केनेडा की हिन्दी प्रचारिणी सभा की त्रैमासिक पत्रिका "हिन्दी चेतना" की ओर से समय- समय पर विश्व विख्यात महापुरूषों, मूर्धन्य लेखको, कवियों तथा साहित्यकारों के सम्मान में विशेषांक प्रकाशित हुए हैं । इन विशेषांको के प्रकाशन का मुख्य उद्देशय यही रहा है कि देश- विदेश के पाठकगण , विशेषतया: भावी पीढ़ी के सदस्य उन महानुभावों के महान कार्यों, आदर्शों, संस्कारों और जीवन मूल्यों से अवगत तथा प्रेरित हो सकें । इसी संकल्प की अगली कड़ी है ’महामना’ पं मदन मोहन मालवीय जी को समर्पित विशेषांक । यह विशेषांक महामना के बहु आयामिक व्यक्त्तित्व तथा अंतरंग जीवन की झाँकियों के साथ -साथ उनके जाने- अनजाने रूप, देश की राजनीति को प्रभावित करने वाले प्रसंगों, हिन्दी भाषा के प्रति उनकी लग्न तथा सेवा के दृष्टान्तों एवं इस महान विभूति के अद्वितीय मानवीय गुणों को उद्घाटित करते हुए प्रेरक प्रसंगों से परिपूर्ण एक अनूठी कृति है । प्रस्तुत अंक में महामना के समकालीन महापुरूषों के संस्मरण, उनके जीवन के दुर्लभ चित्र, उन्हें समर्पित काव्यमयी रचनाएँ तथा उनके कृतित्व को उजागर करते हुए अनेक विचारोत्तेजक एवं सारगर्भित लेख संग्रहित हैं ।

इस विशेषांक के साथ जुड़ा है एक सपना जो हिन्दी चेतना के संरक्षक ( मुख्य सम्पादक ) श्री त्रिपाठी जी ने कुछ वर्ष पहले काशी हिन्दु विश्वविद्यालय के प्रांगण में देखा था, और उस स्वप्न को साकार करने का संकल्प लिया इस बहुचर्चित पात्रिका की सम्पादिका डॉ. सुधा ओम ढींगरा ने । उनके आग्रह और आह्वान पर साथ में जुड़ गए देश-विदेश के रचनाकर, जिनके आलेख/ संस्मरण इस विशेषांक को केवल पठनीय ही नहीं संग्रहणीय़ भी बनाते हैं ।

पूज्य मालवीय जी अप्रतिम व्यक्तित्व के स्वामी होने के साथ- साथ पूर्ण रूपेण समर्पित भारतीय थे । उनके विलक्षण व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए श्री गिरिधर मालवीय जी अपने आलेख में लिखते हैं, "इसे एक विडम्बना ही मानना चाहिए कि इस देश में उनका नाम अधिकांश लोग उन्हें काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक तथा महान शिक्षाविद के रूप में ही जानते हैं । शिक्षा के अतिरिक्त मालवीय जी एक महान देशभक्त, राजनेता, अद्भुत वक्ता, सुविख्यात निर्भीक पत्रकार, समाज सुधारक, हिन्दी के सब से बड़े प्रवर्तक तथा पोषक, अपने समय के शीर्ष एवं सफलतम अधिवक्ता, आर्थिक सुधारों के प्रखर चिन्तक, अत्यन्त कोमल हृदय वाले संवेदनशील मितभाषी, आदर्श आचरण के व्यक्त्तित्व के धनी महानुभाव थे, जिनके कारण उन्हें "महामना" कहा गया " ।

हिन्दी भाषा तथा भरतीय संस्कृति के अनन्य भक्त पंडित जी एक कुशल पत्रकार भी थे । अपनी भावभीनी स्मरणांजलि में भारत के भूतपूर्व राष्ट्र पति श्री शंकर दयाल शर्मा लिखते हैं,"मालवीय जी एक सक्रिय स्वतन्त्रता सैनानी के साथ-साथ साहसी, सजग और प्रतिबद्ध पत्रकार भी थे। हिन्दी साप्ताहिक ’हिन्दोस्तान’ के सफल सम्पादन के माध्यम से मालवीय जी ने राष्ट्रीय विचारों को लोगों तक पहुँचाया । इसके बाद उन्होंने उस समय के ’अभ्युदय’, लीडर, मर्यादा आदि प्रमुख समाचार पत्रों का संपादन करके देश के लोगों में राष्ट्रीय प्रेम की भावना भरी तथा उनमें राजनैतिक चेतना जागृत की "। किसी भी संकल्प के प्रति उनकी निष्ठा तथा लग्न पर प्रकाश डालते हुए वह लिखते हैं, "मालवीय जी उन दिनों अपने भाषणों में अक्सर कहा करते थे -- अर्जुनस्य प्रतिज्ञे द्वे, न देन्यं न पलायनम। अर्थात अर्जुन की दो प्रतिज्ञाएँ हैं -वह न तो किसी के सामने दीनता दिखायेगा और न पीठ दिखा कर भागेगा"। मालवीय जी जीवन भर अर्जुन की इस प्रतिज्ञा का पालन करते रहे तथा अन्य लोगों को भी ऐसा करने के लिये प्रेरित करते रहे ।

मालवीय जी की अपूर्व भिक्षावृत्ति का लोहा मानते हुए महात्मा गांधी ने महामना को संसार का सबसे बड़ा भिखारी माना था । उनकी इसी भिक्षावृत्ति के संदर्भ में शीला मालवीय अपने आलेख में एक अति रोचक प्रसंग प्रस्तुत करती हैं, "वह बड़े कर्मठ व्यक्ति थे, जो ठान लेते थे, वह करके छोड़ते थे । काशी विश्वविद्यालय के निर्माण के लिए चंदा मांगने के लिए वह हैदराबाद के निज़ाम के पास गए, लेकिन निज़ाम ने उन्हें दान देने से इन्कार कर दिया। उसी दिन निज़ाम के महल के पास एक हिन्दू सेठ का शव निकल रहा था, पंडित जी उसमें लुटाये जाने वाले पैसे एकत्रित करने लगे, लोगों के पूछने पर उन्होंने कहा - खाली हाथ जाने से अच्छा कुछ पैसे इसी प्रकार ले जाना ठीक रहेगा" । इसी आलेख में वह आगे लिखती हैं " जब काशी नरेश ने विश्वविद्यालय के लिए भूमि देने से इन्कार कर दिया तो मकर संक्रांति के दिन पंडित जी गंगा तट पर कर्मकांडी ब्राह्मण के रूप में उपस्थित हुए। काशी नरेश ने जब संकल्प कराने को कहा तो पंडित जी ने वही भूमि प्राप्त कर ली" । उनके अथक प्रयत्नों के फलस्वरूप काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना हुई जो शिक्षा के क्षेत्र में महामना की सर्वोत्तम कृति है । इस अमर कृति की विवेचना करते हुए श्री वीर भद्र लिखते हैं ,"यह विश्वविद्यालय प्राच्य एवं पाश्चात्य, प्राचीन एवं आधुनिक समस्त विधाओं की राजधानी ही नहीं अपितु, भारत की राष्ट्रीय चेतना एवं सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक है" ।

ईश्वर भक्त्ति और देश भक्त्ति को जीवन का मूलमंत्र मानने वाले मालवीय जी मातृ भाषा एवं मातृ संस्कृति के अनन्य भक्त्त थे, जिन्होंने अपना पूरा जीवन माँ भारती तथा भारतीय संस्कृति के प्रचार- प्रसार में समर्पित किया । उन्हें समर्पित अपने आलेख " हिन्दी के पितामह" में उनकी हिन्दी के प्रति सेवा और लग्न के विषय में महाकवि प्रो. हरिशंकर आदेश लिखते हैं,"मालवीय जी हिन्दी के प्रथम वरिष्ठ नेता थे, जिन्होंने स्पष्ट रूप से हिन्दी आन्दोलन का सूत्रपात किया तथा हिन्दी को उसका यथोचित स्थान दिलाया । मालवीय जी की हिन्दी सेवाओं में जिस कार्य की सर्वोपरि गणना की जाती है वह है उत्तरप्रदेश के न्यायालयों तथा राजकीय कार्यालयों में हिन्दी को व्यावहारिक भाषा के रूप स्वीकृत कराना है । इसी संदर्भ में डा. दिग्विजय सिंह कहते हैं , "वह भाषा की उनाति को देश की उन्नति से जोड़कर देखते थे जिसे भारतेन्दु " निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति का मूल" कहते हैं । उनके अनुसार साहित्य और देश की अपने देश की भाषा के द्वारा ही उन्नति हो सकती है । यह उनके प्रयत्नों का ही फल था कि १९९० में अखिल भारतिय हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग की स्थापना हुई और इसका प्रथम अधिवेशन काशी में आयोजित किया गया "। यह सर्व मान्य है कि पूज्य महामना हिन्दी सुरक्षा एवं प्रचार आन्दोलन के प्रथम महानायक थे ।

सरस्वती पुत्र मालवीय़ जी के जीवन चरित तथा उनके कृतित्व को एक पत्रिका की परिधि में समेटना एक भागीरथी प्रयत्न है । युगपुरूष ’महामना" के विषय में जितना भी कहा/ लिखा जाए, अपूर्ण ही लगेगा । किन्तु हिन्दी चेतना के समर्पित सम्पादक मंडल ने अथक परिश्रम और निष्ठा से इस संकल्प को मूर्तरूप किया। इस अनुकरणीय अनुष्ठान के लिए हिन्दी चेतना के सभी सदस्य हार्दिक बधाई के पात्र हैं । राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के शब्दों में, "मुट्ठी भर संकल्पवान लोग जिनकी अपने लक्ष्य में दृढ़ आस्था है, इतिहास की धारा को बदल सकते हैं" ।

प्रस्तुत विशेषांक निस्वार्थ सेवा,बलिदान तथा त्याग के प्रतीक मालवीय जी के उच्च जीवन मूल्यों को शब्दों में पिरोता एक "महाकाव्य" है जो प्रत्येक भारतीय, प्रत्येक हिन्दी प्रेमी तथा देशप्रेमी के लिए प्रेरणा का अविरल स्रोत है जिसके पठन-पाठन से जन मानस लाभान्वित होगा । उन सभी लेखकों का आभार जिन्होंने अपने आलेखों, संस्मरणों तथा काव्यांजलि से इस कृति को समृद्ध किया । अन्तत: मैं यह कहना चाहूँगी कि "इसके प्रकाशन में जिस संतोष और सुख का अनुभव" आदरणीय त्रिपाठी जी तथा सुधा जी को हुआ उससे कई गुणा अधिक आनन्द इस कृति को पढ़ने वाले पाठकों को मिलेगा । सुधि पाठकों से मेरा विनम्र निवेदन है कि वे इस विशेषांक की रचनात्मक सामग्री को जन-जन तक पहुँचाएं । हिन्दी की निस्वार्थ सेवा करने वाले "हिन्दी चेतना" के सभी सदस्यों को मेरी शुभ कामनाएँ ।

7 comments:

  1. aap ne yh bhut hi uttm v mhan kary kiya hai aap is ke liye sadhu vad swikar krne ki kripa kren
    malviy ji jaisa vyktitv ki aaj desh ko aavshykta hai khas kr aise mahaul me jb log nihit swarthon ke kiye hindoo dhrm ko bhgva aantnk ka man de rhe hain ve log malviy ji se sbk len
    malviy ji ke prti mera bhi shrdha poorvk nmn hai
    dr.vedvyathit@gmail.com

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  2. महामना मालवीय जी को तो अब लगभग भुला दिया गया है। आपका यह कार्य बडा है। पत्रिका को शुभकामनायें।

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  3. हिन्दी चेतना को शुभकामनायें

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  4. हिन्दी चेतना पत्रिका को मेरी शुभ कामनाएँ

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  5. हिन्दी चेतना ने एक बहुत ही अच्छा कार्य किया है...बधाई व महामना मालवीय जी को बहुत बहुत श्रद्धाजली

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  6. इस पत्रिका के मालवीय जी पर केन्द्रित कुछ आलेख साहित्य शिल्पी पर भी साभार प्रकाशित हो सकें तो अच्छा होगा। मेरा यह अनुरोध शशि जी सुधा जी और राजीव जी तीनों से है।

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