"कभी सोचा नहीं था ऐसे दिनों के बारे में...।" --चारपाई पर लेटे बेरोज़गार पोते के सिर को सहलाते हुए दादी बुदबुदाई।

पोता आँखें मूंदे पड़ा रहा, कुछ न बोला।

"उस रात परधानमन्तरी ने घोसना करी थी क हमारा पहला काम नौजवानों को रोजगार दिलाना होगा।" --दादी कुछ याद करती हुई-सी बोली-- "ये सुनना था क पूरा का पूरा देस तालियों की गड़गड़ाहट से भर उठा।"

"पूरे देश ने तो वह बात सुनी भी नहीं होगी दादी।" --पोते ने आँखे मूंदे-मूंदे ही तर्क किया।

"ताली बजाने के लिए बात सुनने के लिए बात सुनने की क्या ज़रूरत है?" --दादी बोली-- "हमारे देस में ताली की एक आवाज़ कान में पड़ी नहीं क दूसरा, तीसरा, चौथा, पाँचवाँ.....हर आदमी ख़ुद-ब-ख़ुद तालियाँ बजा उठता है। बन्दा सोचता ही नहीं है क वो ताली आखिर बजा क्यों रहा है!"

"अच्छा,....फ़िर?" --पोते ने आगे की बात जानने की गरज़ से पूछा।

"फिर क्या, उनके तो जैसे फार्मूला ही हाथ लग गया सोने की कोठरी में बने रहने का।" --दादी बोली-- "इधर तालियों की गड़गड़ाहट ढीली महसूस की, उधर अगले चुनाव की तैयारियाँ शुरू। नए सिरे से घोसनाएँ और नए सिरे से तालियाँ…चलन ही बन गया मरा...!"

"क्या कहती हो?" --इस बात को सुनकर पोता रोमांचित होकर सीधा बैठ गया।

"पहले चुनाव से यह खेल देख रही हूँ बेटा।" --दादी हताश आवाज में बोली-- "बैठ क्यों गया?"

"यानी कि…" --पोता पुन: लेटता हुआ बोला-- "अफ़ीम सिर्फ़ धार्मिक ही नहीं चटाते...!" "क्या बोला?" --उसकी बात के मर्म से अनजान दादी ने पूछा। "रात बहुत घिर आई है, तुम अब आराम करो...।" --अपने सिर पर से उतारकर दादी के हाथ को दोनों हाथों में दबाकर वह बोला-- "सोना मुझे भी चाहिए...।"

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