राजीव रंजन: विजेन्द्र जी आपकी रचनाधर्मिता को कैसे पारिभाषित किया जाये?

विजेन्द्र: राजीव जी, किसी कवि की रचनाधर्मिता को एक तो उसके रचनाकर्म से जाना जा सकता है। दूसरे वो कैसा इंसान है। उसका आचरण कैसा है। उसके सरोकार क्या हैं? समाज को वो कहाँ जाते हुए देखना चाहता है। उसमें प्रतिकूल परिस्थितियों में हस्तक्षेप की कितनी क्षमता है। वो कितना लोकधर्मी है। कितना समकालीन है। यही नही वो अपने रचनाकर्म को कितनी गंभीरता से लेता है। उसके प्रति वो कितना समर्पित है। उसने अपना मार्ग बनाने में कितने जोखिम उठाये हैं। उसकी संघर्ष यात्रा क्या है...

राजीव रंजन: जब हमारे सामने कृति है तो लेखक को अलग से इंसान के रूप में जानना क्या जरूरी है?

विजेन्द्र: हाँ यह ठीक है कि कृति हमारे सामने है। एक मत यह भी है कि हम सिर्फ रचना को देखें, रचनाकार को नहीं। कुछ विदेशी समीक्षकों की यह मान्यता है। यानी पोयम ऑन द पेज – कविता जो हमारे सामने छप कर पृष्ठ पर आई है – उसे देखें। उससे इधर उधर नहीं। यहाँ दो बाते हैं। एक तो जब कवि अपने लिये पूरी स्वायत्ता माँगता है तो परखने वालों को यह स्वायत्तता क्यों नहीं कि वो कृति को बेहतर समझने के लिये अपनी कार्यशैली अपनाये? वो उसे और बेहतर ढंग से समझने के लिये अन्य स्त्रोतों का यदि उपयोग करता है तो हमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये? बल्कि मेरा सुझाव है कि यदि हम कवि को एक इंसान के रूप में भी जान लें तो उसे और गहराई और विस्तार से समझ पायेंगे। अंग्रेजी के एक सुविख्यात समीक्षक जे एडमण्ड विल्सन नें तो यहाँ तक कहा है कि यदि आप किसी की कलाकृति को परखना चाहते हैं तो रचनाकार को एक इंसान के रूप में भी जानिये। राजीव जी मैं इस समीक्षक की बात से सहमत हूँ। रचनाकर्म एक अत्यंत दायित्वशील कर्म है। हमें सच्चाई का हर समय सामना करना पडता है। जो मैं रचना में कह पा रहा हूँ वो मेरे जीवन की पृष्ठभूमि में है भी या नहीं। मसलन कई बार हम रचना में बडी बडी बातें करते हैं पर जीवन में तुच्छताओं के पीछे भागते दिखते हैं। तो यह बडा अंतर्विरोध हुआ या नहीं? कोई भी श्रेष्ठ रचना बाहरी दुनियाँ को चित्रित करके भी आत्मपरक होती है। उसमें हमारा चित्त पूरे मानवीय व्यक्तित्व के साथ रचा जाता है। वो रेशे रेशे उसमें बुना रहता है। यह चित्त बनता है बाहर की दुनियाँ से प्राप्त संवेदनों से। हम चाहे कितना ही न चाहें तो भी यह संभव नहीं कि हम रचना या रचनाकार को परखते समय अपना संबंध वस्तुजगत से तोड लें। न तो यह मुमकिन है, न व्यावहारिक। देखिये राजीव जी हिन्दी के महान युगद्र्ष्टा आलोचक रामचन्द्र शुक्ल नें कविता पर बात करते हुए कहा है “कविता पर अत्याचार भी बहुत हुआ है। लोभियों, स्वार्थियों और खुशामदियों नें उसका गला दबा कर कहीं अपात्रों की आसमान पर चढाने वाली स्तुति करायी है कहीं द्रव्य न देने वालों की निराधार निन्दा। एसे तुच्छ वृत्ति वालों का अपवित्र हृदय कविता के निवास के योग्य नहीं। कविता देवी के मंदिर उँचे, खुले, विस्तृत और पुनीत हृदय है।“ यहाँ आचार्य जी कविता के लिये कुछ जरूरी और व्यावहारिक शर्तें रख रहे हैं। इसका गहरा संबंध कवि के आचरण से है। हमारे यहाँ कवि के आचरण पर बहुत जोर दिया जाता है। ऋग्वेद की एक ऋचा है “नृमण: कवि: अच्चगा:” अर्थात मनुष्यों का हित करने के लिये कवि के पास सीधा जा। एक गिरा हुआ मनुष्य कैसे कविता करेगा? कैसे मनुष्यों का हित? इसी लिये मैंने कहा है कि कवि को सबसे पहले एक बेहतर इंसान होना पहली शर्त है। देखिये राजीव जी, मनुष्य तो सभी होते हैं परंतु जरूरी नहीं कि वो इंसान भी हों। ग़ालिब नें एक जगह कहा भी है – “आदमी को मयस्सर नहीं इंसां होना।“
महान उपन्यासकार प्रेमचंद नें कहा है, एक लेखक स्वभाव से ही प्रगतिशील होता है। तो क्या यह नहीं कहा जाये कि एक कवि अपने स्वभाव में बेहतर इंसान होता है? होना तो चाहिये। पर जरूरी नहीं। इसी लिये हमारे यहाँ साहित्य या रचनाकर्म को साधना या उपासना कहा गया है। यह केवल निर्मल मन से ही संभव है। कबीर नें एक जगह कहा है –

कामी क्रोधी लालची इनसे भगति न होय।
भगति करे कोई सूरमा जाति वरण कुल खोय॥

यहाँ भक्ति की ध्वनि कविता से ही है। देखने की बात है कि कबीर नें कवि को सूरमा कहा है। अभिप्राय है कि कवि निडर हो, उसमें प्रतिकूलताओं से संघर्ष की क्षमता हो। जो हर जोखिम उठा सके। तो आप देखेंगे कि हमारे यहाँ आचरण पर बडा बल है। आचरण में खानपान ही नहीं है बल्कि अपने लोगों को प्यार करना, अपनी धरती को मान देना, समाज को बेहतर और सुन्दर बनाने का सपना देखना, उसके लिये बडे संकल्प से यत्न करना। कवि को छोड भी दें, एक सामान्य नागरिक होने के नाते भी तो हम चाहते हैं कि हमारे आसपास सुसंस्कृत और अच्छे लोग रहें।...। कई बार हम अपनी भाषा से लोगों को छलते भी हैं। यानी जो कहते हैं जरूरी नहीं उससे तदाकर भी हों। कई बार हम छाया प्रतीति को बडे मनमोहक ढंग से कह कर सार तत्व को बचा देते हैं।

राजीव रंजन: यह छाया प्रतीति क्या है? सार तत्व से कैसे भिन्न है?

विजेन्द्र: इन दोनों बातों का गहरा संबंध वस्तु और उसके आंतरिक गुणों से है। कोई भी वस्तु जो दिखाई देती उपर से, उससे ज्यादा होती है। वो ज्यादा एसे दिखाई नहीं देती। जैसे फूल को हम देख लेते हैं लेकिन गंध कहाँ दिखाई पडती है? बिना गंध के फूल की कोई सार्थकता नहीं है। उपर से लगता है कि हम यथार्थ को पकड पा रहे हैं लेकिन वो उसका सतही भाग है। मैं एक और उदाहरण देता हूँ। जैसे हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था है। कहने सुनने में बडी मनमोहक है। संसद है, विधानसभायें हैं। चुनाव होते हैं। हमें बोलने की आजादी है। हम धर्म निर्पेक्ष हैं पर जरा गहराई से सोचिये क्या वास्तव में यह व्यवस्था वैसी ही सुन्दर है जैसी कि दिखाई देती है? आजादी के साठ साल बाद भी इस देश में करोडों भूखे हैं, प्यासे हैं। उन्हें सब सुविधायें आज भी नहीं हैं जिससे वे बेहतर जीवन जी सकें। लाखों किसानों नें आत्महत्यायें कीं, लाखों बच्चे कुपोषण का शिकार होते हैं। लोगों के पास जीवन रक्षक दवाओं के लिये पर्याप्त धन नहीं है। लाखों लोग पशु से बदतर जीवन बिताने के लिये विवश हैं। यहाँ बडे बडे भू-माफिया हैं, तस्कर हैं। श्रमिक का शोषण होता है। घोर भ्रष्टाचार है। गरीबों को न्याय नहीं मिलता और जाने कितनी बाते हैं। इस पक्ष को हम अक्सर छिपाते हैं। लोकतंत्र का अभिप्राय है अति सामान्य जन को भरपूर बुनियादी सुविधायें मिलें। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी आर्थिक समानता के पक्षधर थे। उन्होंने लिखा है “आर्थिक समानता के लिये कार्य करने का अर्थ है पूंजी और श्रम के बीच निरंतर टकराव को समाप्त करना। इसका अर्थ है उन कुछ धनी लोगों को नीचे उतार कर औरों को समानता के स्तर पर लाना जिनके हाँथों में अधिकांश सम्पत्ति केन्द्रित है। दूसरी तरफ लाखों अधभूखों और नंगे लोगों को समानता के स्तर तक उपर उठाना।“ - एम. के गाँधी, कंस्ट्रक्तिव प्रोग्राम – 1945 का संस्करण जहाँ गाँधी जी छाया प्रतीति को बताते हुए सार तत्व को भी बता रहे हैं। छाया प्रतीति नदी की सतह पर झाग है और सार तत्व उसके भीतर बहने वाली धारा। सच में तो यथार्थ को समग्र और समुचित समझने के लिये दोनों को काव्य विवेक से समझना जरूर्री है। दूसरी बात जो जरूरी है वह है अपने समय के आदमी के संघर्ष, प्रतिरोध और उसकी आकांक्षाओं को व्यक्त करना।
राजीव रंजन: आपके जीवन और उससे जुडे संघर्षों को पाठक जानना चाहेंगे।

विजेन्द्र: राजीव जी मैं एक मझोले सामंत परिवार में जन्मा हूँ। सबसे पहले मुझे उन सामंती संस्कारों से लडना पडा जो मैंने विरासत में पाये थे। एक तरह से मेरे परिवार का पूरा माहौल शिक्षा और रचना विरोधी था। बहुत छोटा गाँव था। न कोई स्कूल न पाठशाला। मेरे पिता चाहते थे कि थोडी बहुत उर्दू सीख कर घर का कामकाज देखूं। अत: उर्दू-फारसी के बहुत अच्छे जानकार मौलवी साहब को घर पर ही पढाने के लिये तय किया गया। किसी तरह दर्जा चार पास कर लिया। पिताजी नें कहा बस बहुत है अब घर का कामकाज देखो। मैं चाहता था कि आगे अंग्रेजी स्कूल में जा कर अच्छी तालीम पा सकूं। तो अपनी माताजी से बहुत अनुनय कर उन्हें तैयार किया। पर वह पिताजी की बात का प्रतिवाद कैसे करें। बडे जतन के बाद मुझे अंग्रेजी स्कूल जाने दिया गया। जब दसवी पास कर लिया तो फिर आगे पढने के मार्ग बंद थे। इस समय तक सामंतवाद ढहने के कगार पर था। आर्थिक संकट की वजह से आगे कैसे पढें? माँ के अब गहने बिक गये। जमीन बिकी। कुछ कर्ज लिया और बनारस पढने के लिये चला गया। बाद में ग्यारहवें दर्जे में विवाह कर लिया। पत्नी के गहने बिके। स्थितियाँ न पढने की थीं। मैं पढना चाहता था। किसी तरह एम.ए किया। अच्छी बात यह हुई कि तत्काल नौकरी मिल गयी। इसके बाद दूसरे संघर्ष शुरु हुए। मैंने कविता चुनी। उसकी तैयारी के लिये मुझे बहुत संघर्ष करना पडा। पढाता अंग्रेजी था और दिन रात लगा रहता था हिन्दी कविता में। कॉलिज प्रशासन नें उपर सूचना दी कि यह व्यक्ति अपने काम में ध्यान न दे कर गैर जरूरी कामों में समय बरबाद करता है। मुझे चेतावनी दी गयी। मेरी गोपनीय रिपोर्ट खराब हुई। प्रशासन इस लिये भी नाराज था कि मैं मार्क्सवाद में यकीन करता था। सामान्य जन के बीच खूब घूमता फिरता था। राजनीतिक गतिविधियों में शिरकत करता था। यह सब उनके लिये, राजपत्रित कर्मचारी के लिये आचार संहिता का सरासर उलंग्घन था। मेरे पीछे गुप्तचर लगे रहे। मेरी पत्नि परेशान थी कि इन सब के होते कहीं मेरी नौकरी न चली जाये। मेरे कॉलिज में भी मेरे लेखन और विचारधारा का बडा विरोध था। अंदर अंदर कई बार विचलित होने के क्षणों का अनुभव हुआ। पर कविता नें विचलित नहीं होने दिया। विचारधारा नें सब कुछ झेलने की ताकत दी। जब मुझे कवि रूप में स्वीक़ृति मिलने लगी तो मेरी रचना का भी विरोध किया गया।
राजीव रंजन: रचना का विरोध क्यों करने लगे लोग?

विजेन्द्र: इसकी वजह तो वे ही बेहतर बता सकते हैं जिन्होंने विरोध किया। मुझे लगता है कि मैं गाँव कसबों की संवेदना से अपने आसपास के जीवन को कह रहा था। यह संजोग ही है कि मुझे बहुत छोटी छोटी जगह रहने का मौका मिला। वहाँ के लोगों, प्रकृति और परिवेश से जुड कर ही मैंने कविता करना बेहतर समझा। यह संवेदना बडे बडे नगरों में रहने वाले कवियों और समीक्षकों को पिछडी संवेदना लगती रही। पर मुझे सच लगता था। यही वजह है कि जब मेरा पहला संग्रह “ये आकृतियाँ तुम्हारी” छपा तो बहुत विरोध हुआ। पर मैंने अपना पथ छोडा नहीं। गद्य लिखना जब शुरु किया तो जो मुझे उचित लगा उसे सीधे सीधे कहा। इसमें कुछ एसे लोगों की आलोचना थी जिनके बारे में लोग कुछ भी कहने में झिझकते हैं। मैं समझता रहा कि साहित्य में लेखक को जनतांत्रिक तरीके से अपनी बात कहने का पूरा हक है। बाद में पता चला कि सच बातें लोगों को पसंद नहीं। प्रतिष्ठित लेखक नये लेखकों की चाटुकारिता पसंद करते हैं। मैं समझता रहा सच कहना कवि का कर्तव्य है। पूंजीवादी तंत्र से भी हम लडे हैं, लड रहे हैं। सब जानते हैं कि इस व्यवस्था में श्रमिकों का शोषण होता है। हमारे नैतिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक तथा मानवीय मूल्यों का भारी क्षरण होता है। यह सब आज हम देख ही रहे हैं। साम्राज्यवाद से लडना हमारी उस परम्परा का जरूरी हिस्सा है जिसे हम आजादी के समय लड चुके हैं। आप जानते हैं हमारे संविधान के तीन प्रमुख जीवन मूल्यों को उसके आमुख में सुरक्षित रखा है। वे हैं, लोकतंत्र, धर्मनिर्पेक्षता और समाजवाद। अत: इनकी प्राप्ति के लिये उक्त बातों से लडना ही होगा। जो नहीं लड सकता वो एक प्रकार से अपने संविधान के प्रति गंभीर नहीं दिखता। अत: यह बात समकालीन और अग्रगामी होने की पहली शर्त है। आज अनेकों लेखक एसे हैं जो साहित्य को मात्र निजी व्यवहार मानते हैं। रचना सिर्फ रचना के लिये। अपने सुख के लिये। आनंद के लिये। हमारे यहाँ की साहित्यिक और सांस्कृतिक परम्परा में साहित्य सदा बडे सामाजिक सरोकारों से अनुप्रेरित रहा है। हमारे महान काव्य शास्त्री आचार्य मम्मट नें साहित्य के अनेक प्रायोजन के साथ एक प्रायोजन “शेवेतर का क्षरण” भी माना था। यानी साहित्य अमंगलकारी लोक कल्याण के विपरीत प्रवृत्ति का विनाश भी करता है। रामायण और महाभारत इसके उज्जवल प्रमाण हैं। इसी अर्थ में एक लेखक को कोई न कोई पक्ष लेना पडता है। यह उसके उपर है कि वह किसका पक्ष ले। वह जनता के साथ है या जनता के उत्पीडकों के साथ है। ऋग्वेद पढने के बाद मुझे आश्चर्य हुआ कि हमारे महान द्र्ष्टा ऋषि जनता के प्रति प्रतिबद्ध हैं। ऋचाओं में बराबर पीडित और पीडक के बीच संघर्ष है द्वन्द्व है। एक एसा वर्ग है जो कमजोर को सताता है। उसका अधिकार छीनता है। उसकी संपदा को हडपता है। मैं कुछ उदाहरण यहाँ दे रहा हूँ – एक जगह कहा गया है कि इन्द्र नें बुराईयों को दूर करने वाले सत्पुरुष की रक्षा के लिये शोषण करने वालों को मारा – कुत्साय शुष्णं अहन या, शत्रु द्वारा कब्जे में की गयी भूमि को इन्द्र नें छुडवाया – व्राणा: अवनि: अमुंचित या, हे अग्नि तू राक्षसों शोषकों उत्पीडकों तथा दुर्जनों हिंसकों को जला दे – अग्ने त्वं रक्षस्विन: रिषत: दह। एसे जाने कितने उदाहरण भरे पडे हैं जहाँ शोषित और शोषक द्वन्द्व चित्रित है। महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय बात यह है कि कोई भी ऋषि उत्पीडकों, हिंसकों, दुराचारियों और शोषकों की समर्थक नहीं है। जहाँ कहीं एसे प्रसंग आये हैं वहाँ ऋषि जनता का समर्थन करते हैं। कहा गया है – य: अघ: वृक: दु:वेश: न: आदिदेशति, तं पथ: अप जहि। यह सीधी बात नहीं है। साहित्य में लोग ज्यादातर ठकुरसुहाती बाते पसंद करते हैं। वह मैं कभी नहीं कर पाया। अत: एक वर्ग एसा बना जो बराबर विरोध करता रहा, कर रहा है। वह संघर्ष बरकरार है। रहेगा। पर प्रसन्नता की बात है कि आज बहुत बडा वर्ग मेरी बातों को सही मान कर संबल भी देता है। एसा संघर्ष कोई नयी बात नहीं है। हर समय, हर देश में उन कवियों को विरोध और उपेक्षा सहनी पडी है जो लीक से हट कर चलते हैं। जो अपना पथ अलग बनाते हैं। मुझे यहाँ कबीर की कुछ पंक्तियाँ याद आती हैं -

हम तो अपनी चाल चलत हैं, लोग कहै उलटी
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साँच कहौ जग मारन धावै, झूठा है संसार
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साँच को कोई गाहक नाहीं, झूठे जगत को खोजे जी

यानि लोग छाया प्रतीतियों में उलझ कर सारतत्व को छोड रहे हैं। इन पंक्तियों से लगता है कि कबीर अपने आलोचकों से खीज रहे थे। तुलसी, मीरा, निराला, नागार्जुन, त्रिलोचन, मुक्तिबोध आदि सभी को कठिन संघर्ष करना पडा है। मुझे लगने लगा है कि संघर्ष हर कवि की रचना प्रक्रिया का हिसा है। वे कवि धन्य हैं जिनकी कोई संघर्ष यात्रा नहीं होती।

राजीव रंजन: समकालीन साहित्य क्या है?

विजेन्द्र: राजीव जी, यह सवाल बडा अहं है। कुछ चकरा देने वाला भी। आम तौर से यह माना जाता है कि आज जो लेखक लिख रहे हैं वे सब समकालीन हैं। पर मैं इस बात से कुछ अलग और भिन्न सोचता रहा हूँ। मुझे एसा लगता रहा है कि एक समय में लिखने वाले सभी समकालीन नहीं होते। मैं अपनी बात रख रहा हूँ आप इस पर सोचें। मेरी दृष्टि में समकालीन वह है जो अपने समय की सामाजिक गतिकी को अग्रसर करने में योग देता है। अपने समय की अग्रगामी ऎतिहासिक ताकतों को पहचान कर उनका अपनी रचनाओं में पक्ष लेता है। दूसरे अर्थ में जो सतत विकसित होती चेतना के उन्नतम छोर पर है। मैं उदाहरण दे कर अपनी बात स्पष्ट करता हूँ। यदि कोई लेखक आज सामंतवाद, पूंजीवाद और साम्राज्यवाद का विरोध नहीं करता है तो वह न तो समकालीन है न अग्रगामी। इसी तरह जो साम्प्रदायिकता का विरोध नहीं करता वह तो विगतगामी हुआ। आप या कोई कह सकता है कि एक लेखक को सामंतवाद, पूंजीवाद और साम्राज्यवाद का विरोध क्यों करना चाहिये? क्योंकि सामंतवाद से हम बराबर लड रहे हैं। आज़ादी की लडाई के समय और बाद में भी। सामंतवाद एक पिछडी हुई और अमानवीय व्यवस्था है। उससे लडना लेखक का दायित्व है। अर्थात जो पापी क्रूर और सेवा के अयोग्य दुष्ट लोग हमें अपनी आज्ञा में चलाना चाहते हैं उसे मार्ग से दूर करो। यही नहीं बल्कि बाधा या कष्ट देने वाले दुष्टों से हमें पार ले जाओ। सश्चत: न: अति नय, न: सुगा सुपथा कृणु। इससे साफ है कि हमारे ऋषि हजारों साल पहले जो बातें कह रहे थे वे आज की लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिये ज्यों की त्यों जरूरी है। इस तरह अपनी प्रसंगानुकूलता में हमारे ऋषि हमारे समकालीन हैं। हम भी तो आज एक समता मूलक, सुव्यवस्थित, शांतिपूर्ण तथा उन्नत समाज चाहते हैं। एसा समाज जहाँ शोषण, उत्पीडन न हो। यहाँ देखने की बात है कि वेदों में सिर्फ पूजा कर्मकाण्ड ही नहीं हैं वहाँ सामाजिक और मानवीय संघर्ष के अनेक ढांचे भी हैं। इसी अर्थ में हम अपने ऋषियों से कहीं न कहीं जुडते हैं। इससे साफ यह भी है कि समकालीनता का संबंध सिर्फ समय से नहीं है न ही तारीख से। इसका गहरा संबंध हमारे विश्वदृष्टिकोण से है। आज स्त्रियों के संघर्ष और उनकी सामाजिक आर्थिक मुक्ति के संदर्भ में मीरा हमारे बहुत निकट हैं। निराला आज नहीं हैं पर चेतना स्तर पर वे हमारे समकालीन हैं। आज एसे अनेक कवि हैं जो आज के लोकतंत्र के सारतत्व को अपनी रचना में नहीं ला पा रहे हैं। उन्हें समकालीन कैसे कहेंगे?

राजीव रंजन: लोक के बारे में आपके क्या विचार हैं। उसे कैसे समझें आज के संदर्भ में?

विजेंद्र: जिस तरह समकालीनता को हमने नए ढंग से समझने की कोशिश की है ठीक उसी तरह लोक को भी लोकतंत्र के संदर्भ में समझना जरूरी है। वैसे लोक का अर्थ बहुत व्यापक है पर लोकतांत्रिक जीवन पद्यति के संदर्भ में उसका अर्थ होगा सर्व सामान्य्। आचार्य भरत ने भी इसे सामान्य के अर्थ में ही लिया है। लोकतंत्र में बलाघात सामान्य पर ही है। अहं यह कि उसका सार तत्व लोक ही है। यह कुलनता से अलग है। उससे भिन्न भी है। यहां सारा जोर सामान्य पर है। अतिसामान्य पर। सौंदर्यशास्त्र की भाषा में इसे सर्वहारा की उचित संज्ञा दी जा सकती है इससे लोक का अर्थ उसके वर्गी आधार भी समझ में आते हैं। अक्सर भ्रम इस बात में है कि लोक के समग्र स्वरूप को कैसे समझें? सामान्यत: आपने देखा होगा कि लोक कहते ही हमारा ध्यान लोक कला, संगीत, नृत्या, वेश-भूषा, उत्सव, अंधविश्वास, रीतिरिवाज तथा जीवन शैली पर जाता है। इन सारी बातों से कुलीन वर्ग फैशन बतौर अपना मनोरंजन करता है। उन्हें सजाता है, संवारता है। इसका खराब असर यह हुआ कि हमने लोक के सांस्कृतिक पक्ष के साथ उनके संघर्ष पक्ष को दरकिनार किया है। यह जानबूझ कर किया गया है। खासतौर से आज अनेक विदेशी एजेंसियां और यहां की स्वयंसेवी संस्थायें यह भ्रम बड़े पैमाने पर प्रचारित करने में लगी हैं। आप कहेंगे ऐसा क्यो है। क्यों कि उनके संघर्ष पक्ष से सत्ता और कुलीन डरते है, घबराते है। यदि लोक का बहुसंख्यक समाज जब जाग्रत और चेतन हो उठेगा तो वो सत्ता में अपने वर्चस्व की बात के लिए संघर्ष करेगा। तुम जानते ही हो।

आदिवासियों को बड़ी-बड़ी देसी-विदेसी कंपनियां उन्हें उनके पैतृक मूल स्थान से बेदखल कर उन्हें उजाड़ रही है। उनके वन काट रही है। नदियों को सुखा रही हैं। झरनों को लुप्त कर रही है। उनकी खनिज संपदा पर अधिकार जमा रही हैं। नाम दिया जाता है कि विकास हो रहा है। ऐसा विकास किस काम का जिससे लाखों गरीब-पीडि़त उजड़ जाएँ? सत्ता कंपनियों को प्रोत्सासहित करती है तो संघर्ष होता है। वे अपने पारंपरिक शस्त्र उठाते हैं। हिंसा होती है, हम उन्हीं को अपराधी घोषित कर उन्हें कारावासों में ढकेल देते हैं। लोक का एक संघर्षपूर्ण पक्ष यह भी है। लोकतंत्र में यह महत्वपूर्ण है। इसका सीधा रिश्ता हमारे स्वतंत्रता आंदोलन उसके संघर्ष से जुड़ा है। आज के इतिहासकार मानते हैं हमारे देश के आदिवासियों ने हर जगह अंग्रेजों के विरूद्ध संघर्ष कर बडी कुर्बानियाँ दी हैं। जैसे बिरसा मुण्डा्, तिलका मांझी, जगदलपुर के आदिवासी, केरल के किसान, महाराष्ट्र के आदिवासियों नें अंग्रेजी साम्राज्यवाद के विरूद्ध बराबर संघर्ष किये हैं। आज का लेखक जब लोक की बात करता है तो इस संघर्ष को छिपाता है। उसे नाच गान कला उत्सवों में ही रूचि है। यही वजह है लोक के बारे में अनेक भ्रम फैले हुए है। यह माना उनमें अनेक सामाजिक कुरीतियां, पिछड़ापन, अंधविश्वास भरे पड़े है पर ये सब बातें तो कुलीनों में भी बहुत हैं। ये सब छाया प्रतीतियां है। सार तत्व तो उनका अपनी मुक्ति के लिए संघर्ष है। वह आज के लोकतंत्र की बुनियादी लोक शक्ति है। इसे हम नजरअंदाज नहीं कर सकते। कुछ समय को उसे दिग्भ्रमित भले ही कर दें। सामाजिक गति की अग्रगामी गति सदा भविष्योन्मुखी होती है। एक न एक दिन हमें उनकी ताकत स्वीकारनी ही होगी। यहां यह भी साफ है कि समाकालीनता का रिश्ता लोक से बहुत गहरा है। दोनों एक दूसरे से जुड़ी चीजें है।

राजीव रंजन : आजकल कहा जा रहा है कि कविता विलुप्त होती विधा है। जिस आम आदमी के लिए कविता रची जाती है वही उसकी सामान्य समझ से बेहद परे है। आम आदमी से दूर होती हुई कविता, कवियों और समालोचकों की वाह वाही पाकर ही क्या वह जनपक्षधरता का सही प्रतिनिधित्व करेगी?

विजेंद्र: राजीव जी यह कैसा सवाल है। आप स्वयं कवि है फिर एक कवि से ऐसा सवाल? ध्यांन रहे किसी जाति या राष्ट्र में सांस्कृतिक रचनाशीलता कभी लुप्त नहीं होती। न कोई कला अपना अस्तित्व खोती है। चाहे कितनी ही प्रतिकूल परिस्थितियां क्यों न हों कविता कभी विलुप्त् नहीं हो सकती। ऐसा लगता है; यह लगना छाया प्रतीति का छल है। कई बार ऐसा होता है। आज ऐसा लगना सहज है। क्योंकि कविता आज हमारी प्राथमिकता नहीं है बल्कि कोई कला हमें जरूरी नहीं लगती। आप देख रहे है आज ध्यान न तो उत्कृष्ट काव्य कृतियों पर है, न किसी अन्य सांस्कृतिक कर्म पर। सारा जोर उपभोग्य वस्तुओं पर है। दूसरे शब्दों में हम पर हमारी रूचियों पर बाजार पकड़ बनाये हुए है।

हर जगह, हर भाषा में कविता प्रचुर मात्रा में लिखी जा रही है। श्रेष्ठ कविता भी है, कमजोर भी। पर वह लोक प्रिय नहीं है। उसके संस्का्रवान पाठक बहुत कम हैं। आप जानते है कि कविता हमारी सांस्कृतिक क्रिया की सर्वोत्त्म रचना है। वह लुप्त कैसे हो सकती है। यदि भारतीय भाषाओं की कविताओं को विश्व कविता स्तर पर परखे तो हमे निराशा नहीं होगी। इसलिए कविता के विलुप्त होने की निराशा हमें मन से निकाल देनी चाहिए। हां, यह बात विवाद पैदा कर सकती है कि जिस आम आदमी के नाम से हम कविता लिख रहे हैं या जिसे हम संबोधित कर रहे है वह उसकी समझ के परे क्यों है। उसे संप्रेषित क्यों नहीं होती। उसकी समझ में क्यों नहीं आती। हमें इसके बारे में गंभीरता से सोचना होगा। यह सिर्फ कविता के समझने की ही बात नहीं है। हमें यह भी सोचना होगा कि आजादी के साठ साल बाद भी हमारे यहां ऐसा बहुल वर्ग पैदा क्यों नहीं हुआ जो श्रेष्ठ कविता पढने को उत्सुक हो? अच्छी कविता की मांग करे? उसे सराह सके? यही नहीं वह कविता लिख भी सके। यह बात सच है कि समाजवादी सोवियत रूस में वहां के श्रमिक अपने यहां के श्रेष्ठ कवि एब्तोशेंको की कविता सुनने को उत्सुक रहते थे। कहा यह भी जाता है कि किसी सभा में यदि कमजोर कविता का पाठ होता था तो वहां के श्रमिक उसको नहीं सुनते थे। यही नहीं गोर्की की महान उपन्यास मां कृति को रातों रात पढने को श्रमिक तक उत्सुक रहते थे। या फिर औस्त्रोवस्की के प्रसिद्ध उपन्यास, अग्निदीक्षा को सीने से लगाये घूमते थे। इन बातों पर धैर्य से हम विचार करें तो हम किसी तर्कसंगत नतीजे पर शायद पहुंच सकें। वैसे मेरी निजी राय है कि कविता सामान्यत: सहज, सरल और संप्रेषणीय होनी ही चाहिए। एक तो आज हमारे यहां का बहुसंख्यक समाज इतना शिक्षित ही नहीं जो कविता पढ सके। दूसरे, सामान्या जन जो पढता भी है उसके जीवन की कठिनाइयों उसे कविता के लिए या किसी भी सांस्कृतिक क्रिया के लिए अवकाश ही नहीं देती। दूसरे, हमारे जनसंचार के साधन, दूरदर्शन, आकाशवाणी तथा दैनिक समाचार पत्र कविता को इतनी कम जगह देते हैं कि आम आदमी उसके महत्व् को जान ही नहीं पाता। कलाओं में सबसे कम जगह कविता को ही क्यों है। यह हमारे विचार का विषय होना जरूरी है। हम जिन्हें संबोधित करते हैं उसका उद्देश्य यह तो है ही कि वे उन तक पहुंचे। यदि नहीं भी पहुंचती है तो भी उनका महत्व किसी तरह कम नहीं होता। कवि कर्म है अपने समय और समाज के यथार्थ की छाया-प्रतीतियों के साथ उनके सार तत्वि को चित्रित करते रहना। यह इसलिए अनिवार्य है क्योंयकि समाज में जो घटित होता है कवि उसे कृति के माध्य्म से चरितार्थ भी करता है। आज नहीं तो कल या उससे आगे समय आयेगा जब कविता में कहे गये यथार्थ को समझ कर अपने इतिहास को जानेंगे। मनुष्य के प्रयत्नों, संघर्षों और उसकी उपलबिधयों से परिचित होंगे। कविता हमारे अंत:करण का जीवंत प्रतिबिंब भी तो है। हम समय को भी जानते हैं और व्यतक्ति के आंतरिक जगत को भी। ऐसा अन्य किसी ज्ञानप्रणाली में संभव नहीं।

अत: आप यकीन मानें कविता कभी, कहीं, कैसे भी विलुप्ती न होगी। आप बराबर कविता लिखने का रियाज करते रहें। साहित्य शिल्पी‍ से जो काम आप कविता को ले कर रहे है वह निश्चित ही हम जैसे लोगों को उत्प्रेरक ही नहीं, अत्यंत उपयोगी भी है।

राजीव रंजन : आखिर आपका आग्रह आम आदमी पर इतना क्यों है। कवि तो मुक्त। है। वह जिस पर चाहे लिखे न लिखे?

विजेंद्र : राजीव जी, जिसे आप आम आदमी कह रहे हैं वही तो लोक है। लोक अर्थ ही सामान्य है, अतिसामान्य। यानि सौंदर्यशास्त्र की भाषा में उसे सर्वहारा कहें तो बेहतर है। हां, आपका यह सवाल परेशान करने वाला है कि उसी का आग्रह क्यों। देखिए राजीव जी, हमने बड़े कठिन संघर्ष और कुर्बानियों के बाद अंग्रेजों के विरूद्ध स्वतंत्रता संग्राम लड़कर लोकतंत्र की स्थापना की है। उसमें अनेक खराबियां होने के बावजूद वह हमारी जीवनपद्यति बन चुका है। भारतीय संविधान के आमुख में लोकतंत्र का सारतत्व बताने को राष्ट्रीय उच्च जीवन मूल्यों की त्रैदी है – लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता तथा समाजवाद। इस त्रै में लोक का सबसे ज्यांदा महत्व स्वीकार करके ही हमने लोकतंत्रीय व्यवस्था को अपनाया है। यह बात बिल्कुल अलग है कि हम उसे अभी आदर्श रूप में चरितार्थ नहीं कर पाये। उसके लिए संघर्ष बराबर है। आप मुझ से सहमत होंगे राजीव जी कि आज कोई भी राजनीतिक दल लोकतंत्र की शक्ति को नकार नहीं सकता। यह बात जाहिर है कि वर्तमान सत्ता आम आदमी के नाम को अपने दल के प्रतीक चिन्ह से जोड़कर चल रही है। यह प्रत्यक्ष-परोक्ष लोकशक्ति का दबाव ही है। न केवल इतना बल्कि अब भारत के सभी राजीनतिक दल यह मानने लगे हैं कि नक्सलवाद की समस्या सिर्फ कानून व्यवस्था की समस्या नहीं है। इस समस्या् की पृष्ठीभूमि में कुछ अन्य गहरे कारण हैं उनकी खोज खबर करना जरूरी है। जब हमारे पूरे परिवेश में आम आदमी को महत्व् मिला हुआ है तो एक लेखक को उधर ध्यान क्यों नहीं देना चाहिए। आम आदमी उसका जीवन, परिवेश और परेशानियाँ कवि के सरोकार क्यों न हों। यही नहीं लेखक को यह बताने की जरूरत है कि आम आदमी अब बिल्कुल सोया नहीं है। उसे अपने अधिकार लेने को संघर्ष करना जरूरी है। वह कर भी रहा है। उसकी ताकत का एहसास हर राजनीतिक दल को हो चुका है। अब आप सोचिए यदि आज का कोई कवि आम आदमी को अपने सृजन के केंद्र में न रख लोकतंत्र का अपमान कर रहा है। क्या यह परोक्षत: हमारे संविधान में निहित महान मानवीय मूल्यों की त्रै की अवमानना नहीं है। इसी अर्थ में आम आदमी के प्रति कवि की प्रतिश्रुति जरूरी शर्त है। आप देखें कि इक्कीसवीं सदी में हम लोकतांत्रिक मूल्यों की सुरक्षा का संकल्प लेकर ही उसमें प्रवेश कर रहे हैं। यही हमारी आधुनिकता है। यही समकालीनता है। यही उत्तराधुनिकता कि हम एक लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष समतामूलक और सुंदर दुनिया को बनाने में सहयोग करें।

आपकी बात सही है कि कवि पूरी तरह अपने विषय चुनने को स्वायत्त है। इसके लिए कोई निश्चित सूची तैयार नहीं की जा सकती। कवि के द्वारा समग्र जीवन क्रियाशीलता, उसके परिवेश तथा उसके सभी मानवीय संबंधों को कविता का विषय बनाया जा सकता है। हम प्रकृति, प्रेम, करूणा, भाई-चारा, देश-प्रेम, परस्पर सहयोग और जीवन की महान आकांक्षाओं जैसे विषयों पर भी कविता लिख सकते हैं। हां, जिस कवि के जितने बड़े, व्यापक तथा दूरगामी सामाजिक सरोकार होते हैं वह उतना ही बड़ा कवि होता है। बिना इनके हम अच्छे कवि होकर भी बड़े कवि नहीं बन सकते। एक बड़ा कवि हर समय अपने समय, समाज और देश की व्यापक आवाज होता है।

राजीव रंजन : कविता में विचारधारा की कितनी आवश्यकता होती है? अलग-अलग विचारधाराओं के संघर्षों में पिसती हिंदी कविता का क्या भविष्य है?

विजेंद्र : देखिये राजीव जी हमारा वर्ग समाज है। अत: यहां वर्गो के अनुसार अनेक विचारधारायें होना स्वाभाविक है। आप जानते हैं हर राजनीतिक दल का कोई न कोई वैचारिक आधार होना पहली शर्त है। जब भिन्नि भिन्न विचारधारायें हैं तो वैचारिक संघर्ष होना सहज बात है। हां आप यह कह सकते हैं कि लेखक को किसी विचारधारा से जुड़ने की क्या जरूरत है। देखिए, इस प्रसंग में कुछ बातें संभव है। क्या कोई लेखक बिना विचारधारा के रह सकता है। लेखक होने से पहले वह एक सजग नागरिक है। इस नाते भी उसे विचारधारा तो अपनानी होगी ही। दूसरे, एक लेखक कैसा समाज बनाना चाहता है। इस संदर्भ में भी उसे कोई न कोई राजनीतिक विचारधारा अपनानी होगी। जो कहते है कि उनकी कोई विचारधारा नहीं है वे सत्ता की विचारधारा का ही पोषण करते हैं। फिर लोकतंत्र में लेखक को राजनीतिक दृष्टि से सजग रहना बहुत जरूरी है। विचारधारा का विरोध वे ही लेखक करते हैं जो यथास्थितिवादी होते हैं। या फिर दरबार के करीब रहकर सुख-सुविधायें भोगना चाहते हैं। अनेक चतुर चालाक लेखक एसे भी होते है जो साहित्य को सिर्फ आत्माभिव्यक्ति की चीज मानकर उसे समाज और समय निरपेक्ष कहते है। पर गहराई से देखने पर लगेगा कि वे सच को छिपा रहे हैं। जैसे अन्याय देखकर यदि कोई चुप रहे तो समझें कि परोक्षत: वह उसका समर्थन कर रहा है। इस तरह जिन की कोई घोषित विचारधारा नहीं होती उनकी अपनी कोई न कोई विचारधारा जरूर होती है। मेरा अपना विचार है कि एक लेखक को अपने समय और समाज में सक्रिय हस्तक्षेप करने के हेतु वैज्ञानिक विचारधारा का जरूर चयन करना होता है।

जहां तक कविता के लिए विचारधारा की बात है उसे हम व्यापक संदर्भ में विवेक से समझें। लेखक अपने सृजन में विचारधारा ऊपर से थोपता नहीं। वह उसके मन मिजाज और रक्त का हिस्सा बन चुकी है। विश्व के किसी भी महान लेखक को हम विचारधारा शून्य नहीं पायेंगे। इसका हमारे भाव, कल्पना और संवेगों से कोई तात्विक विरोध नहीं है। देखिए राजीव जी हमारे जो “भक्त कवि” हैं उनकी भी विचारधारायें हैं। बल्कि, बड़ी मुखर हैं प्रबल भी। हां उसकाल में उन्हें विचारधारा न कह कर संप्रदाय कहते हैं। हमारे भक्तं कवि बेहद प्रतिश्रुत हैं। वे समाज को जगा रहे हैं। उसे अंधकार से उबरने को चेतन कर रहे हैं। अपने समय की गलत रूढियों से लड़ रहे हैं। मैं तो मानता हूं कि ऋचाओं को चरने वाले ऋषि भी प्रतिश्रुत थे। उनका ध्यान लोक कल्याण पर केंद्रित था। वे दुखी, पीडित गरीब और असहाय लोगों के साथ थे। यह मैं ऊपर भी कह चुका हूं। शब्द का जन्म ही वस्तुयथार्थ से होकर उसे प्रभावित करता है। मनुष्य का स्वभाव है वह जड़, अपरिवर्तित, निष्चष्ट, नि:श्रम नहीं रह सकता। विचार ही हमें पशुओं से अलग भी करता है। भाव और विचार में कोई विरोध नहीं है। कोई भी महान रचना अपने समय की विचारधारा का परोक्ष दर्पण भी होती है।

इस संदर्भ में एक बात और कहना चाहूंगा। विचारधारा लेखक को जरूरी होते हुए भी कोई रचना निजी विचारधारा के ही बल पर महान नहीं हो सकती। उसके लिए उसे कलाकृति की जरूरी शर्तें पूरी करनी होंगी ही। मेरा अपना विचार है विचारधारा किसी भी लेखक की ताकत है उसका विश्वंदृष्टिकोण उससे प्रतिबिंबित होता है। विचारधारा से डरने की जरूरत नहीं। कुछ लेखक अपने निहित स्वार्थ के लिए विचारधारा का विरोध करते रहते हैं। विचारधारा का विरोध करना भी तो एक प्रकार की विचारधारा है। उसे हम अपने व्यक्तित्व का जैविक हिस्सा बनाये। ईमानदारी से उसे कलाकृति में व्यक्त होने दें। वह एक प्रकार से हमारे लिए सर्चलाइट है अंधेरे में रोशनी।

राजीव रंजन : आप महाकाव्यात्मक प्रवृत्ति के कवि कहे जाते हैं। आपने बहुत सारी प्रबंध कवितायें रची हैं। इसके पीछे क्या कारण हो सकता है।

विजेंद्र : हां, मेरे समीक्षक यह मानते हैं। मैंने बहुत संख्या में लंबी या कहें प्रबंध कवितायें लिखी हैं। जैसा मैंने पहले कहा मैं अपने समाज, प्रकृति और मनुष्य जीवन को समग्रता में देखने के पक्ष में हूं। तो इसके लिए बड़े फलक की जरूरत होती है। लघु कविताओं के आकार और उनके रचनात्मेक रूप स्वभाव की अपनी सीमायें हैं। लघु कविता में बात पूरी नहीं समाती। दूसरे, मैने प्रबंध कविताओं में ज्यादातर चरित्र रचे हैं। अत: वहां कथा तत्वद के साथ नाटकीयता की भंगिमायें भी पैदा हुई हैं। तीसरे, मैं चरित्रों को उनके पूरे परिवेश उसके प्रति उनके आघात, प्रतिघात और संघात भी बताने को उत्सुक रहा हूं। वे कभी निश्ष्चेष्ट नहीं हैं क्रियाशील हैं। फिर अपने बारे में सोचते हैं। वे जहां तहां वर्ग चेतन भी है। उनका चेतन, अवचेतन और अचेतन सब मिलकर कार्य करते हैं।

बीच बीच में प्रकृति भी आती है। इन्हीं सब कारकों से कवितायें प्राय प्रदीर्घ होती गई हैं। एक बात और भी है। जहां चरित्र नहीं हैं वहां मैंने क्षेत्र विशेष या घटना या शहर को भी चरित्र के रूप में कहा है। जैसे मेरी सर्वाधिक लंबी कवितायें है जनशक्ति और कठफलाबांस। पहली कविता में भरतपुर जिले का प्रमुख इलाका है बयाना क्षेत्र। यहां अशोक के समय का बहुत पुराना किला है। अति प्राचीन ऊंचा मंदिर है। किले के स्थान पर बहुत ही बीहड़ बन है। जनशक्ति में इस पूरे इलाके का विस्तार से चित्रण है। वहां की प्रकृति, मनुष्य जीवन की कठिनाइयां, उनकी सांस्कृातिक विरासत, रीतिरिवाज, खेतीबाड़ी, उनके जीवन के अभाव, दुख और परेशानियां। साथ ही इन सबकी विकास प्रक्रियायें चित्रित हैं। यह कविता 1972 में क्यां नाम की पत्रिका में छपी थी। अब पुस्तिकाकार है। संकलन का नाम है – जनशक्ति तथा अन्य प्रबंध कवितायें। यह दिल्ली से छपी है। इसका संपादन हिंदी के प्रख्यात समीक्षक और वसुधा के प्रधान संपादक डा. कमलाप्रसाद ने किया है। उनकी यहां विस्तृ्त भूमिका भी है। मेरे समीक्षक यह भी मानते हैं कि इन कविताओं में न तो फैण्टसी है न कोई दिवास्व‍प्न। ये कवितायें व्यापक कथ्य की वजह से प्रदीर्ध हुई हैं। यहां विस्तार और संश्लिष्ट‍ता कथ्य‍ को बहुआयामी बनाते हैं। भरापूरा परिवेश तथा ऐतिहासिक पृष्ठभूमि तथा प्रकृति की विराटता ने इन्हें सहज रूप से प्रदीर्घ बनाया है। मेरी दूसरी लंबी कविता है, कठॅूला बांस। इसमें मैंने भरतपूर इलाके का सघन चित्र दिया है। इस तरह दोनों कविताओं में क्षेत्र विशेष आलंबन के रूप में आया है। उसकी स्वायत्त चरित्रात्मक सत्ता है। इन्हें तथा इन जैसी अन्य कविताओं को लेकर महाकाव्यात्मकता की बात कही होगी।

राजीव रंजन : आपकी काव्य भाषा के बारे में अनेक विवाद हैं। अनेक लोगों का कहना है कि आप देशज शब्दों का प्रयोग बहुत करते हैं। कई बार उन्हें समझने में दिक्कत होती है।

विजेंद्र : हां, यह सही है कि मेरे पहले कविता संकलन से ही मेरी भाषा के बारे में विवाद रहे हैं। मुझे ये विवाद गैर जरूरी लगते रहे हैं। आप कहेंगें क्यों। क्योंकि भाषा अपने कथ्य को कहती है। जैसे मैंने कहा, मैं गांव से आया हूँ। गांव जैसे अति छोटे स्था‍नों में रहकर लंबी अवधि तक शिक्षा सेवा में रहा। जहाँ रहा वहाँ के इलाकों को देखा। प्रकृति का सान्निध्यं मिला। वहाँ की स्थानीय भाषा से संपर्क रहा। मसलन मै 28 वर्ष भरतपुर रहा। यह ब्रजभाषा क्षेत्र है। वहाँ आज भी हालात गाँव जैसे हैं। शहर से थोड़ा इधर उधर चलो तो वहाँ आज भी किसान, श्रमिक और आम आदमी ब्रजभाषा बोलता है। यह बड़ी समृद्ध भाषा है। इसमें अनोखा लालित्य है। बेहद कोमलता, सरसता भी। ब्रज के लोक गीत तुमने सुने ही होंगे। तो इस भाषा का असर मेरी कविता में आया है। मैंने ब्रज भाषा के शब्द और क्रिया पदों का प्रयोग किया है। मुझे वे बड़े सहज लगे हैं। उनके पर्याय हिंदी में नहीं हैं। संस्कृत के तत्सम शब्दे देने का कोई औचित्य नहीं है। इस तरह कई बार जो लोग ब्रजभाषा के स्वभाव को नहीं जानते वे इसे कठिनाई कहते हैं। पर इससे खड़ी बोली बहुत समृद्ध होती है। दोनों में विवेध नहीं करना चाहिये।

भाषा की बात प्रमुख नहीं है। वह गौण है। प्रमुख बात है कथ्य की। कोई भी कवि अपने कथ्य को सहजता और औचित्य के साथ कहने के लिए ही भाषा का प्रयोग करता है। अगर मुझे श्रमिक, किसान गाढिया लुहार, बुनकर, पत्थर काटने तराशने वले तथा बागवान, मुर्दा सीने वाला आदि के जीवन को सही सही कहना है तो उन्हीं के जीवन में काम आने वाली भाषा का प्रयोग करना जरूरी है। हो सकता है पढ़े लिखे लोगों को उक्त लोगों के जीवन, परिवेश तथा बोल चाल से परिचय ही न हो तो उनको उक्त भाषा समझने में कठिनाई हो सकती है। जो लोग ऐसी भाषा नहीं समझ पाते उसके दो ही विकल्प हैं। एक तो हम कुलीन पढ़े लिखे लोगों को ध्यान में रखके कविता रचें। पहले से यह जान लें कि उनकी समझ में क्या़ आयेगा – वैसा कथ्य चुने। दूसरे, हम बहुत बड़े यथार्थ से अपने को दूर रखें। मेरे लिए ये दोनों ही बातें मुमकिन नहीं। मैने हर बार कहा है मेरी काव्य संवेदना के केंद्र में सर्वहारा है। लोक है। संघर्षशील आम आदमी है तो उनके जीवन को कहने के लिए मैं मुठ्ठी भर लोगों के बीच बोले जाने वाली भाषा का प्रयोग कैसे कर पाऊंगा। यह सवाल ही गलत है कि हमें कुछ खास किस्म की भाषा समझ में नहीं आती। बल्कि कहें यह तर्क उन लोगों का है जो अपने अनुभव की सीमाओं को छिपाने की कोशिश करते हैं। कहना उन्हें यह चाहिए कि हम अमुक कवि की कविता समझने के लिए उन इलाकों में जायेंगे जहां से कवि अपने कथ्य को उत्खनित कर रहा है। अंग्रेजी में पढ़ा है कि कवि को समझने के लिए समीक्षक तथा उत्सु्क पाठक उन स्था‍नों को बड़ी जिज्ञासा से देखते हैं – परखते है – समझते हैं जहां से वह अपने कथ्य चुन रहा है।

एक बात आपने देशज शब्दों की कही है। यह बात भी पहली बात से जुड़ी है। किसी स्थान विशेष का चित्रण करते समय वहां के कुछ न कुछ शब्द आना स्वाभाविक है। निराला, नागार्जुन, केदार बाबू में उनके इलाके के शब्द आते हैं। तुलसी में चित्रकुट, अयोध्या और काशी क्षेत्रों के शब्द आते हैं। मीरा तो राजस्थानी में लिख ही रही थी। जायसी अवधी में ढेरों स्थानीय शब्द देते ही हैं। कविता में स्थानीयता होना बहुत बडा गुण है। इसका अर्थ है आप अपने परिवेश से अपने को सजगता से जोड़े हैं। दूसरे, देशज शब्दों का कोई विकल्पु होता नहीं। उनमें सदियों के अनुभव छिपे रहते हैं। उसी से वे जीवंत हैं। कबीर को आप पढ कर देखिये सैकड़ों शब्दे ऐसे हैं जो आजके पढ़े लिखे लोग बिना कुंजी के नहीं समझ पायेंगे। कबीर इसकी चिंता नहीं करते कि उनकी भाषा किसी की समझ में आयेगी या नहीं। कबीर ने तो परेशान होकर कहा भी है-

बोली हमारी पूर्व की, हमें लखे नहि कोय
हमें लखे सो जना जो धुर पूर्विया होय

मेरा विनम्र प्रस्ताव है कवि को समझने के लिए – उसकी भाषा को जानने के लिए पाठक को – समीक्षक को, जड़ों तक जानना चाहिए। यह जरूरी है। मैंने एक बार प्रयोग किया है। अपने कविता संग्रह वसंत के पास से कुछ लोक धुनों वाले गीत अनपढ आदमियों को सुनाये कुछ थोड़े पढ़े लिखे लोगों को भी। उन्होंने भले ही अर्थ उस गहराई से न समझे हों पर शब्द समझ लिए। भाषा में देशज शब्दो न समझ पाने की कठिनाई मध्यवर्गीय सीमित अनुभव की समस्या है। लेखकों का बहुत बड़ा वर्ग सर्वहारा, भूमिहीन किसान, श्रमिक और अन्य शिल्पियों के जीवन से कटा हुआ है। यही वजह है उसे कुछ शब्दों को समझने में कठिनाई होती है। राजीव जी आप को हंसी आएगी। मैंने कई सुपरिचित कवियों को देखा सुना है कि वे अरहर और सरसों में ही फर्क नहीं कर पाते। बहुतों को पता ही नहीं मोगरा, जूही, चमेली, पारिजात कब खिलते है। चंपा के फूल का रंग क्या है। गुलतस्वीर या कैना का फूल कैसा होता है। रबी और खरीफ फसलों में क्या अन्न, दालें बोई जाती हैं। बहुतों ने कपास का फूल नहीं देखा होगा। बहत से नहीं जानते पटसन पर कैसा फूल आता है। एक कवि को यह सब जानना जरूरी है। खैर बहुत से लोग इन बातों को गंवारू या पिछड़ी संवेदना का प्रतीक मान बैठे हैं। हमारे संसद में बहुत से सांसद न अपने प्रदेश की भाषा बोलते हैं न हिंदी। अंग्रेजी जो वे बोलते हैं टूटी फूटी होती है। उसमें व्याकरण की त्रुटियां होती हैं। पर बोलते अंग्रजी हैं। क्यों । ऐसी क्या अनिवार्यता है। संसद में संविधान में स्वीकृत सभी भाषाओं को बोलने समझने की व्यवस्थां है। इसका कारण है लोकतंत्र में कुलीनता की भौंड़ी मानसिकता। इससे लगता है उन्हें न तो अपनी धरती से अनुराग है न जनता से। न अपनी जाति संस्कृति से। बड़ी लज्जा की बात है जो जनता आपको चुनकर संसद में भेजती है उसे आपकी अंग्रेजी समझ में कहां आती है। वह नहीं जानती आप क्या बोल रहे हैं। मुझे भारतीय वाम पंथियों की सबसे बड़ी दुर्बलता यही लगती है कि वे अपनी भाषा में सर्वहारा को कभी संबोधित नहीं करते। मैं यह नहीं कहता कि आप हिंदी ही बोलिए। जिस प्रदेश से चुनकर आप आये हैं उस प्रदेश की जनता को समझ में अपने वाली भाषा तो बोलिए। यह मैं विषयांतर होकर इसलिए कह रहा हूं कि भाषा समझने बोलने का प्रश्न हमारी मानसिकता और विश्वादृष्टि से जुड़ा है। भाषा हमारे जातिय चरित्र का उज्जवल प्रतिबिंब है।

राजीव रंजन : आप अंग्रेजी के भी विद्वान है। आप क्या कारण पाते है कि साहित्य और साहित्यंकारों की जो दुर्दशा हिंदी में है वह अन्यत्र नहीं। अन्य भाषाओं में वहां की पुस्तकें न केवल बड़े पाठक वर्ग तक पहुंचती हैं बल्कि उनके हिंदी अनुवाद भी हाथों हाथ लिए जाते हैं। पर हिंदी के लेखक जमीन तलाशते रहते हैं?

विजेंद्र : यह आप ठीक कहते हैं। हिंदी के लेखकों की स्थिति बेहतर नहीं है। वैसे कम ज्यादा ऐसी स्थिति सभी भारतीय भाषाओं के लेखकों की है। राजीव जी जिस समाज में रचना कर्म प्राथमिक न होकर धन उपार्जन प्रमुख हो जाए वहां लेखकों की स्थिति खराब होने के लिए जमीन तैयार हो ही जाती है। हिंदी के लेखकों को प्रकाशक कठिनाई से मिल पाता है। यदि मिलता है तो वह उसका बेहतर ढंग से शोषण करता है। सारा तंत्र ऐसा है कि बिना पैसा कोई काम नहीं होता। आप देखते हैं कि हिंदी की किताबों की कीमतें कितनी ज्यादा होती हैं। आम आदमी चाहकर भी उन्हें खरीद कर पढ़ नहीं सकता। सरकारी खरीदों में पैसा चलता है। अत: पुस्तकों की कीमत ज्यादा रखने को प्रकाशक बहाना तलाश लेते हैं। एक बड़ा कारण है अंग्रेजी का वर्चस्व। मेरा अनुभव है नव धनाड्य पढ़ा लिखा तबका अंग्रेजी की चाहे जैसी पुस्तक हो जिस मूल्य पर खरीदने को तैयार हो जाता है। पर हिंदी की कम कीमत की पुस्तक वह खरीद कर पढ़ना अपना अपमान समझता है। कविता का तो बहुत ही अजब हाल है। मेरा अनुभव है कि कविता पुस्तक छापने को प्रकाशक तैयार ही नहीं होते। अच्छे अच्छे लेखक पैसा देकर पुस्तिकें छपाकर मुफ्त में वितरित करते हैं। जो लोग खरीद कर पढ सकते हैं वे भी मुफ्त में पुस्तक चाहते हैं। हिंदी के जो लेखक विश्वविद्यालयों के बड़े पदों पर हैं या जो अफसर हैं – चाहे लेखक बहुत घटिया है –उनकी पुस्तकें आसानी से छप जाती हैं। वजह है कि वे पुस्तकें बिकवाने में प्रकाशक की मदद करते हैं। ऐसे धनी मानी लेखकों को आजीविका का कोई संकट नहीं है। मेरा ख्याल है एक सच्चे लेखक को हर समय कठिन जीवन जीने को विवश होना पड़ा ही है निराला का जीवन कितना कठिन था आप जानते हैं। आये दिन प्रकाशकों के आगे हाथ पसारना पड़ता था। आचार्य रामचंद्र शुक्ल का भी जीवन बहुत संकट में था। कहते हैं उन्हें बनारस में मात्र अस्सी् रूपये मिलते थे। बड़ी तंग हालत थी। उन्हीं दिनों अलवर नरेश ने अपने हिंदी प्रेम के कारण उन्हें अलवर अच्छे वेतन पर बुला लिया। सब सुविधायें भी उपलब्ध करा दीं। एक सप्ताह के बाद शुक्ल जी ने एक पर्चे पर निम्निलिखित पंक्तियां लिखीं और राज दरबार त्याग कर चले गये। पंक्तियां है-

चीथड़े लपेट चने चावेंगे लित चौखट चढि.
पै चाकरी करेंगे नहीं काहूं चौपट चमार की।

इससे लगता है एक सच्चे, समर्थ और स्वा्भिमानी लेखक को जीवन में कठिनाइयां उठानी ही पड़ती हैं। उसे उनके लिए तैयार रहना चाहिए। अंग्रजी के वर्चस्व‍ के कारण हिंदी पर गहरा संकट हैं। उसे उनके लिए तैयार रहना चाहिए। उत्तर भारतीयों में अपनी जातीयता के प्रति भी उतनी उन्नत चेतना नहीं है जितनी अन्यं भाषा के लेखकों में है। मैंने देखा है कालिजों और विश्वविद्यालयों में हिंदी के अध्यापक अकारण ही हीन ग्रंथि से पीडि़त रहते हैं। जो लेखक या पाठक अपनी भाषा पर गर्व करेगा-उसे मन से चाहेगा- वह तुच्छताओं की परवाह नहीं करता। तुलसी ने अपने समय से दुखी होकर कहा है-

कवि वृंद उदार दुनी न सुनी
दूषण ब्रात न कोपि गुनी
कलि बारिहि बार दुकाल परै
बिन अन्नब दुखी सब लोग मरै

यानि कवि तो बहुत हैं पर उनके गुणी बहुत कम हैं। दोष निकालने वाले तो बहुत है पर कविता के मर्म को समझने वाले विरल है। ऐसा विकराल समय है अकाल है अन्न के बिना लोग भूखों मरने को विवश है।

देखिये राजीव जी, भर्तृहरि तो बहुत पहले हुए हैं। उन्हें भी बहुत वेदना झेलनी पड़ी होगी। एक जगह कहा है-

बोध्दारो मत्स रग्रस्तात: प्रभव: स्मबयदूषिता:
अबोधोपहताश्चान्ये जीर्णमंगे सुभाषितम्

अर्थात् जो जानकार विद्वान हैं वे परस्पर एक दूसरे से ईर्ष्या करते हैं। जो शक्तिशाली जन है वे अहंकार से दबे पड़े हैं। शेष सामान्य जन अज्ञानवश अच्छे् बुरे की पहचान नहीं कर पाते। ऐसी स्थिति में प्रतिकूल हालात में अच्छी कविता सुभाषित मन की मन में ही रह जाती है। यह बात आज भी उतनी ही सही है। लगता है भतृहरि हमारी ही बात कह रहे हों। दरअसल हम सच को कहने से हिचकते हैं। उसे सुनने को तैयार नहीं हैं। कबीर ने बहुत ही अच्छे ढंग से कहा है-

साधो देखो जग बौराना
सांच कहे तो मारन आवै
झूंठे को पतियाना

और कहा है-

सांचे को कोई ग्राहक नाहीं झूठै जगत पतीजै जी
कहैं कबीर सुनो भइ साधो अंधों को क्या कीजै जी

एक वजह हिंदी लेखक को कमजोर बनाती है वह है उसका सामाजिक आचरण। मेरा अनुभव है एक लेखक को बहुत ही अनुशासित जीवन जीने की आदत डालनी चाहिए। हमारे यहाँ भारत में कवि को प्रजापति या चरने वाला ब्रह्मा तक कहा है। उसको आत्मा का शिल्पी भी कहा है। इतने दायित्वशील व्यक्ति को अपने सामाजिक आचरण से सिद्ध करना पड़ता है। यानि वह जो दायित्वशील बातें कह रहा है उनका अनुपालन जीवन में करता भी है या नहीं। रचना हम से बड़े सख्त अनुशासन की मांग करती है। मेरा अनुभव है ज्यादातर लेखक दुहरा जीवन जीते हैं। जो कहते है वैसा जीवन में नहीं होते। जो जीवन में हैं उसे कहते नहीं। यह छल उनके मन को बराबर कमजोर करता है। उनकी बनक का क्षरण होता है। आप जानते हैं महानगरों में लेखक कि किस तरह तुच्छताओं की पीछे भागते हैं। कैसे समझौते करते हैं। जोड़ तोड़ करके चीजों को पाने की लालसा उन्हें चैन नहीं लेने देती। ऐसे में रचना कर्म गौण हो जाता है। समाज में हमारी साख गिरती है। हमारी बातों पर से लोगों का यकीन उठता है। कवि कर्म निभाने के लिए हमें कठोर स्थितियों से गुजरने को तैयार रहना जरूरी है।

राजीव रंजन : लघु पत्रिकायें बराबर संघर्ष कर रही हैं। कृतिओर के पीछे आपकी लगन और प्रेरणा देखी जा सकती है। तथापि क्या लघु पत्रिकायें सिमटती नहीं जा रही। इसके क्या कारण हो सकते हैं। वे प्रभावी क्यों नहीं हो पा रहीं।

विजेंद्र : इसमें शक नहीं जनपक्ष धर पत्रिकायें बराबर संघर्ष कर रहीं हैं

राजीव रंजन: आप लघु पत्रिकाओं को जनपक्षधर कहना क्यों पसंद करते हैं?

विजेंद्र : राजीव जी मैं प्रारंभ से ही लघु शब्द से सहमत नहीं रहा हूं। दरअसल जनपक्षधर पत्रिकाओं की शुरूआत सेठाश्रित पत्रिकाओं के एकाधिकार में सार्थक हस्तकक्षेप था। सेठाश्रित पत्रिकायें उन रचनाओं को छापने में आनाकानी करती थी जो समकालीन यथार्थ, समाज के अंर्विरोध तथा अग्रगामी सामाजिक गतिकी - सोशल डायनामिकस की सही दिशा तथा आवेग थे उसे या तो विकृत करती थी या फिर उसे नकारती थी। वहाँ असहमतियों और वैचारिक संघर्ष की बहुत कम गुजांइश थी। बल्कि कहें, थी नहीं। सेठाश्रित पत्रिकायें अपने मालिकों के हितों के विरूद्ध न तो तब जा सकती थी न आज। इधर समाज में आजादी के बाद सामंतवाद के गढ़ ढह रहे थे। पूंजी व्यवस्था तेज हो रही थी। इसके साथ ही नई जनशक्ति का उदय होने को था। इस नई जनशक्ति की ध्वनि आपको निराला की तोड़ती पत्थर, कुकुरमुत्ता या नये पत्ते में मिलेगी। उसकी शक्ति का विकास मुक्तिबोध, नागार्जुन, केदारबाबू व त्रिलोचन, कुमारेंद्र आदि में मिलेगा। सर्वहारा की शक्ति को साठेश्रित पत्रिकायें न तो व्यक्त करने में रूचि लेती थी न उनके नये चरित्र – नायकों – को सामने लाने का जोखिम उठा सकती थी। जनशक्ति के इसी दबाव ने हमें प्रेरणा दी कि निजी प्रयत्नों से ऐसी पत्रिकायें सामने आयें जो समाकालीन सामाजिक यथार्थ तथा समाज की अग्रगामी गतिकी को दिशा दे सकें। सर्वहारा वर्ग के नये नायकों की तलाश हो सके। किसी भी लोकतंत्र के सार तत्व को सही सही समझने को यह जरूरी कदम था। ऐसी परंपरा पहले भी रही है। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने सरस्वती का प्रकाशन किया। प्रेमचंद ने हंस निकाला। यह उसी का थोड़ा बढे पैमाने पर विकास समझिये। लघु कहने में सिर्फ आकर प्रकार का अर्थ ध्वनित होता है। उसके कथ्य का अर्थ सामने नहीं आता। जनपक्षधर कहने में हम अपने उद्देश्य में एकदम साफ है। लेखकों को कोई दिशा निर्देश देने की जरूरत नहीं। पर लोग लघु शब्द से चिपके रहे। पिछले दिनों जगदलपुर में सूत्र पत्रिका के संपादक कवि विजय सिंह ने जनपक्षधर पत्रिकाओं को लेकर एक महत्वपूर्ण परिसंवाद आयोजित किया था। ज्यादातर की राय थी कि जनपक्षधर शब्द ज्यादा सार्थक, उचित और दिशा सूचक है। फिर भी लोग उधर बहुत आकर्षित नहीं हुये। हालांकि अनेक पत्रिकायें जनपक्षधर शब्द के अर्थ को व्यक्त करते हुये सामने आई। खैर मुझे कृति ओर निकालने का लंबा अनुभव है। यह पत्रिका पहले भरतपुर से ओर नाम से प्रकाशित हुई। बाद में पंजीयन इसका कृतिओर नाम से ही मिल पाया। हमें दो तरह की दिक्कतें उठानी पड़ी। एक तो वित्तीय दूसरे, दिशावान रचनाओं की उपलब्धि। हम चाहते थे जिस उद्देश्य यानि सर्वहारा की पक्षधरता तथा लोक के प्रति सही सही दृष्टिकोण को पाठकों के सामने रखा जाये। इसलिए हमने इसे खुला मंच नहीं बनाया। उस संघर्ष की कहानी अलग है। बड़ी दिलचस्प भी।

आप ठीक कहते हैं कि जनपक्षधर पत्रिकायें सिमटती जा रही हैं। मैं इसका अर्थ यह लगाऊंगा कि उन्होंने स्वपक्ष त्यागा है। अपनी दृष्टि को धुंधलाया है। कारण कुछ भी हों बाजार की भव्यता और चमकदमक से प्रभावित होकर उन्होंने दिशा खोई है। यह इन पत्रिकाओं का बड़ा संकट है। अनेक लोगों को मैं जानता हूं जो कोरपुरोट से सांठगांठ कर अंक आयोजित करते हैं। हर अंक पर एक-डेढ लाख रूपया लाभ भी कमाते है। पर लेखकों को कुछ नहीं देते। यही वजह है सार्थक वैचारिक बहस और संघर्ष में अपेक्षित तीखापन और आवेगमयता नहीं है। खुलामंच रखने की वजह से कई बार वे लेखक भी छाप दिये जाते हैं जो जनविरोधी हैं। जिनके कोई बड़े सामाजिक सरोकार नहीं हैं। जो लेखन सिर्फ लिखने भर को करते हैं। जो साहित्य को समाज और समय निर्पेक्ष मानते हैं। उन्हें स्वयं आनंद प्राप्त होता है। उनका मानना है कि लेखक का धर्म सिर्फ लिखना है। पाठक का धर्म सिर्फ पढना। साहित्य के सामाजिक सरोकार वही है जिन से मुझे सुख की अनुभूति होती है। कविता को समझने के लिए कविता के बाहर जाने की जरूरत नहीं है। जो पृष्ठ पर है वहीं सब कुछ है। मैं इन्हीं अर्थो में उन्हें सिमटना मानता हूँ। जब हम स्वंपक्ष त्यागते हैं तो वह पत्रिका के संपूर्ण व्यक्तित्व पर असर डालता है। ऐसी दिशाहीन और चलताऊ पत्रिकायें अनेक भ्रम फैलाती हैं। लोकतंत्र में वे अपनी अग्रगामी भूमिका को यदि नहीं पहचानती तो उनका निकालना मात्र औपचारिकता है। या कुछ के लिए समझौते कर धन अर्जित करना।

राजीव रंजन : विजेंद्र एक चित्रकार के रूप में कैसे परिभाषित किये जायेंगे।

विजेंद्र : राजीव जी, सच पूछिये तो चित्रकला कभी मेरी प्राथमिकता रही है। अब वह मुझे कविता की पूरक लगने लगी है। बहुत पहले से मैं कविता और चित्रकला को निभाता रहा हूं। बीच में कविता और कवि कर्म की तैयारी ने इतना समय लिया कि चित्रकला कम हुई। पर मन से कभी नहीं उतरी। अन्य कलाओं की तरह चित्रकला भी पूरा श्रम-समर्पण और रियाज चाहती है। वह मैं कविता को दे पाया। चित्रकला को नहीं। जब मैं सेवानिवृत्त हुआ तो चित्रकला को समय दिया। चित्र बनाये। दिखाये किसी को नहीं। एक दो आत्मीय लेखक मित्रों ने जब चित्रों को देखा तो उन्होंने उन्हें निर्व्या‍ज सराहा। मुझ में आत्मविश्वास पैदा हुआ। कुछ ने सुझाव दिया कि चित्रों की प्रदर्शनी की जाये। अत: जयपुर के प्रसिद्ध जवाहर कला केंद्र में एक सप्ताह तक प्रदर्शनी रही। मैंने एक नया प्रयोग करके देखा। हर चित्र के नीचे चित्र को ध्वनित करती कवितायें भी हों। हिंदी कविताओं के अंग्रेजी में अनुवाद भी।

यह प्रयोग दर्शकों को बेहद पसंद आया। कहा ऐसा पहली बार देख रहे हैं। चित्रकार की ही स्वपरचित कवितायें हर चित्र के नीचे हों। मीडिया ने भी बहुत अच्छा नोटिस लिया। मुझे लगा कविता के लिए समग्र जीवन दे दिया तब भी लोग इतने आकर्षित नहीं हुये। पर चित्रों ने रातों रात चित्रकार बना दिया। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि चित्र प्रदर्शनी देखने वे लोग भी गये जिन्हें कला और कविता से लेना देना कुछ नहीं है। हमने अपनी कालोनी में निमंत्रण सबको दिये। जिन दुकानों से हम सामान लेते हैं उनको भी। आश्चर्य हुआ कि वे भी काम छोड़ कर प्रदर्शनी देखने पहुंचे। एक सप्ताह तक खूब गहमागहमी बनी रही। देश के हर कोने से लोग जवाहर कला केंद्र में आते हैं। उन सबने चित्रों को देखकर बड़ा सकारात्मक रूख व्यक्तु किया। इसी दौरान प्रदर्शनी की सफलता को देखकर मेरी पत्नी ऊषा जी का मन बना कि एक ऐसा भी संग्रह क्यों न हो जिसमें चित्र हो। कवितायें भी। यह बहुत खर्चीला प्रस्ताव था। मैंने कोई खास ध्यान नहीं दिया। यद्यपि यह विचार मेरे मन में बार बार कौंधने लगा। पर धन की व्यवस्था कैसे हो। कह किसी से न सका। पर ऊषा जी और मेरे पुत्र राहुल नीलमणि ने अपने वित्तीय साधन जुटा के पुस्तक छपाने का प्रबंध किया। आपके पास पुस्तक है ही। आप इसे देखें। बाद में मुझे पुस्तक देखकर बहुत प्रसन्न्ता हुई। परितोष भी। इस तरह पुस्तक के माध्यम से कुछ चित्र बचे रह सकते हैं। मैं प्रोफाशनल चित्रकार तो हूं नहीं। अत: पुस्तक के रूप में चित्रों का यह नया प्रयोग सुरक्षित रह पायेगा। बाद में पुस्तक की बहुत अच्छी समीक्षायें हिंदी की श्रेष्ठ पत्रिकाओं में जब छपी तो मेरा यह पक्ष देखकर मित्रों को आश्च र्य हुआ। चित्र मैं आज भी बनाता हूं। मेरे पुत्र के यहां ये सब चित्र आप देख ही रहे हैं। इच्छा् है चित्र बराबर बनाता रहूं। जब कविता से तवियत सकून चाहती है तो रंगों की दुनिया में खो जाना अच्छा‍ लगता है। समय पता ही नहीं लगता। मुझे चित्रकला में साहसिक अमूतर्न अच्छा लगता है। दूसरे, भूदृश्यों को मन ललकता रहता है। लगता है वे मेरे मन के स्थापत्य को कह रहे हों। साथ में रेखा चित्र भी बनाता हूँ। बहुत से बनाये हैं। मेरे अनेक आत्मीय मित्रों ने इसी पुस्तक से चित्र लेकर कविता के मुखपृष्ठ बनवाये हैं। पत्रिकाओं के मुख पृष्ठों पर दिये गये हैं। मेरे कविता संग्रहों, आलोचना कृतियों तथा डायरी के मुखपृष्ठों पर मेरे ही चित्र है। प्रकाशकों को बड़ी सुविधा होती है।

राजीव रंजन : ऐसा क्यों है कि कविता में आप मूर्त और चित्रकला में अमूर्त पसंद करते हैं?

विजेंद्र : वाह, राजीव जी क्या सवाल किया है आपने। मैं स्वयं भी नहीं जान पाया ऐसा क्यों है। जाने क्यों मुझे चित्रों में अमूर्त ही पसंद है। हो सकता है मेरे अवचेतन में इसका कोई कारण हो। मसलन मैं चाहता हूं उन्नत फोटोग्राफी से भी भिन्न हों चित्र। यह भी कि हर चित्र छाया प्रतीति ही न हो। कुछ सारतत्व को भी बनाये। रंगों के संयोजन से मन की बात कही जा सके। स्ट्रोक, लय, बुनावट, छाया प्रकाश तथा वास्तु शिल्पीय स्थापत्यु जैसी ध्वनि हो चित्रों में। एक बौद्विक चुनौती हो हर चित्र जैसे। चित्रों में संप्रेषण की बड़ी छूट है। हर दर्शक किसी भी चित्र के अर्थ अपने अनुसार लगा सकता है।

मैंने इस दौरान यह भी अनुभव किया कि चित्र लोगों को भले ही समझ न आये पर वे रंगों के संयोजन में जरूर खो जाते हैं। टैक्सचर कुछ लोगों को बांधता है। हर चित्र यदि हमें देखने में अच्छा लगे जिसे देखते रहने को तबियत करती रहे – मैं समझता हूं इतना पर्याप्त है। ये मेरे विचार है। अच्छे रंग संयोजन, संश्लिष्ट लय, उत्सुकतापूर्ण बुनावट, बोल्डं और नरम स्ट्रोक्सं, छाया प्रकाश की सांगतिक व्यवस्था, समग्र चित्र की टोन आदि से बहुत कुछ संप्रेषित हो जाता है। जो बात रंगों में कहने से रह जाती है उन्हें फिर रेखा चित्रों में कहने का यत्न करता हूं।

राजीव रंजन : विजेंद्र जी आपनें डायरी भी लिखी है। क्या अपनी डायरियों को प्रकाशित कराने की भी आपकी योजना है?

विजेन्द्र : 1960 से ही लगातार डायरी लिखता रहा हूं। जब मैं बनारस पढ़ता था तभी से डायरी लिखना शुरू किया। इसके पीछे जो कारक है व दिलचस्प है। हमारे अंग्रेजी के प्रोफैसर थे श्री मट्टू। काश्मीरी थे। नये नये ही आये थे। बाद में वह आई ए एस होकर चले गये। उन्होंने पहले ही दिन अपने व्याख्यान में भाषा सुधारने के लिए तीन बातें कहीं। पहली जिस भाषा को हम सुधारना चाहते है उसे खूब पढ़ना चाहिए। दूसरी बात, उसे लोगों को बोलते सुनना बहुत जरूरी है। तीसरी, उस भाषा को खूब लिखना चाहिए। मैं देहात से गया था। अंग्रेजी अच्छी करने की धुन सवार थी। सो अंग्रेजी की डायरी लिखना शुरू किया। पढ़ना और बोलना तो सामान्यत: चलता ही था। शुरू में थोड़ी कठिनाई हुई। नियमित रहना कठिन लगा। बाद में रियाज हो गया। हां, लिखते समय मैंने यह चिंता न की कि गलतियां होंगी। कैसे लिखे। बस लिखता गया। जो मन में आया। रोजमर्रा की बातें और भी अनेक घटनायें जो वहां होती थी। या जिनके बारे में सुनते थे। वह डायरी मेरे पास आज भी है। कागज लगभग गलने लगा है। कभी पढ़ता हूं तो हंसी आती है। बाद में मुझे हिंदी में लिखने की सूझी। धीरे धीरे अच्छा लगने लगा। एक अजब किस्म का संतोष् मिलता था। लगता था कुछ काम हो रहा है। वही आदत आज तक बनी हुई। इसी दौरान मैंने अनुभव किया कि लिखते समय कुछ ऐसी बातें मन में कौंधती हैं जिनके बारे में कभी सोचा तक नहीं है। खैर, संकोच से सबसे पहले मेरी डायरी के कुछ पृष्ठ लहर पत्रिका में छपे। यह अजमेर से निकलती थी। प्रकाश जैन इसके संपादक थे। मासिक पत्रिका थी। बहुत नियमित निकलती थी। उस समय नव लेखन को समर्पित पत्रिकाओं में एक वह भी थी। उस समयके महत्वत पूर्ण सभी लेखक उसमें छपते थे। उस समय पत्रिकायें बहुत कम थी। जब डायरी छपी तो कई मित्रों के अच्छेल पत्र आये। कई ने सराहा। कुछ ने सुझाव दिये। कुछ ने बराबर लिखने को कहा। त्रिलोचन ने जब देखी तो उन्हेंय गद्य बहुत अच्छान लगा। इस तरह मुझे और भी लिखने की प्रेरणा मिलती रही। आगे चलकर गंभीरता आने लगी। कवि कर्म, कविता, सौंदर्यशास्त्र की समस्या यें जो मैं सुलझाना चाहता था उनके बारे में लिखा। कुछ चरित्रों के बारे। कुछ कविता के लिए नोट्स की तरह लिखा। अपनी यात्राओं के बारे में भी लिखा। समकालीन साहित्यत की गतिविधियों के बारे में भी। जब पत्रिकाओं के बराबर छपने लगी तो प्रकाशकों ने छापने की पहल की। उसी का सफल है मेरी डायरी की तीन जिल्द आ चुकी हैं। एक कवि की अंतर्यात्रा, शिल्पायन, दिल्ली। दूसरी, धरती के अदृश्य दृश्य, अभिषेक प्रकाशन, दिल्ली्। तीसरी, सतह के नीचे, वांगमय प्रकाशन, जयपुर। अभी भी लिखता हूं। लगभग दो ढाई हजार पृष्ठ हो चुके हैं। उसी में से चयन करके छपने को दे दिया है। पहली पुस्तक की बहुत ही अच्छी प्रतिक्रिया है। लोग खूब पढ रहे हैं। बहुत ही अच्छी समीक्षा भी आने लगी हैं। मेरी डायरी में एक खास बात यह है कि कविता का संग कभी नहीं छूटता। बीच बीच में जब कविता कौंधती है तो उसे आने देता हूं। यह बात प्रकाशकों को भी अच्छी लगती है। कहते हैं ऐसी डायरी पहली बार देखी है जिस में अंतराल से कवितायें स्वाद बदलती रहती हैं। आपको कहीं मिले तो पढना। मेरे लिये डायरी अब एक साहित्यिक विद्या बन चुकी है।


राजीव रंजन : अब इंटरनेट पर हिन्दी नें दस्तक दी है। साहित्य शिल्पी और अन्य ई-पत्रिकायें साहित्य की सेवा इस माध्यम से कर रही हैं। इंटरनेट पर हिन्दी और साहित्य को ले कर आपके विचार?

विजेन्द्र : इंटरनेट विज्ञान की अदभुत देन हैं। हिंदी को लोकप्रिय बनाने में यह महत्व्पूर्ण भूमिका निभायेगा। महत्वयपूर्ण बात यह और है कि हिंदीतर लेखक जो हिंदी में महत्‍वपूर्ण काम कर रहे हैं- करा रहे हैं उनको तो विरल लाभ होगा। मैंने अनुभव किया है। कई शोध करने वालों को किसी लेखक के बारे में तत्काल जानकारी नहीं मिल पाती। खास तौर पर दक्षिण भारत में जहां कुछ लोग हिंदी में बड़ी लगन और उत्सुकता से काम कर रहे हैं - उन्हें लेखकों-उनकी कृतियों के बारे में जानकारी पाने के लिए बड़ी कठिनाई उठानी पड़ती है। मेरे नाटकों और कविता पर काम करने वाले शोधकर्ताओं ने यह चिंता व्यक्त की। मैंने फिर उन्हें अपनी कृतियों और जीवन के बारे में लिख कर भेजा। यह एक मिसाल है। जाने कितने लोग इस कठिनाई से गुजरते होगे। इंटरनेट उन्हें तत्काल और अद्यतन सुचना देकर उनकी कठिनाई दूर करेगा। हां, इसके लिए इंटरनेट पर पत्रिका प्रकाशित करने वालों को भी सजग रहना पड़ेगा। सूचनायें अद्यतन हों। प्रामाणिक भी हों। एक अच्छे संपादक को वैसे भी बड़ा सतर्क और सावधान होना पड़ेगा। यही नहीं हिंदी का लेखक इस माध्यकम से विश्व के किसी भाग में अपनी रचनात्महक उपस्थिति बना पायेगा। अब तक सरकारी एजेंसियां उसका प्रचार प्रसार तंत्र यह काम बड़ी अक्षमता से करना रहा है। मेरे कुछ मित्रों ने विदेश यात्रा के बाद बताया कि वहां हिंदी के उन लोगों के नाम प्रचलित है जिन्हें यहां कोई लेखक मानने को तैयार नहीं है। उन्हें वहां हिंदी के प्रतिनिधि के रूप में अहमियत मिली हुई है। इस प्रसंग में इंटरनेट के संपादक की रचनात्मंक भूमिका पर बहुत कुछ निर्भर करेगा। यहां कुछेक बड़े पदों पर काम करने वाले आकस्मिक लेखकों को वहां वरीयता की सूची में रखा गया है। मुझे उम्मीद है इंटरनेट पर ऐसा नहीं होगा।

आप जैसे जागरूक और रचनाशील संपादक ऐसा नहीं होने देंगे। मैं एक अपनी ही मिसाल देता हूं। आपसे मेरा परिचय फोन पर ही था। मैं आपसे मिलना चाहता था। मैंने आपको बताया कि मैं गुड़गांव अमुक दिनांक को पहुंच रहा हूं। आपने बड़ी तत्पारता से गुड़गांव आने का कार्यक्रम बनाया। हम लोगों ने कई घंटों तक साहित्य और साहित्य। कर्म को लेखकर बड़ी लंबी और रूचिकर बातें की। मुझे दरअसल इतनी अर्थवान और सामयिक बातों की कभी उम्मीद न थी। फिर मैंने पाया आप में इंटरनेट के लिए कितना पैशन है। एक रचनात्मक बेचैनी, उत्सुककता। कवि के मन की गहराइयों तक जाने की लालसा। आपके साथ जो अन्य साथी आये वे भी बड़े उत्सुक दिखे। यह ही प्रतिबद्वता है। आप चूंकि कवि हृदय हैं इसलिए संपादन के दायत्वि को इतनी गंभीरता और दायित्वे से निभा पर रहे हैं। मुझे कहीं कुछ आत्माप्रदर्शन या यांत्रिक चलन आपकी बातों में नही लगा। हम लोगों ने बड़ी आत्मीय अनौपचारिकता से कई घंटों तक विविध विषयों पर बात चीत की। जो बातचीत हुई उसे इंटरनेट पर कभी कोई देख परख सकता है। उस पर टिप्पाणी कर सकता है। इसे और समृद्व और अर्थवान बना सकता है। यह कार्य बड़ी जल्दी संपन्न हो जायेगा। आपने मुझ जैसे सामान्य लेखक की चिंता की – महानगर के लोग क्यों चिंता करने लगे। मैं आपका आभारी हूं।

राजीव रंजन : साहित्य शिल्पी के लिए आपका संदेश।

विजेंद्र : सबसे पहले मैं आपके द्वारा चलाये जा रहे इस महतवपूर्ण कार्य के लिए बधाई देता हूं। मैंने पहली बार किसी इंटरनेट के संपादक से आमने सामने होकर इतने घंटों तक अनौपचारिक बातचीत की है। मुझे बहुत अच्छा लगा। आगे यह काम निरंतर विकसित हो। इससे हिंदी के सभी महत्वपूर्ण लेखक जुड़ सकें। मेरा विनम्र सुझाव है कि इस कार्य को दूरदराज इलाकों – जनपदों तक ले जायें। उन स्थानों पर अनेक युवा लेखक अपने जनपदों में बेहतर कार्य कर रहे हैं। उन्हें अपनी पहचान बनाने में बड़ी कठिनाइयों हैं। राजधानियों के महानगरों में जमघट है। एक अच्छे कर्मठ संपादक का यह भी दायित्व है कि वह जहां जाये वहाँ अक्सर लोग जाना पंसद नहीं करते या जाते नहीं। यह काम थोड़ा कठिन हो सकता है। पर होगा बहुत महत्वपूर्ण। हमने कृतिओर के माध्यम से यह करके देखा है। जनपदों में युवा लेखकों में बडी संभावनायें हैं। वे सीधे यथार्थ से जूझ रहे हैं। बड़ा संघर्ष है। यह अतिकथन न होगा यदि कहूं भारत की असली रचनात्मसक जीवंतता जनपदों में बिखरी पड़ी है। आप जानते हैं सुदर वन फूल खिलते हैं, पर अनदेखे मुरझा जाते हैं। उनके काम की ध्वानियां वहां के वातावरण में गूंजती रहती हैं। लोक में बिखरे प्रतिभाशील लेखकों को इंटरनेट के माध्याम से हम उनकी पहचान करा सकते हैं। इसके लिए वहां के स्थानीय लेखकों का सहयोग लिया जा सकता है। इंटरनेट को छायाप्रतीतियों में न उलझकर सारतत्व को बेहतर प्रस्तुति के साथ सामने लाना जरूरी है। इस से लेखकों का ही भला न होगा, आप हिंदी की बड़ी सेवा करेंगे। अपनी जातीय चेतना को समृद्व करने के लिए यह सार्थक कदम होगा। इससे हमारे समूचे राष्ट्रज में एक जरूरी भावात्मक एकता की फिजा बनेगी। मैं हर तरह के सहयोग के लिए प्रतिबद्ध हूँ।
*******

12 comments:

  1. बहुत लम्बी बातचीत है। मैं अच्छी तरह पढ कर ही विचार प्रस्तुत करूंगा। एक बार में पूरा पढ गया और कई प्रश्न उठे है। राजीव जी मैं आपसे कई विषयों पर चर्चा भी करना चाहूंगा। हाँ अच्छी बातचीत है।

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  2. बेहतरीन प्रस्तुति... विजेंद्र जी काफी खुलकर बतियाए है इसमें...

    उत्तर देंहटाएं
  3. rajiv ji aap ne ek vyktiv v krititv ke bich kee bahs ko fir jida kr diya hai aur yh kbhi smapt bhi nhi hogi kyon swarthisahityakar schchai ko kbhi nhi swikar krenge ya dohre jivn ko hi mandnd ke roop me sthapit krne ka prytn krte rhenge
    aap ka sakshat ka apna hi alg andaj hai
    bahut hi sfltm sakshat kar liya hai
    bahut 2 bdhai

    उत्तर देंहटाएं
  4. साक्षात्कार में छाया प्रतीति और सारतत्व को ले कर कही गयी बाते महत्व की लगी। विजेन्द्र जी मॉडरेट वामपंथी लगते हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  5. सुरुचिपूर्ण और सार्थक बातचीत..


    .कई विषयों पर खुलकर आया
    आदरणीय विजेन्द्र जी का व्यक्तित्त्व..अच्छा लगा...

    उन्हें प्रणाम...



    और राजीव जी,
    आपका आभार...


    .

    उत्तर देंहटाएं
  6. Very impressive interview. Thanks Vijendra ji.

    उत्तर देंहटाएं
  7. PRASHNON AUR UTTARON , DONON NE PRABHAVIT KIYA
    HAI . PRASHNON AUR UTTARON KAA AESA SUNDAR
    SANGAM KABHEE - KABHEE DEKHNE KO MILTA HAI .

    उत्तर देंहटाएं
  8. विजेन्द्र जी नेंकहा कि विचारधारा किसी भी लेखक की ताकत है उसका विश्वंदृष्टिकोण उससे प्रतिबिंबित होता है। विचारधारा से डरने की जरूरत नहीं। कुछ लेखक अपने निहित स्वार्थ के लिए विचारधारा का विरोध करते रहते हैं। विचारधारा का विरोध करना भी तो एक प्रकार की विचारधारा है। उसे हम अपने व्यक्तित्व का जैविक हिस्सा बनाये। ईमानदारी से उसे कलाकृति में व्यक्त होने दें। वह एक प्रकार से हमारे लिए सर्चलाइट है अंधेरे में रोशनी।

    यहाँ मुझे लगता है विचारधारा के कट्टरपन पर वे बात करना भूल गये। राजीव जी मुझे किसी लेखक से यह उत्तर दिलवाईये कि एक की विचारधारा दूसरे को क्यों नहीं सुहाती और विमर्श की गुंजाईश भी इन दिनों विचारवानों में कम ही देखी जाती है।

    विजेन्द्र जी के निजी विचार पठनीय हैं।

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  9. बहुत ही प्रासंगिक बात-चीत है। राजीवजी के प्रश्न और विजेन्द्रेजी के विचार दोनों ही सोचने पर विवश करते हैं ।
    -अमरेन्द्र

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  10. Vijyendraji ka parichit pahle se tha,parantu unake bare me vistrat jankari aaj hi mili.Ab main unka
    anugami hoon.

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  11. bhaut hi achha or prasangik sakshatkar hai.prabhavit kerne wala hai. sarthak batcheet se bhahut se baate ubhar ker aayi hai jo disha dene wali hai. mera unhe naman.
    25 may 2011

    उत्तर देंहटाएं

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