तेरे उन तीन शब्दों को मुझे स्वीकार करना है।
तेरी खातिर सँवरना है, तेरे ही संग चलना है।
तेरी बातों में गीता की कही लौ ढूँढ लानी है,
कभी खुद में उतरना है, कभी तुझमें उतरना है।

अभी कागज की कुछ कतरन इकठ्ठी कर न पाया हूँ,
जमाने भर की बातों की जुँबा भी बन न पाया हूँ।
खुदा ने मुझको भेजा है यहाँ तेरी ही खिदमत में,
खुदा की आशिकी की आरजू भी बन न पाया हूँ।

मगर तेरी ही बातों में मेरा दिन बीत जाता है।
कि तुझसे हार कर हर बार ये दिल जीत जाता है।
तेरे आने की उम्मीदें मैं कब से पाल बैठा हूँ,
हथेली की लकीरों पर मैं डोरे डाल बैठा हूँ।

तेरी हर बात तेरी याद मुझको ज्यों खजाना है।
तेरे खबरी की साँसों में तेरा ही आना जाना है।
कि तुझको गम नहीं होता जो तेरी याद आती है।
तुझे पाकर खुदा को भी तेरे ही संग पाना है।

कभी तपते हुऐ दिन में बरसती हो घटा सी तुम,
कभी होठों के छालों पर छिड़कती हो दवा सी तुम,
कभी माथे को सहलाती हो माँ बनकर दुआऔं में,
कभी रोती हो मेरे बिन अकेली राधिका सी तुम।

कभी चाहूँगा तुमको भी यही बस कह सका हूँ मैं,
जनम की दौड़ में सधकर-संभलकर चल रहा हूँ मैं।
तेरे रीते से बर्तन में बस दो बूँद, गंगा की,
बस दो बूँद, आँखों की समर्पण कर रहा हूँ मैं।

3 comments:

  1. तेरी बातों में गीता की कही लौ ढूँढ लानी है,
    कभी खुद में उतरना है, कभी तुझमें उतरना है।

    बहुत खूब देवेश जी

    उत्तर देंहटाएं
  2. कभी तपते हुऐ दिन में बरसती हो घटा सी तुम,
    कभी होठों के छालों पर छिड़कती हो दवा सी तुम,
    कभी माथे को सहलाती हो माँ बनकर दुआऔं में,
    कभी रोती हो मेरे बिन अकेली राधिका सी तुम।

    वाह

    उत्तर देंहटाएं

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