उत्तरशती के पूर्व अर्थात उन्नींस सौ पचास ई0 के पूर्व लघुकथा की वस्तुस्थिति क्या रही है?

बलराम अग्रवाल- हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखते हुए स्वयं द्वारा निर्धारित काल-विभाजन के औचित्य को स्पश्ट करते हुए आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है कि विभाजन काल-विषेश के दौरान लिखित रचनाओं की केन्द्रीय प्रवृत्ति के मद्देनजर किया गया है। अर्थात् जिस समय-अन्तराल में भक्ति-भावना की रचनाओं की अधिकता देखी गई उसे ‘भक्तिकाल’ कहा गया। इस दृश्टि का अनुसरण करें तो यह कहने में किसी प्रकार का संकोच नहीं होना चाहिए कि 1970 से पूर्व की लघ्वाकारीय कथा-रचनाएं ‘लघुकथा’ हैं और उसके बाद यानी सन् 1971 से अद्यतन लिखी जा रही लघ्वाकारीय कथा-रचनाएं ‘समकालीन लघुकथा’ की श्रेणी में आती हैं। अतः कहानी के आकलन की भूमि से उधार लिया गया ‘उत्तरशती’ शब्द लघुकथा की विवेचना पर ज्यों का त्यों फिट नहीं बैठता है।

सन् 1970 से पूर्व की लघुकथा को उसकी बहुलता में देखें तो स्पश्टतः या तो यह दृश्टांत- बोध-उपदेश की मुद्रा में खड़ी दिखाई देती है या भावबोध की मुद्रा में। प्रेमचंद ‘राश्ट्र का सेवक’ की परम्परा को आगे नहीं बढ़ा पाए। माधवराव सप्रे हिन्दी के प्रसिद्ध पत्रकार रहे हैं। ‘एक टोकरीभर मिट्टी’ को पहली हिन्दी कहानी के रूप में उद्घाटित किया जाने से पूर्व उन्हें हिन्दी का उल्लेखनीय कथाकार शायद ही कभी माना गया हो। जहां तक एक ही कहानी के बल पर साहित्य में टिके रहने का सवाल है, उनके और गुलेरी जी के मध्य जमीन-आसमान का अन्तर है। चंद्रधर षर्मा गुलेरी की ‘उसने कहा था’ जैसी कलात्मक व्यापकता और साधारणीकरण की क्षमता ‘एक टोकरीभर मिट्टी’ में नहीं है। तात्पर्य यह कि लघुकथा-लेखन की आमजन के इहलोक से जुड़े त्रास और उससे मुक्ति के प्रयासों को स्वर देने की परम्परा का विकास करना उनका भी सपना कभी नहीं रहा। ऐसा लगता है कि पूर्व कथाकार लघुकथा में कुल मिलाकर ‘हारे को हरिनाम’ ही जपते-जपाते रहे।

सन् 1970 से पूर्व कथा-लेखन की लघुकथा-परम्परा को जी-जान से अपनाने वालों में कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’, आचार्य जगदीश चन्द्र मिश्र, सुदर्षन, अयोध्या प्रसाद गोयलीय, रावी, आनन्द मोहन अवस्थी, शरद कुमार मिश्र ‘शरद’, रामनारायण उपाध्याय आदि का नाम लिया जा सकता है लेकिन इनकी रचनाएं पढ़ने के उपरान्त यही पता चलता है कि ये सभी लोग मुख्यतः ‘लघुकथा’ की पुरातन धारा के ही वाहक हैं। एकाध रचना को छोड़कर इनके लेखन में समकालीन मानवीय त्रास के, उसकी मानसिक और दैहिक स्वाधीनता के न तो चित्र ही कहीं मिलते हैं न वैसे प्रयास। अगर मिलते भी हैं तो वे आदर्शपरक अन्त को प्राप्त हो जाते हैं गोया कि सारी धूर्तताओं, सारे दमन को नजरअन्दाज कर सामाजिकों में आदर्श स्थापित करना ही उनके लेखन का मुख्य उद्देश्य रहा है। अमानुशिक चरित्र के विरुद्ध वे उतरते भी हैं तो परलोकवादी हथियार के साथ। यह बात मैं उक्त काल की समूची लघुकथा के परिप्रेक्ष्य में कह रहा हूं, इक्का-दुक्का रचनाएं काल के समूचे लेखकीय चरित्र का प्रतिनिधित्व नहीं करती हैं।


नई कहानी के समानांतर लघुकथा की क्या स्थिति एवं प्रवृत्ति थी? स्वतत्रंता के बाद किस तरह के बदलाव एवं उनमें विमर्श मिलतें हैं ?

बलराम अग्रवाल- हिन्दी कहानी के क्षेत्र में ‘नई कहानी’ आंदोलन सन् 1950 के आसपास आया। उस काल में यद्यपि हरिशंकर परसाई आदि की व्यंग्यपरक लघुकथाएं प्रकाश में आईं जिनमें काल-सापेक्ष मनोवृत्तियों, परिस्थितियों और समस्याओं को केन्द्र में रखा गया था, लेकिन विशुद्ध व्यंग्य से अलग इस काल-सापेक्षता के दर्षन निरन्तर कथा-धारा के रूप में नहीं होते हैं। ‘नई कहानी’ का लक्ष्य ‘नये भाव बोध या आधुनिकता बोध पर आधारित जीवन के यथार्थ अनुभव का चित्रण’ माना जाता है। निष्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि लघुकथा एकजुट होकर कभी भी ‘नई कहानी’ के समांतर नहीं चली। स्वतंत्रता के बाद की लघुकथा में तत्कालीन सामाजिक बदलाव के मद्देनजर कहानी जैसा विमर्श आम तौर पर नहीं मिलता तो इसका बहुत बड़ा कारण यही नजर आता है कि समकालीन समाज के जीवन और मनोभावों को लघुकलेवर में कथात्मक अभिव्यक्ति देने का समय शायद वह नहीं था। नयी विधाएं यथेश्ट सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक दबावों के बिना न तो अंकुरित होती हैं और न ही पल्लवित-पुश्पित-कंटकित।

अकहानी के दौरान लघुकथा की क्या स्थिति दिखलायी देती है ? इस दौर के लघुकथाओं में कैसी प्रवृत्तियॉ एवं विमर्ष विन्दु मिलते हैं ?

बलराम अग्रवाल- इस प्रश्न का उत्तर देने से पूर्व मैं ‘अकहानी’ की कुछेक प्रवृत्तियों को यहां पर बता देना बेहतर समझता हूं। ‘अकहानी’ गई सदी के सातवें दषक की देन है। ‘अकहानी’ में वर्णित आदमी इससे पूर्व हिन्दी कहानी में चित्रित आदमी से भिन्न घोर व्यक्तिवाद, अतियथार्थवाद और उच्छृंखल यौनवाद में डूबा आदमी है। ‘अकहानी’ के कथाकारों ने कहानी को सभी मूल्यों, समाज के उत्तरदायित्वों और नैतिकता के सभी प्रतिबन्धों से मुक्त घोशित करते हुए उसमें व्यक्तिगत काम-सम्बन्धों और यौन-प्रवृत्तियों का खुला चित्रण किया। इनकी दृश्टि में आम-आदमी की यौन-संतुश्टि से इतर कोई अन्य आवष्यकता या इच्छा जैसे थी ही नहीं। मैं इसे कहानी के एक-पक्षीय दायित्व के निर्वाह के रूप में देखता हूं--समग्र दायित्व-निर्वाह के रूप में नहीं। मेरा यह भी मानना है कि भारतीय राजनीति में ‘अकहानी’ की प्रस्तुति वाला काल अत्यन्त उद्वेलनकारी काल रहा है जिसकी उक्त आन्दोलन के पक्षधरों द्वारा लगातार अनदेखी हुई। यही वह काल है जब ‘लघुकथा’ ‘समकालीन लघुकथा’ में रूपान्तरित होनी प्रारम्भ हो जाती है और 1971 तक आते-आते आन्दोलन का रूप अख्तियार कर लेती है। आपको याद होगा कि सम्भवतः ‘अकहानी’ के प्रवृत्यात्मक दोशों की प्रतिक्रियास्वरूप ही 1971 के आसपास कमलेष्वर ने ‘समान्तर कहानी’ आन्दोलन शुरू किया था और ‘सारिका’ में लघुकथाओं को बहुलता से स्थान देना प्रारम्भ कर दिया था।

समकालीन हिन्दी कहानी के दौरान लघुकथा की क्या स्थिति है ?

बलराम अग्रवाल- लघुकथा में किसी भी प्रकार के बाह्य तत्व विचार, सिद्धान्त, दृष्टान्त, बोध या उपदेश के आरोपण का अस्वीकार कथात्मक आवेग के साथ 1970 के बाद ही आया। 1970 के बाद के कथाकारों ने अपनी अभिव्यक्ति को कहानी के अनावष्यक विस्तार से भी मुक्त रखा और परम्परागत लघुकथा की रूढ़ता से भी। इसीलिए इसे ‘लघुकथा’ के बजाय ‘समकालीन लघुकथा’ कहना श्रेयस्कर भी है और प्रवृत्यात्मक आकलन की दृष्टि से उचित भी। यह विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि समकालीन लघुकथा की स्थिति आज किसी भी दृष्टि से कमतर नहीं है क्योंकि समकालीन लघुकथाकार किसी भी सामाजिक, धार्मिक या राजनीतिक विचारधारा, परम्परा, विश्वास, आस्था अथवा रूढ़ि से बंधा हुआ नहीं है। मैं यद्यपि कथाकार को लिंग, धर्म अथवा समुदाय विशेष से जोड़कर देखने का पक्षधर नहीं हूं तथापि यह इंगित करना आवश्यक समझता हूं कि आज का मुस्लिम कथाकार भी अपने-आप को सिद्धांत विशेष से मुक्त समाज का हिस्सा मानकर लघुकथा-लेखन कर रहा है।

समकालीन हिन्दी लघुकथा में किस तरह के विभिन्न प्रयोग मिलतें है ? क्या लघुकथा की कुछ सीमाएं भी हैं ? (रचनाओं के सन्दर्भ में)

बलराम अग्रवाल- समकालीन हिन्दी लघुकथा में अनेक प्रयोग देखने को मिलते हैं। शिल्प और शैली के स्तर पर भी और कथ्य के स्तर पर भी। हां, इतना जरूर है कि कहानी-आन्दोलनों की तरह वे प्रयोग अलग-अलग नाम से चिह्नित नहीं किए गए। कारण निश्चित रूप से यह रहा कि पहला काम विधा के स्वरूप को संवारना था, प्रयोगवादिता को भुनाना नहीं। तथापि एक-दो महत्वाकांक्षी ऐसे भी रहे जिन्होंने बिना किसी सकारात्मक अवदान के स्वयं को ‘प्रयोगवादी’ प्रचारित किए रखा। मैं समझता हूं कि हिन्दी लघुकथा को पौराणिक कलेवर के दृश्टांतपरक, बोधपरक, उपदेषपरक तथा खलील जिब्रानवादी भावपरक कथानकों से हटाकर आम-आदमी की पीड़ाओं और व्यथाओं से जोड़ना समकालीन लघुकथाकारों का सबसे अधिक उज्ज्वल पक्ष है। लगभग उसी के समान्तर एक अन्य प्रयास भी देखने को मिलता है-लघु-आकारीय व्यंग्य लिखने की शुरुआत के रूप में। सन् 1950 के आसपास हरिषंकर परसाई ने अत्यन्त छोटे आकार के कथात्मक व्यंग्य लिखने षुरू किए थे। उनमें अनुपम मारक क्षमता है। लेकिन, लघुकथा क्योंकि केवल व्यंग्य नहीं है इसलिए समय विषेश के उपरान्त मात्र व्यंग्य की वाहक लघुकथाएं अधिक आगे अपनी परम्परा को न लेजा सकीं। हालांकि इसका प्रमुख कारण यह था कि उक्त काल के ज्यादातर लेखक परसाईजी जैसा मारक व्यंग्य लिख पाने में अक्षम थे। परसाईजी की ‘अयोध्या में खाता-बही’ की तर्ज पर उन्होंने पौराणिक पात्रों को लेकर पैरोडी कथाएं तो खूब लिखीं और छपवाईं, लेकिन उनके-जैसा कचोटता हुआ व्यंग्य वे कभी नहीं लिख पाए। वैसी पैरोडी कथाओं को ‘सारिका’ में लगातार स्थान मिला लेकिन आज स्थिति यह है कि उनमें से अधिकतर का कहीं उल्लेख नहीं होता।

‘लघुकथा की सीमा’ वाले प्रश्न पर मैं ‘सीमा’ शब्द पर टिप्पणी करना चाहूंगा। ‘सीमा’ से आपका तात्पर्य अगर इसकी प्रभाव क्षमता से है तो मैं कहूंगा कि यह असीम है; और ‘सीमा’ से तात्पर्य अगर ‘लिमिट’ से है तो मैं कहूंगा कि प्रत्येक विधा के कुछ अनुषासन होते हैं, उन्हें ‘लिमिट्स’ कहना उचित नहीं है। जैसे किसी पात्र के नख-शिख वर्णन की जितनी आजादी किसी उपन्यासकार को मिलती है उतनी कहानीकार को नहीं मिलती तथा जितनी कहानीकार को मिलती है उतनी लघुकथाकार को प्राप्त नहीं है। इसे आप ‘सीमा’ नहीं कह सकते, यह अनुशासन है।

क्या लघुकथा में दलित लघु कथा, दलित विमर्ष एवं कुछ विषेश प्रवृत्तियॉ भी मिलती हैं ? क्या दलित लघुकथा की कुछ सीमाएं हैं ? (रचनाओं के सन्दर्भ में)

बलराम अग्रवाल- समकालीन हिन्दी लघुकथा में दलित लघुकथा की स्थिति कम से कम अभी तक तो वैसी ही है जैसी दलित साहित्य के विधिवत उत्थान से पूर्व कहानी एवं उपन्यास में थी यानी सवर्ण लेखक/चिंतक भी दलित अनुभूतियों को शब्द और संवेदना प्रदान कर रहे हैं। यही स्थिति दलित विमर्ष की भी है। समूचे लघुकथा साहित्य से वैसे ही दलित जीवन की लघुकथाएं चुनकर संकलित की जा रही हैं जैसे कहानी अथवा उपन्यास साहित्य से जीवन पर केन्द्रित रचनाएं चुनकर दलित जीवन की कथाओं के संकलन संपादित किए जा रहे हैं। जहां तक सीमा का प्रष्न है-उत्तर ऊपर पांचवें प्रष्न के अन्तर्गत दिया जा चुका है।

12 comments:

  1. लघुकथा पर इस चर्चा में बडी महत्व की जानकारियाँ हैं। बलराम जी को धन्यवाद।

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  2. समकालीन लघुकथा पर संग्रह योग्य सामग्री

    उत्तर देंहटाएं
  3. लघुकथा पर एक सार्थक आलेख...

    आभार..

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  4. हिंदी साहित्य की सर्वाधिक सशक्त विधाओं में से एक लघुकथा पर केन्द्रित प्रतिष्ठित लघुकथाकार बलराम जी का यह साक्षात्कार कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं को रेखांकित करता है. हिंदीतर भारतीय भाषाओँ और हिंदीतर विदेशी भाषाओँ में लघुकथा के कथ्य, प्रभाव आदि पर तुलनात्मक दृष्टि से कुछ चर्चा होती तो शोधार्थी लाभान्वित अधिक होते. साक्षात्कारकर्ता तथा साक्षात्कारदाता के साथ संपादकमंडल को भी साधुवाद.

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  5. Balram ji ka alekh Laghukatha ki visheshtaon ki or sanket karta hua unki bareekion par bhi bharpoor roshini pesh kar raha hai. Gyanvardak lekh ke liye badhayi

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  6. लघुकथा पर एक जानकारीपूर्ण आलेख। बलराम जी का यह साक्षात्कार घुकथा लेखन के
    पूरे परिदृश्य को समेटता है। अशोक जी बधाई के पात्र हैं इस साक्षात्कार के लिये!

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  7. बलराम से बातचीत बहुत मह्त्वपूर्ण है।लघुकथाये बहुत पहले से लिखी जा रहा है लेकिन उसे अन्य विधाओ की तुलना में
    स्वीकृति नही मिली।इससे लघुकथा का मह्त्व कन नही होता।ाज के भागदौड भरे समय में जब आदमी के पास बहुत कम वक्त मिलता है। लघुकथायें पढने के लिये आम्न्त्रित करती है।

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