देश से ग़रीबी हट कर न हट सकेगी
मज़बूत उसकी जड़ है, हिल कर न वो हिलेगी

धनवान और भी कुछ धनवान हो रहा है
मुफ़लिस की ज़िंदगानी, ग़ुरबत में ही कटेगी

चारों तरफ़ से शोले नफ़रत के उठ रहे हैं
इस आग में यक़ीनन, इन्सानियत जलेगी

नारो का देश हैं ये, इक शोर- सा मचा है
फ़रियाद जो भी होगी, वो अनसुनी रहेगी

सावन का लेना देना 'देवी' नहीं हैं इससे
सहरा की प्यास हैं ये, बुझकर न बुझ सकेगी

6 comments:

  1. सावन का लेना देना 'देवी' नहीं हैं इससे
    सहरा की प्यास हैं ये, बुझकर न बुझ सकेगी


    बहुत खूब....देवी जी..सुंदर....

    आभार..

    उत्तर देंहटाएं
  2. चारों तरफ़ से शोले नफ़रत के उठ रहे हैं
    इस आग में यक़ीनन, इन्सानियत जलेगी

    कटु यथार्थ को उघारती पंक्तियाँ हैं.........

    उत्तर देंहटाएं
  3. चारों तरफ़ से शोले नफ़रत के उठ रहे हैं
    इस आग में यक़ीनन, इन्सानियत जलेगी
    kya khoob likha hai
    bahut bahut badhai
    sasder
    rachana

    उत्तर देंहटाएं
  4. नारों का देश है ये इक शोर सा मचा है ,
    फरियाद जो भी होगी वो अनसुनी रहेगी ।
    वाह देवी जी बेहतरीन गजल के लिए बधाइ । शुरु में , ‘देश से गरीबी...’ की जगह ‘इस देश से गरीबी...’ होता तो सायद लय और वज्न में पूर्णता आ जाती ।

    उत्तर देंहटाएं

आपका स्नेह और प्रस्तुतियों पर आपकी समालोचनात्मक टिप्पणियाँ हमें बेहतर कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करती हैं.

पुस्तकालय

~~~ साहित्य शिल्पी का पुस्तकालय निरंतर समृद्ध हो रहा है। इन्हें आप हमारी साईट से सीधे डाउनलोड कर के पढ सकते हैं ~~~~~~~

डाउनलोड करने के लिए चित्र पर क्लिक करें...

आइये कारवां बनायें...

साहित्य शिल्पी, हिन्दी और साहित्य की सेवा का मंच, एक ऐसा अभियान.. जो न केवल स्थापित एवं नवीन रचनाकारों के बीच एक सेतु का कार्य करेगा अपितु अंतर्जाल पर हिन्दी के प्रयोग और प्रोत्साहन का एक अभिनव सोपान भी है, अपने सुधी पाठको के समक्ष कविता, कहानी, लघुकथा, नाटक, व्यंग्य, कार्टून, समालोचना तथा सामयिक विषयो पर परिचर्चाओं के साथ साहित्य शिल्पी समूह आपके समक्ष उपस्थित है। यदि राष्ट्रभाषा हिदी की प्रगति के लिए समर्पित इस अभियान में आप भी सहयोग देना चाहते हैं तो अपना परिचय, तस्वीर एवं कुछ रचनायें हमें निम्नलिखित ई-मेल पते पर प्रेषित करें।
sahityashilpi@gmail.com
आइये कारवां बनायें...

Followers

Google+ Followers

Get widget