष सत्ता नहीं होती , ये ’शब्द’ से ही निकलते हॆं ऒर उसी में विलीन हो जाते हॆं, बल्कि सामाजिक मत भी, उनके मत में, इसी ( शब्द) में से निकलते हॆं । यह बात न केवल विवादास्पद हॆ बल्कि पेचीदा भी हे । निश्चत रूप से शब्दों के कुशलतापूर्ण या सजगता भरे प्रयोग का कविता में बहुत मह्त्त्व होता हॆ । सफ़ल कवि शब्दों का पारखी होता हॆ । किन्तु यह कहना कि कविता मात्र भाषा ही हॆ या शब्द हॆ, एक अतिवादी दृष्टिकोण नज़र आता हॆ ।

नया कवि सिद्धान्तत: भाषा के सहज रूप पर बल देता हॆ । अज्ञेय का भी यही पक्ष हॆ । उन्होंने सही भाषा को सहज भाषा का पर्याय मानते हुए लिखा हॆ -"भाषा का संस्कार वही सही होता हॆ जो इतना गहरा हो जाए कि लिखते-बोलते समय ही नहीं, स्वप्न देखते समय भी यह प्रश्न न उठे कि भाषा सही हॆ या नहीं ।सही भाषा जब सहज हो जाये तभी वह वास्तव में सही हॆ ।" (अद्यतन) । अज्ञेय का यह भी माना हॆ कि रचते समय रचनाकार को न भाषा की चिन्ता होती हॆ न ही भाषा की रचनात्मकता की । ऎसे सब विचार तो रचना हो जाने के बाद किए जाते हॆं । (अद्यतन) । अज्ञेय की यह बात गह्राई से समझी जानी चाहिए । मॊटे रूप में यहाँ शब्द, शब्दावली या भाषा के आरोपण की ओर ध्यान दिलाया गया हे । आरोपण सहज नहीं होता । अत: भाषा का सहज रूप भाषा का सही होना या शुद्ध होना नहीं होता बल्कि वह भाषा पर कवि के स्वाभाविक लगने वाले अधिकार के रूप में होता हॆ । कवि शमशेर( आलोचना, जुलाई-सितम्बर, १९६७) ने ऎसे कवियों को रूपवादी कहना अनुचित माना हॆ जो शिल्प पर अधिकार पा चुके हॆं । दसरे शब्दों में, जिनके लिए उनकी कविताओं में विशिष्ट दिखने वाला शिल्प सहज हो चुका हॆ । चॊपाई ऒर दोहे पर अतुलनीय अधिकार होने के बावज़ूद तुलसी को रूपप्रकारवादी नहीं कहा जाएगा । नया कवि सहज भाषा की प्राप्ति के लिए साधाना की आवश्यकता को नकारता नहीं हॆ । वह भाषा पर सहज अधिकार को इल्हाम या अलॊकिक शक्ति का कमाल न मानकर साधना की वस्तु मानता हॆ । यही उचित भी हॆ । अज्ञेय ने भाषा के बारे में अपनी जागरूकता का रहस्य अपनी विशिषट परिस्थिति(हिन्द प्रदेश के बाहर रहना) में देखा हॆ । उन्होंने लिखा हॆ -"जागरूक तो हूं भाषा के बारे में । जागरूकता कहाँ तक कृतिकार/कलाकार के लिए अच्छी चीज़ हॆ ऒर कहाँ बुरी चीज़, इसका उत्तर मॆं नहीं जानता " (अपरोक्ष ) । इस प्रकार के मत से यह आशय तो लिया ही जा सकता हॆ कि अज्ञेय या नया कवि कविता संबंधी अपने विचार में कोई सार्वभॊमिक या सार्वकालिक प्रतिमान खोजने की चिन्ता में खपता नज़र नहीं आता । वस्तुत: मूल रूप से ,अधिक से अधिक वह अपनी कविता के प्रतिमान की बात करता हॆ कविता के प्रतिमान की नहीं ।

नये कवि, जिनमें अज्ञेय भी सम्मिलित हॆं रचनात्मक भाषा को इकहरी नहीं मानते । (अद्यतन ) ।तात्पर्य यह हॆ कि जिस प्रकार जीवन में प्रयुक्त भाषा के शब्द प्राय: इकहरे होते हॆं, उनका अर्थ निश्चित-सा होता हे, उस प्रकार कविता में प्रयुक्त भाषा में नहीं होता । दर असल आधुनिक साहित्य-चिन्तन की यह एक प्रमुख विशेषता हे कि अर्थ को स्थिर न मानकर बहुस्तरीय ऒर विकसन्शील माना जाता हॆ । (आलोचना-४२) ।

इसी प्रसंग में अज्ञेय का एक अन्य मत बहुत ही दिलचस्प ऒर नवीन हॆ । वह अभिव्यक्ति की परमावस्था "मॊन" को मानते हॆं । शब्द ऒर भाषा से परे वह मॊन को ही सम्प्रेषण का एक महत्त्व्पूर्ण साधन स्वीकार करते हॆं । उनके शब्दों में " कविता भाषा में नहीं होती, वह शब्दों में भी नहीं होती, कविता शब्दों के बीच की नीरवता में होती हॆ । (आलवाल) । उनके अनुसार, "आज कवि पाता हे ऒर अगर नहीं पाता हॆ तो में कहूंगा कि उसे पाना चाहिए कि व्यंजना के पुरानी साधन पर्याप्त नहीं हॆं ।...तो व्यंजना के नए माध्यम की खोज में, अगर कभी कवि पाता हॆ कि उसे जो कहना हॆ, वह मॊन ही में कहा जा सकता हॆ तो क्या वह बिलकुल भूला हॆ ।" (आत्मनेपद) । लेकिन मॊन को अभिव्यक्ति का एक साधन तो माना जा सकता हॆ, एकमात्र साधन नहीं । मॊन की सार्थकता हर स्थिति में नहीं होती । रघुवीर सहाय ने उचित ही लिखा हॆ -" बिना ज़रूरत बोल पड़ने का पश्चाताप उतना कभी नहीं होगा, जितना ज़रूरत होते हुए चुप रह जाने का।" (सीढ़ियों पर धूप में ) । इस बिन्दु पर अन्य नए कवि प्राय: मॊन हॆं ।

असमर्थ पुरानी काव्य-भाषा को त्याज्य मानते हुए, एक बिन्दु उपयुक्त भाषा की खोज का भी रहा हॆ । प्रश्न यह भी उठा कि क्या काव्य की भाषा सहज व्यवहार ऒर आम जन-जीवन की भाषा होनी चाहिए । अज्ञेय ने इतर भाषाओं से युक्त बोलचाल का काव्य-भाषा के रूप में अपनाया जाना अनुचित नहीं माना हॆ, बल्कि उसकी सहज आवश्यकता स्वीकार की हॆ । उनके अनुसार अन्य भाषाओं से शब्द लेना अन्य भाषाओं में लिखना नहीं हॆ । उनका यह मानना हॆ कि व्यापकता के लिए लोक साधारण की भाषा को अपनाना होगा ऒर परिमार्जित भाषा का मोह छोड़ना होगा । (हिन्दी साहित्य का आधुनिक परिदृष्य, सच्चिदानन्द वात्स्यायन) । वस्तुत: नये कवि में बोलचाल की भाषा के प्रति विशेष झुकाव का प्रमुख कारण उनका यह अहसास हॆ कि छायावादी भाषा जीवन की भाषा से कटी हुई अत: कृत्रिम हो चुकी थी । अज्ञेय यह तो मानते हॆं कि नये कवि को विरासत में मिला शब्द-भण्डार बहुत बड़ा हॆ किन्तु उनकी नज़र में जो गढ़ी हुई नयी शब्दवली उन्हें मिली हॆ वह अर्थ वहन करने की क्षमता ही नहीं रख्ती अत: नया कवि व्यवहार में विदेशी शब्दों का इस्तेमाल करने पर विवश हुआ ।(अद्यतन) । साफ़ हॆ कि अज्ञेय अपनी कुछ मान्यताओं के पीछे ’विवशता”का हाथ भी मानते हॆं, माद्त्र ज़रूरत का नहीं । ऎसी ही विवशता के तहत उन्होंने लिखा हॆ -" जब हम बोलचाल में संकर भाषा का प्रयोग करते हॆं, सारा समाज संकर भाषा में जीता हॆ, तब कविता में उसे प्रवेश न मिलेगा ?..हम अपने अर्थों को रोज़ जिन संदर्भों में जीते हॆं, उनके साथ अगर हमने अंग्रेजी शब्द जोड़ लिए हॆं तो कविता में उनके बिना काम भी कॆसे चलेगा ? या तो कवि उन संदर्भों से कट जाएगा या उन संदर्भों से बंधा पाठक कविता से कट जाएगा ।" अत: अज्ञ्रेय संकर भाषा को उपयुक्त मानते हॆं क्योंकि वॆसी भाषा उस स्थान पर भी हॆ जो उसका अनुभव-स्रोत हॆ । लेकिन अज्ञेय क यह मत सभी नये कवियों को पूरी तरह स्वीकार नहीं हॆ । फ़िर भी यह तो मानना होगा कि सृजन की भाषा में आंचलिक, लोक, संकर आदि अनेक भाषा -स्तरों का प्रभाव या सहयोग हो सकता हॆ ।काव्य-भाषा हूबहू सामान्य भाषा या जनभाषा या बोल्चाल नहीं होती । वह आम_भाषा का विशिष्ट रूप ही होती हॆ क्योंकि कवि आम भाषा को वॆशिष्ट्य देता हॆ । अज्ञेय, शब्दावली के इस्तेमाल के ढ़ंग ऒर आम भाषा तथा काव्य-भाषा के प्रयोजन्परक अन्तर के आधार पर कविता की भाषा को साधारण भाषा से भिन्न मानते हॆं । उनके अनुसार काव्य-भाषा में आम भाषा की-सी शब्दावली हो सकती हॆ किन्तु वह शब्दावली, इस्तेमाल की दृष्टि से, साधारण भाषा की शब्दावली से अलग ही मानी जाएगी क्योंकि काव्य की भाषा अभिधेय से आगे ले जाने की ताकत रखती हॆ, अभिधेय तक सीमित रहकर वह अच्छी कोटि की नहीं होती । (अपरोक्ष) ।ऒर यह भी कि "आप जन-साधारण के शब्द बोलते हॆं, लेकिन साहित्य में जब उन्हीं शब्दों का इस्तेमाल करते हॆं तो वह कुछ विशिष्ट होता हे । यह नहीम कि उनमें से कुछ शब्द ऎसे हॆं जो जन-साधारण की समझ में नहीं आते, लेकिन यह हो सकता हॆ कि दो शब्द आपने साथ-साथ रख दिये ऒर उनमें से एक नया अर्थ पॆदा हुआ । ..सारा साहित्य रचनत्मक इशीलिए हॆ कि वह सादारण चीज़ का साधारण उपयोग करता हॆ उसमें से विशिष्ट अर्थ भी प्राप्त करता हॆ ।" (अपरोक्ष) । यहीं अज्ञेय एक अन्य तथ्य की ओर भी ध्यान खींचते हॆं जो उनकी सूक्ष्म ऒर ग्गहरी दृष्टि का परिचायक हॆ । वह हॆ अर्थबोध की समस्या । बोलचाल में जो शब्द सहज समझ में आने वाले हॆं वे काव्य में, ख़ास ढ़ंग से इस्तेमाल किए जाने के कारण विशिष्ट हो उठते हॆं ऒर उनके नये अर्थ जन-सामान्य की पकड़ में आसानी से नहीं आते । वस्तुत: उन नये अर्थों को पकड़ने के लिए जन-सामान्य को भी अतिरिक्त रूप से सचेत होना पड़ेगा ।

अज्ञेय ने अन्य नये कवियों की भांति गद्य ऒर पद्य की भाषा के रूप में भी विचार किया हॆ । वस्तुत: नये कवियों में दो प्रकार के मत मिलते हॆं । एक के अनुसार दोनों की भाषा में कोई मॊलिक अन्तर नहीं हॆ ऒर दूसरे के अनुसार कविता की भाषा ऒर गद्य की भाषा में कुछ-न-कुछ अन्तर अवश्य रहता हॆ । रघुवीर सहाय पह्ले मत के समर्थक हॆं तो अज्ञेय दूसरे के । अज्ञेय न केवल दोनों की भाषा में अन्तर मानते हॆं बल्कि अन्तर के कारण भी खोजते हॆं । रचनात्मक गद्य की भाषा को तो वे फ़िर भी कविता की भाषा मान लेते हॆं क्योंकि उसमें भी काव्य-भाषा जॆसी जटिल स्थितियां पेश आति हॆं लेकिन सामान्य गद्य को वे इकहरा मानते हॆं जिसमें एक शब्द के बदले दूसरा शब्द रखा जा सकता हॆ । (अज्ञेय -विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ) । वस्तुत: अज्ञेय गद्य का सीधा संबंध भाषा से मानते हॆं जबकि कविता का संबंध उनकी निगाह में भाषा से न होकर शब्द से होता हॆ । वे उपन्यास ऒर नाटक को सर्जनात्मक रूपाकार मानने से इंकार नहीं करते लेकिन कविता में रचनात्मक भाषा के रूप ऒर उनकी समस्याओं को वे अलग-अलग मानते हॆं । (अद्यतन) । इतना ही नहीं अज्ञेय के अनुसार तो कविता की भाषा का चमत्कार मरता रहता हॆ ऒर वह गद्य की भाषा होती चली जाती हॆ जिसकी वज़ह से कवि के सामने हमेशा चमत्कार की सृष्टि की समस्या बनी रहती हॆ । वे कविता की भाषा को ’सांचा’ या जामा नहीं मानते, बल्कि उनके अनुसार वह रचनात्मक अनुभूति का अंग होती हॆ । आनन्द प्रकाश दीक्षित ने अज्ञेय के मत को प्रचीन लेखकों के मत को नई शबदावली में प्रस्तुत करना बताया हॆ । प्राचीन चिन्तन में भी ऊपरी तामझाम से लॆस करके काव्य-भाषा बनाने में यक़ीन नहीं किया गया हॆ ।

अज्ञेय ने सम्प्रेषण को केन्द्र में रखकर भी महत्वपूर्ण चिन्तन किया हॆ । उनका मानना हॆ कि उनका समय ऎसा समय हॆ जिसमें काव्य एक छोटे से समाज की थाती नहीं रह गया हे । अत: पहले की तरह अब कोई भी शब्द पाठक के मन में समान चित्र या विचार उत्पन्न नही कर सकता ।(तारसप्तक ) । अज्ञेय ने साधारणीकरण में विश्वास रखते हुए कवियों से नये तथ्यों को प्रेष्य बनाकर साधारणीकरण करने की बात की हॆ ।(दूसरा सप्तक) । भाषा के अपर्याप्त होने पर शब्देतर साधनों जॆसे विराम संकेतों आदि के उपयोग को न्याय संगत कहा हॆ ।(त्रिशंकु) । यह इस्लिए भी कि कविता वाचिक परम्परा से हटकर छपित हो चली थी ।अज्ञेय का यह मत कविता को अन्तत: शब्द मानने वाले मत से भी एक कदम आगे बढ़ गया । हम जानते हॆं कि धीरे-धीरे ऎसी कसरतबाजी कविता से गायब होती चली गई हॆ । लेकिन अज्ञेय का शब्द-शंस्कार वाला मत समय के साथ ऒर भी दृढ़ होता चला गया ।तीसरा सप्तक में उन्होंने कवियों के लिए लिखा _"शब्द को निरन्तर नया संस्कार देता हुआ-भाषा की रूढ़ से मुक्त होता चले, शब्द के संस्कार बदलता चले ऒर भाषा की रूढ़ि बदलता भी जाये, तोड़ता भी चले ।" लेकिन अज्ञेय समय सम्य पर अतिवाद के प्रति सचेत करने से भी नहीं चूकते । तीसरा सप्तक में ही उनका कहना हॆ -" जिन्होंने उसे (शब्द को) नया कुछ देने के आग्रह में पुराना बिलकुल मिटा दिया हॆ, वे ऎसे देवता हॆं जो भक्त को नया रूप दिखाने के लिए अनर्धान ही हो गए हॆं । कृतित्व का क्षेत्र इन दोनों सीमा रेखाओं के बीच में हॆ ।" वस्तुत: नया कवि सिद्धान्त रूप में नए कवि की सृजनात्मक दृष्टि में आस्था रखता हॆ, विध्वंसात्मक दृष्टि में नहीं । वह रूढ़ भाषा को तोड़ने ऒर उसके संस्कार करने का मूल प्रयोजन भाषा का गुणात्मक विकास करना ही मानता हॆ । इसके पीछे अज्ञेय की यह धारणा भी हॆ कि शब्द मूलत: अनुभूति ऒर उसके संप्रेषण के बीच एक बाधक वस्तु हॆ । उनका यह भी कहना हॆ कि "निरे शब्दों के निरे अर्थ से आगे जाकर वह (कविता) ध्वनियों ऒर अन्त:ध्वनियों, स्वरों ऒर अन्त:स्वरों से उलझती हॆ ।" (आत्मनेपद )। अज्ञेय की यह भी धारणा हॆ कि उपयुक्त शब्द की प्राप्ति के लिए कवि को निरन्तर बेचॆन रहना पड़ता हे । अनुपयुक्त या भरती का एक शब्द उसे बुरी तरह खटकता रहता हॆ, भले ही पाठक को यह स्वीकार ही क्यों न हो ।(भवन्ती) । धर्मवीर भारती की कनुप्रिया की भाषा पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने लिखा हॆ -" राधा का परियों या जादू की बात करना मेरी दृष्टि में उतना ही असंगत हॆ जितना हमारे कृष्ण के ’हरम’ की बात करना- इन शब्दों से, ऒर इनको अर्थ देने वाली संस्कृति से हमारा परिचय उस काल के हज़ारों वर्ष बाद हुआअ जिसमें कवि हमें ले जाना चाहता हॆ । ऒर राधा का अपने को”सखी ’ न कहकर ’मित्र’ कहना तो हमें बीसवीं सदी में ले आता हॆ (गर्ल-फ़्रॆण्ड) ।" (विवेक के रंग, सं०-देवीशंकर अवस्थी) । सब जानते हॆं कि उपयुक्त शब्द का चुनाव कोई आसान काम नहीं होता । अज्ञेय के अनुसार शब्द का ज्ञान , शब्द की अर्थवत्ता की सही पकड़ ही कृतिकार को कृति बानाती हॆ । (तारसप्तक) । इसीलिए वे ख़ुद को भाषा के क्षेत्र में शुद्धवादी न मानते हुए भी कवि के लिए शब्द-धातु का विचार ज़रूरी मानते हॆं । (विवेक के रंग ) । कोई शब्द दूसरे का सम्पूर्ण पर्याय नहीं हो सकता, क्योंकि प्रत्येक शब्द दे अपने वाच्यार्थ के अलावा अलग-अलग लक्षणाएं ऒर व्यंजनाएं होती हॆं - अलग संस्कार ऒर ध्वनियां । (तीसरा सप्तक ) । अज्ञेय कम-से-कम शब्दों यानी एकदमम ज़रूरत भर शब्दों के इस्तेमाल ऒर शब्दों के अपव्यय से बचाव को कवि के लिए सही मार्ग मानते हॆं । कितनी नवों मे कितनी बार में उनकी एक पंक्ति हॆ - सका तो ज़रूर ले आऊंगा । वे सही शब्द की पहचान को भी पर्याप्त नहीं मानते । कवि वह हॆ जो शी शब्द ढ़ालना जानता हॆ ।इस प्रकार कह सकते हॆं कि अज्ञेय ने शब्द पर गहराई से विचार किया हॆ ऒर उसके महत्व को कविता के संदर्भ में स्थापित भी किया हॆ । उन्होंने नि:संदेह शब्द-ज्ञान ऒर शब्द-चयन के सम्बध में अन्य कवियों की तुलना में अधिक लिखा हॆ । नामवर जी ने भी नये कवियों की शब्द-चेतना की प्रशंसा की हॆ । (विवेक के रंग ) । सुधी जन जानते हॆं कि शब्द के प्रति सजगता सिद्धान्तत: पारम्परिक चिन्तन से कटी नहीं हॆ, हो भी नहीं सकती थी । आज के अनुपयुक्त शब्द की अवधारणा को हम पुराने समय के ’काव्य-दोष’ में खोज सकते हॆं ।

इस आलेख क उद्देश्य मूलत: कवि-चिन्तक अज्ञेय की काव्य-भाषा संबंधी अवदारणा को संक्षेप में सामने लाना था। संभव था कि विस्तार में जाकर भारतीय ऒर पाश्चात्य काव्यशास्त्रीय परम्परा ऒर अन्य नये कवियों तथा मान्य आलोचकों-समीक्षकों के मतों कॊ सामने रखकर विचार किया जाता । लेकिन वह अपेक्षित नहीं था ।
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दिविक रमेश
बी-295, सेक्टर-20
नोएड-201301(उ०प्र०)







10 comments:

  1. अज्ञेय की काव्य शिल्प और भाषा संबंधी अवधारणा को इस आलेख से समझने में सहायता हुई। दिविक जी का आभार।

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  2. आज की कविता में अजीबोगरीब बिम्ब और अस्पष्टता ही नजर आती है और इसी लिये कविता और पाठक के बीच की दूरी बढती जा रही है। अज्ञेय पर केन्द्रित इस आलेख में भाषा और शिल्पी को ले कर कई दशा-दिशा मिलती है।

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  3. अज्ञेय एक कवि के रूप में ही नहीं वरन एक विचारक के रूप में भी प्रभावित करते हैं| काव्य के शिल्प और भाषा संबंधी उनकी अवधारणायें उनकी गहन चिंतनवृत्ति का परिचय देती हैं|
    गंभीर प्रस्तुति के लिये आभार!

    - अतुल्य

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  4. गंभीर आलेख, अज्ञेय पर बहुत अच्छा आलेख। दिविक रमेश जी को साहित्य शिल्पी पर पढ कर अच्छा लगा।

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  5. लेख पर इतनी महत्तव्पूर्ण टिप्पणियों के लिए आभार ।

    दिविक रमेश

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  6. श्रवण डगला9 अगस्त 2017 को 6:57 pm

    बहुत अच्छा आलेख् धन्यवाद

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