जगत की सृष्टि- आदि मे परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की। [बाइबल मे उत्पति 1:1]
सब कुछ उसी के द्वारा उत्पन्न हुआ और जो कुछ उत्पन्न हुआ, उसमे से कोई भी वस्तु उसके बिना उत्पन्न न हुआ है। [यूहन्ना 1:3]

परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया, नर और नारी करके उसने मनुष्यों की सृष्टि की और आशीष दी। [उत्पत्ति 1:27,28] किंतु लोभ, मोह अहंकार, घृणा, अत्याचार और स्वार्थ का प्रभाव काल क्रमानुसार बढ़्ने लगा। मनुष्य ने प्रेम, न्याय और शांति को भुला दिया। फलत:, प्रेम का पुन: सृजन करने के लिए ईश्वर ने अपने पुत्र ‘यीशुमसीह’ को इस धरती पर मनुष्य रूप मे उत्पन्न किया।

रचनाकार परिचय:-
अजय कुमार सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया) में अधिवक्ता है। आप कविता तथा कहानियाँ लिखने के अलावा सर्व धर्म समभाव युक्त दृष्टिकोण के साथ ज्योतिषी, अंक शास्त्री एवं एस्ट्रोलॉजर के रूप मे सक्रिय युवा समाजशास्त्री भी हैं।
यीशु मसीह का जन्म-कथा:- आज से लगभग दो हजार वर्ष पूर्व मध्य-पूर्व एशिया के एक देश ‘पलिस्तीन’(अब इस्राइल) के एक गाँव बैतलहम मे यीशु मसीह का जन्म हुआ। जब यीशु मसीह की माता मरियम की मंगनी यूसुफ( यीशु के पिता) के साथ हो गई तो इनके इकठ्ठे होने से पहले वह पवित्र आत्मा की ओर से गर्भवती पाई गई। यूसुफ धर्मी थे और वे मरियम को बदनाम नहीं करना चाहते थे, इसलिए चुपके से त्याग देने की मनसा की। जब वो इन बातो को सोच ही रहे थे तब ‘प्रभु का स्वर्गदूत उन्हें स्वप्न मे दिखाई देकर कहने लगा, हे यूसूफ दाउद की संतान, तू अपनी पत्नी मरियम को अपने यहाँ ले आने से मत डर; क्योंको जो उसके गर्भ मे है, वह पवित्र आत्मा की ओर से है। वह पुत्र जनेगी और तू उसका नाम यीशु रखना; क्योंकि वह अपने लोगों का उनके पापों से उद्धार करेगा। यूसुफ नींद से जागकर प्रभु के दुत की आज्ञा अनुसार अपनी पत्नी को अपने यहाँ ले आया। और जब तक वह पुत्र न जनी तब तक वह उसके पास न गया। जन्म के बाद उस विशेष बालक का नाम “यीशु” रखा।

जब यहूदिया के बैतलहम मे यीशु का जन्म हुआ तब कई ज्योतिषी यरूशलेम मे आकर पूछने लगे कि यहूदिया का राजा जिसका जन्म हुआ है कहाँ है? क्योकि हमने पूर्व में उसका तारा देखा है, और उसको प्रणाम करने आए है। यह सूनकर वहाँ के राजा ‘हेरोदेस’ सहित सारा यरूशलेम घबरा गया। तब राजा ‘हेरोदेस’ ने ज्योतिषियो को चुपके से बुलाकर उनसे पूछा, कि तारा ठीक किस समय दिखाई दिया था। उसने यह जानकर ज्योतिषियों को बैतलहम भेजा कि “जाकर उस बालक उस बालक के बिषय मे ठीक मालूम करो और जब वह मिल जाए तो मुझे समाचार दो ताकि मै भी आकर उसको प्रणाम करू।“ वे राजा की बात सूनकर चले गए। जब वे चले तो जो तारा पूर्व मे देखा था, वह उनके आगे आगे चला और जहाँ बालक था उस जगह के उपर पहुँच कर ठहर गया। उस तारे को देखकर वे अति आनन्दित हुए। और उस घर मे पहुँचकर उस बालक को उसकी माता मरियम के साथ देखा और मुँह के बल गिरकर उसे प्रणाम किया। फिर अपना-अपना थैला खोलकर उसको सोना, और लोहबान, और गन्धरस की भेंट चढ़ाई| स्वपन की चेतावनी पाकर कि “राजा हेरोदेस के पास फिर न जाना, वे दूसरे मार्ग से होकर अपने देश को चले गए|”
उनके चले जाने पर यूसुफ को प्रभु के एक दूत ने स्वप्न मे दिखाई देकर कहा, उठ; उस बालक को और उसकी माता को लेकर मिस्र देश को भाग जा; और जब तक मै तुझ से न कहूँ, तब तक वही रहना, क्योकि राजा हेरोदेस इस बालक को ढूढ़ने पर है ताकि उसे मरवा डाले| इसके बाद यूसुफ रात ही को उठकर बालक और उसकी माता को लेकर मिस्र को चल दिए| जब राजा हेरोदेस ने यह देखा कि ज्योतोषियों ने मेरे साथ ठठ्ठा किया है, तब वह क्रोध से भरकर, अन्य ज्योतिषियों से ठीक ठीक पूछे हुए समय के अनुसार बैतलहम और उसके आस पास के सब लड़को को जो दो वर्ष के या उससे छोटे थे, मरवा डाला| राजा हेरोदेस के मरने तक यूसुफ मिस्र में ही सपरिवार रहे| फिर पुन: स्वप्न में चेतावनी पाकर गलील देश में चले गए और नासरत नाम के नगर मे जा बसे| कलांतर मे यीशु नासरी कहलाए| ताकि वह वचन पूरा हो, जो भविष्यवक्ताओं के द्वारा कहा गया था कि वह नासरी कहलाएगा|

यीशु मसीह का लालन पालन‌ नासरत नगर में ही हुआ| जब वे तीस वर्ष के थे तो अपना कार्य आरंभ किया|

प्रभु यीशु का पहाड़ी उपदेश:- इन उपदेशों को पढकर हम जान सकते है कि परमेश्वर की इच्छा के अनुसार हमें कैसा ‌‌‌‌‌जीवन व्यतीत करना चाहिए| इस शिक्षा ने विश्व के अनेक महान नेताओं को प्रभावित किया है| हमारे राष्टपिता महात्मा गाँधी उनमे से एक है| हम सब को चाहिए कि हम भी प्रभु यीशु का यह महान पर्वतीय प्रवचन पढ़े और इसकी शिक्षा के अनुसार जीवन व्यतीत करें|

जनसमूह को देखकर यीशु पहाड़ पर चढ़ गए| जब वह बैठ गये तब शिष्य उनके समीप आए| यीशु इन निम्नलिखित शब्दों में उन्हे उपदेश देने लगे:-

धन्य वचन- “धन्य है वे जो मन के दीन है, क्योंकि परमेश्वर का राज्य उनका है| धन्य है वे जो शोक करते है क्योंकि उन्हें शांति प्राप्त होगी| धन्य है वे जो विनम्र है क्योंकि वे पृथ्वी के अधिकारी होगे| धन्य है वे जो धर्म के भूखे और प्यासे है क्योंकि वे तृप्त किए जाएगे| धन्य है वे जो दयावान है क्योंकि उन पर दया होगी| धन्य है वे जिनके हृदय शुद्ध है क्योंकि वे परमेश्वर को देखेगें| धन्य है वे जो शांति की स्थापना करते है, क्योंकि वे परमेश्वर के पुत्र कहलायेगे| धन्य है वे जो धर्म के कारण सताए जाते हऐ क्योंकि परमेश्वर का राज्य उनका है|

नमक और दीपक से शिक्षा:- तुम पृथ्वी के नमक हो; परंतु यदि नमक का स्वाद बिगड़ जाए, तो वह किस वस्तु से नमकीन किया जाएगा? फिर वह किसी काम का नही केवल इसके कि बाहर फेका जाए और मनुष्यों के पैरो तले रौदा जाए|

तुम जगत की ज्योति हो| जो नगर पहाड़ पर बसा है छिप नही सकता| मनुष्य दीपक जलाकर पैमाने के नीचे नही वरन्‌ दीवट पर रखते है तब उससे घर के सब लोगो को प्रकाश पहुँचाता है। इसी प्रकार तुम्हारी ज्योति मनुष्यों के सम्मुख इस प्रकार चमकना चाहिए कि वे तुम्हारे भले कार्यों को देखकर तुम्हारे पिता की जो स्वर्ग मे है, स्तुती करें।
क्रोध और हत्या:- तुमने सुना है कि पूर्वजों से कहा गया था, “हत्या न करना, जो कोई हत्या करेगा न्यायालय मे दंड मिलेगा।“ किंतु मै तुमसे कहता हूँ जो कोई अपने भाई पर क्रोध करेगा , उसको न्यायलय मे दण्ड मिलेगा; जो अपने भाई को अपशब्द कहेगा, उसको धर्म महासभा मे दण्ड मिलेगा, और जो कोई अपने भाई से- “अरे मुर्ख” कहेगा वह अग्निमय नरक मे डाला जाएगा। पहले अपने अप्रसन्न भाई से मेल करो, फिर आकर भेट अर्पण करो।
दुराचार:- तुमने सुना है कि कहा गया था,”व्यभिचार न करना।“ किंतु मै तुमसे कहता हूँ; जो कोई पुरूष किसी स्त्री पर बुरी इच्छा से आँख लगाए तो वह मन में उसके साथ व्यभिचार कर चुका। यदि तुम्हारी दाहिनी आँख तुम्हारे पतन का कारण है तो उसे निकाल कर फेंक दो। तुम्हारा कल्याण इसी में है कि भले ही तुम्हारा एक अंग नष्ट हो, पर समस्त शरीर नरक मे न डाला जाए। यदि तुम्हारी दाहिना हाथ तुम्हारे पतन का कारण है तो उसे काटकर फेंक दो तुम्हारा कल्याण इसी में है कि भले ही तुम्हारा एक अंग नष्ट हो, पर समस्त शरीर नरक मे न पड़े।

तलाक:- कहा गया था,” जो पति अपनी पत्नी को तलाक दे वह उसे त्यागपत्र लिखकर दे।“ किंतु मै तुमसे कहता हूँ; व्यभिचार को छोड़कर यदि किसी कारण से कोई पति अपनी पत्नी को तलाक देगा तो वह उसे व्यभिचार के लिए बाध्य करता है, और तलाक पाई हुई स्त्री से विवाह करेगा, वह भी व्यभिचार करता है।

प्रतिशोध:- तुमने सुना है कहा गया था, “आँख के बदले आँख और दाँत के बदले दाँत।“ किंतु मै तुमसे कहता हुँ, दुष्ट का विरोध मत करो वरन् जो तुम्हारे दाहिने गाल पर थप्पड मारे, उसके आगे दूसरा भी फेर दो। जो तुम पर नालिश करके तुम्हारा कुरता लेना चाहे उसे अंगरखा भी ले लेने दो। यदि कोई तुम्हे बेगार मे एक किलोमीटर ले जाए तो उसके साथ दो किलोमीटर चले जाओ। जो तुमसे माँगे उसे दो, और जो तुमसे उधार लेना चाहे उससे मुँह न मोड़ो।

शत्रुओं से प्रेम करना:- तुमने सुना है कि कहा गया था, “अपने पड़ोसी से प्रेम करना और अपने शत्रु से द्वेष रखना।“ किंतु मै तुमसे कहता हूँ अपने शत्रुओं से प्रेम करो और अपने सतानेवालो के लिए प्रार्थना करो, जिससे तुम अपने पिता की, जो स्वर्ग में है, संतोष बन सको क्योंकि वह दुर्जन और सज्जन दोनो पर अपना सूर्य उदय करता है तथा धार्मिक और अधार्मिक दोनो पर वर्षा करता है।

गुप्त दान:- जब तुम दान दो तो तुम्हारा कार्य इतना गुप्त हो कि तुम्हारा बायाँ हाथ भी न जाने कि दाहिना हाथ क्या कर रहा है। तुम्हारा दाब गुप्त हो, तब तुम्हारा पिता, जो गुप्त कार्यों को भी देखता है, तुम्हे प्रतिफल देगा।

गुप्त प्रार्थना:- जब तुम प्रार्थना करुं तब अपने कमरे मे जाओ द्वार बंद करो और अपने पिता से जो गुप्त स्थान मे है प्रार्थना करो। क्योंकि तुम्हारा पिता तुम्हारे माँगने से पूर्व की जानता है कि तुम्हे किन वस्तुओं की आवश्यकता है।

उपवास:- जब तुम उपवास करो तब पाखंडियो के समान अपने मुख पर उदासी न लाओ, क्योंकि वे अपना मुख मलीन किए रहते है जिससे वे मनुष्यों को उपवासी दिखाई दें। परंतु जब तुम उपवास कर रहे हो तब अपने सिर पर तेल मलो और अपना मुँह धो डालो जिससे मनुष्यों को नही वरन अपने पिता को, जो गुप्त है उपवासी दिखाई को। और तुम्हारा पिता जो गुप्त कार्य को भी देखता है तुम्हे प्रतिफल देगा।

प्रकाश और अंधकार:- शरीर का दीपक आँख है। यदि तुम्हारी आँख ठीक है तो तुम्हारा समस्त शरीर प्रकाशमय होगा, परंतु यदि तुम्हारी आँख खराब हो जाए तो तुम्हारा समस्त शरीर अंधकारमय होगा। यदि तुम्हारे भीतर की ज्योति ही अंधकार हो तो अंधकार कितना घोर होगा।

धर्म और धन:- कोई मनुष्य दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता या तो वह एक के प्रति द्वेष रखेगा और दूसरे से प्रेम करेगा अथवा एक के प्रति निष्ठा रखेगा और दूसरे को तुच्छ जानेगा। तुम परमेश्वर और धन दोनो की सेवा नही कर सकते।

चिंता से मुक्ति:- मै तुमसे सच कहता हूँ अपने जीवन से लिए चिंता न करना कि तुम क्या खाओगे और क्या पीओगे, और न शरीर के लिए कि क्या पहिनोगे। क्या भोजन की अपेक्षा जीवन, और वस्त्र की अपेक्षा शरीर अधिक मूल्यवान नही है? आकाश की पक्षियो को देखो; वे न तो बोते है, न काटते है और न खलिहान मे रखते है, परंतु तुम्हारा स्वर्गिक पिता उनका पालन करता है। क्या तुम उनसे श्रेष्ठ नहीं हो? पहले परमेश्वर के राज्य की खोज करो और उसकी इच्छा के अनुरूप आचरण करो तो ये सब वस्तुएँ भी तुम्हे मिल जाएँगी।

दूसरो पर दोष लगाना:- दोष न लगाओ जिससे तुम पर दोष न लगाया जाए, क्योंकि जिस माप से तुम दोष लगाते हो उसी माप से तुम पर भी दोष लगाया जाएगा और जिस नाप से तुम नापते हो, उसी नाप से तुम्हारे लिए नापा जाएगा।

प्रार्थना के संबंध मे प्रतिज्ञा:- माँगो तो दिया जाएगा। ढूँढ़ो तो तुम पाओगे। खटखटाओगे तो तुम्हारे लिए खोला जाएगा। जो कोई माँगता है, उसे मिलता है, जो ढुढ़ता है, वह पाता है, और जो खटखटाता है उसके लिए खोला जाता है।

उत्तम आचरण:- जैसा तुम चाहते हो कि मनुष्य तुम्हारे साथ करे वैसा ही तुम भी उनके साथ करो, क्योंकि व्यवस्था शास्त्र और नबियों की यही शिक्षा है।

यीशु और चमत्कार:- जब यीशु कफरनहूम आए तो एक सूबेदार ने उनके पास आकर बिनती की और उसका सेवक बहुत दुखी था चंगा हो गया। यीशु पतरस के घर आकर उसकी सास जो ज्वर मे पडी थी का केवल हाथ छुआ और उसका ज्वर उतर गया। जब संध्या हुआ तो उनके पास बहुत से लोग आए जिनमे दुष्टात्माएँ थी एवं बहुत से बिमारों को चंगा किए। जब यीशु नाव पर चढ़े तो उनके चेले भी उनके साथ उनके पीछे साथ चले किंतु झील में एक ऐसा तुफान उठा कि नाव लहरो से ढ़ंपने लगी, पर यीशु सो रहे थे इसी बीच चेलो ने उन्हें जगाया और बचाने की बिनती की तब यीशु ने कहा; हे अल्पविश्वासियों, क्यों डरते हो? यीशु ने उठकर आँधी एवं पानी को डांटा और सब शांत हो गया। सभी आश्चर्य चकित होकर कहने लगे यह कैसा मनुष्य है जो आँधी और पानी भी उसकी आज्ञा मानते है।

एक स्त्री जो बारह वर्ष से रोगग्रस्त ठीक उसका लहू बहता था उस स्त्री ने यीशु के वस्त्र के ऑचल को छू लिया और वह तुंरत चंगी हो गई। यीशु उस सरदार के घर पहुँचा जिसकी लड़की मर गई ठीक किंतु लड़की का हाथ पकड़ा और वह जी उठी। इस बात की चर्चा उस सारे देश मे फैल गई। जब यीशु आगे बढ़े तो दो अन्धे की करूण प्रार्थना पर उनकी ऑखे छुकर उनकी ऑखे खोली और वे ठीक हो गए। किंतु, यीशु ने चेतावनी दिया कि कोई उनकी इस बात को न जाने। किंतु, उन्होने निकलकर सारे देश में उनका यश फैला दिया। यीशु ने एक गुंगे को ठीक किया और वह बोलने लगा। इस प्रकार यीशु सब नगरो और गाँवो मे घूमते थे। वह उनके सभागारो में उपदेश करते थे और सुसमाचार का प्रचार करते हुए लोगों की हर प्रकार से बिमारी और दुर्बलता को दुर करते थे।

यीशु केवह “पाँच रोटी और दो मछलियों” से पॉच हजार से ज्यादा लोगों को एक सूनसान जगह पर भोजन कराते है। इस प्रकार सभी तृप्त होकर भोजन ग्रहण करते है। जब लोगों को विदा करने के बाद प्रार्थना करने के लिए अलग पहाड़ पर चले गए। इससे पहले चेलो लो नाव पर चढ़ाया किंतु नाव तेज लहरों से झील के बीच डगमगा रही थी। इसी बीच राह के चौथे पहर यीशु झील पर चलहे हुए चेलो के पास आए। सभी चेले भूत समझ घबड़ा गए। यीशु ने तुरंत उनसे बात की इससे सभी शांत हो गए और आश्चर्य से भरकर दण्डवत करके कहा “सचमुच आप परमेश्वर ले पुत्र है।“

यीशु की अंतिम यात्रा:- यीशु मसीह के यश और प्रभाव से, ईष्या करने वाले उन्हें पकड़ने के लिए अवसर की ताक मे थे। एक दिन यीशु के बारह शिष्यों मे से एल “यहूदा इस्करियोती” महायाजको के पास गया और कहा कि “यदि मै यीशु को पकड़वा दूँ तो तुम मुझे क्या दोगे?” उन्होने उसे तीस चाँदी के सिक्के तौल कर दिए। यहूदा उसी समय से यीशु को पकड़वाने का अवसर ढूढने लगा। उसने महायाजकों को संकेत बता दिया था कि “जिसको मै चूमू यही यीशु है, उसे पकड़ लेना।“ फिर एक दिन यहूदा मौका पाकर तुरंत यीशु के पास आकर बोला “हे रब्बी नमस्कार।“ और यीशु को चूमा। यीशु ने कहा,”हे मित्र, जिस काम के लिए तुम आए हो, उसे कर लो।“ तब उन्होने पास आकर यीशु पर हाथ डाले और उन्हें पकड़ लिया। यीशु को जान से मारने की नियत से बाँधा और ले जाकर राज्यपाल पीलातुस के हाथ सौप दिया। जब यीशु के पकड़वाने वाले यहूदा ने देखा कि यीशु दोषी ठहराया गया है तब वह पछताया और तीस चाँदी के सिक्के महायाजको और धर्मवृद्धों के पास लौटा लाया। उसने कहा कि “मै निर्दोष व्यक्ति को वध के लिए पकड़वाकर पाप किया है।“ तब महायजको और धर्मवृद्धों ने कहा,”हमे क्या? तू ही जान।“ इसपर यहूदा ने उन सिक्को को मन्दिर मे फेककर चला गया और जाकर अपने आप को फाँसी दे दी। इसके बाद यीशु मसीह को कई तरह की यातनाएँ दी गई। सैनिको ने यीशु का उपहास किया। यीशि के कपड़े उतारकर लाल चोंगा पहनाया। उन्होने काँटो का मुकुट गुंथकर उनके सिर पर रखा। यीशु के मुह पर थुका और सरकाण्डा लेकर उनके सिर पर मारने लगें फिर लाल चोंगा उतार कर यीशु के कपड़े उन्हें पहना कर क्रूस पर चढ़ाने के लिए ले गए। यीशु का दोष पत्र उनके सिर पर लगा था;”यह यहुदियो का राजा यीशु है।“ उसके पश्चात यीशु के साथ दो डाकू एक दाहिनी और दूसरा बाई ओर क्रूसो पर चढ़ाए गए। इस प्रकार दोपहर से तीसरे पहर तक पूरे प्रदेश मे अंधेरा छाया रहा। तीसरे पहर के समय यीशु ने उँची आवाज में पुकारकर कहा “हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तू ने मुझे क्यों छोड़ दिया?” तब यीशु ने उँची स्वर मे पुकार कर प्राण त्याग दिए। इसके बाद शाम को यूसुफ नामक एक धनी मनुष्य जो यीशु का चेला था पीतालुस के पास जाकर शव दफनाने के लिए माँगा। शव दफनाने के बाद मरियम मगदलीनी और दूसरी मरीयम कब्र के सामने बैठी ठीक पहरेदार कब्र की पहरा देते रहे पर सब्त के पहले सप्ताह मरीयम कब्र देखने आई पर, उस समय बड़ा भुकम्प हुआ। क्योंकि प्रभु का एक दुत स्वर्ग से उतरा और कहा मै जानता हूँ तुम प्रभु यीशु जो क्रुस पर चढाए गए थे, को ढुढ़ती हो। यह यहाँ नहीं है परंतु, अपने वचन के अनुसार जी उठे है। इस प्रकार यीशु मसीह संसार में आए और प्रेम का संदेश दिया।

“चारो तरफ शांति और प्रेम का संदेश फैले” आमीन्।

4 comments:

  1. bhai jis prmeshwr ki aap bat kr rhe hain us ne prithvi ko chpti bnaya tha jb yh asliyt hi use pta nhi thi to fir vh eeshwr kaise ho gya aur baki bateb to bad kee hain aur n hi iswvr ke putr ka ke jmn kee koi titi pta hai yh to mani hui hai haise dehat me mastr ji apni mrji se bchche ki jmn tithit lik dete hain aap in tthyon pr bhi vichr kro
    aise hi aur bhi tthy hain jo aadhunik khoj ke bad samne aa rhe hain

    उत्तर देंहटाएं
  2. चारो तरफ शांति और प्रेम का संदेश फैले” आमीन्।

    आभार...अजय जी...

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
    एक आत्‍मचेतना कलाकार

    उत्तर देंहटाएं

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