महानदी के तटवर्ती ग्राम्यांचलों में केवल राजा, जमींदार या किसान ही नहीं बल्कि समाज सुधारक, पथ प्रदर्शक, अंग्रेजी दासता से मुक्ति दिलाने में अग्रणी नेता और साहित्यकार भी थे। छत्तीसगढ़ अपने इन सपूतों का ऋणी है जिनके बलिदान से हमारा देश आजाद हुआ। उन्हीं में से एक थे पंडित सुन्दरलाल शर्मा। उनके कार्यो के कारण उन्हें ‘‘छत्तीसगढ़ केसरी‘‘ और ‘‘छत्तीसगढ़ का गांधी‘‘ कहा जाता है। वे एक उत्कृष्ट साहित्यकार भी थे। अपनी साहित्यिक प्रतिभा से जहां जन जन के प्रिय बने वहीं भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और अछूतोद्धार में प्रमुख भूमिका निभाकर छत्तीसगढ़ को राष्ट्रीय भावना से जोड़ने का सद्प्रयास किया है। छत्तीसगढ़ के वनांचलों में पंडित सुंदरलाल शर्मा ने ही महात्मा गांधी को पहुंचाने का सद्कार्य किया था। उनके कार्यो को देखकर गांधी जी अत्यंत प्रसन्न हुए और एक आम सभा में कहने लगे:-‘‘मैंने सुना था कि छत्तीसगढ़ एक पिछड़ा हुआ क्षेत्र है। लेकिन यहां आने पर पता चला कि यह गलत है। यहां तो मुझसे भी अधिक विचारवान और दूरदर्शी लोग रहते हैं। उदाहरण के लिए पंडित सुन्दरलाल शर्मा को ही लीजिए जो मरे साथ बैठे हुए हैं, उन्होंने मुझसे बहुत पहले ही हरिजन उद्धार का सद्कार्य शुरू कर दिया है इस नाते वे मेरे ‘‘गुरू‘‘ हैं। ब्राह्यण कुलोत्पन्न, समाज सेवक, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और साहित्यकार पंडित सुन्दरलाल शर्मा ‘‘छत्तीसगढ़ी काव्य के भारतेन्दु‘‘ थे। उनके बारे में पंडित शुकलाल पांडेय छत्तीसगढ़ गौरव में लिखते हैं:-

बुधवर रामदयालु, स्वभाषा गौरव केतन।
ठाकुर छेदीलाल विपुल विद्यादि निकेतन।
द्विजवर सुन्दरलाल मातृभाषा तम पूषण।
बाबु प्यारेलाल देश छत्तीसगढ़ भूषण।
लक्ष्मण, गोविंद, रघुनाथ युग महाराष्ट्र नर कुल तिलक।
नृप चतुर चक्रधर लख जिन्हें हिन्दी उठती है किलक।।

छत्तीसगढ़ी दानलीला के अंत में वे अपने बारे में लिखते हैं:-

सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै एक,
भाई ! सुनौ तहां कविताई बैठि करथे।

ऐसे महापुरूष का जन्म छत्तीसगढ़ के तीर्थ राजिम के निकट चमसुर गांव में परासर गोत्रीय यजुर्वेदीय ब्राह्यण पंडित जयलाल तिवारी के घर पौष अमावस्या संवत् 1881 को हुआ था। उनका परिवार सुसंस्कृत, समृद्ध और प्रगतिशील था। वे कांकेर रियासत के कानूनी सलाहकार थे। माता देवमती सती साध्वी और स्नेह की प्रतिमूर्ति थी। कांकेर के राजा पंडित जयलाल तिवारी के कार्यो से प्रसन्न होकर उन्हें 18 गांव की मालगृजारी दिये थे। उनके तीन पुश्तैनी गांव चमसुर, घोंट और चचोद राजिम के निकट स्थित हैं। पंडित सुन्दरलाल शर्मा की शिक्षा दीक्षा गांव के ही स्कूल में ही हुई। मिडिल स्कूल तक शिक्षा ग्रहण करने के बाद वे घर में ही उच्च शिक्षा ग्रहण किये। उन्होंने अंग्रेजी, हिन्दी, उर्दू, मराठी, बंगला, उड़िया और संस्कृत भाषा का गहन अध्ययन किया। उनके घर लोकमान्य तिलक द्वारा संपादित ‘‘ मराठा केसरी ‘‘ पत्रिका आती थी। वे उनका नियमित पठन करते थे। 18 वर्ष की आयु में वे काव्य लेखन में परांगत हो गये। सन् 1898 में उनकी कविताएं ‘‘रसिक मित्र‘‘ में प्रकाशित होने लगी थी। महानदी का पवित्र वातावरण उनके व्यक्तित्व में निखार ले आया। एक जगह वे लिखते हैं:-‘‘राजिम में कहीं संगीत, कहीं सितार वादन होते ही रहता है...शंभू साव की साधु भक्ति, पंडित मुरलीप्रसाद की विद्वतापूर्ण वेदान्त प्रवचन, कामताभगत की निश्छल भरी भक्ति बड़ी प्रेरणास्प्रद होती थी..।‘‘ इस प्रकार किशोरवय और भूषण कवि पंडित विश्वनाथ दुबे का साथ उन्हें काव्य में उन्हें प्रवीण बना दिया। यहां दुबे जी ने एक कवि समाज की स्थापना की थी जिनके संस्थापक महामंत्री और सक्रिय सदस्य पंडित सुन्दरलाल शर्मा थे। यही संस्था आगे चलकर जन जागरण करके बहुत लोकप्रिय हुआ। पंडित जी ने साहित्य की सभी विधाओं में लेखन किया है। फलस्वरूप उनके खंडकाव्य, उपन्यास, नाटक आदि की रचना हुई। उनकी कृतियों में छत्तीसगढ़ी दानलीला, राजिम प्रेमपियुष, काव्यामृवाषिणी, करूणा पचीसी, एडवर्ड राज्याभिषेक, विक्टोरिया वियोग (सभी काव्य), कंस वध (खंडकाव्य), सीता परिणय, पार्वती परिणय, प्रहलाद चरित्र, ध्रुव आख्यान, विक्रम शशिकला (सभी नाटक), श्रीकृष्ण जन्म आख्यान, सच्चा सरदार (उपन्यास), श्रीराजिमस्त्रोत्रम महात्म्य, स्फुट पद्य संग्रह, स्वीकृति भजन संग्रह, रघुराज भजन संग्रह, प्रलाप पदावली, ब्राह्यण गीतावली और छत्तीसगढ़ी रामायण (अप्रकाशित) आदि प्रमुख है।
श्री सुन्दरलाल शर्मा छत्तीसगढ़ी काव्य के प्रवर्तक थे। उन्होंने छत्तीसगढ़ी काव्य में रचना करके ग्रामीण बोली की भाषा के रूप में प्रचलित किया। घमतरी के काव्योपाध्याय हीरालाल ने छत्तीसगढ़ी व्याकरण लिखकर इसे पुष्ट किया। पंडित जी की छत्तीसगढ़ी दानलीला बहुत चर्चित हुई। रायबहादुर हीरालाल लिखते हैं:-‘‘जौने हर बनाईस हे, तौने हर नाम कमाईस हे।‘‘ माधवराव सप्रे उसकी प्रशंसा करते हुए लिखते हैं:-‘‘मुझे विश्वास है कि भगवान श्रीकृष्ण की लीला के द्वारा मेरे छत्तीसगढ़िया भाईयों का कुछ सुधार होगा ? मेरी आशा और भी दृढ़ हो जाती है जब मैं देखता हूँ कि छत्तीसगढ़िया भाईयों में आपकी इस पुस्तक का कैसा लोकोत्तर आदर है..।‘‘ श्री भुवनलाल मिश्र ने तो पंडित सुन्दरलाल शर्मा को ‘‘छत्तीसगढ़ी भाषा का जयदेव‘‘ निरूपित किया है। छत्तीसगढ़ी दानलीला में छत्तीसगढ़ के जन जीवन की झांकी देखने को मिलती है:-

कोनो है झालर धरे, कोनो है घड़ियाल।
उत्तधुर्रा ठोंकैं, रन झांझर के चाल।।
पहिरे पटुका ला हैं कोनो। कोनो जांघिया चोलना दोनो।।
कोनो नौगोटा झमकाये। पूछेली ला है ओरमाये।।
कोनो टूरा पहिरे साजू। सुन्दर आईबंद है बाजू।।
जतर खतर फुंदना ओरमाये। लकठा लकठा म लटकाये।।
ठांव ठांव म गूंथै कौड़ी। धरे हाथ म ठेंगा लौड़ी।।
पीछू मा खुमरी ला बांधे। पर देखाय ढाल अस खांदे।।
ओढ़े कमरा पंडरा करिहा। झारा टूरा एक जवहरिया।।
हो हो करके छेक लेइन तब। ग्वालिन संख डराइ गइन सब।।
हत्तुम्हार जौहर हो जातिस। देवी दाई तुम्हला खातिस।।
ठौका चमके हम सब्बो झन। डेरूवा दइन हवै भड़ुवा मन।।
झझकत देखिन सबो सखा झन। डेरूवा दइन हवै भड़ुवा मन।।
चिटिक डेरावौ झन भौजी मन। कोनो चोर पेंडरा नोहन।।
हरि के साझ जगात मड़ावौ। सिट सिट कर घर तनी जावौ।।

शर्मा जी ने ‘‘दुलरवा‘‘ नामक एक छत्तीसगढ़ी पत्रिका का संपादन किया था। उनकी ‘‘छत्तीसगढ़ी रामायण‘‘ अप्रकाशित रही। उनके साहित्यिक मित्रों में पं. माखनलाल चतुर्वेदी, जगन्नाथ प्रसाद भानु, माधवराव सप्रे, लक्ष्मीधर बाजपेयी, नवनीत पत्रिका के संपादक ग. न. गद्रे स्वामी, सत्यदेव परिब्राधक आदि प्रमुख थे। उनके नाटक राजिम के अलावा छत्तीसगढ़ के अनेक स्थानों में मंचित किये गये थे। सन् 1911 और 1916 के हिन्दी साहित्य सम्मेलन में वे सम्मिलित हुए। वे एक उत्कृष्ट साहित्यकार के साथ साथ चित्रकार, मूर्तिकार और रंगमंच के कलाकार थे।

उनके जीवन का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष आजादी के महासमर में सक्रिय भागीदारी थी। श्री भुवनलाल मिश्र ने इसका अच्छा चित्रण अपने लेख में किया है-‘‘कौन जानता था, कौन सोच सकता था कि छत्तीसगढ़ी दानलीला का रसिक और सुकुमार कवि हृदय में क्रांति की चिंगारी भी सुलग रही थी। कौन सोच सकता था कि ‘‘विक्टोरिया वियोग‘‘ का कवि उसके उत्तराधिकारियों के खिलाफ दिल में बगावत की आग समेटकर बैठा हुआ है। जब छत्तीसगढ़ का सम्पन्न वर्ग अंग्रेजी हुकुमत की वंदना करने में लीन था, जब देशी रियासतें अंग्रेजी हुकुमत की कृपाकांक्षी थी, जब आम आदमी अंग्रेजों के खिलाफ बात करने का साहस नहीं कर पाता था तब पंडित सुंदरलाल शर्मा ने पूरे छत्तीसगढ़ का दौरा करके जन जीवन में राजनीतिक चेतना जागृत की और अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ आजादी का शंखनाद किया..।‘‘

सन् 1905 में जब बंग भंग के कारण देश व्यापी आंदोलन हुआ तब पंडित जी राजनीति में सक्रिय भूमिका अदा की। उन्होंने छत्तीसगढ़ में जनसभाओं और भाषणों के द्वारा राजनीतिक जागरण किया। वे कांग्रेस के सूरत, कलकत्ता, बम्बई, जयपुर और काकीनाड़ा अधिवेशन में भाग लिये थे। इस महासमर में उनके प्रारंभिक सहयोगियों में श्री नारायणराव मेघावाले, श्री नत्थूलाल जगताप, श्री भवानीप्रसाद मिश्र, माधवराव सप्रे, श्री अब्दुल रऊफ, श्री हामिद अली, श्री वामनराव लाखे, यति यतनलाल जी, श्री खूबचंद बघेल, श्री अंजोरदास, बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव जैसे कर्मठ लोगों का साथ मिला। उन्होंने सन् 1906 में ‘‘सन्मित्र मंडल‘‘ की स्थापना की थी। उन्होंने स्वदेशी वस्तुओं के प्रचार में सक्रिय भूमिका अदा की और जगह जगह स्वदेशी वस्तुओं की दुकानें खोलीं। उन्होंने यहां अनेक सत्याग्रह किये और जेल यात्रा के दौरान अनेक यातनाएं झेली। उनके सत्याग्रहों में कंडेल सत्याग्रह अंग्रेजों की नींद हराम कर दी थी। यह सत्याग्रह पूरे देश में असहयोग आंदोलन की पृष्ठभूमि बनी। इस बीच वे महात्मा गांधी को छŸाीसगढ़ आमंत्रित किये थे। उन्होंने यहां की आमसभा में उनकी भूरि भूरि प्रशंसा की और हरिजनोद्धार के लिए उन्हें अपना ‘‘गुरू‘‘ स्वीकार किया था।

पंडित जी वास्तव में बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वे छत्तीसगढ़ के एक सच्चे सपूत थे। समाज सुधार, स्वतंत्रता संग्राम और साहित्य के क्षेत्र में उनके अप्रतिम योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने सन् 1935 में अपने सहयोगियों के प्रयास से धमतरी में एक ‘‘अनाथालय‘‘ और रायपुर में ‘‘सतनामी आश्रम‘‘ की स्थापना की थी। राजिम में वे ‘‘बह्यचर्य आश्रम‘‘ पहले ही स्थापित कर चुके थे। ऐसे युगदृष्टा ने अपने अंतिम क्षणों में राजिम में महानदी के पावन तट पर एक पर्ण कुटीर में निवास करते हुए 28 दिसंबर सन् 1940 को स्वर्गारोहण किया और समूचे छत्तीसगढ़ वासियों को विलखता छोड़ गये। डॉ. खूबचंद बघेल अपने एक लेख में लिखा है-‘‘छत्तीसगढ़ के तीन लाल-घासी, सुंदर और प्यारेलाल‘‘ वे तीनों को सत्यं, शिवं और सुन्दरं की प्रतिमूर्ति मानते थे। ऐसे युगदृष्टा के स्वर्गारोहण से सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ को अपूरणीय क्षति हुई जिसकी भरपायी संभव नहीं है। उन्हें हमारी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित है।
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रचना, लेखन एवं प्रस्तुति,

प्रो. अश्विनी केशरवानी
राघव, डागा कालोनी,
चांपा-495671 (छ.ग.)

3 comments:

  1. अश्विनी जी छत्तीसगढ के लिये समर्पित लेखक हैं। उनका हर आलेख संग्रहनीय होता है।

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  2. दुर्लभ जानकारी। अश्विनी जी हमेशा छतीसगढ की धरोहर से पाठको को परिचित कराते रहते हैं।

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