गुप्त साम्राज्य को भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग माना जाता है और इसके लिये सम्राट समुद्रगुप्त के साम्राज्य और उनके कार्यों का महत्वपूर्न योगदान है। प्रस्तुत काव्यकृति भारतीय इतिहास के इसी महान व्यक्तित्व को उद्घाटित करने वाली एक महत्त्वपूर्ण कृति है। इस पुस्तक में समुद्रगुप्त के साम्राज्य विस्तार और उनके महत्वाकांक्षी अभियानों का ऐतिहासिक तथ्यों एवं प्रमाणों के साथ सिलसिलेवार ढंग से अत्यन्त रोचक शैली में कविताकरण किया गया है। इस काव्य कृति के माध्यम से गुप्त कालीन सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक स्थितियों का सजीव चित्रण सहज ही पाठक के मानस पटल पर अंकित हो जाता है।

इस खंडकाव्य में सम्राट समुद्रगुप्त के कार्यों से लेकर उनके जीवन के अंतिम क्षणों तक की घटनाओं के माध्यम से उनके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं, उनकी असाधारण विजय, अद्भुत रणकौशल, प्रशासनिक एवं कूटनीतिक दक्षता, व्यवहार कुशलता, आखेट प्रियता, प्रजा-प्रेम, न्याय प्रियता आदि के बारे में दुर्लभ जानकारी मिलती है। यह काव्यकृति पाठकों को चक्रवर्ती सम्राट समुद्रगुप्त के संगीत, कला और सौंदर्य उपासक व्यक्तित्व की इन्द्रधनुषी छटा के विभिन्न रंगों सराबोर होने का भी सुअवसर प्रदान करती है।

वीरान भूमि में दौडते हुए घुडसवारों के पीछे से उगता हुआ सूरज इस काव्यग्ंथ का मुखपृष्ठ है जो अपने आप में पुस्तक की कवितावस्तु बताता है। यह काव्यग्रंथ, बस्तर भारती प्रकाशन, राजमहल परिसर, जगदलपुर (बस्तर), छतीसगढ से प्रकाशित है। कवि नें बिना कोई भूमिका बाँधे अथवा सम्राट समुद्रगुप्त का काव्यात्मक परिचय देते हुए अपनी बात आरंभ कर दी है। इस काव्यकृति का महत्व समझने के लिये अतीत तक पहुँचना होगा।

कविताओं नें ही हजारों वर्षों तक इतिहास को जीवित रखने का कार्य किया है। पीढी दर पीढी इतिहास इस लिये भी पहुँचता रहा चूंकि कविता सुग्राह्य होती थी और उसके भीतर के रस छंद और अलंकार सुनने वाले को विभोर कर देते थे। हालांकि इसके साथ किसी विवरण के अतिश्योक्ति हो जाने जैसी बडी खामी भी सन्निहित थी। दरबारी कवियों, चारणों और भाटों नें भी एक खास तरह की कविता अपने राजा का गुणगान करते हुए की है, जिनमें इतिहास निचोडने के बाद ही मिलता है, अधिकतम तो वाहवाही और जी-हुजूरी भरे छंद ही हैं। समय के बदलने के साथ ही इतिहास और कविता नें एक दूसरे की ओर पीठ कर ली। डॉ. के. के. झा की यह काव्य-कृति इस मायने में महत्व की है कि एक इतिहासकार नें कविता की है। इस पुस्तक में प्रामाणिक इतिहास है और स्तरीय कविताई है। यह किताब केवल अतीत का तानाबाना नहीं बल्कि वर्तमान को समुचित राह भी देती है –

इतिवृत्त के पृष्ठों में जब, वर्तमान खो जाता है,
युगों युगों का सारा अंतर, क्षण भर में मिट जाता है।

कविता में तिथियों और घटनाओं को पिरोना कठिन कार्य है। कई स्थलों पर कवि नें संबंधित घटना की तिथि का अलग से उल्लेख किया है। चन्द्र गुप्त के बाद समुद्र गुप्त का शासनकाल 335 से 375 ईस्वी पश्चात का है। इसका अलग से उल्लेख करते हुए कवि नें समुद्र गुप्त के राज्यारोहण का मनोरम दृष्य उपस्थित कर दिया है –

तुमुल हर्श ध्वनि सभा कक्ष में, गूंज उठी थी बारम्बार,
नृपति चंद्र एवं समुद्र की, बहुत हुई फिर जय जय कार।

कविता कम शब्दों में समुद्रगुप्त के राज्यारोहण के पश्चात की राजनीतिक उथलपुथल का विवरण देती है। समुद्रगुप्त का ज्येष्ठ भ्राता काच किस तरह महत्वाकांक्षी हो उठा और उसने अपने नाम की स्वर्ण मुद्रायें तक प्रचलित करवा दी आदि घटनाओं को पूरी बिम्बात्मकता से कवि नें प्रस्तुत किया है। डॉ. झा नें सम्राट समुद्रगुप्त की प्रधान रानी दत्त महादेवी का वर्णन करते हुए बिम्बों को मुक्त हृदय से अपने शब्दों में निछावर किया है। रानी की बुद्धिमत्ता और युद्धकौशल आदि को भी कवि नें सजीव कर दिया है –

चन्द्रमुखी थी राज्ञी जब कि स्वर्ण-रत्न द्युति, तारक गण थे
राज्ञी के मुखमंडल सम्मुख, फीके सारे अलंकरण थे।
युद्धों में जब समुद्र गुप्त नृप व्यस्त रहा करते अत्यंत
राज्य कार्य संचालित करती राज्ञी नृप आने पर्यंत।

अपने इतिहास ज्ञान को पद्य रचना करते हुए डॉ. झा नें सर्वोपरि रखा है। जब वे समुद्रगुप्त की शक्ति और उसके सामर्थ्य की बात करते हैं तो सेना के अंगों और उसकी विषेशताओं का वर्णन भी बारीकी से करते हैं। युद्ध में इस्तेमाल होने वाले वाद्य यंत्र और उनके प्रभावों को ये पंक्तियाँ कितनी सहजता से प्रस्तुत करती हैं: -

पटह तूर्य भेरी तुरही थे, मुरज शंख मांदर मृदंग थे,
घंटा वंशी झांझ मंजीरे, भिन्न भिन्न वादित्र संग थे।
तुमुल नांद से दसो दिशायें, गूंजा करती थी रह रह कर,
सैनिक वीरों की नस नस में, ज्वाला सी उठती ठहर ठहर।

सम्राट समुद्रगुप्त को कविता में प्रस्तुत करते हुए डॉ. झा नें इस बात का यत्न किया है कि रोचकता बनी रहे और उनकी कृति न तो नीरस इतिहास बने न ही बोझिल खंडकाव्य। इस उद्देश्य से वे घटनाओं को जीवित भी करते चलते हैं। हाँथी घोडों से सजी विशाल सेना किसी नगर से गुजर रही हो और प्रत्यक्शदर्शी उत्साहित हैं और उद्दंड भी –

कुछ मनचले युवक, बाल तब हस्ति, अश्व को बिदका देते,
ढोल-ढमाका बजा बजा कर हँस हँस लोट पोट हो जाते

---

बडा कुतुहल होता था फिर, देख विशाल सैन्य अभियान
सुदृढ मगध राज्य पर उनको होता था अतीव अभिमान।


एक इतिहासकार के अनुभव का लाभ उठाती यह काव्यकृति किसी सैनिक अभियान का पूरा विश्लेषण प्रस्तुत करती है कि किस तरह एक सेना कूच करती है। किस तरह मार्ग में भोजनादि की व्यवस्था की जाती है। किस तरह किसी आक्रमण की योजना बनती है और उसका क्रियांवयन होता है। काव्य कृति बहुत बारीकी से समुद्रगुप्त का संपूर्ण विजय अभियान प्रस्तुत करती है जिसमें समुद्रगुप्त की उत्तर भारत पर विजय, या कि अन्य बडे साम्राज्यों पर जीत जिनमें आटविक राज्य, दक्षिणापथ अभियान, दक्षिण कोसल, महाकान्तार, एरण्डपल्ल, गिरिकोट्टूर, पिष्ठपुर, देवराष्ट्र, अवमुक्त, वेंगी विजय, पालक्क, कांची, कुस्थलपुर, कौराल, पश्चिमी सीमांत के गणराज्यों पर विजय, समतट विजय, डवाक, कामरूप, नेपाल विजय, कर्तृपुर पर विजय, समुद्रगुप्त का उत्तर पश्चिम भारत के विरुद्ध अभियान, देवपुत्र षाहिषाहानुषाहि से सम्बंध, शक छत्रप से संबंध आदि प्रमुख सामरिक कदमों की विवेचना एवं महत्व की घटनाओं का विस्तार से वर्णन है। यही नहीं किसी भी विजय अभियान का काव्यवर्णन करते हुए देश काल और परिस्थितियों को भी उन्होंने सामने रखा है। महाकांतार के विवरण की कुछ पंक्तियाँ –

विशाल वन प्रांतर आवेष्ठित दण्डक वन में था यह राज्य
गुरु शुक्राचार्य श्राप से कभी हुआ था निश्चित त्याज्य।
समय फिरा फिर इस अरण्य का, रघुपति का जब हुआ आगमन
उनके अध्भुत वीर कृत्य से, राक्षस रहित हुआ था यह वन।

इतना ही नहीं युद्ध के दृश्य कविता में जैसे सजीव हो उठे हैं। समुद्र गुप्त के वेंगी विजय के दृष्टांत की कुछ पंक्तियाँ –

इधर देश वेंगी के योद्धा, लगे उडेलने सतत निरंतर
बहुत खौलता तेल और जल, सीढी पर चढते वीरों पर
कई वीर गिर गये, मर गये, तेल और जल से जल गये
और वहीं कुछ शीतल जल के तल में जा कर बैठ गये

कुछ पंक्तियाँ समतट विजय से –

शोणित की सरिता बह निकली, क्षण क्षण में पट परिवर्तन था
गृद्ध श्रृगाल काक श्वान संग रणचंडी को आमंत्रण था।
अश्व और जग तडप रहे थे, घायल थे कुछ मरे पडे थे
तुरग सारथी रथी सहित रथ, यत्र तत्र सर्वत्र खडे थे।
कुछ क्षण पहले जो जीवन का मोह त्याग युद्ध में रत थे
जीवन भी उनको त्याग गया, वे प्राण त्याग क्षत-विक्षत थे

डॉ. झा नें समुद्रगुप्त की स्वर्ण मुद्राओं का जिस तरह से काव्य प्रस्तुतिकरण किया है उसे असंभव को संभव बनाना कहा जा सकता है। मुद्राओं का सजीव वर्णन और उनसे जुडी कहानियों का साथ ही उल्लेख भी –

छ: प्रकार की सुवर्ण मुद्रा नृप समुद्र नें प्रचलित की थी
बल वैभव का प्रतीक तो थी पर मूल भावना जनहित की थी
इसकी एक स्वर्ण मुद्रा में उसके गुण का है उल्लेख
“कृतांत परशुर्जयत्यजित राज जेता जित:” अंकित है लेख।
मानो धारणकर्ता वह था यमराज परशु का स्वयं अजित
एसे नृपगण को जीता था जो पूर्व कभी थे नहीं विजित।

इतिहास पर पैनीदृष्टि रखते हुए डॉ. झा जहाँ समुद्र गुप्त द्वारा किये गये अश्वमेध यज्ञ का वृतांत प्रस्तुत करते हैं वही सम्राट के प्रशासन, उनकी राज्य सभा, धार्मिक मान्यताओं तथा नगर प्रबंधन पर भी जानकारी अपने खंडकाव्य के माध्यम से उपलब्ध कराते हैं। -

कहीं बडी चूक होती तो, कार्य मुक्त हो जाते थे
कोई बडा कार्य करने पर पुरस्कार भी पाते थे

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अपवादों को छोड कहीं भी भ्रष्टाचार नहीं था
अन्याय और उत्कोच नहीं था अत्याचार नहीं था

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बौद्ध धर्म के चैत्य स्तूप या वैदिक मंदिर, जैन-जिनालय
कई जगह बनते रहते थे, था गुप्त काल धर्मास्थामय

डॉ. के के झा नें सम्राट समुद्र गुप्त के समय के पाटलीपुत्र का आकर्षक चित्र खींच दिया है। एक चक्रवर्ती सम्राट की राजधानी निश्चित ही एसी ही मनोरम रही होगी। समुद्रगुप्त कालीन समाज तथा शिक्षा पर काव्य कृति समीक्षात्मक विवरण प्रस्तुत करती है –

ग्राम याकि कुछ भूमि दान में, पाते थे अनेक विद्वान
पूजा पाठ पठन पाठन को, फैलाने को विस्तृत ज्ञान।
ताडपत्र या ताम्र पत्र पर दान पत्र अंकित होते थे
यदा कदा प्रस्तर खंडों पर भी ये टंकित होते थे
करमुक्त हुआ करते थे निश्चित सभी भांति एसे सब दान
शिक्षा के विस्तार हेतु थे बहुत बडे सार्थक अवदान

कुछ पृष्ठ चन्द्रगुप्त (द्वितीय), चन्द्रगुप्त द्वारा प्रकृति अवलोकन, चन्द्रगुप्त की नागवंशीय पत्नि कुबेर नागा, हरिषेण आदि के विवरण से संबंधित हैं। कुछ अन्य महत्व के प्रखंड जिनमें मगध राज्य वर्णन, जन वर्णन, वन वर्णन, मेला, कृषि आदि की स्थिति आदि को कविता के माध्यम से दर्शाते हुए डॉ. झा कवि से इतिहासकार अधिक नजर आते हैं। समुद्रगुप्त की महिमा या समुद्रगुप्त की देवतादि से तुलना, अथवा सिंहल नृप से मैत्रि संबंध की विदेश नीति जैसे विवरण तत्कालीन राजनीतिक परिवेश के साथ साथ राजा के निजी जीवन की झलकिया भी प्रस्तुत करते हैं –

जिन हाँथों में वीणा होती, उनमें फिर होता धनुष वाण
वीणा जीवन संगीत सुनाती, वाण शत्रु के हरते प्राण।
जिस तरह कृष्ण के कर कमलों में, वंशी थी चक्र सुदर्शन था,
उसी तरह समुद्र नृप कर में, जीवन और मरण भी था।

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समुद्र गुप्त जब वीणा ले कर, संध्या काल छेडते तान
नीडों को लौट रहे पंछी भी रुक जाते सुनने को गान

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रचना हुई विविध ग्रंथों की भू रचना, भूगोल ज्ञान की
समुद्र-यात्रा, कला चिकित्सा, विविध विषय विज्ञान की।

समुद्रगुप्त की वृद्धावस्था एवं सम्राट समुद्रगुप्त का आत्मकथन जैसे प्रखंडों में कवि इतिहासकार पर हावी हुआ है। सब कुछ पा कर जब वृद्धावस्था में सम्राट स्वयं को रिक्त हाँथ महसूस करते हैं तो संसार की निस्सारता का आध्यात्म कविता से निखर कर आता है।

सबकुछ त्याग हेतु तत्पर हूँ, मैं सम्राट आज असहाय
मृत्यु निकट है जिसकी आहट सुनता हूँ बैठ निरुपाय।

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फिर मैंने क्यों किया सभी कुछ? क्या अहंकार की तुष्टि हेतु?
या सत्ता की भूख मिटाने? अथवा संप्रभुता की पुष्टि हेतु?

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क्यों बनें सैंकडो राज्य यहाँ? किसने खींचीं सीमाएँ?
क्यों सब आपस में लडते हैं? क्यों बाँटी सभी दिशाएँ?
लक्ष-लक्ष लोगों के शव पर हम साम्राज्य खडा करते हैं
यह विडम्बना कैसी फिर भी हम महान कहलाते हैं?

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फिर क्या सब संघर्ष व्यर्थ है, क्या इन सबका कुछ नहीं अर्थ है?
क्या युद्धों में ही अनर्थ है, या इनके कुछ निहित अर्थ है?

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यहि कि इस शास्वत वसुधा पर, नहीं किसी का है अधिकार
जो मिट्टी में मिल जाते हैं उनका फिर कैसा अहंकार

सम्राट समुद्रगुप्त के जीवन व कार्यों की कई परते खोलती इस पुस्तक में तथ्यात्मकता बहुत है तथा ज्ञान संग्रहण की दृष्टि से किसी भी पुस्तकालय की शोभा हो सकती है। यद्यपि जो बात सर्वाधिक खटकती है वह है इसकी विवरणात्मकता। सम्राट स्कंदगुप्त को स्वयं पात्र बना कर अथवा अनेको पात्रों के माध्यम से यदि कहानी कही जाती तो वह पाठकों को बाँधने में अधिक सक्षम हो सकती थी। इतिहासकार कवि नें प्रत्येक घटना को एक शीर्षक दे कर कविता में उसका विस्तार दिया है। मैं इसे नूतन प्रयोग भी कहूँगा।

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कृष्ण कुमार झा - एक परिचय
डॉ. के. के झा शिक्षा, संस्कृति, पर्यटन, इतिहास, नृतत्वशास्त्र, पुरातत्व, पर्यावरण, विधि एवं साहित्य के शीर्षस्थ विद्वान हैं।

डी.लिट एवं पाँच विषयों में पी. एच. डी सहित आप सत्रह विषयों में स्नात्कोत्तर है। आपकी शैक्षणिक उपलब्धियों के कारण आपका नाम लिमका बुक ऑफ रिकॉर्डस -2009 में दर्ज किया गया है।

आपने केन्दीय विद्यालय संगठन में सहायक आयुक्त के पद के अलावा अनेक महाविद्यालयों में प्राचार्य एवं विश्वविद्यालय में उपकुलपति जैसे पदों को सुशोभित किया है।

आपकी अनेक पुस्तकें इतिहास, पर्यावरण, शिक्षा, विधिशास्त्र, साहित्य आदि पर प्रकाशित हुई हैं।

आप वर्तमान नें जगदलपुर (बस्तर) में अवस्थित हैं।

10 comments:

  1. समीक्षा पढ कर पुस्कर को पढने जैसा अहसास हुआ। सम्राट सकंदगुप्त पर यह खंडकाव्य साहित्य को देन सिद्ध होगा। डॉ. के. के. झा को बधाई।

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  2. इस समीक्षा को पढ कर इस बात की खुशी हुई कि इन विषयों को ले कर अभी भी कोई कविता लिख रहा है। राजीव जी नें निचोड कर समीक्षा की है।

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  3. उपसंहार में पुस्तक को समझने का सूत्र है - सम्राट स्कंदगुप्त के जीवन व कार्यों की कई परते खोलती इस पुस्तक में तथ्यात्मकता बहुत है तथा ज्ञान संग्रहण की दृष्टि से किसी भी पुस्तकालय की शोभा हो सकती है। यद्यपि जो बात सर्वाधिक खटकती है वह है इसकी विवरणात्मकता। सम्राट स्कंदगुप्त को स्वयं पात्र बना कर अथवा अनेको पात्रों के माध्यम से यदि कहानी कही जाती तो वह पाठकों को बाँधने में अधिक सक्षम हो सकती थी। इतिहासकार कवि नें प्रत्येक घटना को एक शीर्षक दे कर कविता में उसका विस्तार दिया है। मैं इसे नूतन प्रयोग भी कहूँगा।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुंदर...
    एक एक पंक्ति ने मन मोह लिया...छन्दस कविताएँ देखने को भी नहीं मिलतीं...और यहाँ तो एक से एक सुंदर छंद...आहा......

    राजिव जी आपका आभार...जो आपने इस पुस्तक की चर्चा यहाँ की...

    गीता .

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  5. सुन्दर समीक्षा जैसे पूरी किताब ही सामने आ गयी हो।

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  6. डॉ.के.के. झा जी को पडने का अवसर मुझे मिला है , उन्है पड हमेशा kuch adhayan avam lekhan kee prerana milti hai uprokt grantha bhi maine padha, Dr sahab is umar mai bhi Padate avam likhate hai

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  7. Antarjaal par Bastar ke tisare shabd-shilpii ko padhne kaa sukh kuchh alag hii hai. Udbhat widwaan, Itihaaskaar aur Shikshaa-shaastrii aadarniiy Dr. K. K. Jha jii ka yah kavi ruup bhii gazab hii dhaataa hai.
    Aadarniiy Raajiiv Ranjan jii, Bastar ke shabd-shilpiyon kii rachnaaon ko jis tarah ek-ek kar saamne laane kaa aap apani team ke saath mil kar prayaas kar rahe hain, uske liye mere paas uplabdh prashanshaa ke saare shabd riit gaye hain. Bas, samajh liijiye ki main aap logon kaa bhakt ho gayaa hun.
    Aap chaahenge to mere paas uplabdh kuchh aur shabd-shilpiyon kii Halbi-Bhatri kavitaayein main aapkoo unke Hindii anuwaad ke saath uplabdh karaa sakuungaa. Thodii sii sewaa mujhe bhii karane kaa awasar mil jaaye to dhany ho jaaungaa.
    Meraa ek sujhaaw hai: shabd-shilpiyon ke saath-saath any (hast) shilpiyon se bhii paathakon ko parichit karaa sakein to aur aanand aa jaayegaa.

    Saadar,
    Harihar Vaishnav

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