"अजी सुनते हो, ज़रा इन बच्चों को नहला देना" अपने पति को आवाज़ देते हुए सुधा नाश्ता बनाने में लग गई। जब उसका पति रामप्रसाद यह काम निपटा चुका तो फिर आवाज़ आई।

"अजी नाश्ते के बाद आप बाज़ार से सौदा ले आइये, मैं घर की सफ़ाई करती हूँ।" रामप्रसाद नौ साल की गृहस्थी में इन सारे कामों का आदी हो चुका था, पर भीतर कहीं न कहीं कुछ, बहुत कुछ टूटता रहता था-बेआवाज़। ज़िन्दगी का जाम उसके हिस्से में ऐसा कुछ आया, जो वह न तो पी सकता था, न निगल सकता था, न थूक सकता था। नील कंठ सा हो गया था मानो!

"मैं एक हफ़्ते के लिये माइके जा रही हूँ, आप भी थोड़ा आराम कर लेना, अपना ख़याल रखना। मैं मुन्नी को ले जा रही हूँ, मुन्ना आपके साथ रहेगा। जब आप ऊपर जायें तो मेरा सामान नीचे लेते आइयेगा।"

सामान नीचे दरवाज़े के पास रखते हुए रामप्रसाद ने कहा- "भाग्यवान मैं ज़रा गंगा नहाकर आता हूँ" कहकर वह बाहर निकल गया और सुधा उस आवाज़ की आहट तक न सुन पाई जो मन की कराहना से निकली। इंतज़ार लम्बा हो गया, लौटने वाला नहीं लौटा, गंगा स्नान करते अपने समस्त बोझ के साथ विलीन हो गया शायद!

और सुधा अब जब भी अपनी बच्चों को नहलाती है तो वह चीत्कार उठती है कि उसके राम उसे कैसा प्रसाद दे गए है जो आँखों से निरंतर गंगा बहती रहती है।

5 comments:

  1. कश्मकश को खूब लिखा है आपने।

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  2. It is not clear why Ram Prasad has taken this step. Doing something at his own home is not that bad. many working women take care of entire family along with her work also but they never commit suiside.

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  3. Apni apni manodasha ek kaaran ho sakti hai aur Manobal ka mahatv bhi maine rakhta hai. Ramprasaad ke atmasanmaan ko thes lagna ek aur karan ho sakta hai. Apni apni soch aur apna apna nazaria.

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  4. end accha nahi hai. iss tarah zindagi se haar nahi maanni chahiye.

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