बस्तर हमेशा से खामोश नहीं था। अपने अभावों में जीता हुआ भी जिन्दादिल और गुनगुनाता हुआ बस्तर, कांख में मुर्गा दबाये कंधे पर तूम्बा टांगे ‘मंद’ से मंद-मंद लडखडाता, झूमता हुआ बस्तर इधर कुछ दिनों से पहचान ही नहीं आता। ‘दाहिने’ ‘बायें’ हो कर ‘थम’ गये हैं जंगल। अब मांदर की आवाज कहीं से आती है तो कदमों को झुमाती नहीं सिहरा देती है। जो जानते हैं वे यह मानते हैं कि अब गीतों में भी स्वाभाविकता खो गयी है। कैसे चहका करते से वे समवेत स्वर –

तेर ना नी ओ
तेर ना ना रे नांव रे
ती ना ना मुर ना नारे नाना
ना मुर ना ना हो...

जब दिल्ली कहती है कि ‘दंडक वन’ बारूद का ढेर है या जब वर्धा कहता है कि बस्तर आधार इलाका है और लाल क्रांति की कालीन यहीं से बुनी जायेगी तो लगता है वह कौन सा चश्मा है जिससे यह हरी भरी धरा लाल-काली दिखती है? जब इन पठारों में बंदूखें नहीं बोयी गयी थी तब भी हाल यह था कि भोपाल में भी “बस्तर कहाँ है?” जानने वाले उंग्लियों में गिने जा सकते थे। आज राजधानी रायपुर है तो भी बस्तरिये “अबूझ” हैं। हम बस्तरियों को मत ही जानो कोई शिकवा नहीं; लेकिन अगर जानना चाहते हो तो दिल्ली की किसी युनिवर्सिटी में कोक्टेल पार्टियों में बहसियाने वाले लालबुझक्कडों से तो मत बूझो। बस्तर को जिन्होंने जिया है वे किसी को दीख नहीं पडते।....। सच यह भी है कि बस्तर के भीतर के कुछ ख्यातिनाम कवि और लेखक भी अब तक “वह तोडती पत्थर” ही लिख कर “खास खेमों” की पत्रिकाओं में छप-छप कर महान हो रहे हैं। उनका लेखन “पक” गया है। उन्हें मल्टीप्लेक्स बनाते “मजदूर” साफ साफ दिखते हैं किंतु अचरज कि ‘अधमरा-अधभूखा’, ‘माओवदियों और व्यवस्था’ की दो पाटियों में पिसता माडिया नजर भी नहीं आता। हालांकि मैं जानता हूँ कि जिसदिन सुकारू कविता समझने लगेगा उसे भी ये साहित्यकार “विदेशी” ही नजर आयेंगे।

कितनी अचरज की बात है कि भ्रामक सोच और अधकचरे लेखक एक आध विदेशी पुरस्कार पा कर स्वनामधन्य “बस्तर विशेषज्ञ” हो जाते हैं। कुछ एसे भी लेखक हैं रायपुर तक फ्लाईट से पहुँचने के बाद उनकी कार चलती है और दंतेवाडा के किसी अनवासी-वनवासी आश्रम तक पहुँच कर लौटती है। तुरंत अंग्रेजी की किताबे “मैन्युफैक्चर” होने लगती हैं। कोई गुंडाधुर की तलाश में आता है और “किशन जी” को खोज निकालता है। एक दिल दुखाने वाली घटना और हुई इस बीच। जगदलपुर में एक बुकस्टॉल पर जब मैंने बस्तर के आदिम जीवन पर लिखा गया साहित्य तलाशा तो मुझे एक कहानी संग्रह “मैं जीती हूँ” जिसके कहानीकार कालेश्वर हैं थमा दी गयी। रात जब मैने पुस्तक को पढना आरंभ किया तो महसूस हुआ यह तो “झारखंड के आदिम जीवन को बंदूख थामने की राह दिखाने वाली कहानियों” का संग्रह है। फिर मैंने जान बूझ कर दंतेवाडा से ले कर कांकेर तक के कई पुस्तकालयों में बस्तर के आदिम जीवन पर लिखी गयी पुस्तकों की माँग की और हर एक नें मुझे यही पुस्तक थमायी। बस्तर के साहित्यकार जब तक “वह” पत्थर तोडते रहेंगे बस्तर की बात का धोखा दे कर झारखंड की कहानिया ही ठेली जायेंगी। यह सच्चाई “तथाकथित” समकालीन बस्तरिया लेखकों पर व्यंग्य अवश्य है।

लेकिन इस अंधेरे में बस्तर अब भी साँस लेता है, जाग रहा है, साधना रत है और संस्कारवान भी। बस्तर “हाँथी चले बजार” में यकीन रखता है और वह जानता है कि बडे बडे समाजशास्त्री और तथाकथित “बुद्धिजीवियों” के लिये वह “अंधों का हाँथी” ही है। बस्तर जानता है कि उसकी पहचान बनाये रखने के लिये दण्डक वन का ऋषि लाला जगदलपुरी 91 वर्ष की उम्र में भी अनवरत लिख रहा है इस लालच से दूर कि उसे बुकर, मैग्सेसे, ज्ञानपीठ या पद्मश्री मिलेगा। बस्तर क्या है यह बस्तरिया लाला जगदलपुरी की “हल्बी” में लिखी गयी पंक्तिया कहती खुद कहती हैं –

धन धन बस्तर मायँ धरतनी
तुचो मयाँ चो छायँ, ए धनी!!
भारत देस भुईं चो मांटी
कुडई, कुंद, झुईं चो मांटी
जै जै माता बस्तर मांटी।

[अनुवाद – धन्य धन्य बस्तर की धरती माते! तेरी ममता की छांव धन्य है। भारत देश की भूमि-मिट्टी, कुडई, कुन्द, झुई की मिट्टी। जय जय माता बस्तर माटी]

लाला जगदलपुरी की इन पंक्तियों के गहरे मायने हैं। वे स्वयं भी बस्तर की पहचान हैं तो उन्होंने कई साहित्यकारों को भी बुना जिनमें धनन्जय वर्मा, गुलशेर अहमद खाँ “शानी” और हरिहर वैष्णव प्रमुख हैं। लेखन में “शालवनों के द्वीप” की परम्परा को लाला जगदलपुरी के जलाये दीपक के प्रकाश में आगे बढाने का कार्य एक और बस्तरिया लेखक शोरगुल, प्रचार प्रसार से दूर खामोशी से कर रहा है वह है – हरिहर वैष्णव

हरिहर वैष्णव के लिये लाला जगदलपुरी कहते हैं “नयी पीढी से निराशा हाथ लगने के बावजूद नयी पीढी में अप्रत्याशित रूप से कुछ एसे प्रतिभा सम्पन्न और उल्लेखनीय चरित्र मिल ही जाते हैं, जिनकी रचनात्मक सक्रियता पर गौरव होता है---जिनकी तरुणाई में चिंतन की प्रौढता पायी जाती है और जो प्राय: प्रौढों और वयोवृद्धों के चिंतन संगी हुआ करते हैं। उन्हीं में एक नाम हरिहर वैष्णव का भी प्रभावित करता है।.....।इन दिनों बस्तर लेखन एक फैशन की तरह चला हुआ है। तथ्यों की प्रामाणिकता का अभाव आपत्तिजनक नहीं माना जाता। बस्तर लेखन की इस विडम्बना से हट कर भी कतिपय रचना कर्मी बस्तर विषयक सृजन कर्म में लगे हुए हैं, इन में हरिहर वैष्णव का तथ्यात्मक लेखन अपनी अलग पहचान देता है।“

हरिहर वैष्णव का जन्म 19 जनवरी 1955 को दंतेवाडा (बस्तर) में हुआ। आपके पिता का नाम श्यामदास वैष्णव तथा माता का नाम जयमणि वैष्णव है। आप हिन्दी साहित्य में स्नात्कोत्तर हैं। आप मूलत: कथाकार एवं कवि हैं साथ ही आपने साहित्य की अनेकों विधाओं में कलम चलाई है।

आपने न केवल बस्तर की पवित्र माटी में जन्म लिया बल्कि इसे जिया, इस पर गहरा शोध भी किया। बस्तर की साहित्यिक सांस्कृतिक परम्पराओं पर आपके आलेख प्रामाणिक और अंतिम हैं। आपकी प्रमुख कृतियाँ हैं – मोहभंग (कहानी संग्रह), लछमी जगार (बस्तर का लोक महाकाव्य), बस्तर का लोक साहित्य (लोक साहित्य), चलो चलें बस्तर (बाल साहित्य), बस्तर के तीज त्यौहार (बाअ साहित्य), राजा और बेल कन्या (लोक साहित्य), बस्तर की गीति कथाएँ (लोक साहित्य), धनकुल (बस्तर का लोक महाकाव्य), बस्तर के धनकुल गीत (शोध विनिबन्ध)। इतना ही नहीं आपने बस्तर की मौखिक कथाए (लोक साहित्य) के अलावा घूमर (हल्बी साहित्यिक पत्रिका), प्रस्तुति, (लघुपत्रिका), एवं ककसाड (लघु पत्रिका) का सम्पदन भी किया है।

किशोरावस्था से ही आरंभ हो कर बस्तर की परम्पराओं और संस्कृति को उत्कृष्ट दस्तावेज बनाता आपका लेखन अनवरत जारी है। वर्तमान में बस्तर पर केन्द्रित पाँच पुस्तकों पर आप कार्य कर रहे हैं। आपने लाला जगदलपुरी के जीवन और कार्यों को भी पुस्तकबद्ध करने का दायित्व उठाया है। आपने सांस्कृतिक आदान प्रदान कार्यक्रम के अंतर्गत ऑस्ट्रेलियन नेशनल युनिवर्सिटी के आमंत्रण पर 1991 में ऑस्ट्रेलिया, लेडिग-रोव्होल्ट फाउंडेशन के आमंत्रण पर 2000 में स्विट्जरलैंड तथा दी राकेफेलर फाउंडेशन के आमंत्रण पर 2002 में इटली नें बस्तर का प्रतिनिधित्व किया। इतना ही नहीं आपने स्कॉटलैंड की एनिमेशन संस्था “हाईलैंड एनिमेशन” के साथ मिल कर बस्तरिया लोक भाषा हल्बी की पहली एनिमेशन फिल्म का निर्माण किया।

आपको छतीसगढी हिन्दी साहित्य परिषद से “स्व. कवि उमेश शर्मा सम्मान (2009) तथा दुष्यंत कुमार स्मारक पाण्डुलिपु संग्रहालय, भोपाल द्वारा वर्ष 2010 के लिये “आंचलिक साहित्यकार सम्मान” प्राप्त है” यहाँ मैं यह भी कहना चाहूंगा कि अपने निरंतर किये जा रहे शोध कार्यों एवं लेखन के द्वारा आपने जो स्थान बस्तर और इसके बाहर भी हृदयों में हासिल किया है वह सम्मान अनमोल है। आप वर्तमान में सरगीपारा, कोंडागाँव (बस्तर) में अवस्थित हैं।

उपसंहार के लिये पुन: भूमिका में अधूरी छोडी गयी बातों का संज्ञान लेते हैं। बस्तर की पहचान बारूद और बंदूख नहीं है। बस्तर किसी किशन जी, किसी गणपति, किसी वरवर और किसी अरुन्धति का नहीं है। बस्तर की अपनी आवाज है, पहचान है, ध्वनि है। कान लगा कर सुनिये – बस्तर बोल रहा है।

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यह “साहित्य शिल्पी” के लिये उपलब्धि है कि बस्तर के इस कलमसेवी नें “बस्तर बोल रहा है” स्तंभ को इस ई-पत्रिका के लिये लिखने की स्वीकृति दी है जिसमें इस क्षेत्र की विविधता यहाँ की संस्कृति, साहित्य तथा कला पर बात होगी। "बस्तर बोल रहा है" स्तंभ हर माह की 16वी तथा 27वी तिथि को प्रस्तुत किया जायेगा। आईये जाने बस्तर को हरिहर वैष्णव की कलम से...। आईये सुनें कि बस्तर बोल रहा है।

22 comments:

  1. हरिहर वैष्णव जी के विषय में जान कर प्रसन्नता हुई। यह लेख विचारोत्तेजक है अय्र कई सवाल भी उठाता है। बस्तर को जानने की कोशिश अवश्य करूंगी और इसके लिये मुझे बस्तर बोल रहा है कि प्रतीक्षा रहेगी।

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  2. I agree that - लेकिन इस अंधेरे में बस्तर अब भी साँस लेता है, जाग रहा है, साधना रत है और संस्कारवान भी। बस्तर “हाँथी चले बजार” में यकीन रखता है और वह जानता है कि बडे बडे समाजशास्त्री और तथाकथित “बुद्धिजीवियों” के लिये वह “अंधों का हाँथी” ही है।

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  3. यह तो सोचना ही पडेगा कि जिस बस्तर में लाला जगदलपुरी हैं हरिहर वैष्णव है वहाँ चर्चा अरुन्धति के लेख पर होती है। बस्तर के भीतर और बस्तर के बाहर के गैप को समाप्त करने पर शायद इस घने जंगल की समझ देश विदेश तक पहुचेगी।

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  4. बस्तर पर प्रमाणिक साहित्य प्रणयन में लगे हरिहर वैष्णव जी का स्वागत है ,वे प्रशंसनीय काम कर रहे हैं !

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  5. प्रामाणिक जानकारी का अभाव है। हरिहर वैष्णव के काम को प्रणाम।

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  6. यह जानकर मुझे कितनी प्रसन्‍नता है मैं व्‍यक्‍त नहीं कर सकता, लेकिन मैं जानता हूं कि मेरी प्रसन्‍नता बढ़ती ही जाएगी और लोग भी जान सकेंगे हरिहर-खेम के माने क्‍या हैं. हरिहर जी के जगार और हल्‍बी वाचिक परंपरा वाले काम, जो वे कर चुके हैं वह तो अद्भुत हैं ही आगे उनके माध्‍यम से जो आने की संभावना है उसके क्‍या कहने, अभी से रोमांचित हो रहा हूं..

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  7. हरिहर लिखेंगे तो बस्तर जरूर बोलेगा..अग्रिम बधाई।

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  8. हरिहर वैष्णव जी के विषय में जान कर अच्छा लगा...
    "बस्तर बोल रहा है" का इंतज़ार रहेगा

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  9. केवल परिचय नहीं दिया आपने परिचय को जस्टीफाई भी किया है।

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  10. हरिहर वैष्णव जी का स्वागत है और व्यग्रता से उन्हें पढ़ने की व्यग्रता है...कि वो बस्तर के विषय में कैसे विचार रखते हैं...आभार...

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  11. मित्रवर राजीव जी !

    आप बस्तर के यथार्थ स्वरूप को सामने लाते हुये साहित्य के साथ साथ सम्पूर्ण देश को द्ण्डकारण्य के सवालों से रूबरू कर रहे हैं. यह सभी प्रश्न समस्त जागरूक अंतस को विचलित कर अपने से जोड़ सकने में सक्षम हैं

    हरिहर जी के परिचय के आलोक में उठाये गये इन सवालों की प्रासंगिकता आजादी ... अथवा तथाकथित स्वराज के दशकों बाद भी है.... कौन देगा इन प्रश्नों के उत्तर ..... मैं स्वयं इन सवालों की पीड़ा चुभन अंतस में गहरे भेदती हुयी अनुभव कर रहा हूं . सम्पूर्ण राष्ट्र को अपनी लेखनी के माधय्म से सोचने को विवश करते हुये आप बस्तर से जोड़ने का कार्य कर रहे हैं.

    साधुवाद

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  12. sanch ka aaina shyd log n jhel payen pr schchai chhupegi nhi samne aayegi hi
    aap ne yh bda kam kiya hai
    sadhuvad

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  13. harihar vaishnav ek gambheer lekhak hai. mai unhe varsho se janataa hoo, jab mai ek akhabaar me sahity sampadak hua karata thaa. ve sachche mai-putra hai.

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  14. Shri Vaishnav ji ko aur padne ki jigyasa jag rahi hai. Har vidha par kalam chalane mein dakshata jinke paas ho vo sahitya ke bhandhar apne ander samohit kar paane mein saksham hai. Ukeeta se padne ki iccha ..barkarar hai!

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  15. राजीव भाई हरिहर वैष्णव जी के विषय में जानकारी देकर आपने अच्छा काम किया।

    साधूवाद

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  16. राजीव जी, हरिहर वैष्णव जी के विषय में जानकारी देकर आपने बहुत अच्छा काम किया है |"बस्तर बोल रहा है" का इंतज़ार रहेगा | आभारी हूँ जो आप यह स्तम्भ शुरू कर रहे हैं | मुझे भी बहुत कुछ जानने को मिलेगा |
    सुधा ओम ढींगरा

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  17. हरिहर वैष्णव जी हमारे बस्तर की पहचान है, उनपर आधरित राजीव जी का आलेख प्रेरना देने वाला है.
    dhnyavad

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  18. - राजीव रंजन प्रसाद जी,



    साहित्य शिल्पी में भाई हरिहर वैष्णव जी के बारे में पढा बहुत अच्छा लगा , बस्तर पर भोपाल और दिल्ली में बैठकर लिखनेवाले बहुत हैं पर बस्तर को जीने वाले , उसे सहेजने वाले भाई हरिहर जी हैं ..उनकी बैटन से मैं सहमत हूँ की बस्तर को गोली की नहीं बोली की जरुरत है.... आपने बहुत ही अच्छा प्रयास किया है , मेरा आपको साधुवाद

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  19. बस्तर का सच्चा और स्वच्छ चेहरा(मीडिया अपनी तरफ से झूठ, बरबोलेपन और कथित बौद्धिकता का मेक-अप डाल देती है) आमजन तक पहुँचे.. यही कामना है मेरी। लाला जी के बाद हरिहर जी को जानना और फिर यह जानना कि हरिहर जी हमसे नियमित तौर पर मुखातिब रखेंगे.. हमारे लिए एक बहुत बड़ी खुशखबरी है। राजीव जी और पूरी साहित्य-शिल्पी टीम का हृदय से आभार और सबको ढेर सारी शुभकामनाएँ!

    हम आपकी इस मुहिम में सहभागी होंगे... यकीनन!!

    -विश्व दीपक

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