डोंगरगड़, छत्तीसगढ़ प्रदेश के राजनांदगांव जिलान्तर्गत दक्षिण पूर्वी मध्य रेल्वे के हावड़ा-मुम्बई रेल मार्ग में और रायपुर नागपुर राष्ट्रीय राजमार्ग में महाराष्ट्र प्रांत से लगा सीमांत तहसील मुख्यालय है। ब्रिटिश शासन काल में यह एक जमींदारी थी। प्राचीन काल से विमला देवी यहां की अधिष्ठात्री है जो आज बमलेश्वरी देवी के नाम से विख्यात् है। यह छत्तीसगढ़ के शक्तिपीठों में एक है। नवरात्रि में लाखों दर्शनार्थी यहां आते हैं और बमलेश्वरी देवी की स्तुति गाते हैं:-

चैत क्वांर का मास रहे, कोई दीप जला उपवास रहे,
मन वांछित फल पाये मां बमलेश्वरी।
तेरी शरण में आये जो, सौ तीरथ का सुख पाये वो,
जीवन सफल हो जाये मां बमलेश्वरी।
मोह माया अंधकार से, तूफान और मंझदार से,
नैया पार लगाये मां बमलेश्वरी।

दर्शनार्थी श्रद्धा की अपार संपदा लिये मां बमलेश्वरी के दरबार में आते हैं। नवरात्रि में यहां अपार भीढ़ होती है। अन्य दिनों में भी दर्शनार्थियों की अपार भीढ़ देखा जा सकता है। चारों ओर हरे भरे वनों, पर्वत मालाओं और छोटे बड़े तालाबों से घिरा प्राकृतिक सुषमा से परिपूर्ण है यह डोंगरगढ़। सुरम्य पहाड़ी पर छोटी छोटी घुमावदार सीढ़ियां चढ़ते, लहराते छोटे बड़े पेड़, सांय सांय करती हवायें और मंदिर से आती घंटी की आवाज और श्रद्धालुओं के द्वारा गाये जा रहे भजन मन को मोह लेता है। लगभग एक हजार सीढ़ियों को चढ़कर माता के दरबार में पहुंचने पर जैसे सारी थकान दूर हो जाती है, मन श्रद्धा से भर उठता है और हाथ जोड़े नतमस्तक हो जन समुदाय पुकार उठता है:-

तेरी होवे जय जयकार, नमन करूं मां करो स्वीकार
तेरी महिमा अनुपम न्यारी है जग में सबसे बलिहारी है।
तू ही अम्बे, तू ही दुर्गा, बमलेश्वरी तेरी सिंह की सवारी
नैया सबकी पार लगे मां, तेरी जय जयकार।

भारतीय साहित्य में देवी-देवताओं, गंधर्वों, किन्नरों और अप्सराओं के मनोरम विहार स्ािलों एवं ऋषि-मुनियों की तपोस्थली पर्वतों में बतायी गयी है। माया मोह से उबर चुके मोक्षार्थियों को पर्वत में जाने का निर्देश है:-

अस्त्युत्तरस्या दिशि देवात्मा। हिमालयो नाम नागाधिराज।।

महाकवि कालिदास ने तो हिमालय को देवताओं का निवास स्थान बताया है। कवियों ने पर्वत मालाओं में देवी-देवताओं की कल्पना की है। डोंगरगढ़ की पहाड़ी में बमलेश्वरी देवी विराजमान हैं। पहाड़ी के नीचे छोटी बमलेश्वरी देवी का भव्य मंदिर है। पहाड़ में गुफाओं के अतिरिक्त अन्य प्राकृतिक खंड हैं जो अपनी विकरालता के साथ विचित्रता के लिए प्रसिद्ध है। सन् 1968 में सीढ़ियों का निर्माण और विद्युतिकरण का कार्य कराया गया। यात्रियों की सुविधा के लिए पहाड़ के उपर जन सहयोग से पेय जल की सुगम व्यवस्था, ठहरने क लिए धर्मशालाएं, प्रतीक्षालय, सुलभ काम्पलेक्स और भोजनालय आदि की व्यवस्था की गयी है। डोंगरगढ़ के पश्चिम में सिंचाई विभाग के द्वारा निर्मित पनियाजोब बोध है। उत्तर में ढारा जलाशय, दक्षिण में मड़ियान जलाशय है। पहाड़ी में जाने के लिए ‘रोप वे‘ की भी सुविधा है। डोंगरगढ़ जाने के लिए सड़क मार्ग, रेल्वे आदि की सुविधा है। सीढ़ियों को भी सुगम बनाया गया है। देवियों के अलावा यहां बुद्ध और महावीर स्वामी की मूर्ति भी दर्शनीय है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:-

आज भी बमलेश्वरी पहाड़ अपने गर्भ में अतीत के अनेक ऐतिहासिक एवं रोमांचकारी तथ्य छुपाये हुए है। यह प्राचीन काल की कामावती नगर की वैभवशाली और अनेक स्मरणीय यादों को अपने गर्भ में समेटे अविचल, अडिग अनादिकाल से खड़ा है। इसमें मां बमलेश्वरी की सत्ता सर्वोच्च शिखर पर इसका साक्षी है। इस पहाड़ पर ऋषि-मुनियों की कठोर तपस्या किये जाने के अवशेष यहां की गुफाओं में मिलते हैं इसके अलावा इस पहाड़ के दूसरे किनारे पर अति दुर्गम चट्टान है जहां इतनी तेज हवाएं चलती है कि वहां पर बिना सहारे खड़ा होना मुश्किल होता है। इस चट्टान पर खुले आसमान के नीचे साधना स्थल और जल कुंड के अवशेष हैं। पहाड़ी के नीचे ऋषि-मुनियों का आश्रम और सरोवर था। लोगों का ऐसा विश्वास है कि इस सरोवर में स्नान करने, इसका जल ग्रहण करने से रोगों से मुक्ति मिलती है। इस आश्रम में नागा साधु रहते थे जो अन्यत्र चले गये। इस आश्रम को आज ‘तपस्वी मंदिर‘ के नाम से जाना जाता है।

डोंगरगढ़ के जमींदार घासीदास बैरागी था। वे कभी सिंगारपुर और कभी डोंगरगढ़ में रहते थे। नागपुर के भोंसले राजा और अंग्रेज सत्ता के वे प्रथम पंक्ति के विरोधी थे। संवत् 1816 में उन्होंने बगावत कर दी जिसे दबाने के लिए भोंसले राजा की सेना और अंग्रेज सेना को खैरागढ़ के राजा टिकैतराय और नांदगांव के जमींदार महंत मौजीराम ने सैन्य सहायता दी थी। इस युद्ध में डोंगरगढ़ के जमींदार को पकड़कर नागपुर ले जाया गया जहां उन्हें फांसी दी गयी। सैन्य सहायता के एवज में डोंगरगढ़ की जमींदारी खैरागढ़ के राजा को मिल गया। आगे चलकर नांदगांव के जमींदार के द्वारा डोंगरगढ़ की सम्पत्ति में हिस्सा मांगने पर इस जमींदारी के दो हिस्से क्रमशः डोंगरगढ़, पाथरी और आधा सिंगारपुर खैरागढ़ के राजा टिकैतराय को और आधा सिंगारपुर, डोंगरगांव और छुरिया नांदगांव के जमींदार को मिला। तब से यहां खैरागढ़ राजपरिवार का कब्जा बरकरार है। सन् 1964 में ‘बमलेश्वरी देवी ट्रस्ट समिति‘ बनायी गयी जिसके प्रमुख ट्रस्टी खैरागढ़ के राजा बने। ट्रस्ट के मंत्री श्री गणेशमल भंडारी के निर्देशन में यहां अनेक विकास कार्य हुए और आज नवकलेवर के साथ बमलेश्वरी देवी मंदिर लोगों की श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है।
कामकंदला और माधवानल का डोंगरगढ़ से संबंध:-

डोंगरगढ़ के अतीत में कामकंदला और माधवानल की प्रेम कहानी दफन है। लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व यहां राजा कामसेन की वैभवशाली कामाख्या नगरी थी जो उज्जयनी के राजा विक्रमादित्य के समकालीन थे। कला, नृत्य और संगीत के लिए विख्यात् इस नगरी में कामकंदला नाम की राज नर्तकी थी। वह नष्त्यकला में निपुण और अनिंद्य सुन्दरी थी। एक बार राज दरबार में उसका नृत्य हो रहा था। उसी समय माधवानल नाम का एक निष्णात् संगीतज्ञ वहां आया। संगीत प्रेमी होने के कारण उन्होंने राज दरबार में प्रवेश करना चाहा लेकिन दरबान उन्हें भीतर प्रवेश नहीं करने दिया। तब वह वहीं बैठकर तबले और घुंघरूओं का आनंद लेने लगा। अचानक उन्हें लगा कि तबला का बायां अंगूठा नकली है और नर्तकी के पैरों में बंधे घुंघरूओं में एक घुंघरू में कंकड़ नहीं होने से ताल में अशुद्धि है। वह बोल पड़ा- ‘मैं व्यर्थ में यहां चला आया। यहां के राज दरबार में ऐसा एक भी संगीतज्ञ नहीं है जो ताल की अशुद्धियों को पहचान सके।‘

मजरिस है भूपाल की, अचरज की बात
बिना कहे कैसे रहूं, अब चुप रहो न जात
अब चुप रहो न जात, ये कैसी राजसभा कहलावें
बदतमीज सब सभा, चतुर नर एक न आवे
मरदंगी पूरब मुख वाला, जो मिरदंग बजावे
बायां अंगूठा मोम का, इससे ताल बेताल हो जावे।

द्वारपाल उस अजनबी से अपने राजा और राज दरबार के बारे में सुना तो उसे तत्काल रोककर राज दरबार में जाकर राजा से सारी बात कह सुनाया। राजा का आज्ञा पाकर द्वारपाल उन्हें सादर राज दरबार में ले गया। उनके कथन की पुष्टि होने पर उन्हे संगत का मौका दिया गया। उनकी संगत में कामकंदला नृत्य कर रही थी। ऐसा लग रहा था मानो राग रागनियों का संगम हो रहा हो ? तभी अचानक एक भौंरा कामकंदला के वक्ष में आकर बैठ गया। थोड़े समय के लिए कामकंदला का ध्यान बंटा जरूर मगर नष्त्य चातुर्य्य से वह भौंरा को अपने वक्ष से उड़ाने में सफल हो गयी। किसी ने इसे देखा या नहीं मगर संगत कर रहे माधवानल की नजर से यह बच न सका। इस घटना ने मानो माधवानल को कामकंदला का दीवाना बना दिया। दोनों में प्रेम हो गया जो राजकुमार मदनादित्य को बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। एक बार राज दरबार में माधवानल के संगत में कामकंदला नृत्य कर रही थी। इससे राजा प्रसन्न होकर माधवानल को पुरस्कार दिया लेकिन राजा के द्वारा दिया गया पुरस्कार को उन्होंने राज नर्तकी को देकर राजा के कोप का भागी बना। राजा ने उन्हें तत्काल राज्य की सीमा से बाहर जाने का आदेश दिया। यह सब इतनी तेजी से घटित हुआ कि किसी को कुछ समझ में नहीं आया। निर्वासित, अपमानित माधवानल से कामकंदला भी आसक्त हो गयी। लेकिन दोनों का मेल संभव नहीं था। तब उन्होंने उज्जयनी के राजा विक्रमादित्य की शरण ली और उनसे दया और सहयोग की भीख मांगी। राजा विक्रमादित्य ने उन्हें न्याय दिलाकर दोनों में मेल कराया। यहां ऐसी किंवदंति प्रचलित है कि माधवानल को न्याय दिलाने के लिए उन्हें कामावती के राजा से युद्ध करना पड़ा था जिसे रोकने के लिए मां भवानी और महादेव को आना पड़ा था। डोंगरगढ़ का ‘कामकंदला-माधवानल सरोवर‘ इस साक्षी है।

छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध साहित्यकार स्व. श्री हरि ठाकुर ने कामकंदला-माधवानल की किंवदंति को छत्तीसगढ़ की लोककथा कहा है और इसे ढोला-मारू तथा लोरिक-चंदा के साथ जोड़ने का प्रयास किया है। प्राचीन नाटककार आनंदधर ने संस्कृत में माधवानल नाटक की रचना की थी। सन् 1583 में अकबर के दरबारी कवि आलम ने इस कथा को पद्यबद्य किया। ‘माधवानल की कथा‘ नामक सन् 1755 में लिखे एक हस्तलिखित पुस्तक बनारस के एक पुस्तकालय में संग्रहीत है। हिंदी साहित्य कोश में प्रेमाख्यान शीर्षक के अंतर्गत प्रचलित लोककथाओं की चर्चा में माधवानल-कामकंदला का भी उल्लेख मिलता है। डॉ. प्यारेलाल गुप्त ने एक अन्य किंवदंति का उल्लेख किया है। उनके अनुसार एक बार सात आगर सात कोरी यानी 147 मोटियारी नर्तकियां अपनी नृत्यकला का प्रदर्शन करने नांदगांवराज से डोंगरगढ़ आयीं। राजमाता को जब यह समाचार ज्ञात हुआ तब वह चिंतित हो गयी। उन्हें राजकुमार के किसी मोटियारी नर्तकी के उपर मोहित हो जाने का डर हो गया। अतः उन्होंने हल्दी के घोल में अभिमंत्रित जल मिलाकर राजकुमार को नृत्य शुरू होने के पूर्व नर्तकियों के उपर छिड़कने को कहा। राजकुमार द्वारा ऐसा करने पर सभी नर्तकियां शिलाखंड में परिवर्तित हो गयीं। डोंगरगढ़ की पहाड़ी में ऐसे अनेक शिलाखंड हैं जिन्हें डॉ. गुप्त ने नर्तकियों का शिलाखंड माना है। डोंगरगढ़ के मोतीबीर तालाब में एक 10 फीट शिला स्तम्भ मिला है जिसमें फारसी में एक लेख उत्कीर्ण है। स्तम्भ रायपुर के घासीदास संग्रहालय में संग्रहीत है। इसी प्रकार यहां की पहाड़ी में एक अन्य स्तम्भ है जिस पर उत्कीर्ण लेख को आज तक पढ़ा नहीं जा सका है। तथ्य चाहे जो भी हो, लेकिन डोंगरगढ़ की बमलेश्वरी माता आज भी लोगों की आराध्य देवी हैं, श्रद्धा की प्रतिमूर्ति हैं। उन्हें हमारा शत् शत् नमन:-

या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।


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प्रो. अश्विनी केशरवानी
राघव, डागा कालोनी,
चांपा-495671 (छत्तीसगढ़)

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