हाँ, मैं जा रहा हूँ। आज के बाद मेरा वजूद, सदा के लिए, तृप्ति के जीवन से अलग हो जायेगा।

मेरा शरीर तो स्वयं ही मेरा साथ छोड़ने के लिए तैयार हो गया है।...कहाँ जा रहा हूँ?...मालूम नहीं। कहीं ना कहीं तो पहुँच ही जाऊँगा। मैं तो यह भी नहीं सोच सकता कि पीछे से तृप्ति आवाज़ देकर बुला लेगी। उससे भी कहीं अधिक तो अपनी गब्दु के पास लौट जाना चाहता हूँ। अपनी बेटी की याद तो बहुत सतायेगी। तृप्ति ने तो अपनी यादों को इतना कैसेला और कड़वा बना दिया है कि उसे याद ही नहीं कर पाउंगा।

कहाँ जाऊँगा?...तृप्ति से मिलने के बाद तो मेरी सभी राहें मेरे अपने लिए ही अजनबी हो गई थीं। वो सब लोग जो कभी मेरे जीवन का अटूट हिस्सा थे, तृप्ति से मिलने के पश्चात् एक-एक करके मेरे जीवन से टूटकर अलग होते गये। कई बार तो अपनी माँ तक का चेहरा याद करना पड़ता है।

हाँ, यह भी सच है कि तृप्ति को पाकर मुझे लगा था कि मैं सम्भवत: विश्व का सबसे भाग्यवान इंसान हूँ। उसके मखमल जैसे बदन को छूने से मुझे डर लगता था। मेरे कठोर हाथों से कहीं उसके फूल-से कोमल शरीर को चोट ना लग जाये। वास्तव में यह विश्वास कर पाना ही बहुत कठिन है कि तृप्ति जैसी अमीर पिता की रुई के फाये-सी कोमल लड़की, मेरे सीधे-सादे मध्यवर्गीय मनुष्य से प्यार कर सकती है।...ऑटो रिक्शा में भी यही लिखा है, 'जीवन प्यार का दूसरा नाम है।' यहाँ...रिक्शा में...गाना भी वही बज रहा है, 'प्यार पर बस तो नहीं है मेरा, लेकिन फिर भी, तू बता दे कि तुझे प्यार करूँ या ना करूँ?'

हाँ, तृप्ति ने तो मुझे यह पूछने का मौका भी नहीं दिया था - केवल अपना हक़ जता दिया था मुझ पर। मैं तो अपनी ऑंखों में एक उज्ज्वल भविष्य के सपने सँजोये अपने जीवन की लड़ाई लड़ने में व्यस्त था। साथ ही बोरीवली के ग़रीब कुलियों की लड़ाई भी मेरी ही लड़ाई बनती जा रही थी। उनकी समस्याएँ जैसे सब मेरी अपनी समस्याएँ बनती जा रही थीं। ऐसे में तृप्ति कहाँ से आ गई मेरे जीवन में?

खार जिमखाना पहुँच गया हूँ। इस जगह की यादें भी तो मेरे जीवन का अभिन्न अंग बन चुकी हैं। हमारे विवाह के बाद की कितनी ही शामें यहाँ बीती थीं।...तृप्ति भी तो लगभग हर क्लब की सदस्य है...जूहू, खार, बान्दरा।...और मैं बोरीवली पूर्व की 'वन-रूम-किचन' हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी का बाशिन्दा।... पहले कुछ महीने तो एक स्वप्न की तरह निकल गये। उन महीनों का एक-एक क्षण मेरे दिलो-दिमाग़ पर छपा हुआ है।...फिर एकाएक क्या हो गया? तृप्ति का व्यवहार रूखा क्यों हो गया? खार जिमखाना की रंगीन शामें मेरे लिए अकेली क्यों हो गईं?

जब पहली बार तृप्ति के संगमरमरी बदन को छुआ था तो मेरे पूरे शरीर में जैसे करंट की लहरें चलने लगी थीं। उसके बदन की महक ने मुझे दीवाना बना दिया था। मैं...कुलियों और मज़दूरों के पसीने की महक में रहनेवाला इंसान...निम्न मध्यवर्गीय पहुँच के भीतर रहनेवाला आदमी - जैसे एकाएक कोई परी मेरे हाथ लग गई थी।...लोग अवश्य हमारी जोड़ी पर फ़िकरे कसते होंगे। पर मैं स्वयं तो तृप्ति के पास चलकर नहीं आया था।

किन्तु बान्दरा स्टेशन आ गया है। मैंने ऑटो रिक्शा छोड़ दिया है। अब सोच यही है कि यहाँ से बम्बई सेंट्रल टैक्सी से आऊँ या ट्रेन ले लूँ। तृप्ति को मिलने से पहले तो मैं सदा गाड़ी में ही सफ़र करता रहा हूँ।...बोरीवली-चर्चगेट लोकल! वैसे तो पिछले छ: महीने से फिर लोकल का मुसाफ़िर बना हुआ हूँ। परन्तु आज कुछ तबीयत ठीक नहीं लग रही।...तबियत तो कल गब्दु की भी ठीक नहीं थी।...उसे प्यार करने के लिए कदम आगे भी बढ़ाये थे...पर जैसे किसी अदृश्य ताकत ने मुझे पीछे खींच लिया था...मेरी हालत की इन्तहा तो देखो, सामने बेटी है लेकिन प्यार कर सकता नहीं। हालात ही कुछ ऐसे हो गये हैं। कौन ज़िम्मेदार है इस सबका?...तृप्ति, हालात या मैं स्वयं? इसका उत्तर तो स्वयं तृप्ति को ही खोजना होगा।

बान्दा स्टेशन के बाहर ही दो कोढ़ी भीख माँग रहे हैं।...कहीं मुझे उनमें अपना भविष्य तो नहीं दिखाई दे रहा है। उन पर तो दया करके लोग भीख भी दे रहे हैं...परन्तु, क्या मुझ पर कोई दया करेगा।...मेरी तो छाया तक से लोग डरेंगे।...वैसे तो मुझे भी अपनी बीमारी से डरना चाहिए। परन्तु मैंने तो यह बीमारी स्वयं ही मोल ली है।...तो फिर अपनी ही खरीदी हुई चीज़ से क्या डरना।

डर भी तो एक विचित्र वस्तु है। दो प्यार करने वाले दिल हमेशा डरे-डरे ही रहते हैं। अपने प्रेम को खो देने का डर दिलों में समाया रहता है। किसी भी बच्चे के दिल में अपने खिलौने को खो जाने का डर रहता है। सम्भवत: तृप्ति के दिल में कुछ ऐसा ही डर रहा होगा।

एक बात का मुझे सदा ही मलाल रहेगा। तृप्ति को कभी पता नहीं चलेगा कि मैंने इस जानलेवा बीमारी को क्यों गले लगाया। और मुझे यह बीमारी लगने के बावजूद भी वह उससे कैसे बच पाई। उसने तो मेरे बारे में सोचना भी बन्द कर रखा है। भला उसे यह सब बातें सोचने का अवसर ही कहाँ मिलेगा। मैं कहाँ हूँ, कैसा हूँ, कहाँ जाऊँगा, कैसे जाऊँगा, कैसे रहूँगा - यह सब विषय अब उसकी सोच के दायरे में कहाँ आयेंगे। उसके नज़दीक तो जीवन का अर्थ केवल सीमेण्ट, ईंट और गारा ही है।...आख़िर इतने बड़े बिल्डर की बेटी है। उसके पिता तो दुनिया जहान के लिए घर बनाते फिरते हैं। तृप्ति तो स्वयं अपना घर ही नहीं बसा सकी। ज़िन्दगी के फ़ैसले करने में हमेशा उसने बचपने से ही काम लिया है।

परन्तु मुझे तो कोई ना कोई फ़ैसला करना ही पड़ेगा। एक मन तो होता है कि यहाँ से बम्बई सेण्ट्रल तक पैदल चलना शुरू कर दूँ। और अगर रास्ते में ही कहीं गिरकर दम टूट जाये...तो...मेरे लिए अच्छा ही रहेगा। तृप्ति से सम्बन्ध जोड़ने का यही तो ईनाम मिलना चाहिए मुझे। एक लावारिस लाश की परिणति - मेरे जीवन का अंतिम सत्य!...फिर सोचता हूँ, उससे तो तृप्ति की बदनामी होगी। लोग जब एक आवारा लावारिस लाश के साथ उसका और उसके पिता का नाम जोड़ेंगे, तो उसकी कितनी जगहँसाई होगी।...यही तो मेरी समस्या है - मैं आज भी तृप्ति से इतनी नफ़रत नहीं कर पाया कि उसकी जगहँसाई का कारण बन सकूं।

जानता हूँ, तृप्ति यह भी कह सकती है कि कितनी बार मेरे कारण उसके सर्कल में उसकी हँसी उड़ाई गई है।...और यह भी सच है कि मैं उसे आज तक नहीं समझा पाया कि यह सर्कल कभी भी मेरे जीवन का हिस्सा नहीं था। मैंने हमेशा यही प्रयत्न किया कि मैं अपनी मध्यवर्ग की मानसिकता को लाँघकर तृप्ति के उच्च वर्ग में अपने आप को खपा पाऊँ। पर क्या अपनी परवरिश, अपने संस्कारों को भुला पाना इतना ही आसान है। तृप्ति के लिए कितना आसान है किसी भी पाँच सितारा होटल में बाल कटवाना। जितना वह अपने नाई को - 'सॉरी'- अपने हेयर ड्रेसर को टिप देती है, उससे चौथे दामों में तो मैं अपने बाल कटवा लेता था।

इन दो सभ्यताओं को एक करने का बीड़ा भी तो तृप्ति ने स्वयं ही उठाया था। कॉलेज में उसने मुझे कब पसन्द कर लिया, मुझे तो पता ही नहीं चला। मैं तो वहाँ भी विद्यार्थियों के हक़ की लड़ाई लड़ता रहता था। पढ़ना मेरे लिए मजबूरी ही कहा जायेगा। मेरे जैसे लोगों की तो पूरी जमा पूँजी उनकी डिग्री ही होती है।

हाँ! शायद क्रिकेट मैच में ही उसने मुझे पसन्द कर लिया होगा। शतक बनाया था उस मैच में। या फिर हो सकता है...वाद-विवाद प्रतियोगिता में उसे भा गया होऊँ। या जब कॉलेज में हड़ताल के दिन भाषण दे रहा था उस दिन। कॉलेज में मेरे से एक साल ही तो पीछे थी शायद।...परन्तु कॉलेज में उसने कभी मुझसे बात भी नहीं की। मेरे पास तो लड़कियों को देख पाने तक का समय नहीं होता था। कैसे एकतरफ़ा चाह पाल रखी होगी तृप्ति ने?...मुझे कभी पता ही नहीं चलने दिया कि मुझे प्यार करती है।...अपने पिता को कैसे मनाया होगा उसने?...करोड़ोंपति बिल्डर की इकलौती संतान ने एक ग़रीब परिवार के लड़के से विवाह कर लिया।

मुझ पर तो अपने प्यार का इज़हार तक तृप्ति ने स्वयं नहीं किया था। उसके पिता अहूजा साहिब का संदेश देने भी उनका ड्राइवर ही आया था। बोरीवली (पूर्व) की एक रूम किचन की हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी में से उसने मुझे ढूँढ़ ही निकाला था। वह ड्राइवर तो अपनी ही बिरादरी का था। नहीं तो उसे तो हमारी कॉलोनी में पहुँचने से पहले ही नाक पर रूमाल रखना पड़ता।

मेरे सभी दोस्त मज़ाक-मज़ाक में कहा करते थे कि मैं तो अपने घर का सदस्य लगता ही नहीं। माता-पिता का कद छोटा और रंग साँवला है। बहन का रंग भी पक्का है। मैं कैसे गोरा-चिट्टा छ: फुट का जवान निकल आया?

तृप्ति भी, विवाह के पश्चात् पहले कुछ महीने तो दत्तक पुत्र ही कहती थी। कितना तृप्त होता था मेरा मन उसकी यह बात सुनकर। परन्तु कुछ ही महीनों तक चला था यह लाड़। फिर उसका मन मुझसे ऊब गया था, शायद। खिलौना पुराना हो चला थ। फिर उसके बाद तो एक ही वाक्य सुनने को मिलता था, “आखिर हो तो उसी घर के ना। खून तो वही है ना। अगर शरीफ़ ख़ानदान के होते तो सारी उमर मेरी पूजा करते। मुझे क्या मिला तुम लोगों से...ज़िल्ल्त, बेइज्ज़ती, और जगहँसाई। तुम तो मेरी गाड़ी के ड्राइवर बनने के भी काबिल नहीं।”

गाड़ी आकर प्लेटफ़ार्म पर रुक गई है। इस समय अधिक भरी हुई भी नहीं है। आराम से चढ़ जाऊँगा। गाड़ी अगर भरी होती तो शायद मेरी आत्मा मुझे गाड़ी में चढ़ने भी नहीं देती। इस बीमारी के साथ मैं लोगों से सटकर खड़ा होने की बात भला सोच भी कैसे सकता हूँ।...प्रतिदिन, ना जाने कितने लाखों लोग इन गाड़ियों में सफ़र करते हैं। सभी एक-दूसरे के साथ सटकर खड़े रहते हैं। किसी को क्या मालूम होता होगा कि उसके साथ खड़े व्यक्ति को क्या बीमारी है।

मेरी बीमारी का तो इतिहास ही विचित्र है। संवेदनशील होने का ख़मियाज़ा भुगत रहा हूँ। और...सच भी तो है। विवाह के बाद के कुछ महीने तो जैसे हवा के झोंके की तरह निकल गये थे। फिर अचानक तृप्ति गर्भवती हो गई थी। यह समाचार सुनकर मैं तो जैसे सातवें आसमान पर उड़ने लगा था। ख़ुशी जैसे मेरे शरीर में रक्त के साथ-साथ संचार करने लगी थी। मेरे ससुर भी समाचार पाकर धन्य लग रहे थे। परन्तु तृप्ति को एकाएक क्या हो गया था? वह क्यों इस समाचार को सहज रूप से नहीं ले पाई। इतनी प्यारी ख़बर ने उसके रूप को क्यों रौद्र बना दिया।

वह अभी तैयार नहीं थी। इतनी छोटी उमर में मां नहीं बनना चाहती थी। उसके शरीर, उसकी 'फ़िगर' क्या होगा?...सोसाइटी में उसका मज़ाक उड़ेगा। सब उसे बहनजी मानने लगेंगे। उसे नहीं बनना है बहन जी। अभी तो उसका सुन्दर दिखने का समय है।...उसे नहीं चाहिए बच्चा।...मैं तो हकबका गया था। भला एक माँ अपने बच्चे को गिरवाने की बात कैसे सोच सकती है। तृप्ति तो चिल्लाए जा रही थी, “रहोगे तो तुम जाहिल के जाहिल ही।...फ़ँसा दिया ना मुझे। कितनी बार कहा था कंडोम लगाने के लिए।...पर नहीं...तुम्हें तो मज़ा चाहिए था ना।...अब भुगतना तो मुझे पड़ेगा।...तुम तो ऐश करते रहोगे।...मैं तो...एबार्शन करवा लूँगी।...समझे तुम?”

पहली बार अहूजा साहिब ने अपनी बेटी को डाँट लगाई थी। वो शायद उसे मार भी बैठते। मेरी बदनसीबी का आलम यह था कि अपनी पत्नी को अपने ही होनेवाले बच्चे के बारे में कुछ भी समझा पाने की स्थिति में नहीं था, मैं।...तृप्ति के पापा चाहे कितने भी अपने थे - हम दोनों के रिश्ते के हिसाब से तो बाहरवाले ही थे।...मेरे पौरुष पर पहली चोट हुई थी। मुझे इतना ज़ब्त करना पड़ा था कि रक्त जैसे नसों-नाड़ियों में जम-सा गया था। उनके फट जाने का भी डर था। उसी दिन दिल में एक नासूर ने जन्म ले लिया था।...उसे अन्तत: तो फटना ही था।

अब तृप्ति मेरे हर काम में ग़ल्तियाँ ढूँढ़ने लगी थी। कभी मेरे कपड़ों का रंग अच्छा नहीं था, तो कभी सिलाई ग़लत थी। कभी अंग्रेज़ी ग़लत बोल गया तो कभी बात ही ग़लत कह दी। जब कभी होनेवाले बच्चे के बारे में बात की तो घर में कोहराम मच जाता। कलह से बचने के लिए देर तक आफ़िस में ही रहने लगा था। अहूजा साहिब भी एक दिन पूछ बैठे थे, “क्यों बेटा नरेन, आजकल काम बहुत ज्यादा हो रहा है।...भाई, आजकल तो तुम्हें ज्यादा से ज्यादा वक्त तृप्ति के साथ गुज़ारना चाहिए।”

अब उनको क्या कहता। 'जी सर' कहके रह गया। अहूजा साहिब को भी शिकायत है कि मैं उन्हें पापा कहकर नहीं बुलाता। मैं भी क्या करूँ। पहले झिझकवश नहीं बुला पाता था; फिर दहशत ने कभी बोलने ही नहीं दिया।

बोला तो मैं कॉलेज के दिनों में करता था। क्या मजाल थी कि कॉलेज में मेरे सामने कोई ज़ुबान खोल दे। प्रिंसिपल से लेकर चपरासी तक, सभी आदर करते थे मेरा। जब गावस्कर ने मेरी बैटिंग की तारीफ़ की थी तो लगता था कि एक दिन मैं भी टेस्ट क्रिकेट खेलूँगा। यहाँ तो ज़िन्दगी के टेस्ट में 'क्लीन बोल्ड' हो गया हूँ।

गाड़ी दादर पार कर चुकी है। एलफ़िंस्टन रोड, लोअर परेल, महालक्ष्मी और बाम्बे सेण्ट्रल। बस मेरे जीवन का नया सफ़र शुरू होनेवाला है। एक ऐसा सफ़र जिसका अन्त मैं पहले से ही जानता हूँ। बम्बई सेण्ट्रल से ही अपने हनीमून पर भी गया था।...तृप्ति को हवाई यात्रा से डर लगता है। जीवन में पहली बार प्रथम श्रेणी वातानुकूलित 'कूपे' अन्दर से देखा था। मैं और तृप्ति सारी रात एक ही बर्थ पर एक-दूसरे की बाँहों में समाये रहे।

पर मेरी बेटी की 'बर्थ' पर तो हंगामा हो गया था। अस्पताल में 'लेबर रूम' से तृप्ति की चीख़ों की आवाज़ें सुनाई दे रही थीं और साथ ही मेरे लिए गालियाँ।...”यू बास्टर्ड,...हाय!...मर गई माँ...सन ऑफ़ ए बिच...तुमने मुझे मार दिया...ओ...माँ...” और इन्हीं गालियों के बीच मेरी गोल-मटोल बेटी ने जन्म लिया था। उसके कानों में शायद पहला शब्द 'बास्टर्ड' ही पड़ा था।

जब डाक्टर ने बाहर आकर कहा कि बेटी हुई है और मैं अन्दर जाकर उसे देख सकता हूँ, तो अचानक मेरी निगाह अपनी माँ और बहन पर पड़ी थी। उनके चेहरे से भाँप नहीं पा रहा था कि उन्होंने गालियाँ सुनीं...नहीं सुनीं या निगल लीं। अहूजा साहिब के चेहरे से शर्मिन्दगी साफ़ गिरती दिखाई दे रही थी। उन्होंने मेरी हथेली को अपने हाथों में दबाया था, “डोण्ट वरी बेटा, सब ठीक हो जायेगा।”

ससुर जी के आशीर्वाद ने थोड़ी हिम्मत मुझे भी दी। मैं कमरे में दाखिल हुआ। बिटिया का रंग तो एकदम अपनी मँ की तरह संगमरमरी था। माँ ने उसे देखते ही एलान कर दिया, “बिटिया के नैन-नक्श तो पूरे नरेन पर गये हैं। बचपन में नरेन हूबहू ऐसा ही दिखता था।”

बस! इतना सुनना था कि तृप्ति की नज़रों में कड़वाहट भर गई थी। भला हमारी बच्ची का कुछ भी मेरे साथ मिलता हो यह तृप्ति कैसे बरदाश्त कर लेती। पर सम्भवत: बच्ची पैदा करके तृप्ति शारीरिक रूप से थक चुकी थी...या...शायद अभी भी कहीं कुछ बाकी था जिसने तृप्ति को कुछ बोलने नहीं दिया।...ससुर जी को बच्ची के चेहरे में ना मालूम क्या दिखाई दिया कि बच्ची का नाम गब्दु हो गया।

माँ ने पंजीरी और गुड़जीरा जैसा कुछ बनाकर दिया था। घी से भरी चीज़ें खाकर तो तृप्ति को मोटा होने का डर था। इसलिए यह सब बेकार वस्तुएँ यूँ ही पड़ी रहीं। तृप्ति केवल अपने तरीके से ही चलती रही और मैं बस देखता रहा।

तृप्ति में एक ख़ास बात तो है। वह जब भी अपने पक्ष की बात सामने रखती है तो सामने वाला निरुत्तर हो ही जाता है। फिर चाहे तृप्ति की बात कितनी भी ग़लत क्यों ना हो, उसे पेश करने का ढंग इतना तर्कपूर्ण होता था कि उसकी बात माननी ही पड़ती थी। ऐसा भी बहुत बार हुआ कि मुझे तृप्ति की कोई बात बुरी लगी और मैंने उस पर गुस्सा किया। परन्तु कुछ ही क्षणों बाद तृप्ति के चेहरे पर विजयी मुस्कान होती, क्योंकि वह मुझे ग़लत साबित कर चुकी होती। और वह अपनी व्यंग्यात्मक मुस्कान बिखेरते हुए कहती, “मैं यह सुनते-सुनते तंग आ चुकी हूँ कि मैं ही ठीक थी। अगर मैं ही ठीक थी तो हमारे बीच यह रोज़-रोज़ की लड़ाई क्यों होती रहती है।...आई विश, कि तुम कभी तो मुझे यह मौका भी दो कि मैं कह सकूं – यू वर राईट नरेन!” और मेरा मुँह फिर लटक जाता।

तृप्ति 'लॉजिक' में इतना विश्वास करती थी कि बड़ों का लिहाज़ जैसी चीज़ उसमें नहीं समा पाती थी। उसका 'लॉजिक' कहता है कि बड़ों का आदर इसलिए नहीं किया जा सकता क्योंकि वे बड़े हैं। हाँ यदि वे आदर करवानेवाले काम करेंगे तो इज्ज़त भी हो जायेगी।...बरना बैठें अपने घर।

इतने लड़ाई-झगड़े के बावजूद, तृप्ति मेरे बारे में खासी 'पुज़ेसिब' है। कभी कोई दूसरी औरत मुझसे बात भी कर लेती तो तृप्ति सैकड़ों सवाल पूछने लगती, “वोह कौन थी?...उसे कब से जानते हो...? उसे क्या काम था?...” हर बार उसकी पूछताछ एक ही वाक्य पर रुकती थी, “याद रखना, मैं तुम्हें किसी के साथ शेयर नहीं करूँगी।...तुम मेरे हो, सिर्फ मेरे।...कहीं कोई गड़बड़ की तो मुझसे बुरा कोई ना होगा।”

काश! तृप्ति बुरा होने के बजाय थोड़ा अच्छा होने के बारे में सोचती। यदि तृप्ति बुरी ही बनी रही तो जीवन की गाड़ी कैसे खिंचेगी।

बम्बई सेण्ट्रल पर लोकल गाड़ी रुक गई है। अब मुझे मेन स्टेशन की ओर चलना है। इस समय भी पुल पर यात्रियों की भाग-दौड़ जारी है। मैं तो इतना चलने में ही थकता जा रहा हूँ। यह बीमारी का असर है या बीमारी की जानकारी ने ही मुझे ऐसा बना दिया है।

जानकारी तो मनुष्य का जीवन ही बदलकर रख देती है। और यदि जानकारी ग़लत हो और इंसान उसे सच मान ले तो जीवन नरक ही बन जायेगा। और जीवन तो नरक बन ही गया था। तृप्ति के पास मेरी गब्दु के लिए वक्त ही नहीं होता था। कभी ऑफ़िस, तो कभी क्लब, कभी ब्यूटी पार्लर तो कभी कोई फंक्शन। इस सारे शेडयूल में गब्दु बेचारी आया के सहारे।

गब्दु शरारती भी तो होती जा रही थी। उसने पहला शब्द पापा ही बोला। उसका कमज़ोर पापा जब भी उसके पास होता, गब्दु बहुत खुश दिखाई देती। ज़िद भी माँ की तरह करने लगी थी।...”दादी के घर जाऊँगी।”...मन में कहीं एक प्रसन्नता की लहर-सी दौड़ गई।...चलो, मेरी बच्ची को तो मेरी माँ की चिन्ता है। चल पड़ा उसे लेकर। बोरीवली की उस कॉलोनी में जैसे चाँद उतर आया हो। माँ की सभी पड़ोसनें जैसे उस मखमल-सी कोमल संगमरमरी काया को देखने आ गई थीं।...किन्तु माँ की ऑंखों में कहीं एक दर्द था। तृप्ति के ना आने से माँ अतृप्त रह गई थीं।

“तुम मेरी बेटी को उस गन्दे, सड़े, बीमार वातावरण में ले कैसे गये? वहाँ से पचास तरह के इन्फेक्शन कैच करके आई होगी।”

“तृप्ति, वहाँ उस गन्दे, सड़े, बीमार वातावरण में भी लोग बसते हैं। कोई वीरान जंगल नहीं है वहाँ।”

“तुम उन रेंगते हुए कीड़ों को इंसान कहते हो?”

“मैं भी वहीं से आया हूँ, जानू। तुमने भी विवाह के बाद पहला चक्कर वहीं लगाया था। वहाँ मेरी माँ है, बाऊजी हैं, मेरी बहन है। वो सब तुम्हारे भी कुछ लगते हैं।”

“मुझे तो शक है कि तुम भी मेरे कुछ लगते हो या नहीं। अगर आज के बाद तुम मेरी बेटी को वहाँ ले गये तो मुझसे बुरा कोई ना होगा।”

फिर बुराई। तृप्ति सदा बुराई के बारे में ही क्यों सोचती है। क्या बुरा होना भी कोई अच्छी बात है।

गाड़ी ने सीटी बजा दी है। अभी कुछ ही क्षणों में चल पड़ेगी। अच्छाई और बुराई को पीछे छोड़ती, पटरियों को रौंदती हुई, बेख़बर। अभी तो यह भी ख़बर नहीं, कहाँ उतरूँगा। टिकट तो हरिद्वार तक का बनवाया है। परन्तु इस बीमार काया को हरि के द्वार तक कैसे ले जाऊँगा? यह बीमारी भगवान के सामने भी कैसी ज़लालत का अहसास करवायेगी।

यह कदम-कदम पर उठाई ज़लालत ही तो थी जिसने मुझे इतना बड़ा कदम उठाने पर मजबूर कर दिया। खार जिमखाना में तृप्ति अपने मित्रों सहेलियों में व्यस्त हो गई थी। मैंने तो कभी शराब चखी ही नहीं थी। नहीं तो मैं भी किसी कोने में शराब का गिलास भरकर दुनिया की ऐसी-तैसी करता रहता। इतने में मिसेज़ बिजलानी बिजलियाँ गिराती हुई मेरी ओर चली आई।

“बाई गाड़, नड़ेन्द्र जी, आज तो बहुत जँच रहे हैं।”

“जी।” एक फ़ीकी मुस्कान के साथ मैंने उत्तर दिया।

“आप क्लब में अकेले बैठे-बैठे बोड़ नहीं हो जाते? कभी-कभी हमाड़े साथ भी थोड़ा टाइम गुजाड़ा कीजिये ना।”

“जी...जी!”

“अड़े, यह क्या जी, जी लगा ड़खी है आपने। कोई बात कड़िये ना।”

“जी!”

और इतने में ही तृप्ति गुस्से में उफ़नती हुई आई थी। मिसेज़ बिजलानी का तो फ्यूज़ ही उड़ा दिया था उसने। फिर मेरी बारी आई। “मैं पूछती हूँ उस कुतिया से क्या बातें कर रहे थे?...उससे क्या लेना-देना है तुम्हें?”

“अरे तृप्ति, अगर कोई बात करे तो उसे जवाब तो दूँगा ना।”

“हाँ, हाँ, एक तुम्हीं तो दुनिया के सबसे हसीन आदमी रह गये हो कि हर औरत तुमसे बात करने को तड़प रही है।...जानते हो ना मिसेज़ बिजलानी कैसी औरत है...उसका कैरेक्टर क्या है...अगर ऐसी औरतों से वास्ता रखोगे तो एड्स से मरोगे।”

तृप्ति तो यह कहकर चली गई। परन्तु मेरे दिमाग में एक तूफान खड़ा कर गई। वो तो सदा ही कहती है कि उससे बुरा कोई ना होगा। परन्तु आज स्वयं ही मुझे बुरा बनने का तरीका सिखा गई।

एड्स! जैसे मुझे एक साधन मिल गया था तृप्ति से बदला लेने का। समझती क्या है अपने आप को। इस सुन्दर शरीर पर ही अभिमान है ना इसे?...मैं...इस शरीर को ही ख़त्म कर दूँगा।...अब मैं अपनी ज़िल्लत-बेइज्ज़ती का बदला लूँगा इस औरत से।...बदले की भावना ने मेरी सोच को कुंद कर दिया था। मन में बस एक ही निश्चय था...पहले अपने आप को एड्सग्रस्त बनाऊँगा और फिर...हा...हा...हा...तृप्ति, अब मुझसे बुरा कोई ना होगा।

एक सप्ताह तक दफ्तर नहीं गया। गब्दु तक की परवाह नहीं की। तृप्ति को तो मेरी परवाह थी कहाँ। ससुर जी ने पूछा भी तो टाल गया। एड्स पर जितना साहित्य मिल सकता था, पढ़ डाला। और पहुँच गया कमाठीपुरा - एड्स खरीदने।

ग्रांट रोड स्टेशन से कमाठीपुरा तक पैदल भटकता रहा। बेज़ान, मरियल, पाउडर से लिपे-पुते, पान के दाग़वाले दाँत लिये अपने आपको लड़की कहती कुछ देहें इधर-उधर दिखाई दे रही थीं।...मेरा मध्यवर्गीय मन तो बैठा जा रहा था। यदि किसी ने यहाँ पहचान लिया तो? मेरी तो मेरी, ससुरजी और तृप्ति की कितनी बदनामी होगी।...तृप्ति का नाम ज़ेहन में आते ही मैं और भी बुरा हो गया। एक दलाल ने अपनी लच्छेदार भाषा में मुझे अपने माल का वर्णन सुना दिया। नथ उतराई की बातें...।

उसे कौन समझाये, मैं वहाँ नथ उतारने नहीं, उतरी उतराई नथ से कुछ खरीदने आया था।

परन्तु वहाँ की गन्दगी और निर्लज्ज माहौल ने मेरे मन से एड्स का सारा शौक ही उड़न छू कर दिया और मैं वापिस आ गया।

किन्तु बदला तो मुझे लेना ही था। तृप्ति को ऐसा डसना था कि फिर कभी किसी के साथ बुरी ना हो सके। उसके जीवन को ऍंधेरा कर देना था। हज़ारों बिजलियाँ मिलकर भी उसके जीवन के ऍंधेरे को ना मिटा सकें।

मिसेज़ बिजलानी!...तृप्ति के अनुसार एड्स की कुंजी! अग्नि के इर्द-गिर्द की गई सभी प्रतिज्ञाओं को होम कर दिया और पहुँच गया मिसेज़ बिजलानी की मंडली में। वह भी तो गुस्से की आग में जल रही थं, “अड़े, वो भी कोई औड़त है। लो भाई, मैं तो बाहड़ की हूँ, उसने तो आपको भी नहीं छोड़ा। मड़द के साथ कोई ऐसा सलूक कड़ता है भला?” और मिसेज़ बिजलानी ने ब्लैक लेबल में सोड़ा डालकर मेरे सामने रख दिया।

मिसेज़ बिजलानी के चीयर्स कहने तक तो मैं पूरा गिलास एक ही साँस में गटक गया था। गले से पेट तक जैसे एक आग-सी लग गई थी। मुँह कड़वा हो गया था और पूरे जिस्म में करंट दौड़ गया था। कुछ ही क्षणों में मिसेज़ बिजलानी दुनिया की सबसे हसीन औरत लगने लगी थी।...और फिर कपड़े उतारकर हम दोनों तृप्ति से बदला ले रहे थे।

उसके बाद तो कई ब्लैक लेबल के गिलास और ना जाने कितनी बिजलानियाँ मेरे बदले में शरीक़ होती चली गईं। हर सप्ताह अपना खून टेस्ट करवाता था।...अलग-अलग हस्पताल से करवाता था।...'निगेटिव'!

समाचार पत्र तो कहते हैं कि एड्सग्रस्त किसी भी साथी के साथ संभोग करते ही एड्स हो जाती है। यहाँ इतनी सारी बिजलानियाँ मिलकर भी मुझे एड्स नहीं दे पाईं। लानत है!

परन्तु मैंने भी हार नहीं मानी। और वह दिन भी आ पहुँचा जब मेरी बिजलानियों ने मेरी खून की रिपोर्ट पर लिखवा दिया - एच.आई.वी. पाज़िटिव। उछल पड़ा मैं। जीवन की इस महान उपलब्धि पर गर्व होने लगा था। आज मैं पूरी तरह से बुरा बन चुका था। अब तृप्ति बचकर कहाँ जायेगी।

एड्स के रोगियों के कितने ही चित्र मैंने अख़बारों और पत्रिकाओं से काट-काट कर रखे थे। उन सबके चहरों पर तृप्ति का चेहरा चिपका-चिपका कर देखता था कि एड्स होने के बाद तृप्ति कैसी लगेगी। अब प्रतीक्षा नहीं हो पा रही थी।

कई दिनों के अन्तराल के बाद, आफ़िस के लिए नहा-धोकर तैयार हुआ था। अभी बैग उठाया ही था कि गब्दु अपनी तोतली बोली में मेरी ओर भागती आई। तपाक से उसे उठा लिया और चूमने ही वाला था कि किसी अज्ञात डर ने मेरे शरीर को जकड़ लिया। नहीं...!...मैं गब्दु को नहीं चूम सकता। अपनी प्यारी-सी बेटी को ऐसी भयानक बीमारी नहीं दे सकता।

बदले की आग ने मुझे यह भी भुला दिया था कि मैं केवल तृप्ति का पति ही नहीं, किसी का पुत्र, भाई और पिता भी हूँ। किन्तु अब क्या हो सकता था। मैं तो बुरा बन ही चुका था। तृप्ति से बदला तो लेना ही था।...गब्दु अपनी शिकायत करे जा रही थी। कितने दिन से उसे मिला जो नहीं था।

आफ़िस जाने का सारा उत्साह ठण्डा पड़ चुका था। केवल एक ही सोच मस्तिष्क को मथे जा रही थी। मेरी मौत तो निश्चित है। कल को अगर तृप्ति भी मेरे डसने से चल बसी, तो गब्दु किसके सहारे जियेगी।

और मैं एक बार फिर गलत सिद्ध हो गया था। यदि आज तृप्ति मेरे सामने होती तो फिर यही कहती, “वाज़ आई नॉट राईट?” वह तो सदा की तरह एक बार फिर सही सिद्ध हो चुकी थी। उसने तो कहा ही था कि मिसेज़ बिजलानी जैसी औरतों से मेलजोल बढ़ाओगे तो एड्स से मरोगे। बुरी होकर भी तृप्ति कितनी सही होती है।

अब उस घर में मेरा क्या काम था? मुझे अपनी अच्छी गब्दु और बुरी तृप्ति से बहुत दूर चला जाना था।...और मैं जा रहा हूँ।...गाड़ी वापिस दादर, बान्दरा, विले पार्ले, अंधेरी और बोरीवली को पीछे छोड़कर मुझे एक अनजान गंतव्य की ओर ले जा रही है।

तृप्ति को तो यह भी नहीं मालूम कि चाहकर भी मैं बुरा नहीं हो पाया!

2 comments:

  1. EK ANOKHE SHILP MEIN KAHEE GAYEE LOKPRIY
    KAHANIKAR TEJENDRA SHARMA KEE MARMSPARSHEE
    AUR VICHARNIY KAHANI .

    उत्तर देंहटाएं
  2. तेजेन्द्र जी की कहानी किराये का नर्क के शीर्षक ने ही कुछ ऐसा आकर्शित किया कि पढ़े बिना रह ना सकी। एक बहुत ही अच्छी और मार्मिक कहानी है जो अपने ही प्रवाह में बहती हुई आगे बढ़ती जाती है। कहानी का अन्त तो बस दिल को छू गया। तेजेन्द्र जी को हमारी हार्दिक शुभ कामनायें और बधाई ।

    - यह टिप्पणी नीमा पाँल द्वारा साहित्य शिल्पी को भेजी गई

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