“मन तुम हरी दूब रहना” किसी काव्य संग्रह का ही शीर्षक हो सकता है। कवियित्री गीता पंडित के भावुकता भरे शब्दों में किसी भी मन-दूब को हरी भरी रखने की क्षमता है। कविताओं में ताजगी है और नयापन भी। कौस्तुभ प्रकाशन हापुड से प्रकाशित काव्य संग्रह का मुखपृष्ठ जितना कलात्मक है इसके फ्लैप पर प्रस्तुत कविता ‘स्त्री’ जैसे इस रचना संग्रह की भूमिका प्रस्तुत करती है –

सिक्त नयन हैं/ फिर भी मन में
मृदुता रख कर/ मुस्काती
अपने स्वपनों की/ बना अल्पना
नभ को रंग कर/ सुख पाती।

कवियित्री नें अपना संग्रह पिता तथा कवि स्व. श्री मदन ‘शलभ’ को समर्पित किया है। कवियित्री नें अपनी बात में कहा है “...दो विपरीत ध्रुवों क्के बीच पीडा है, छटपटाहट है, जिज्ञासा है, जकडन है, खिन्नता है और खोज है। इसी खोज नें मुझे रथारूढ कर दिया शब्द रथ पर।“ कवियित्री आगे कहती हैं “स्त्री संबंध का पोषण भी करती रहे और जीती भी रहे। सामंजस्य बनाने में उपलब्धि हुई अश्रु की। लेकिन अश्रु अशक्तता नहीं अवसाद नहीं और हताशा भी नहीं। वरन सुदूर छूर के पार जा कर कुछ सार्थक कर निकलने का प्रयास है, वह भी मनके अंतर्पटल को उपजाऊ रख कर, हरी दूब की भाँति निर्मल रख कर। यह प्रयास ही मेरा परिचय है।“ एक “आभार” पर निगाह ठहरती है। कवियित्री नें अंतर्जाल को एक मंच करार देते हुए “ओरकुट” का आभार व्यक्त किया है। हिन्दी साहित्य जगत अब अंतर्जाल को यह कह कर तो हर्गिज खारिज नहीं कर सकता कि यह महज संवाद के आदान प्रदान का माध्यम है।

काव्य संग्रह की भूमिका डॉ. अशोक मैत्रेय नें लिखी है। काव्य संग्रह को पढने के पश्चात मैं डॉ. मैत्रेय से सहमत हूँ कि “समकालीन कविता में जहाँ विचारों सरोकारों की प्रमुखता बढ गयी है और भावनाओं को निजी मान लिया गया है, वहाँ एक स्वर गीता पंडित का भी है जहाँ विचारों से अधिक भावना की प्रधानता है।“ मैं जोडना चाहूँगा कि आज झंडो और नारों में कविता कहीं खो सी गयी है। जब तक मन के हरी दूब होने की कल्पना कविता में नहीं होगी वह नारे जैसी तीखी या किसी नक्कारखाने की तूती जैसी हो जायेगी। अधिकांश वे कविताए एसी ही है जिन पर समकालीन होने का पोस्टर चिपका हुआ है कि उन्हें पढने के लिये हिम्मत जुटानी पडती है। कविता वह जो बहे, बहा ले जाये। कविता वह जिसका कोई काल नहीं कोई आदि नहीं कोई अंत नहीं। डॉ. मैत्रेय गीता पंडित की कविताओं के लिये आगे लिखते हैं “”...कविताओं में प्रेम की चेतना वैयक्तिक धरातल से उठ कर समिष्टि में विस्तारित होते होते उस अदृश्य में एकाकार हो जाती है जिसे हम ‘ईश्वर’ कहते हैं..”। मैत्रेय आगे लिखते हैं कि “गीता पंडित की कवितायें आशा-निराशा, लालसाओं और स्मृतियों के बीच हिचकोले लेती एक भावुक और संवेदनशील लेकिन सतर्क कवियित्री की कवितायें हैं”।

कवियित्री नें अपनी कविताओं में स्थाईयों को अत्यधिक समर्पण दिया है। कई स्थाईयाँ अपने आप में इतने गहरे भाव लिये हुए हैं कि पूरी कविता को अपने प्रभाव क्षेत्र में जकड रखती हैं –

कौन से हैं मोड ये
मुझको नहीं पहचानते।
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दीप मन के साथ जलते,
फिर भी फैले पथ अंधेरे
क्यों नहीं हैं वो पिघलते॥
-----
मैं मिट गया तो मिट जायेगी
तेरे मन की प्रेम-निशानी,
मैं हूँ तेरी आँख का पानी।
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बाहर तो मधुमास घिरा है,
अंदर पतझर पावन सा
मेरी अँखिया ही पगली हैं,
दोष कहाँ है सावन का।
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उन्मुक्त पलों का मर्म देख कर सुख पाते,
बहुत सहज है जीवन जो हम जी पाते।
-----
तुम ना महके, ना महकी, मन की कली
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बिन प्रियतम के चाँदनी मन रो रहा है,
उजली रातें फिर भी मावस बो रहा है।
-----
संदली मन ओढ कर,
जाने क्या सह कर गये पल,
श्वास के पल्लू से क्यूँकर
आज बंध कर रह गये पल।

गीता जी नें अपने काव्य संग्रह में निराले स्नेह संबंध की सृष्टि की है। “मीते” शब्द के सौन्दर्यबोध की ही सराहना नहीं करनी होगी अपितु पार्थिव प्रेम से उपर उनका यह बिम्ब नवीन आलम्बन देता है।

हर एकाकी पल में मीते
गीत तुम्हारा मन पर छाया
-----
मेरे मीते तुम्हें मनाने
मेरे गीत चले आये।
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फिर तुम्हारी याद आयी
मेरे मीते! तुम कहाँ।
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मन गगन में बरस कर
आये वही फिर प्रीत मीते।
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तुम चलोजो साथ मीते! सुर नये मिल जायेंगे।
मन के आँगन की दोपहरी में भी पंछी गायेंगे।
-----
तुम ही कजरी चैती मीते!
तुम में सावन गाते हैं।

गीता जी की कविता में प्रेम अपने निहितार्थ से उपर उठ कर आस्था और उपासना के चरम को स्पर्श करने लगता है। कविता में प्रेम एक अलौकिक भावना है जो कभी वेदना है कभी आशा तो कभी प्रेरणा -

प्रेम ही जब मूक बोलो
कौन किसको गाएगा
एक है जो हममेँ तुममेँ
एक कब हो पाएगा।

प्रेम बिन कैसा जगत ये
काठ बन रह जाएगा,
मौन भेजेगा निमंत्रण,
मौन ही दोहराएगा।
-----
हक्की बक्की खडी बजरिया
जब से तुम परदेश गये,
लोहे के से चने चबाते
पल-पल के संदेश भये,
तुम बिन ओ मनमीते मेरे!
पीर मेरे मन में झूले।
-----
प्रीत घन अमृत कलश के
बन के बरसें आज तो,
मन के मरुथल में सरस
सरिता बहे जाने कहाँ।
-----
प्रीत के मनके संभालो
तुम ही माला श्वास के

गीता जी की कविताओं में केवल अनुरक्ति की अभिव्यक्ति भर नहीं है अपितु भाव और प्रस्तुति में नूतनता और वैविध्य दोनों ही दृष्टिगोचर होता है। गीति, काव्यात्मक शिल्प, दार्शनिक चिंतन, बिम्ब आदि की विवेचना करते हुए यह समझना कठिन हो जाता है कि बात कवियित्री के प्रथम काव्य संग्रह पर हो रही है। बिम्ब स्वाभाविक है और भाव को सुग्राह्य ही बनाते हैं। कवियित्री नें कहीं भी केवल विद्वत्ता प्रदर्शन के लिये शब्दों की जटिलता को नहीं ओढा न ही एसे बिम्ब प्रयोग में लाये हैं जो पाठक का मष्तिष्क मंथन करें।

हिम पर बैठे हुए शब्द थे।
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मीठे झरने की कहानी
खारे जल में है पली।
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आओ मन से मुस्कुरायें
पल के माथे पर लिखें कोई कविता
आओ हम हरेक पल को जीते जायें
क्यूँ ना जाने, आज इस पल में कहें
मन सुमन ना खिल सके तो रूठे जायें।
------
नींद बेघर सी ना जाने है कहाँ
सपनों के पाखी बहकते हैं यहाँ
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आज इस पल में भरें मन की मेरी ये बस्तियाँ,
क्या पता कल हों ना हों फिर साथ मेरे अस्थियाँ
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बाँधकर घुंघरू प्रणय के,
पंजनी बन बोलता मन।
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जग सितार पर मीठी मीठी
धुन बन कर सो जाउँगी
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जिस पल तुमने याद किया
वो पल मन का श्रृंगार बना
-----
मन मेरा तो एक सरिता है
तुम से ही भरकर जल आये।

कवियित्री अपनी पीडा को बोल देना चाहती तो हैं किंतु वे ‘प्रीत बिन ना स्वांस आना’ की मनोवृत्ति में भी हैं। कभी उन्हें अम्बर से उत्तर चाहिये तो कभी मन ही से। वेदना का अर्थ ठहर जाना तो हर्गिज नहीं है। बहुत समय बाद हिन्दी कविता में प्रेम को एसी सादगी भरी गीति मिली है और इन कविताओं की भाव-सुषमा में कई बार अनायास ही महादेवी की स्मृति हो आती है। असाधारण है यह प्रेम जो डूबती उतराती लहरों सा चंचल है, आन्दोलित है प्रश्न लिये हुए है उत्तर पाने के लिये व्यग्र है और अपने मीते को गाना चाहता है।

नयन ना बरसात लाना
इस तरह ना याद आना
प्रीत बिन ना श्वास आना,
इस तरह ना याद आना।
-----
संवेदना पल-पल ढले,
पीर से मिलकर गले,
प्रीत के दीपक जलाये,
बंद मन के कोष्ठ में
होती विकल वो कौन है।
-----
आस के तरुवर पे छाया मौन क्यूँ,
हर कली के मन को भाया कौन क्यूँ,
क्यूँ निरुत्तर पल का अम्बर हो गया,
शब्द मन के सोख अंतर सो गया
-----
धूम्र तन में हूँ लपेटे
अंशु-मन की रश्मियाँ,
पीर की घनघोर बदली
मुझमें भरती बिजलियाँ,
मन सलिल को हूँ संभाले
पल में मैं ठहरी रही।
-----
एक एक पल में एक एक युग सा
समय निगोडा आता है
नयनों की बस्ती में जाने
कैसा सागर लाता है
डूबती उतराती लहरों संग
मैं लहरें बन जाती हूँ
तुमको गाना था प्रियतम
आज ना गाने पाती हूँ।
-----
विगत हुए युग प्रीत
पथिक पथ में ही भटक रही है।

खोल दो सब बंद द्वारे
मीत अंतर में पधारे
दीप अर्चन आरती बन
मन स्वयं को आज वारे।

गीता जी के गीत सधे हुए एवं शब्द-शब्द नपे तुले हैं। पढते हुए कोई भी शब्द बाधा उत्पन्न नहीं करता। शब्द चयन भावानुकूल है एवं जहाँ भी शब्दों के साथ प्रयोग किये गये हैं जैसे - कूकेगी, मात, मीते, प्रीते, शूले आदि, वे अबूझ नहीं होते। कवियित्री नें ध्वन्यात्मक शब्दों को भी अपनी भाव संप्रेषणीयता का माध्यम बनाया है। छम-छम, खन-खन, कल-कल, ढुल ढुल जैसी ध्वनिया पाठक के आगे चित्र उकेरने में समर्थ हो जाती हैं। आवश्यकता पडने पर कवियित्री नें देशज शब्दों से भी गुरेज नहीं किया है -

गहन उदासी, बढते साये
नयनों में घन घिर घिर आये,
मन तरुवर पर बैठी बुलबुल
पीडा के बोलों में ढुल ढुल
-----
नभ में घन की मेखला भी
बुंदिया भर भर साथ लायी
झूले कजरी चैती गाने
सखि सहेली संग लायी
-----
है धरोहर कौन सी जो मन को लानी है अभी,
याद ना आयें मुझे अब पीर बोते हैं सभी,
पीर की बोली छिपी है, मन के हर एक गाँव में
ना जाने क्यों खो गये मग, प्रीत की हर ठाँव में।
-----
नयन बेकल पथ निहारें रैन की है माँग सूनी,
बिन तुम्हारे मीत मेरे पीर की है आग दूनी।

कवियित्री की प्रस्तुत रचनाओं को स्त्री विमर्श पर केन्द्रित अथवा सामाजिक सरोकारों के लिये लेखन तो नहीं कहा जा सकता तथापि इसकी झलकियाँ उनकी कुछ पंक्तियों में अवश्य दीख पडती है -

मैं हूँ मात यशोदा जिसको
कान्हा का यहाँ प्यार मिला
हूँ मैं वो गीता भी जिसमें
गीता का हर एक सार खिला
क्या मेरा है सभी तुम्हारा
तुम्हें लौटाने आयी हूँ
मैं हूँ बेटी इसी देश की,
तुमसे मिलने आयी हूँ
-----
मन में करुणा बोलती है
कर ना पाती मन द्रवित,
धर्म, जाति के झमेलों
में फंसा जन है भ्रमित
-----
चुक जाये ऋण धरा का
रहें जीवित ये प्राण
उर में भक्ति, पग में शक्ति
बस ये ही हो सामान

कविता से दूर होते पाठक को गीता जी की ये कवितायें मोर पंख से छुवेंगी। कविता आत्म से आत्मा तक के विषयों में पिरोयी हुई अवश्य हैं किंतु उनमें पाठक के अंतस में घर कर जाने की क्षमता है। केवल भावुकता कह कर आप इन कविताओं से बच नहीं सकते अपितु आपको संवेदना की इस नदी से गुजर कर कुछ एसा पढने की ताजगी का अहसास होगा जैसा इन दिनों नहीं लिखा जा रहा है। आज की कविता में उसका ढांचा भर रह गया है लेकिन उसके भीतर का मन जैसे सूख गया हो। मन को हरी दूब रखने का गीता जी का प्रयास सफल हुआ है।

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बहुत जल्द साहित्य शिल्पी पर कवियित्री गीता पंडित से श्रीकांत मिश्र "कांत" की बातचीत भी प्रस्तुत की जायेगी।

26 comments:

  1. गीता जी जितने ही उद्धरण पढे वे बहुत गहरे और सुन्दर गढे हुए हैं। आपको इन रचनाओं के लिये और अपनी पुस्तक के लिये बधाई और शुभकामनायें। एक स्त्री होने के नाते स्त्री के अंतर्मन की प्रस्तुति को भी मैं स्त्री विमर्श मानती हूँ।

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  2. A comprehensive review of the book. Thanks Gita Pandit ji.

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  3. गीता जी कविता के साथ आपका ट्रीटमेंट अच्छा लग रहा है। इस संग्रह को पढना चाहूँगा

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  4. कविता से दूर होते पाठक को गीता जी की ये कवितायें मोर पंख से छुवेंगी। - सही कथन

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  5. गीता पंडित की कोमल कवितायें मन को हराभरा करती हैं। जितने भी अंश प्रस्तुत किये गये हैं उनसे इस कवियित्री से बडी उम्मीद बनती है।

    उत्तर देंहटाएं
  6. गीता जी आपकी पुस्तक को कई बार पढा, इन रचनाओं का अलग ही आनंद है। स्त्री मिमर्श को लेकर यह तथ्य मैं अवश्य जोडना चाहूंगा कि स्त्री ही गीता जी की हर रचना के परोक्ष में है। हर स्त्री का दर्द गीता जी नें "मैं" बन कर सहा है और उसे लिखा है। गीता जी के दो अन्य काव्य संग्रह भी आ रहे हैं। साहित्य शिल्पी परिवार की ओर से उन्हें शुभकामनायें।

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  7. गीता जी को इस संकलन के प्रकाशन पर ढेरों शुभकामनाएं
    सुन्दर शब्दों से रचित स्त्री व सामाजिक आधार लिए रचनायें प्रशंसा की अधिकारी हैं.
    आने वाले संकलनो की प्रतीक्षा रहेगी

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  8. KAVYA SANGARAH KEE ADHIKAANSH KAVITAAYEN
    MUN KO SPARSH KARTEE HAIN . SEEDHEE - SAADEE
    BHASHA MEIN SEEDHE - SAADE BHAAV HAIN . RAJIV
    JI NE SAHEE KAHAA HAI - " MUN KO HAREE DOOP
    RAKHNE KAA GEETA JEE KAA PRAYAAS SAFAL HUAA HAI."

    उत्तर देंहटाएं
  9. सर्व प्रथम साहित्यशिल्पी को,
    इसके रचनाकारों को व
    सभी पाठकों को नव वर्ष की मंगलकामनाएं |


    नव वर्ष में साहित्यशिल्पी समाज को, साहित्य को सही दिशा की तरफ मोड़ने में समर्थ हो, पथ प्रदर्शक बने यही मेरी मनोकामना है |


    मेरी पुस्तक की समीक्षा के लियें मैं साहित्यशिल्पी की ह्रदय से आभारी हूँ |




    शुभाकांक्षी

    गीता पंडित

    उत्तर देंहटाएं
  10. राजीव जी !

    नव वर्ष की मंगलकामनाओं सहित आपकी आभारी हूँ आपने सम्पूर्ण मनोयोग से " मन तुम हरी दूब रहना " पुस्तक की समीक्षा की है |

    आप स्वयं एक कवि हैं इसलियें कवि मन से भी अच्छी तरह परिचित हैं एक कवि जब समीक्षा करता है तो उसका प्रभाव वैसा होता है जैसा इस समीक्षा से हुआ.... अद्वितीय .... अनुपम ....

    आपकी पैनी दृष्टि,
    और सकारात्मक सोच को नमन |


    पुन: आभार
    सस्नेहगीता पंडित

    उत्तर देंहटाएं
  11. सुषमा जी !

    आभारी हूँ ह्रदय से आपको कविताओं के अंश अच्छे लगे...

    जहां तक लेखन का प्रश्न है मैं तो केवल माध्यम हूँ...लिखती वो स्त्री है जो मेरे अंदर है |



    डॉ साहब, निधि जी, अनन्या जी , अभिषेक जी, नंदन जी, आभार आप सभी का |


    अनिल जी आपने पढने की इच्छा व्यक्त की अच्छा लगा..
    आभार |


    शुभ कामनाएँ
    गीता पंडित

    उत्तर देंहटाएं
  12. रचना जी, बेनामी जी, आभार |

    मोहिंदर जी, आदरणीय वेदव्यथित जी आभारी हूँ आपकी |


    शुभ कामनाएँ
    गीता पंडित

    उत्तर देंहटाएं
  13. आदरणीय प्राण जी!
    आपकी ह्रदय से आभारी हूँ |


    नव वर्ष की शुभ कामनाएँ

    गीता पंडित

    उत्तर देंहटाएं
  14. GEETA JI , AAPKE BHAAVON PAR MAIN MUGDH HOON .
    GEET - KAVITA ISEE KHOOBSOORTEE SE LIKHTEE
    RAHEN AUR KAVYA JAGAT KEE SHOBHA KO CHAAR CHAND
    LAGAATEE RAHEN . NOOTAN VARSH KEE SHUBH KAMNA
    KE SAATH .

    उत्तर देंहटाएं
  15. @ प्राण

    आभार ...आपका....ये स्नेह सदैव बना रहे...और आभार शुभ कामनाओं के लियें भी....


    आज आदरणीय महावीर शर्मा जी भी बहुत याद आये...उन्होंने भी ऐसा ही मेरे ब्लॉग पर कहा था ....

    शुभ कामनाएँ
    गीता पंडित

    उत्तर देंहटाएं
  16. गीता जी की इस कृति के प्रस्फुटन से पूर्व कितनी ही बार अनेकों पंक्तियों , बहुत से पदों पर -भावों पर चर्चा होती रही | अपना अपना दृष्टिकोण और मत की भागीदारी की हमने |
    नारी के मनोभावों को सुघड़ और सार्थक रूप देने के लिए गीता जी निश्चय ही बधाई की पात्र हैं | पुरुष चूक सकता है , किन्तु नारी के अन्तर्मन के कोमल कोणों को दोनों हाथों की अंजुरी मे लेकर जिस तरह कवियित्री ने सहेजा है ,देखते बनता है |
    मन को हरी दूब की भाँति निर्मल और हरा भरा बनाने के इस प्रयास के लिए पुनः पुनः शुभकामना |
    और हाँ, राजीव जी की प्रस्तुति श्रेष्ठ बन पड़ी है | निश्चय ही रचना को इस पटल पर रखने के लिए और नारी के अंतर्भाव को उसी दृष्टि से देखने के लिए वो प्रशंसा के पात्र हैं |

    उत्तर देंहटाएं
  17. शब्दों का आभाव निरंतर
    अविरल भावों की धारा है
    छन्दों की सुमधुर सृष्टि ने
    अद्भुत काव्य रूप धारा है

    उत्तर देंहटाएं
  18. प्रवीण जी, आभारी हूँ आपकी ..
    .आपने मेरे दृष्टिकोण को समझा और सराहा...

    आपके सहयोग के लियें ह्रदय से आभारी हूँ..


    शुभ कामनाएँ
    गीता पंडित .

    उत्तर देंहटाएं
  19. आभार श्रीकान्त जी...
    आपने चार पंक्तियों में सम्पूर्ण पुस्तक को बाँध दिया...

    पुन; आभार और
    नव वर्ष की हार्दिक शुभ कामनाएँ..


    गीता पंडित .

    उत्तर देंहटाएं
  20. @ संजीव सलील

    आपने मेरे जन्मदिन पर मुझे हरी दूब बनने की कामना की थी...मैंने वही हरी दूब अपनी कविताओं और गीतों के माध्यम से सभी के मन तक पंहुचाने का प्रयास किया है...



    आभार आपका...नमन...
    गीता पंडित

    उत्तर देंहटाएं
  21. @ राजीव रंजन

    राधा श्याम के चित्र के साथ मेरी सबसे प्रिय पंक्तियाँ ...
    आहा देखते ही मन बाग बाग हो गया था...आभारी हूँ आपकी...दोनों के लियें..


    सस्नेह
    गीता पंडित .

    उत्तर देंहटाएं

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