सतयुग-समय, सत्य की असत्य पर जीत
सदियों से जय-जय, ऐसी रघुकुल की महां रीत ।
पुण्य-पावन कथा से पूर्ण ब्रम्हाण्ड परिचित,
न होगी धूमिल कभी युगों-युग जाएं बीत ।
शत-शत नमन् इस कुल को, शत बार नवाएं शीश,
रघुकुल सा कुल हो सब कुल में, माँगे यही आशीड्ढ ।

सजा है नव-वधू सम साकेत, खुशियाँ खिली अपार,
अवध-रंगमंच के बनने चले, रघुकुल-नायक सूत्रधार ।
दशरथ सहित तीनों रानियाँ, ऐसे प्रफुल्लित हो रहीं,
श्रावण-घन मे बार-बार, तड़ित ज्यों द्रुमित हो रही ।
भरत, लक्ष्मण औ’ शत्रुघ्न सोच-सोच इठलाते हैं,
बनेगें राम भैया भूपति, सबको बात बताते हैं ।
प्रजा-जनों के हिय में बची यही एक आस है,
राम प्रिय के मुकुटधारी छवि-दर्शन की प्यास है ।
ऐसे कृपानिधि राम हैं, रघुकुल के दिनकर,
उद्धारने इस धरा को, भगवत आए मनुज बनकर ।

होकर भी पूर्ण राकेश ज्यों लिए हुए है दाग,
अवध जन भी कैसे सकते विधि से दूर भाग ।
राका के उपरांत ज्यों आती काली अमा की रात,
आयी मंथरा अयोध्या ऐसे नारी एक नीच जात ।
खाया जिस थाली में, उसी में किया छेद उसने,
दासी-पुत्र जहाँ प्राण प्यारा, डाला वहीं भेद उसने ।

पीठ झुकाए लिए सहारा वह कुबड़ी डायन चलती थी,
स्वर्ग से सुंदर इस नगरी पर पड़ी इसी की कुदृष्टि थी ।
आखेट ज्यों ढूँढे आखेटक ऐसी उसकी प्रवृत्ति थी,
अनल उगलती थी तब-तब, जब-जब बातें करती थी ।
अयोध्या की अनुज रानी को, बनाया उसने निशाना था,
सर्वनाश साकेत सुख का, उसने लक्ष्य अपना माना था ।

लिए कुविचार यह मन में कैकई-कक्ष में हुआ प्रवेश,
रानी जहाँ स्वप्न सँजोए, प्रिय राम होंगे अवध-नरेश ।
सम्मुख देख अतिथि को उसने, माता सम आदर दिया,
शीश नवां कर कुशल पूछा, सुंदर एक आसन दिया ।
राम के भावी भूप का, रानी ने सहर्ड्ढ समाचार सुनाया,
उस अशुभ को यह शुभ संदेश, तनिक भी न मन भाया ।

बिना व्यर्थ में समय गवाएं, दुष्टा ने अपना जाल बिछाया,
किया उसे पाश में ऐसे, मदारी ज्यों वानर नचाया ।
कहा उसने चाटुरता से ‘सुन ओ अभागी रानी,
पर-पुत्र के मोह में तुम क्यों हुई जाती दीवानी ।
अपने पुत्र के हित का क्या नहीं तुम्हे ध्यान,
दूसरा हो राजा निज अभागा, काहे का तू करे मान ?’

कैकई ने तब तर्क दिया ‘नहीं-नहीं ओ मेरी मैया,
भरत मेरा है राम का सबसे प्यारा औ’ दुलारा भैया ।
नहीं कभी उसने मुझमे औ’ कौशल्या में अंतर किया,
मैंने भी भरत-सम उसे, स्नेह प्याला भर-भर दिया ।
‘तू है भोली’, मंथरा बोली ‘वास्तविकता से अनजान
कर बैठती अपना अहित दूसरों का कहा मान ।
यह स्नेह और प्रेम भावना सत्य नहीं मिथ्या है,
अंत समय रहता रक्त-संबंध, केवल यही एक तथ्य है’ ।

जब बूँद-बूँद पानी से शैल भी चूर-चूर हो जाए,
तो मंथरा के वाग्जाल से कैकई कैसे बच पाए ।
गह चरण मंथरा के अयोध्यारानी हुई जैसे पूर्ण असहाय,
कहा, इस संकट से निकलने का तुम्हीं बताओ कोई उपाय ।

तब उस कुल्टा ने कराया स्मरण वह महां रण-क्षेत्र,
जिसकी भयावहता को लख रक्त उगल रहे थे नेत्र ।
बन सारथी तुमने नरेश की, अबला भेड्ढ उतारा था,
रिपुओं से जब घिरे नरेश तुमही ने उन्हें संभाला था ।
काली का या दुर्गा का, रूप जो तुमने बनाया था,
अपनी इस वीरता कारण तुमने भूप बचाया था ।
वह भी हो चकित केवल तुम्हें ही लखते रहे,
बार-बार कृतज्ञता वश द्विवचन माँगने को कहें ।
तुमने तब पटुता से अपनी सूझ का उपयोग किया,
करूंगी सुअवसर माँग इनकी, कह शीश नवां दिया ।

आज वह क्षण आया रानी रखो वर नाथ-समक्ष,
हो प्रिय भरत भावी भूप दृढ़ता से रखो अपना पक्ष ।
भरत के राजमार्ग मे कोई भी कंटक न रहे,
राम को चाहिए वह चौदह बरस का बनवास सहे ।
उस पटु ने रानी को वचनों का करा ध्यान,
भड़का दी फूट की ज्वाला, साकेत से किया प्रस्थान ।

कक्ष में रानी निःशेष बुद्धिहीन हो करे विचार,
मै बनुंगी महारानी और भूप भरत कुमार ।
जननी की सुत को अमूल्य होगी यह भेंट,
नौनिहाल से आते ही होगा जब उसका राज्याभिषेक ।
प्राप्त कर यह उपहार भरत फूला नही समायेगा,
बारम्बार धन्य होगा ममता का मोल न चुका पाएगा ।
लक्ष्य-प्राप्ति हेतु कैकई ने कोप भवन का स्वांग किया,
अपनी संकीर्ण भावना कारण अवध-हित का त्याग किया ।

अवध नरेश दशरथ का कैकई-कक्ष में हुआ आगमन,
मन मे संतोष अपरिमित मुख चमके ज्यों आभरण ।
राम सम पुत्र पाकर दशरथ धन्य-धन्य हुए जा रहे,
अग्रज प्रिय होगा उत्तराधिकारी सोच-सोच मुसका रहे ।
पूर्ण विश्वास लिए राम पर, रघुकुल रीत निभाएगा,
प्रजा-जनों के कष्ट झेलने, स्वयं समक्ष हो जाएगा ।
अलकें बिखारे लेटी भू पर किए काले वसन धारण,
प्रिया की इस रूप दशा का दशरथ समझ न सके कारण ।
प्रिय-प्रिय पुकारा पूछा - क्या कारण इस कोप का,
कौन इच्छा रही अधूरी वेश धरा कैकई काक का ।
राजा को रानी ने शम्बर-इन्द्र युद्ध स्मरण कराया,
उनके विस्मृत वचनो का पुनः उन्हें ध्यान कराया
राजन ने कहा हो आश्वस्त, संपूर्ण धरा पर राज हमारा,
जलधि छोड़ सर्वस्व माँगो जो हो रानी तुम्हे प्यारा ।

निर्दयी निर्मम रानी ने माँग लिए वही वचन
भरत का राजतिलक, राम का चौदह वर्ड्ढ वन-गमन ।

वचन रूप में रानी ने राजा के प्राण ही माँग लिए,
उर-प्रिय ने ही हृदय में सहस्र शूल हों दाग दिए ।
जड़वत सुनते रहे राजन असंख्य क्रोध के घूँट पिए,
क्षुब्ध हो रहे उस घड़ी पर, जब रानी को वचन दिए ।

खड़े भूपति भिक्षु सम करें कैकई से नित निवेदन,
किया समर्पित राज भरत को करो परिवर्तित द्वितिय वचन ।
निष्ठुर रानी रही अटल यह अनर्थ कराने को,
दूत भेजा तुंरत ही कक्ष से राम बुलाने को ।
लज्जा-संताप से घिरे दशरथ ने कैकई-कक्ष छोड़ दिया,
होंगे कैसे समक्ष राम के, कुल्टा ने हाय हिय तोड़ दिया ।

सुन आदेश माता का राम नग्न पद दौड़ पड़े,
किए चरण स्पर्श सहृदय स्मित मुख लिए मिले ।
‘अहो भाग्य मेरे, माता ने स्मरण मुझे किया,
संपूर्ण संपदा जिस पद में स्थान मुझे वहीं दिया ।
बाल्याकाल से मैया स्नेह अपरिमित आपने मुझे दिया,
अपनी ममता के आँचल से कृतज्ञ आपने मुझे किया ।
कहो माँ, क्या है इच्छा तत्क्षण वह पूर्ण होगी,
रक्त की अंतिम बूंद भी पुत्र-धर्म हेतु कम होगी ।’
‘कैकई ने रखे वचन समक्ष, पूर्णतः होकर हृदय-रहित,
राज होगा प्रिय भरत का, तुम जाओ वन वल्कल सहित ।’
‘तनिक सी बात को लेकर, हो मत माते तुम विचलित,
भरत है उत्तम अवध हेतु, हैं तथ्य से सब परिचित ।
राज्य-भार से मुक्ति दिलाकर किया एक अतिरिक्त उपकार,
दिया अवसर वन जाने का करुं प्रकृति अवलोकित अभिसार ।’

लख विनम्रता राम की कैकई विस्मित रह गईं,
हो दुखी लगी पछताने राम से हाय क्या कह गईं ।
किंतु निकला तीर तरकश से वापिस कैसे मुड़ सके,
तोड़ा स्वयं जो धागा स्नेह का जोडे़ से न जुड़ सके।

राम का हुआ वन-गमन निभाया पुत्र-वंश धर्म,
हुए नतमस्तक समस्त देवगण देख यह महां कर्म ।
भ्राता भार्या संग चले किया स्थापित अन्य आदर्श,
स्नेह त्याग में है छिपा, इस विश्व-कुटुम्ब का उत्कर्ष ।
**********

2 comments:

  1. आनंद, गीदम13 नवंबर 2010 को 9:50 am

    अब भी एसी रचनायें लिखी जा रही हैं यह देखना सु:खद है।

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