अटल बिहारी वाजपयी जी की कविता "उनको याद करें" की कुछ पंक्तियाँ गौरतलब हैं-

जो वर्षों तक लड़े जेल में, उनकी याद करें
जो फाँसी पर चढे खेल में, उनकी याद करें
याद करें काला पानी को
अंग्रेजों की मनमानी को
कोल्हू में जुट तेल पेरते
सावरकर की बलिदानी को।
आज भी अंडमान का नाम सुनते ही काला-पानी के दृश्य कौंध जाते हैं।

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जब प्रोन्नति पश्चात् मेरा स्थानांतरण अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में हुआ तो मेरा ज्ञान भी यहाँ के बारे में सुनी-सुनाई बातों पर आधारित था। पर जैसे ही यहाँ की धरती पर कदम रखा तो दंग रह गया। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह न सिर्फ पर्यटन-स्थल के रूप में विस्तृत है, बल्कि रक्षा-क्षेत्र के लिहाज से भी बहुत महत्वपूर्ण है । भारत की सशस्त्र सेनाओं का ‘अंडमान-निकोबार’ ही एकमात्र ऐसी ‘कमांड’ है, जहां तीनों सेनाओं की संयुक्त कमान है। बंगाल की खाड़ी में स्थित अंडमान-निकोबार द्वीप समूह भारतीय नौसेना की ‘पूरब की ओर देखो’ रणनीति को फलीभूत करने के लिए एक अहम स्थल है।

भारत का सबसे बड़ा केंद्रशासित प्रदेश अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह सुंदरता का प्रतिमान है और सुंदर दृश्यावली के साथ सभी को आकर्षित करता है। प्रकृति के खूबसूरत आगोश में 8249 वर्ग कि0मी0 में विस्तृत 572 द्वीपों (अंडमान-550, निकोबार-22) के अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में भले ही मात्र 38 द्वीपों (अंडमान-28, निकोबार-10) पर जन-जीवन है, पर इसका यही अनछुआपन ही आज इसे "प्रकृति के स्वर्ग" रूप में परिभाषित करता है। अंडमान द्वीप समूह की कुल लम्बाई 467 व अधिकतम चौड़ाई 52 किलोमीटर, जबकि निकोबार द्वीप समूह की क्रमश: 259 व 58 किलोमीटर है। जनजीवन से भरपूर अंडमान का सबसे बड़ा द्वीप मध्य अंडमान द्वीप (1536 वर्ग कि0मी0) व सबसे छोटा कर्ली द्वीप (0.03 वर्ग कि0मी0) है, जबकि निकोबार में क्रमश: ग्रेट निकोबार द्वीप (1045 वर्ग कि0मी0) व पिलोमिलो द्वीप (1.3 वर्ग कि0मी0.) हैं। अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह में मात्र तीन जनपद हैं- दक्षिणी अंडमान ;पोर्टब्लेयरद्ध, उत्तरी और मध्य अंडमान; मायाबन्दर और कारनिकोबार। यहाँ नगरीय क्षे0 16.64 कि0मी0 व ग्रामीण क्षे0 8232.36 कि0मी0 है। वर्ष 2001 की जनगणनानुसार यहाँ की जनसंख्या 3,56,256 आंकी गई थी, जो कि वर्तमान में 5 लाख से उपर होगी। यह भारत का तीसरा सबसे कम जनसंख्या घनत्व ;43 व्यक्ति प्रति वर्ग कि0मी0 और सातवाँ सर्वाधिक साक्षर ;81% राज्य/केंद्रशासित क्षेत्र है। अंडमान की सबसे ऊँची चोटी सैडल पीक (732मी0) व निकोबार की माउन्ट थुलियर (642 मी0) है। निकोबार द्वीप समूह के ग्रेट निकोबार द्वीप में ही भारत का सबसे दक्षिणी छोर ष्इंदिरा पॉइंट;पिग्मालियन पॉइंट भी अवस्थित है, जो कि इंडोनेशिया से लगभग 150 कि0मी0 दूर है। यहाँ का सुदूर उत्तरी छोर लैंडफाल द्वीप है जो हुगली नदी के मुहाने से 901 कि0मी0 व म्यंमार से लगभग 190 कि0मी0 की दूरी पर स्थित है। अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह के द्वीप बंगाल की खाड़ी में पन्ने के समान चमकते हैं। यहाँ पर सामान्यतया 3180 मि.मी. बरसात होती है और तापमान न्यूनतम 24 डिग्री से.-35 डिग्री से. के मध्य होता है। अपने स्वच्छ परिवेश, सड़कें, हरियाली और प्रदूषण रहित ताजी हवा से यह सभी प्रकृति प्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। कीट्स की निम्नलिखित प्रसिद्ध पंक्तियों में असीमित रोमांटिक प्रभाव उत्पन्न करने के लिए उत्तरदायी सुंदरता में अजनबीपन का जुड़ाव दर्शाया गया है-यहाँ का संगमरमरी सफेद तट अपने किनारों पर पाम वृक्षों के साथ अचल खड़ा रहकर समुद्र की ताल पर नृत्य करता है। जनजातीय तबलों की ताल पर यहां की वीरानी और रंग बिरंगी मछलियाँ साफ स्वच्छ चमकीले पानी में अपने रास्ते चलती हैं।श्

यह एक अजीब इत्तफाक है कि अंडमान को भगवान श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई हेतु सबसे पहले चुना था पर बाद में इसे बदलकर रामेश्वरम (धनुषकोडि) कर दिया। उसके बाद से सभ्यता की हलचल अंडमान में नहीं दिखी। प्रकृति के आगोश में लिपटे इस खूबसूरत द्वीप के चारों तरफ विस्तृत समुद्री लहरों की अठखेलियाँ दीर्घ-काल तक लोगों की निगाहों से बची रहीं पर उनके इस अनछुएपन को न जाने किसकी नजर लग गयी कि ‘काला पानी’ के रुप में कुख्यात हुईं। अंडमान शब्द की उत्पत्ति मलय भाषा के ष्हांदुमनष् शब्द से हुई है जो भगवान हनुमान शब्द का ही परिवर्तित रुप है। निकोबार शब्द भी इसी भाषा से लिया गया है जिसका अर्थ होता है नग्न लोगों की भूमि।

बंगाल की खाड़ी के दक्षिण में स्थित, सैलानियों के मन को असीम आनंद की अनुभूति कराता यह निर्मल और शांत द्वीप प्रकृति की विविधता का अनुपम उपहार है। इन द्वीपों के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 92 प्रतिशत अर्थात 7,615 वर्ग किलोमीटर ;अभिलिखित रूप में 86 प्रतिशत अर्थात 7,171 वर्ग किलोमीटरद्ध भाग वनों से ढका हुआ है। यहाँ के घने जंगल, जो इन द्वीपों को ढक लेते हैं तथा यहाँ पाए जाने वाले असंख्य विशिष्ट फूल और पक्षी यहाँ के वातावरण को काव्यमय और रूमानी माहौल प्रदान करते हैं। उष्ण कटिबंधी वर्षा वन और बंगाल की खाड़ी का पानी यहां पौधों, जंतुओं तथा समुद्री जीवन का विशाल संग्रह है। स्थलाकृति के अनुसार यह द्वीप पर्वतीय कहा जा सकता है, जिसके किनारों पर नारियल पाम के पेड़ हैं और यहाँ के उष्ण कटिबंधी जंगल फैले हुए हैं एवं अर्धचंद्राकार तट यहां के चपटे तटों के साथ मिले हुए हैं। अंडमान-निकोबार अपने आंचल में मूंगा भित्ति, साफ-स्वच्छ सागर तट, पुरानी यादों से जुड़े खंडहर और अनेक प्रकार की दुर्लभ वनस्पतियां संजोए है। इन द्वीपों पर लगभग सभी प्रकार के वन जैसे उष्णकटिबंधीय आर्द्र सदाबहार वन,, आर्द्र पर्णपाती, गिरि शिखर पर होने वाले तथा तटवर्ती और दलदली वन पाए जाते हैं। अंडमान-निकोबार में विभिन्न प्रकार की लकडियाँ पाई जाती हैं। सबसे बहुमूल्य लकडियाँ पाडोक तथा गरजन की हैं। ये निकोबार में नहीं मिलतीं। धान यहाँ अनाज की प्रमुख खाद्यान्न फसल है जो कि मुख्यतरू रुप में अंडमान द्वीपसमूह में उगाई जाती है जबकि निकोबार द्वीपसमूह की मुख्य नकदी फसलें नारियल और सुपारी हैं। रबी के मौसम के दौरान दालें, तिलहन और सब्जियां उगाई जाती हैं जिसके बाद धान की फसल बोई जाती है। यहाँ के किसान पहाड़ी जमीन पर भिन्न-भिन्न प्रकार के फल, जैसे आम, सेपोटा, संतरा, केला, पपीता, अनन्नास और कंदमूल आदि उगाते हैं। यहाँ बहुफसल व्यवस्था के अंतर्गत मसाले, जैसे- मिर्च, लौंग, जायफल तथा दालचीनी आदि भी उगाए जाते हैं। इन द्वीपों में रबड, रेड आयल, ताड़ तथा काजू आदि भी थोडी-बहुत मात्रा में उगाए जाते हैं।
जैव विविधता के मामले में भी अंडमान-निकोबार द्वीप समूह काफी समृद्ध है। इन द्वीपों में 96 वन्यजीव अभयारण्य, 09 राष्ट्रीय पार्क, 01 बॉयोलाजिकल पार्क तथा 01 जैव संरक्षित क्षेत्र ग्रेट निकोबार बायोरिजर्व हैं।

इनमें महात्मा गाँधी मैरीन राष्ट्रीय पार्क वंडूर, माउन्ट हेरियट राष्ट्रीय पार्क, सैडल पीक राष्ट्रीय पार्क, गलाथिया राष्ट्रीय पार्क, कैंपबेल बे राष्ट्रीय पार्क, नारकोंडम आइलैंड सैंक्चुरी, कथबर्ट बे सैंक्चुरी ;कछुओं के बसेरों के लिए प्रसिद्ध, जहाँ वे अण्डे देते हैं। मुख्यतया ओलिवे रिडले व अन्य में लैदर बैक कछुआ, समुद्री हरा कछुआ, हॉकबिल कछुआद्ध, इंटरव्यू आइलैंड सैंक्चुरी ;हाथियों के लिए प्रसिद्धद्ध, लोहाबराक क्रोकोडाइल सैंक्चुरी ;खारे पानी के मगरमच्छों हेतु प्रसिद्धद्ध, बट्टिमालव आइलैंड सैंक्चुरी ;मेगापोड व निकोबारी कबूतर हेतु प्रसिद्धद्ध, रीफ आइलैंड सैंक्चुरी ;अंडमान की ग्रे टील चिड़िया हेतु प्रसिद्ध, इत्यादि प्रसिद्ध हैं। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह का राज्य पशु समुद्री गाय;डयूगांगद्ध, राज्य पक्षी अंडमान वुड पिजन ;अंडमानी कबूतरद्ध व राज्य वृक्ष अंडमान पाडोक है। यहाँ अंडमानी जंगली सुअर, हिरण, केकड़ा खाने वाला लघुपुच्छ बंदर, समुद्री गाय, हाथी, खारे पानी के घड़ियाल इत्यादि खूब मिलते हैं। अब तक अधिसूचित कुल 55 स्थलीय एवं 7 समुद्री स्तनपायी प्रजातियों में से 32 इसी क्षेत्र विशेष में पाई जाती हैं। यहाँ पक्षियों की 270 प्रजातियां एव उपप्रजातियां मिलती हैं जिनमें से 106 प्रजातियां एवं उपप्रजातियां इसी क्षेत्र विशेष में पाई जाती हैं। इसी प्रकार सरीसृपों की 76 प्रजातियां पाई जाती हैं जिसमें से 24 क्षेत्र विशेष तक सीमित हैं। समुद्री जीवों की यहाँ बहुतायत है। इन द्वीपों के समुद्र में मछलियों की 1200 से अधिक प्रजातियां, जिनमें 571 प्रजातियां प्रवाल भित्ति में पाई जाती हैैं, इकाइनो डर्म की 350, घोंघा (मोलस्क) समूह की 1000 तथा अन्य सूक्ष्म प्रजातियां पाई जाती हैं। कशेरूकी प्राणियों में मुख्यतरू समुद्री गाय (ड्यूगांग), डॉल्फिन, व्हेल, खारे पानी के घडियाल, समुद्री कछुए, तथा समुद्री सर्प इत्यादि मिलते हैं। प्रवाल ;मूंगाद्ध और प्रवाल भित्ति समुद्री पारिस्थितिकी के महत्वपूर्ण अंग हैं। यहाँ पर अभी तक 61 वर्गों के प्रवालों की 179 से अधिक प्रजातियों के बारे में जानकारी मिली है। पूर्वी तट पर मुख्यतरू तटीय प्रवाल भिति तथा पश्चिमी तट पर अवरोधक (बैरियर) प्रवाल भित्ति पाई जाती हैं, जो कि मछलियों इत्यादि के लिए प्रजनन स्थल का भी कार्य करती हैं। अंडमान-निकोबार की इसी जैव-विविधता के कारण समुद्री जीवन, इतिहास और जलक्रीड़ाओं में रूचि रखने वाले सैलानियों को यह द्वीप बहुत रास आता है।

अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह एक पर्यावरण अनुकूल सुरक्षित पर्यटक स्थल के रूप में विख्यात है। पर्यटन के इस स्वर्ग में सेल्यूलर जेल, रॉस आइलैंड तथा हैवलॉक आइलैंड जैसे विशिष्ट स्थान है। अंडमान के उष्णकटिबंधीय सदाबहार घने वन, सुंदर रूपहले व रेतीले समुद्र तट, सर्पाकार मैंग्रोव युक्त क्रीक, दुर्लभ समुद्री वनस्पतियों एवं जीव-जंतुओं की प्रजातियों युक्त समुद्री परिवेश तथा मूंगे यहां पर्यटकों को एक स्मरणीय अनुभव प्रदान करते हैं। समुद्र तट पर बने रिसार्ट्स, जल क्रीड़ा केंद्रों तथा पानी के साहसिक खेलों, ट्रेकिंग, आईलैंड कैंपिंग, प्रकृति के बीच निवास (नेचर ट्रेल) स्कूबा डाइविंग जैसे साहसिक पर्यटन के रूप में यहां पर्यटन का अनंत विस्तार है. पर्यटकों की यहां बेतहाशा बढ़ती संख्या का आलम यह है कि वर्ष 1990 में जहां 33716 पर्यटकों ने आमद की थी, वहीं दस सालों बाद यानी कि 2009 में इनकी संख्या 130000 को पार कर गई। इन द्वीपों की यात्रा पर आने वाले पर्यटकों के ठहरने की आरामदेह व्यवस्था के लिए समस्त सुविधाओं से युक्त डीलक्स पाँच सितारे होटलों से लेकर मध्यम श्रेणी वाले होटलों तथा गेस्ट हाउसों की श्रृंखला उपलब्ध है और पर्यटन विभाग की ओर से भी द्वीपों के विभिन्न भागों में विश्राम गृहों का संचालन किया जाता है। यहाँ पर्यटन अबाधित नहीं है बल्कि कुछेक सीमाएं भी हैं। विदेशी पर्यटकों को यहाँ घूमने और रहने के लिए इंडियन मिशन ओवरसीज के दफ्तर से अनुमति लेनी होती है, जबकि भारतीय पर्यटकों को निकोबार और कुछ आदिवासी इलाकों में घूमने के लिए जिला उपयुक्त की विशेष अनुमति लेनी होती है। आदिवासियों से संपर्क और उनकी फोटो खींचने से बचना चाहिए।

प्रमुख ऐतिहासिक पर्यटन स्थल-

पोर्टब्लेयर- पोर्टब्लेयर अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की राजधानी है और यहाँ प्रवेश करने का गेट-वे भी। 1789 में नौ-सेना का बेस स्थापित करने की खोज में यहाँ कदम रखने वाले ईस्ट इण्डिया कम्पनी के लेफ्टिनेंट लॉर्ड आर्किबल्ड पोर्ट ब्लेयर के नाम पर इसका नामकरण पोर्टब्लेयर किया गया। यहाँ का अबरदीन मुख्य बाजार है। अबरदीन में ही अंग्रेजों व अंडमानीज के मध्य 1859 में ऐतिहासिक लड़ाई भी हुई थी। पोर्टब्लेयर और इसके आसपास तमाम ऐतिहासिक व पर्यटन स्थल समाहित हैं। इनमें ऐतिहासिक सेल्युलर जेल, रॉस द्वीप, वाइपर द्वीप के अलावा कोर्बिन्स कोव तट, उत्तरी खाड़ी (नार्थ बे बीच), मुंडा पहाड तट व चिड़िया टापू, वंडूर तट, कालिनपुर तट, महात्मा गाँधी मैरीन नेशनल पार्क वंडूर, राजीव गाँधी वाटर स्पोर्ट्स काम्प्लेक्स, गाँधी पार्क, मरीना पार्क सीपीघाट फार्म (80 एकड में विस्तृत व दुर्लभ प्रजातियों के पेड़-पौधों व जीव-जन्तुओं के लिए प्रसिद्ध), माउन्ट हैरियट (दक्षिण अंडमान की सबसे ऊँची चोटी-365 मी0), मधुबन, चाथम मिल (एशिया की सबसे प्राचीन लकड़ी चिराई की मशीन), सागरिका, साइंस सेण्टर इत्यादि प्रसिद्ध हैं। इसके अलावा पोर्टब्लेयर स्थित संग्रहालय भी आकर्षण के केंद्र-बिंदु हैं। कहते हैं कि किसी जगह की नब्ज पकडनी हो तो वहाँ के संग्रहालय की सैर कीजिये, कुछ ऐसा ही यहाँ पर भी है। पोर्टब्लेयर स्थित प्रमुख संग्रहालयों में- मानव विज्ञान संग्रहालय (इसमें अंडमान-निकोबार की प्रमुख जनजातियों के साथ-साथ मानव-विकास के विभिन्न पहलुओं को दर्शाया गया है), फिशरीज म्यूजियम (मछली, प्रवाल, सीप, डाल्फिन, व्हेल, समुद्री गाय, कछुआ, साँप इत्यादि के कंकाल इत्यादि संग्रहित हैं), समुद्रिका रू नेवेल मरीन म्यूजियम (सीप, रंग-बिरंगी मछली, प्रवाल (मूंगा) के साथ-साथ समुद्री पारिस्थितिक व जनजातियों के सम्बन्ध में जानकारी व एकत्रीकरण), जुलोजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया म्यूजियम (प्रवाल, मूंगा, स्पंज, कनखजूरा, तितलियों सहित तमाम जीवों का अद्भुत संग्रह) एवं फारेस्ट म्यूजियम चाथम ;वन-पर्यावरण मंत्रालय से जुड़े ऐतिहासिक फोटोग्राफ, इमारती लकड़ियों से बने हस्तशिल्प उत्पाद इत्यादिद्ध शामिल हैं। प्रत्येक वर्षा जनवरी माह के प्रथम सप्ताह में पर्यटन विभाग द्वारा आयोजित होने वाला ष्आइलैंड टूरिज्म फेस्टिवलष् भी मनभावन और आकर्षक होता है।

सेल्युलर जेल- ब्रिटिश हुकुमत द्वारा सेल्युलर जेल का उपयोग स्वाधीनता आंदोलन में दमनकारी नीतियों के तहत क्रांतिकारियों को भारत से अलग रखने के लिये किया जाता था। इसी वजह से यह स्थान आंदोलनकारियों के बीच कालापानी के नाम से मशहूर था। कैद के लिये पोर्ट ब्लेयर में एक अलग जेल सेल्यूलर जेल का निर्माण किया गया था। अंग्रेजी सरकार द्वारा भारत के स्वतंत्रता सैनानियों पर किए गए अत्याचारों की मूक गवाह इस जेल की नींव 1897 में रखी गई थी। इसके निर्माण में कुल लागत रु. 517,352 खर्च हुए। इस जेल के अंदर 694 कोठरियां हैं। इन कोठरियों को बनाने का उद्देश्य बंदियों के आपसी मेल जोल को रोकना था। चूंकि इस जेल की अन्दरूनी बनावट सेल (कोटरी) जैसी है, इसीलिए इसे सेल्यूलर जेल कहा गया है।

आक्टोपस की तरह सात शाखाओं में फैली इस विशाल कारागार के अब केवल तीन अंश बचे हैं। संरचना की दृष्टि से देखा जाए तो इस जेल के बीच में एक टावर बना है, जिससे सात भुजाएं निकली हैं जो टावर से गलियारे के माध्यम से जुड़ी हैं। यहां से कैदियों पर सख्त निरानी रखी जाती थी। उन्हें कठोर दिल दहला देने वाली यातानाएं दी जाती थीं, जिनमें चक्की पीसना, कोल्हू पर तेल पिराई करना, पत्थर तोड़ना, लकड़ी काटना, एक हफ्ते तक हथकड़ियां बांधे खड़े रहना, तन्हाई के दिन बिताना, चार दिन तक भूखा रखना, दस दिनों तक क्रासबार की स्थिति में रहना आदि शामिल थे। यहां एक संग्रहालय भी है जहां उन अस्त्रों को देखा जा सकता है जिनसे स्वतंत्रता सेनानियों पर अत्याचार किए जाते थे। प्रतिदिन शाम को लाइट एंड साउंड शो द्वारा सेलुलर जेल का इतिहास जीवंत किया जाता है, जो कि अपने आप में रोंगटे खड़े कर देता है।

रॉस द्वीप- रॉस द्वीप एक वर्ग किलोमीटर से भी कम क्षे0 में फैला है। कभी यह ग्रेट अंडमानी आदिवासियों का अधिवास था, जिनकी संख्या ब्रिटिश शासन के आरंभिक 20 वर्षों में ही 5,000 से 28 पर आ गई। यह द्वीप 1858-1941 तक अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की राजधानी भी रहा, पर जापानियों ने इस पर कब्जा करने के बाद इसे ग्रेट अंडमानीज की स्थली होने के कारण के कारण इसे ष्पीपुल ऑफ वारष् साइट में तब्दील कर दिया । यह द्वीप अब ब्रिटिश वास्तुशिल्प के खंडहरों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ पर अभी भी चर्च और चीफ कमिश्नर के बंगले के अवशेष देखे जा सकते हैं। सुबह के समय यह द्वीप पक्षी प्रेमियों के लिए स्वर्ग के समान है।

वाइपर द्वीप- यहाँ किसी जमाने में ब्रिटिश भारत से लाए गए बंदियों को पोर्ट ब्लेयर के पास वाइपर द्वीप पर उतारा जाता था। वाइपर द्वीप का नामकरण उस जहाज के नाम पर पड़ा, जिसमें सवार होकर ले0 आर्किबेल्ड ब्लेयर यहाँ पर अंडमान में नौ-सेना का बेस स्थापित करने की खोज में आया था। माना जाता है कि यह जहाज इसी द्वीप के पास दुर्घटनाग्रस्त हो गया था, जिससे इसका नामकरण उसी जहाज के नाम पर कर दिया गया।

यहाँ पहाड़ी पर फांसी घर बनाया गया था, जो कि सभी कैदियों को दिखता और मौत का अहसास कराता। यहाँ के टूटे-फूटे फांसी के फंदे निर्मम अतीत के साक्षी बनकर खड़े हैं। यहीं पर शेर अली को भी फांसी दी गई थी, जिसने 1872 में भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड मेयो की हत्या की थी। अब यह द्वीप एक पिकनिक स्थल के रूप में विकसित हो चुका है।

चाथम- ले0 आर्किबेल्ड ब्लेयर ने अंडमान में नौ-सेना का बेस स्थापित करने की खोज में 1789 में चाथम द्वीप से ही सर्वे करना आरम्भ किया। पोर्टब्लेयर से इस द्वीप को 100 मीटर लंबे चाथम पुल द्वारा जोड़ा गया है। यहाँ एशिया की सबसे प्राचीन लकड़ी चिराई की मशीन चाथम सा मिल है जो कि 1883 में स्थापित हुई। ब्रिटिश काल में इस मिल से न्यूयार्क, लंदन व अन्य पश्चिमी देशों को इमारती लकड़ी का निर्यात होता था। लंदन के बकिंघम पैलेस की ष्क्रिमजन वाल पैनलिंगष् यहीं के पाडोक लकड़ी की गौरवशाली परंपरा को बखूबी दर्शाता है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब जापानियों ने अंडमान पर कब्जा किया तो 10 मार्च 1942 को चाथम मिल पर बमबारी कर इसे ध्वस्त कर दिया, पुनरू 1946 में इस मिल को पूर्ववत खड़ा किया गया। पाडोक, गुरजन, मार्बल वुड, साटिन वुड जैसी बहुमूल्य लकडियाँ यहाँ पर देखी जा सकती हैं। यहाँ पर वन विभाग द्वारा एक खूबसूरत फारेस्ट म्यूजियम भी बनाया गया है, जहाँ वन-पर्यावरण मंत्रालय से जुड़े ऐतिहासिक फोटोग्राफ, इमारती लकड़ियों से बने तमाम हस्तशिल्प उत्पाद प्रदार्शित है।

माउन्ट हैरियट-ब्रिटिश काल में यह चीफ कमिश्नर का ग्रीष्मकालीन आवास था। इसका नामकरण कर्नल आर. सी. टाईटलर की पत्नी हेरियट के नाम पर हुआ, जिसने 1862 के दौरान इस क्षेत्र को चीफ कमिश्नर के ग्रीष्मकालीन आवास के रूप में चुना। पोर्टब्लेयर से सड़क द्वारा 55 व नाव द्वारा 15 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित माउन्ट हेरियट दक्षिण अंडमान का सबसे उंचा पहाड़ भी है। पिकनिक, ट्रेकिंग व चिड़ियों को देखने के लिए यह उत्तम स्थल है। वर्तमान में माउन्ट हेरियट 46.62 वर्ग कि0मी0 क्षे. में राष्ट्रीय पार्क के रूप में विस्तृत है और नवम्बर 1996 में इसे आरक्षित वन के रूप में चिन्हित किया गया।

प्रसिद्ध तट ;बीच -कार्बिन्स् कोव तट- पोर्ट ब्लेयर में समुद्र स्नान के लिए एकमात्र तट। पोर्टब्लेयर से 6 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित हरे-भरे वृक्षों से घिरा यह तट एक मनोरम स्थान है। यहाँ समुद्र में डुबकी लगाकर पानी के नीचे की दुनिया का अवलोकन किया जा सकता है। यहां से सूर्यास्त का अद्भुत नजारा काफी आकर्षक प्रतीत होता है। यह तट अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के लिए प्रसिद्ध है। इसके रास्ते में जापानी बंकर के अवशेष देखे जा सकते हैं।


वंडूर तट- पोर्टब्लेयर से 25 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित हरे-भरे वृक्षों से घिरा यह तट तैरने और प्रवाल (मूंगा) देखने के लिए प्रसिद्ध। समुद्र के अन्दर के जीवन का आनंद यहाँ ग्लास-बाटम नावों पर सैर कर लिया जा सकता है। यहीं से महात्मा गाँधी मैरीन नेशनल पार्क भी जाया जा सकता है।

चिड़िया टापू- दक्षिण अंडमान के सबसे दक्षिणी छोर चिड़िया टापू में समुद्र की तेज आवाज और चिडियों की मीठी चहचहाहट यहाँ आने वाले अतिथियों को एक संगीतमय ताल प्रदान करती है। यहाँ के घने मेंग्रोव वन अनेक प्रकार के पक्षियों का घर हैं जो पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र हैं। पोर्टब्लेयर से 25 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित चिड़िया टापू में हाल ही में बायलोजिकल पार्क की भी स्थापना की गई है। यहाँ से आगे मुंडा पहाड तट पर स्नान का आनंद लिया जा सकता है।

नील तट -पोर्टब्लेयर से 36 कि0मी0 की दूरी पर एक सुन्दर द्वीप नील द्वीप है, जहाँ हरे-भरे जंगल व रेतीले तट इसे महत्वपूर्ण बनाते हैं। यहाँ नील तट अण्डमान के सर्वाधिक खूबसूरत तटों में से है। यहाँ उथले समुद्र में रंग-बिरंगे प्रवाल देखने का आनंद ही कुछ और है। नील द्वीप पर्यावरण हितैषी पर्यटकों के लिए एक आदर्श स्थल है। स्थानीय बाजार के लिए यह सब्जियों की एक भूमि है। नील द्वीप में ही लक्ष्मणपुर, भरतपुर और सीतापुर तट भी प्रसिद्ध तट हैं।

राधानगर तट (हैवलॉक)- अंडमान व निकोबार द्वीप समूह का सबसे खूबसूरत बीच राधानगर को माना जाता है। अंडमान व निकोबार द्वीप समूह में हैवलॉक सबसे अधिक पर्यटकों के आवागमन वाला और सबसे लोकप्रिय द्वीप है जो पोर्टब्लेयर के उत्तर-पूर्व में लगभग 38 कि0मी0 दूर स्थित है। यह तट विदेशी सैलानियों की यह पहली पसंद है। एशिया का द्वितीय सबसे लम्बा और मशहूर राधानगर समुद्र तट भी यहीं है। 2 किलोमीटर लम्बा और औसतन 30-40 मीटर चौड़ा राधानगर तट को टाइम मैग्जीन ने एक सर्वेक्षण में एशिया का सर्वोत्तम बीच (समुद्र-तट) करार दिया है। यहाँ के पवित्र, अछूते तट अत्यंत सुंदर हैं और सभी प्रकृति प्रेमियों एवं उत्साही व्यक्तियों के लिए आकर्षण का केन्द्र हैं। यहां पर रेत की ढलानें ज्यादातर समकोण पर मिलती है, इससे मिलन बिंदु पर ज्यादा पानी जमा होने की सम्भावना होती हैं। यहां पानी वाकई गहरा हो सकता हैं। इस तट पर उजली रेत, लम्बे पेड़ और सामने से लगातार आती समुद्र की लहरें ऐसा सम्मिश्रण बनाते हैं कि आप उसमें डूबे बिना नहीं रह सकते। यहां की उष्णकटिबंधी हरियाली शहरी जीवन की भाग दौड़ से दूर एक पृथक आवास प्रदान करती है। राधानगर समुद्र तट पर कैम्पिंग सुविधा भी उपलब्ध है। यह एक आदर्श अवकाश स्थल हैं। यहीे से नाव द्वारा एलीफैंट बीच पर भी जाया जा सकता है, जो कि प्रवाल के लिए मशहूर है। कभी यहाँ पर इमारती लकड़ियों को जड़ से निकालने हेतु एक व्यापारी हाथी लेकर आया था, जिन्हें बाद में यहीं छोड़ गया. धीरे-धीरे इन हाथियों की संख्या में इजाफा होता गया और यह एलीफैंट बीच के नाम से मशहूर हुआ। हैवलॉक का विजयनगर तट भी मशहूर है। हैवलॉक के किनारे समुद्र में खासी समुद्री जैविक हलचल देखने को मिलती है।

रंगत-रंगत द्वीप पर्यावरण हितैषी पर्यटकों का आदर्श स्थल है। पोर्टब्लेयर से सड़क द्वारा 170 और समुद्र द्वारा 90 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित रंगत द्वीप सूर्य की किरणों से खेलते समुद्र और आनन्द का स्थल है। रंगत से करीब 25 कि0मी0 की दूरी पर कर्टबर्ट बे समुद्र तट है जहाँ कछुआ अण्डा देते है।

हरमिंदर बे तट- यह पोर्टब्लेयर से 100 कि0मी0 की दूरी पर हटबे में स्थित है और यह अंतरद्वीप नाव सेवा के जरिए जुड़ा हुआ है। सूर्य की धूप में स्नान करते हुए यहाँ ताजे नारियल की चुस्कियाँ ले सकते हैं या समुद्र की तरंगों में डॉलफिन मछलियों के बीच तैर सकते हैं जो आपके साथ समुद्र में तैरती हैं।

मायाबन्दर (करमाटांग तट)- मायाबंदर अप्रदूषित पर्यावरण और अनूठे सुन्दर दृश्यों वाला स्थल है जो अंडमान के मध्य में उत्तर दिशा में सड़क द्वारा 240 कि0मी0 की दूरी पर तथा पोर्टब्लेयर से नाव द्वारा 136 कि0मी0 की दूरी पर है। यहाँ पर तीन समुद्री तट रामपुर, पोकाडेरा और करमाटांग हैं। तैरने और जल क्रीड़ाओं के अलावा इस द्वीप के रेतीली तट कछुओं के अण्डे देने का स्थल हैं। कछुओं की कुछ महत्वपूर्ण प्रजातियों में शामिल हैं- लैदर बैक कछुआ, समुद्री हरा कछुआ, हॉकबिल ;बाज की चोंच वालाद्ध कछुआ और ओलिव रिडले कछुआ। वॉटर मॉनिटर लिजार्ड, खारे पानी में रहने वाला घड़ियाल, रेटिकुलेट पायथन ;जालदार अजगरद्ध, समुद्री साँप और किंग कोबरा आदि यहाँ देखे जा सकते हैं। करमाटांग तट को अंडमान व निकोबार द्वीप समूह का खूबसूरत बीच माना जाता है।

सिंक व रेडस्किन द्वीप- यहाँ के स्वच्छ निर्मल पानी का सौंदर्य सैलानियों का मन मोह लेता है। पोर्टब्लेयर से 26 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित इन द्वीपों में कई बार तैरती हुई डाल्फिन मछलियों के झुंड देखे जा सकते हैं। सीसे की तरह साफ पानी के नीचे जलीय पेड़-पौधे व रंगीन मछलियों को तैरते देखकर पर्यटक अपनी बाहरी दुनिया को अक्सर भूल जाते हैं।

डिगलीपुर (रामनगर तट)- उत्तर अण्डमान में स्थित पोर्टब्लेयर से करीब 180 कि0मी0 समुद्री दूरी पर स्थित डिगलीपुर द्वीप में स्टीमर से मायाबन्दर से जाते समय मैंग्रोव खाड़ी के बीचों-बीच से यात्रा करने का अवसर उपलब्ध है। यह द्वीप प्रकृति प्रेमियों को बहुत पसंद आता है। यह स्थान अपने संतरों, चावलों और समुद्री जीवन के लिए प्रसिद्ध है। यहीं पर अण्डमान की सबसे उंची चोटी सैडल पीक ;732 मीटरद्ध है। यहाँ पर अण्डमान की एकमात्र कल्पांग नदी बहती है, जहाँ पर एक पनबिजली परियोजना है। डिगलीपुर में स्थित सुंदर रेत से भरा हुआ उष्णकटिबंधी आदर्श रामनगर तट शांत अवकाश के लिए पूरी तरह आदर्श स्थान है। अपने कपड़े और धूप का चश्मा उठाएं और यहाँ के तरह-तरह के पक्षियों की खोज में जुट जाएं। यहाँ का साफ पानी और नारियल के वृक्षों से सजे हुए सुंदर तट की विविध जीवन शैलियाँ देखने योग्य हैं। डिगलीपुर के समीप स्थित रॉस एवं स्मिथ द्वीप सफेद रेतीले बालू के लिए प्रसिद्व हैं। इन दोनों द्वीपों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि ज्वार के समय ये एक-दूसरे से अलग हो जाते हैं और भाटे के समय एक-दूसरे से यूँ जुड़ जाते हैं कि एक द्वीप से दूसरे पर पैदल भी आया जा सकता है।

लघु अंडमान- पोर्टब्लेयर से 120 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित लघु अंडमान द्वीप में मूलतरू निकोबारी, ओंगी और पूर्वी पाकिस्तान से लाकर बसाये गए लोग हैं। यहाँ पर चमकीले रेतीले तट, क्रीक से गुजरती हुई बोटिंग के अलावा झरनों व हाथी की सवारी का भी आनंद उठाया जा सकता है। यहाँ के बटलर बे तट, नेता जी नगर तट व हरमिंदर बे तट प्रसिद्ध हैं तो हट बे से क्रमश रू 6.5 व 20 किलोमीटर दूर स्थित व्हाइट सर्फ व व्हिस्पर वेव झरनों का लुत्फ उठाने से कोई नहीं चूकता है। इस द्वीप में पिकनिक की मस्ती के साथ हाथी की सवारी का लुत्फ भी मौजूद है। हाथियों द्वारा लकड़ी खींचने के कार्य का प्रशिक्षण भी यहाँ दिया जाता है, जिसे देखा जा सकता है। यह द्वीप रेड आयल पाम के पौधारोपण के लिए भी प्रसिद्ध है.

महात्मा गाँधी मैरीन नेशनल पार्क वंडूर- यह समुद्री विविधता को देखने का महत्वपूर्ण स्थान है। इसकी स्थापना 1983 में प्रवाल भित्ति, मैंग्रोव व सामुद्रिक पारिस्थितिकी के संरक्षण हेतु हुई थी। पोर्टब्लेयर से 29 कि0मी0 दूर 281.5 वर्ग कि0मी0 क्षेत्रफल में विस्तृत यह पार्क खुले समुद्र, क्रीक और 15 छोटे-बड़े द्वीपों से आच्छादित है। समुद्र के अन्दर के जीवन का आनंद यहाँ ग्लास-बाटम नावों पर सैर कर लिया जा सकता है। भारत के इस सर्वोत्तम समुद्री द्वीप पार्क में उष्णकटिबंधी वन, मैंग्रोव, प्रवालभित्ति, 300 से अधिक प्रजातियों की रंग-बिरंगी मछलियाँ, जेली फिश, स्टार फिश, डाल्फिन, शार्क, कछुआ, समुद्री गाय, केकड़ा, आक्टोपस, समुद्री पानी के घड़ियाल, साँप आदि तमाम समुद्री जीवों को देखकर आनंद उठाया जा सकता है। यहाँ के खुले स्थान भी झाडियों और लताओं से भरे हुए हैं। किसी भी तरफ देखने पर केवल ऑर्किड, टूटी हुई शाखाओं तथा गिरी हुई पत्तियों के साथ चमकदार उष्ण कटिबंधी फूल दिखाई देंगे जो पूरे जंगली मार्गों पर फैले हुए हैं। अत्यंत घने होने के कारण यहाँ वनस्पति सीधी तट तक आती है और ऐसा लगता है कि मानो समुद्र में मिल रही है। शाखाएं और बेलें समुद्र के ऊपर टंगी हुई दिखाई देती हैं और कभी कभार ये पानी में डूब जाती हैं। यहाँ पक्षियों की आवाजें भी सुन सकते हैं किन्तु जब तक वे खुले स्थान पर न हों, उन्हें देखना कठिन है। यहाँ 15 द्वीपों में जाली बॉय व रेड स्किन द्वीप ही पर्यटकों के लिए अनुमन्य हैं।

बाराटांग द्वीप- पोर्टब्लेयर से सड़क द्वारा 100 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित बाराटांग द्वीप के आसपास बालू डेरा तट, लालाजी बे तट, मार्क बे तट, गिटार तट, स्पाइक द्वीप और पैरट द्वीप पर्यटन के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। आजकल यह द्वीप लाइम स्टोन गुफा के लिए भी प्रसिद्व है। इस प्रकार की गुफायें मनुष्य द्वारा पाई गई सबसे गहरी और सबसे विशाल मानी जाती है। इसके अलावा यहाँ पर ष्मड-वोलकेनोष् (कीचड़ फेंकने वाले ज्वालामुखी) भी हैैं, जिसे कि लोग आश्चर्य से देखते हैं। बाराटांग द्वीप में जारवा क्रीक गाँव में 18 फरवरी 2003 की संायरू 7रू45 बजे सर्वप्रथम कीचड़ फेंकने वाले ज्वालामुखी का उद्भव हुआ। जबरदस्त विस्फोट के साथ उत्पन्न इस प्रक्रिया में थोड़ा कंपन भी महसूस हुआ। इससे पूर्व 1983 में इसी जगह दरार पड़ गई थी। अंतिम बार यह 26 दिसम्बर 2004 को जबरदस्त विस्फोट व कंपन के साथ उत्सर्जित हुआ था। फिलहाल अंडमान में इस तरह के 11 कीचड़ फेंकने वाले ज्वालामुखी पाए गए हैं, जिनमें से 08 बाराटांग व मध्य अंडमान में एवं 03 डिगलीपुर (उत्तरी अंडमान) में अवस्थित हैं। ये पंक ज्वालामुखी 1000-1200 वर्ग मी0 के क्षेत्र में विस्तृत हैं और लगभग 30 मी0 व्यास व 2 मी0 उंचे अर्द्ध्रवृत्ताकार टिब्बे का निर्माण करते हैं। इनके चलते विवर्तनिक रुप से अस्थायी भू-भागों का निर्माण होता है और कालांतर में ऐसी परिघटनाओं से ही नए द्वीपों का भी निर्माण होता है।

बैरन द्वीप- यहाँ भारत का एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी बैरन का ज्वालामुखी है। पोर्टब्लेयर से समुद्र द्वारा 139 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित यह द्वीप लगभग 3 कि0मी0 में फैला है। 177 साल प्रसुप्त रहने के बाद यह 1991, 1994-95 और पुनरू सुनामी के बाद 28 मई 2005 को इसमें विस्फोट हुआ था। 2005 के बाद 2006 तक इससे लावा निकला और फिलहाल यह शांत है। समुद्र तट से आधा किलोमीटर दूर इस ज्वालामुखी का विशाल क्रेटर स्थित है। फिलहाल ज्वालामुखी शांत रहने के दौरान वन विभाग की अनुमति से यहाँ जाया जा सकता है।

आवागमन- अंडमान निकोबार द्वीप समूह मुख्यभूमि से हवाई जहाज और समुद्री जलयान सेवा से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है. कोलकाता, चेन्नई और दिल्ली से राजधानी पोर्ट ब्लेयर आने के लिए सीधी विमान सेवाएं हैं। कोलकाता और चेन्नई से पोर्ट ब्लेयर के बीच इंडियन एयरलाइंस, डेक्केन और जेटलाइट की नियमित उड़ानें हैं। चेन्नई, कोलकाता और विशाखापट्टनम से यहाँ के लिए नियमित यात्री नौका सेवा है। समुद्री यात्रा में पोर्टब्लेयर की चेन्नई से दूरी करीब 1190 कि0मी0, कोलकाता से 1255 कि0मी0 और विजयवाड़ा से 1200 कि0मी0 दूरी है। अक्टूबर से मार्च के मध्य यह आदर्श पर्यटन स्थल माना जाता है। इस समय जब शेष भारत में कड़क ठण्ड पड़ रही होती है तो यहाँ मौसम सुहाना होता है। हालांकि यहां यात्रा की कुछ बंदिशें हैं यानी कुछ चुने हुए द्वीपों में पर्यटन की अनुमति है। यही बात खूबसूरत तटों और मूंगों वाली विस्तृत जल क्षेत्र के लिए है। प्रकृति का सबसे अधिक कीमती उपहार माना जाने वाला अंडमान और निकोबार द्वीप जीवन भर याद रहने वाला अवकाश अनुभव है।

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कृष्ण कुमार याद
भारतीय डाक सेवा
निदेशक डाक सेवाएं
अंडमान व निकोबार द्वीप समूहए पोर्टब्लेयर-744101













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