वरना जग से उठ जायेंगे [गज़ल] - दीपक शर्मा

आँख बंद करके भला तमघन कैसे छट पायेंगे
उठने के लिये जगना होगा , वरना जग से उठ जायेंगे

सिर्फ बातों से, कलम से और बे - सिला तर्कों - बहस से
बात तो हो जायेगी पर हासिल न कुछ कर पायेंगे

नुक्ताचीनी , मगज़मारी , माथापच्ची , बहसबाज़ी
जिस दिन करना छोड़ देंगे नये रास्ते खुल जायेंगे

ऐसी कोई मुश्किल नहीं , जिसका बशर पे तोड़ न हो
जब तोडना ही चाहेंगे तो कैसे मन जुड़ पायेंगे

"दीपक" कैसे कह दिया सच अब तेरा हाफिज़ खुदा
तू अँगुलियों की बात न कर हाथ तक उठ जायेंगे

अयोध्या प्रकरण : कब?, क्या??, कैसे???...आपका मत? [एक बहस] - आचार्य संजीव वर्मा "सलिल"

लगभग १२ लाख वर्ष पूर्व श्री राम का काल खंड. भूगोल के अंसार तब टैथीस महासागर समाप्त होकर ज़मीन उभर आई थी. बहुत सी ज़मीन विशाल शिलाओं के कारण अनुपजाऊ थी, बंजर तथा घने जंगलोंवाली जिस ज़मीन पर लोग सारी कोशिश करने के बाद भी बस नहीं सके उसे त्याग दिया गया. वह अभिशप्त मानी गई
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वर्ष १५२८ : मुग़ल आक्रान्ताओं ने स्थानीय निवासियों के विरोध के बावजूद सनातन धर्मावलम्बियों द्वारा श्री राम का जन्मस्थल मानी जाती भूमि पर उन्हें नीचा दिखाने के लिये अपना पूजा गृह बनवाया. यह मुग़ल सेना के नायक ने बनवाया. बाबर कभी अयोध्या नहीं गया. आम लोग मुग़ल सेना को बाबरी सेना कहते थे क्योंकि बाबर सर्वोच्च सेनानायक था, उसकी सेना द्वारा स्थापित ढांचा बाबरी मस्जिद कहा गया. यह लगभग १० फुट x १० फुट का स्थान था जहाँ सीमित संख्या में लोग बैठ सकते थे. यहाँ का निर्माण मस्जिद जैसा नहीं था... अजान देने के लिये मीनारें नहीं थीं, न इबादतगाह थी. बाबर की आत्मकथा बाबरनामा तथा अन्य समकालिक पुस्तकों में बाबर द्वारा अयोध्या में कोई मस्जिद बनवाने का कोई उल्लेख नहीं है. संभवतः मुग़ल सिपाहियों के नायक इसका उपयोग करते रहे हों... बाद में बड़ी संख्या हिन्दुओं को बलपूर्वक मुसलमान बनाये जाने से नमाजियों की संख्या में वृद्धि तथा अन्यत्र बड़ी मस्जिद बन जाने के कारण के बाद यह स्थान नमाज के लिये छोटा पड़ा और क्रमशः अनदेख और उपेक्षित रहा.

वर्ष १८५९: अंग्रेज शासकों ने हिन्दुओं-मुसलमानों को लड़वाने की नीति अपनी. उस काल में इसे मस्जिद कहकर बाद से घेर दिया गया. राम भक्त ढाँचे के बाहर श्री राम की पूजा करते रहे.

वर्ष १९४९: २२-२३ दिसंबर को अचानक ही श्री राम की मूर्तियाँ यहाँ मिलीं... कैसे-कहाँ से आईं?... किसने रखीं?... आज तक पता नहीं लगा. संतों ने इसे श्री राम का प्रगट होना कहा... अन्य धर्मावलम्बियों ने इसे सत्य नहीं माना. फलतः दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के विरुद्ध मुकदमे दायर कर दिए. सरकार ने स्थल पर ताला लगा दिया. प्रारभ में श्री राम का पूजन बंद रहा किन्तु क्रमशः प्रशासन की देख-रेख में पूजन होने लगा... असंख्य श्रृद्धालु रामलला के दर्शनार्थ पहुँचते रहे.

वर्ष: १९८४: विवाद को राजनैतिक रंग दिया गया. जनसंघ ने हिन्दू हित रक्षक होने का मुखौटा पहनकर विश्व हिन्दू परिषद् के माध्यम से मंदिर निर्माण हेतु समिति का गठन कराया.

वर्ष १९८६: रामभक्तों के आवेदन पर जिला मजिस्ट्रेट ने हिन्दुओं को पूजा-प्रार्थना करने के लिये विधिवत ताला खोलने का आदेश दिया. दैनिक पूजन तथा समस्त धार्मिक आयोजन वृहद् पैमाने पर होने लगे.

वर्ष: १९९२: भारतीय जनता पार्टी ने राजनैतिक लाभ हेतु राम रथ यात्रा का आयोजन किया. नेतृत्व कर रहे श्री लालकृष्ण अडवानी का रथ बिहार में श्री लालू यादव के आदेश पर रोका गया. बाद में पूर्वघोषित कार्यक्रम के अनुसार कारसेवकों ने ढाँचा जहाँ वर्षों से नमाज नहीं पढ़ी गयी, गिरा दिया. केन्द्रीय सुरक्षा बल ने बचने के पर्याप्त प्रयास नहीं किये. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री कल्याण सिंह ने सर्वोच्च न्यायालय में ढाँचे की सुरक्षा का वायदा किया था जो पूरा नहीं हुआ. श्री आडवानी, उमा भारती, स्थानीय सांसद श्री विनय कटिहार ने हर्ष तथा श्री अटल बिहारी बाजपेई ने दुःख व्यक्त किया. ढाँचा गिराए जाने को केद्र में पदासीन कोंग्रेस सरकार ने विश्वासघात कहा किन्तु कोंग्रेसी प्रधानमंत्री स्व. नरसिम्हाराव की बाल्य-काल में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े रहने की पृष्ठभूमि को देखते हुए उनका परोक्ष समर्थन माना गया. घटना की जाँच हेतु केंद्र सरकार ने लिब्राहन आयोग का गठन किया.

वर्ष २००२: सर्वोच्च न्यायालय ने ३ मार्च को यथास्थिति बनाये रखने का आदेश दिया.

वर्ष २००३: जनवरी रेडिओ तरंगों के माध्यम से विवादित स्थान के अवशेषों की खोज की गई. मार्च में केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय से विवादित स्टाल पर पूजन-पथ की अनुमति देने हेतु अनुरोध किया जो अस्वीकार कर दिया गया. अप्रैल में इलाहबाद उच्च न्यायालय के निर्देश पर पुरातात्विक विभाग (आर्किओलोजिकल डिपार्टमेंट) ने खुदाई कर प्रतिवेदन दिया जिसके अनुसार मंदिर से मिलते-जुलते अवशेष एक विशाल इमारत, खम्बे, शिव मंदिर और मूर्तियों के अवशेष प्राप्त होना स्वीकारा गया.

वर्ष २००५:विवादित परिसर में स्थापित रामलला परिसर पर आतंकवादी हमला... पाँच आतंकी सुरक्षा बालों से लम्बी मुठभेड़ के बाद मार गिराए गये.

वर्ष २००९: गठन के १७ वर्षों बाद लिब्राहन आयोग ने अपना जाँच-प्रतिवेदन प्रस्तुत किया. ७ जुलाई उत्तर प्रदेश सरकार ने स्वीकारा कि विवाद से जुड़ी २३ महत्वपूर्ण नस्तियाँ सचिवालय से लापता हो गयीं.

वर्ष २०१०:

मूल प्रश्न: क्या विवादित ढाँचा किसी मंदिर को तोड़कर बनाया गया था?, क्या विवादित ढाँचा ही श्री राम का जन्मस्थल है?

हमारा मत:

लगभग ५०० वर्ष पूर्व बनाया गया ढाँचा किसी इमारत को तोड़कर बनाया गया या किसी खाली ज़मीन पर यह भी आज जानना संभव नहीं है. इतिहास की किताबों में भी इन बिन्दुओं पर कोई जानकारी नहीं मिल सकती.

क्या उक्त दो प्रश्न किसी कानून से जुड़े है? क्या लाखों वर्ष पहले जन्में श्री राम के जन्म से संबंधित दस्तावेजी सबूत (प्रमाणपत्र) मिलना संभव है? आज भी जन्म प्रमाण पत्र में जन्म का स्थान कोई शहर, मोहल्ला या चिकित्सालय लिखा नाता है, उसके किस हिस्से में यह नहीं होता... लम्बी समयावधि के बाद यह जान पाना संभव नहीं है. कुछ भी निर्णय दिया जाए सभी पक्षों को संतुष्ट करना संभव नहीं है.

स्पष्ट है कि न्यायालय जो संविधान के अंतर्गत संवैधानिक कानून-व्यवस्था से जुड़े विवादों के हल हेतु बनाई गई है को ऐसे प्रकरण में निर्णय देने को कहा गया जो मूलतः उससे जुड़ा नहीं है. यह विवाद हमारी सामाजिक समरसता भंग होने तथा राजनैतिक स्वार्थों के लिये लोक हित को किनारे रखकर विविध वर्गों को लड़ाने की प्रवृत्ति से उपजा है. इसके दोषी राजनैतिक दल और संकुचित सोचवाले धार्मिक नेता हैं.

न्यायालय कोई भी निर्णय दे कोई पक्ष संतुष्ट नहीं होगा. वर्तमान में लम्बे समय से पूजित श्री राम की मूर्तियों को हटाने और मस्जिद बनाने या ढाँचे को पुनर्स्थापित करने जैस्सा एक पक्षीय निर्णय न तो सामाजिक, न धार्मिक, न विधिक दृष्टि से उचित या संभव है. लंबी मुक़दमेबाजी से कुछ पक्षकार दिवंगत हो गए, जो हैं वे थक चुके हैं और किसी तरह निर्णय करना चाहते है, जो नए लोग बाद में जुड़ गए हैं वे मसाले को जिंदा रखने और अपने साथ जनता की सहानुभूति न होने से असहाय हैं... वे जो भी निर्णय आये उसे स्वीकार या अस्वीकार कर अपने लिये ज़मीन पाना चाहते हैं. आम भारतवासी, सामान्य राम भक्तों या अयोध्यावासियों को इस विवाद या निर्णय से कोई सरोकार नहीं है... वह अमन-चैन से सद्भावनापूर्वक रहना चाहता है पर राजनीति और धर्म से जुड़े और उसे आजीविका बनाये लोग आम लोगों को चैन से जीने नहीं देना कहते और विवादों को हवा देकर सुर्ख़ियों में बने रहना ही उनका ध्येय है. दुर्भाग्य से प्रसार माध्यम भी निष्पक्ष नहीं है. उसके मालिक इस या उस खेमे से जुड़े हैं और बहुत से तो हर पक्ष से सम्बन्ध रखे हैं कि कोई भी सत्ता में आये स्वार्थ सधता रहे.

एक सच यह भी बरसों से लड़ रहे लोग अयोध्या में रहेँ तो भी न तो रोज राम-दर्शन को जाते हैं... न ही कभी ढाँचे में नमाज पढने गए. वे विवाद से निष्ठा नहीं स्वार्थ के कारण जुड़े हैं.

पाठक अपना मत दें उनके अनुसार निर्णय क्या होना चाहिए?


फिर ज़मीं पर कहीं काफ़िर कहीं क़ादिर क्यों है?
फिर ज़मीं पर कहीं नाफ़िर कहीं नादिर क्यों है?
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फिर ज़मीं पर कहीं बे-घर कहीं बा-घर क्यों है?
फिर ज़मीं पर कहीं नासिख कहीं नाशिर क्यों है?
*
चाहते हम भी तुम्हें चाहते हो तुम भी हमें.
फिर ज़मीं पर कहीं नाज़िल कहीं नाज़िर क्यों है?
*
कौन किसका है सगा और किसे गैर कहें?
फिर ज़मीं पर कहीं ताइर कहीं ताहिर क्यों है?
*
धूप है, छाँव है, सुख-दुःख है सभी का यक सा.
फिर ज़मीं पर कहीं तालिब कहीं ताजिर क्यों है?
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ज़र्रे -ज़र्रे में बसा वो न 'सलिल' दिखता है.
फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं मंदिर क्यों है?
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पानी जन आँख में बाकी न 'सलिल' सूख गया.
फिर ज़मीं पर कहीं सलिला कहीं सागर क्यों है?
*
कुछ शब्दों के अर्थ : काफ़िर = नास्तिक, धर्मद्वेषी, क़ादिर = समर्थ, ईश्वर, नाफ़िर = घृणा करनेवाला, नादिर = श्रेष्ठ, अद्भुत, बे-घर = आवासहीन, बा-घर = घर वाला, जिसके पास घर हो, नासिख = लिखनेवाला, नाशिर = प्रकाशित करनेवाला, नाज़िल = मुसीबत, नाज़िर = देखनेवाला, ताइर = उड़नेवाला, पक्षी, ताहिर = पवित्र, यक सा = एक जैसा, तालिब = इच्छुक, ताजिर = व्यापारी, ज़र्रे - तिनके, सलिला = नदी, बहता पानी, सागर = समुद्र, ठहरा पानी.

मशीन पठनीय शब्दकोश [तकनीकी आलेख] - डॉ. काजल बाजपेयी

सभ्यता और संस्कृति के उदय से ही मानव जान गया था कि भाव के सही संप्रेषण के लिए सही अभिव्यक्ति आवश्यक है। सही अभिव्यक्ति के लिए सही शब्द का चयन आवश्यक है। सही शब्द के चयन के लिए शब्दों के संकलन आवश्यक हैं। शब्दों और भाषा के मानकीकरण की आवश्यकता समझ कर आरंभिक लिपियों के उदय से बहुत पहले ही आदमी ने शब्दों का लेखाजोखा रखना शुरू कर दिया था। इस के लिए उस ने कोश बनाना शुरू किया। कोश में शब्दों को इकट्ठा किया जाता है।


शब्दकोश एक बड़ी सूची होती है जिसमें शब्दों के साथ उनके अर्थ व व्याख्या लिखी होती है। शब्दकोश एक भाषीय हो सकते हैं द्विभाषिक हो सकते हैं या बहुभाषिक हो सकते हैं। अधिकतर शब्दकोशों में शब्दों के उच्चारण के लिये भी व्यवस्था होती है जैसे अन्तर्राष्ट्रीय ध्वन्यात्मक लिपि में देवनागरी में या आडियो संचिका के रूप में। कुछ शब्दकोशों में चित्रों का सहारा भी लिया जाता है। अलग अलग कार्य क्षेत्रों के लिये अलग अलग शब्दकोश हो सकते हैं जैसे विज्ञान शब्दकोश चिकित्सा शब्दकोश विधिक ;कानूनी शब्दकोश गणित का शब्दकोश आदि।


शब्दकोशों के अनेक रूप आज विकसित हो चुके हैं और हो रहे हैं। वैज्ञानिक और शास्त्रीय विषयों के सामूहिक और उस विषय के अनुसार शब्दकोश भी आज सभी समृद्ध भाषाओं में बनते जा रहे हैं । शास्त्रों और विज्ञानशाखाओं के परिभाषिक शब्दकोश भी निर्मित हो चुके हैं और हो रहे हैं । इन शब्दकोशों की रचना एक भाषा में भी होती है और दो या अनेक भाषाओं में भी । कुछ में केवल पर्याय शब्द रहते हैं और कुछ में व्याख्याएँ अथवा परिभाषाएँ भी दी जाती है। विज्ञान और तकनीकी या प्रविधिक विषयों से संबद्ध नाना पारिभाषिक शब्दकोशों में व्याख्यात्मक परिभाषाओं तथा कभी कभी अन्य साधनों की सहायता से भी बिलकुल सही अर्थ का बोध कराया जाता है । दर्शन भाषाविज्ञान मनोविज्ञान समाजविज्ञान और समाजशास्त्र राजनीतिशास्त्र अर्थशास्त्र आदि समस्त आधुनिक विद्याओं के कोश विश्व की विविध संपन्न भाषाओं में विशेषज्ञों की सहायता से बनाए जा रहे हैं और इस प्रकृति के सैकडों हजारों कोश भी बन चुके हैं । शब्दार्थकोश संबंधी प्रकृति के अतिरिक्त इनमें ज्ञानकोशात्मक तत्वों की विस्तृत या लघु व्याख्याएँ भी संमिश्रित रहती है । प्राचीन शास्त्रों और दर्शनों आदि के विशिष्ट एवं पारिभाषिक शब्दों के कोश भी बने हैं और बनाए जा रहे हैं ।


मशीन पठनीय शब्दकोश ;एमआरडी कागज पर मुद्रित करने के बजाय एक मशीन; कंप्यूटर डेटा के रूप में संग्रहित शब्दकोश है । यह एक इलेक्ट्रॉनिक शब्दकोश और शाब्दिक डेटाबेस है।


मशीन पठनीय शब्दकोश इलेक्ट्रॉनिक रूप में शब्दकोश है जोकि डेटाबेस में लोड किया जा सकता और अनुप्रयोग सॉफ्टवेयर के माध्यम से पूछा जा सकता है। यह दो या अधिक भाषाओं को या दोनों के संयोजन के बीच अनुवाद का समर्थन देने के लिए एक भाषा व्याख्यात्मक शब्दकोश या बहु भाषा शब्दकोश हो सकते हैं। एकाधिक भाषाओं के बीच अनुवाद सॉफ्टवेयर आमतौर पर द्विदिशात्मक शब्दकोशों पर लागू होते हैं। एमआरडी शब्दकोश एक ट्रेडमार्क युक्त संरचना हो सकती है जोकि एक ही कार्य करने में सक्षम सॉफ्टवेयर; उदाहरण के लिए इंटरनेट के माध्यम से ऑनलाइन द्ध के द्वारा पूछे जा सकते हैं या यह एक शब्दकोश भी हो सकता है जिसकी खुली संरचना है और कंप्यूटर डेटाबेस में लोड करने के लिए उपलब्ध है और इस प्रकार विभिन्न सॉफ्टवेयर अनुप्रयोगों के जरिए प्रयोग किया जा सकता है । पारम्परिक शब्दकोशों में विभिन्न विवरण के साथ लैमा होते हैं। मशीन पठनीय शब्दकोश में अतिरिक्त क्षमताएँ हो सकती हैं और इसलिए कभी कभी इसे अच्छा शब्दकोश भी कहा जाता है।


इलेक्ट्रॉनिक शब्दकोश या शब्दावली के प्रयोग के रूप में उदाहरण के लिए वर्तनी जाँचकर्ता में उद्घृत करने के लिए शब्दकोश का भी प्रयोग किया जाता है। यदि शब्दकोश अवधारणाओं के उपप्रकार महाप्रकार पदानुक्रम में व्यवस्थित होते हैं तो इसे वर्गीकरण विज्ञान कहा जाता है। यदि इसमें अवधारणाओं के बीच अन्य संबंध भी होए तो इसे वस्तुरूप विज्ञान कहा जाता है। खोज इंजन या तो शब्दावलीए वर्गीकरण विज्ञान या वस्तुरूप विज्ञान का उपयोग करने के लिए खोज परिणामों को अनुकूलित कर सकते हैं। विशेष इलेक्ट्रॉनिक शब्दकोश आकृति संबंधी शब्दकोश या वाक्यात्मक शब्दकोश हैं।


मशीन पठनीय शब्दकोशों में निम्ननिर्दिष्ट बातों का अनुयोग आवश्यक है


देवनागरी लिपि के लिए यूनीकोड फॉन्ट
खोजे गये शब्द का उच्चारण
स्पष्ट लेआउट / जी यू आई प्रयोग में आसान
तीन अक्षरों पर शब्द सूची
पूर्ण शब्द खोज
द्विआयामी खोज
शब्दों की सूची में से खोजने की सुविधा
सही मौखिक उच्चारण और संबंधित जानकारी
अर्थ एवं संबंधित जानकारी
शब्द पदबंध का प्रयोग
शब्द पदबंध का सचित्र चित्रण ;जहॉं उचित हो

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डॉ. काजल बाजपेयी
संगणकीय भाषावैज्ञानिक
सी.डैक पुणे

झलख [ग़ज़ल] - श्यामल 'सुमन'

बेबस है जिन्दगी और मदहोश है ज़माना


इक ओर बहते आंसू इक ओर है तराना


लौ थरथरा रही है बस तेल की कमी से

उसपर हवा के झोंके है दीप को बचाना


मन्दिर को जोड़ते जो मस्जिद वही बनाते

मालिक है एक फिर भी जारी लहू बहाना


मजहब का नाम लेकर चलती यहाँ सियासत

रोटी बड़ी या मजहब हमको ज़रा बताना


मरने से पहले मरते सौ बार हम जहाँ में

चाहत बिना भी सच का पड़ता गला दबाना


अबतक नहीं सुने तो आगे भी न सुनोगे

मेरी कब्र पर पढ़ोगे वही मरसिया पुराना


होते हैं रंग कितने उपवन के हर सुमन के

है काम बागवां का हर पल उसे सजाना

पत्रकारिता को ग्लैमर की चकाचौंध से बचाएं [साहित्य समाचार] - चित्रसेन सिंह

शचींद्र त्रिपाठी भाषा, भाव और विचार से समृद्ध उच्चकोटि के पत्रकार है। मूल्यों के प्रति समर्पित शचींद्र त्रिपाठी के पास अपना नज़रिया और अपना दृष्टिकोण है। तीस साल पहले टाइम्स ऑफ इंडिया मुम्बई के लोकप्रिय हिंदी दैनिक नवभारत टाइम्स में उपसम्पादक के रूप में शुरू हुई उनकी यात्रा आज स्थानीय सम्पादक के रूप में शिखर पर पहुँच चुकी है। मुम्बई महानगर की प्रतिष्ठित संस्था तरुण कला संगम की ओर से 24 सितम्बर को प्रमुख लेखकों-पत्रकारों की उपस्थिति में आयोजित एक समारोह में शचींद्र त्रिपाठी को पत्रकारिता पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वरिष्ठ पत्रकार नंदकिशोर नौटियाल,नवनीत के सम्पादक विश्वनाथ सचदेव, मुम्बई प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कृपाशंकर सिंह और संस्थाध्यक्ष चित्रसेन सिंह ने सम्मान स्वरूप उन्हें शाल, श्रीफल, स्मृति चिन्ह और 21 हज़ार की धनराशि भेंट की।


शचींद्र त्रिपाठी का परिचय कराते हुए कवि-गीतकार देवमणि पाण्डेय ने कहा कि श्री त्रिपाठी एक विनम्र, मृदुभाषी और प्यारे आदमी होने के साथ-साथ एक श्रेष्ठ पत्रकार और सुयोग्य सम्पादक हैं। पाण्डेय जी ने बताया कि पत्रकारिता शचींद्र त्रिपाठी को विरासत में मिली है। उनके पिता स्व.योगेंद्रपति त्रिपाठी ने सिर्फ़ 31 साल की उम्र में स्वतंत्र भारत लखनऊ के प्रधान सम्पादक की ज़िम्मेदारी सँभाल कर एक रिकार्ड कायम किया था। सन् 1971 में उनके स्वर्गवास के बाद प्रबंधकों के अनुरोध पर स्वतंत्र भारत लखनऊ से ही शचींद्र त्रिपाठी ने पत्रकारिता की गौरवशाली शु्रुआत की। शचींद्र त्रिपाठी ने पत्रकारिता में अपने पिता से प्राप्त संस्कारों की रक्षा की। गोरखपुर में 01 जनवरी 1952 को जन्मे शचींद्र त्रिपाठी आज भी अपनी मिट्टी-पानी-हवा से ऐसे जुड़े हुए हैं कि उन्हें मुम्बई महानगर में अवधी और भोजपुरी बोलने में ज़रा भी संकोच नहीं होता। एक शेर के माध्यम से पाण्डेय जी उनके व्यक्तित्व को रेखांकित किया- जब देखो हँसते रहते हो / इतना ख़ुश कैसे रहते हो।


समारोह के अध्यक्ष विश्वनाथ सचदेव ने कहा कि पत्रकारिता में ग्लैमर के मोह और उसकी चकाचौंध से उत्पन्न ख़तरों के प्रति हमें सचेत रहना होगा ताकि पत्रकारिता में लोगों का विश्वास और भरोसा बना रहे। प्रमुख अतिथि कृपाशंकर सिंह ने कहा कि शचींद्र त्रिपाठी ने कल्याणकारी मूल्यों को स्थापित करने के चुनौतीपूर्ण दायित्व को बख़ूबी निभाया। म.रा.हिंदी साहित्य अकादमी के कार्याध्यक्ष नंदकिशोर नौटियाल के अनुसार शचींद्र त्रिपाठी ने पत्रकारिता के ज़रिए भारतीय मूल्यों, परम्परा और राष्ट्रीय चेतना को प्रखरता से अभिव्यक्त किया है। समारोह में डॉ.राजेंद्र सिंह, महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग के सचिव अभय नारायण त्रिपाठी, मुम्बई के सूचना आयुक्त रामानंद त्रिपाठी,पूर्व निर्वाचन आयुक्त नंदलाल जी बतौर अतिथि उपस्थित थे। अनुराग त्रिपाठी (वरिष्ठ पत्रकार नभाटा), राघवेंद्र द्विवेदी (सम्पादक:हमारा महानगर) और बृजमोहन पाण्डेय (सम्पादक: नवभारत) ने पत्रकारिता में शचींद्र त्रिपाठी के योगदान पर प्रकाश डाला। वरिष्ठ पत्रकार लालजी मिश्र पत्रकार सुमंत मिश्र और कवि हरि मृदल भी मौजूद थे। कवि रासबिहारी पाण्डेय ने काव्यांजलि प्रस्तुत की और पत्रकार रमेश निर्मल ने आभार व्यक्त किया।


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तस्वीर में -[बाएं से दाएं] धनपत जैन, डॉ.राजेंद्र सिंह, अभय नारायण त्रिपाठी(IFS), वरिष्ठ पत्रकार नंदकिशोर नौटियाल, मुम्बई प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कृपाशंकर सिंह, नवनीत के सम्पादक विश्वनाथ सचदेव, नवभारत टाइम्स के सम्पादक शचींद्र त्रिपाठी, पूर्व निर्वाचन आयुक्त नंदलाल जी, संस्थाध्यक्ष चित्रसेन सिंह, मुम्बई के सूचना आयुक्त रामानंद त्रिपाठी, समारोह संचालक कवि देवमणि पाण्डेय।


27 सितम्बर भगतसिंह के जन्मदिन पर [विशेष आलेख] - शरद कोकास

क्रांतिकारियों को सम्मान देने की परम्परा में जिस तरह हमारे स्वतंत्रता संग्राम के अन्य सेनानियों का सम्मान किया जाता है एवं उनका स्मरण किया जाता है , भगतसिंह का परिचय भी उसी तरह केवल एक स्वतंत्रता सेनानी या समाजवादी क्रान्तिकारी के रूप में दिया जाता है । एक मार्क्सवादी विचारक व चिंतक के रूप में भगतसिंह के परिचय से या तो हम अनजान हैं या अनजान रहना चाहते हैं । यहाँ तक तो फिर भी ठीक है लेकिन भगतसिंह के व्यक्तित्व का एक तीसरा पक्ष भी है जो उनके लेख “ मैं नास्तिक क्यों हूँ “ कि वज़ह से प्रकाश में आया । इस पक्ष से लगभग देश का बहुत बड़ा वर्ग अनजान है।

भगतसिंह के व्यक्तित्व के इस पक्ष के अप्रकाशित रहने का सबसे बड़ा कारण इस पक्ष से किसी भी व्यकि को उसका राजनैतिक लाभ न होना है । भगतसिंह की मार्क्सवादी विचारधारा का एक वर्ग उल्लेख तो करता है लेकिन उनके नास्तिक होने न होने से किसीको कोई फ़र्क नहीं पड़ता है । भगत सिंह की मृत्यु 23 वर्ष की उम्र में हुई इस बात का उल्लेख केवल इसी संदर्भ में किया जाता है कि इतनी कम उम्र में उनके भीतर स्वतंत्रता प्राप्ति की आग थी और जोश था लेकिन उनके नास्तिक होने को लेकर यही उम्र अपरिपक्वता के सन्दर्भ में इस्तेमाल की जाती है । ऐसा कहा जाता है कि इस उम्र में भी धर्म या ईश्वर को लेकर कहीं कोई समझ बनती है , या भगतसिंह के संदर्भ में ज़्यादा से ज़्यादा यह कहा जाता है कि यदि भगतसिंह जीवित रहते तो वे भी पूरी तरह आस्तिक हो जाते।

इस तरह से भगतसिंह के नास्तिक होने का बहुत गैरज़िम्मेदाराना ढंग से उल्लेख कर दिया जाता है । लेकिन यदि भगतसिंह का लेख “ मैं नास्तिक क्यों हूं “ पढ़ा जाए तो वह इस विषय में बहुत सारे प्रश्नों के उत्तर देता है । भगतसिंह ने यह लेख न किसी अहंकार में लिखा न ही उम्र और आधुनिकता के फेर में । वे इस लेख में धर्म और नास्तिकवाद की विवेचना के साथ साथ पूर्ववर्ती क्रान्तिकारियों की धर्म व ईश्वर सम्बन्धी धारणा का उल्लेख भी करते है । भगतसिंह ने इस बात का आकलन किया था कि उनके पूर्ववर्ती क्रांतिकारी अपने धार्मिक विश्वासों में दृढ़ थे । धर्म उन्हें स्वतन्त्रता के लिये लड़ने की प्रेरणा देता था और यह उनकी सहज जीवन पद्धति में शामिल था।

यह लोग उन्हें गुलाम बनाने वाले साम्राज्यवादियों से धर्म के आधार पर घृणा नहीं करते थे , इसलिये कि वास्तविक स्वतंत्रता का अर्थ वे जानते थे और धर्म तथा अज्ञात शक्ति में विश्वास उन्हे स्वतंत्रता हेतु लड़ने के लिए प्रेरित करता था । इसके विपरीत साम्राज्यवादियों ने धर्म और ईश्वर में श्रद्धा को उनकी कमज़ोरी माना और इस आधार पर उनमें फूट डालने का प्रयास किया । इतिहास इस बात का गवाह है कि वे इसमें सफल भी हुए।

भगतसिंह तर्क और विवेक को जीवन का आधार मानते थे । उनकी मान्यता थी कि धर्म और ईश्वर पर आधारित जीवन पद्धति मनुष्य को शक्ति तो अवश्य देती है लेकिन कहीं न कहीं किसी बिन्दु पर वह चुक जाता है । इसके विपरीत नास्तिकता व भौतिकवाद मनुष्य को अपने भीतर शक्ति की प्रेरणा देता है । इस शक्ति के आधार पर उसके भीतर स्वाभिमान पैदा होता है और वह किसी प्रकार के समझौते नहीं करता है । भगतसिंह इस बात को भी समझ गए थे कि धर्म का उपयोग सत्ताधारी शोषण हेतु करते हैं । यह वर्गविशेष के लिए एक हथियार है और वे ईश्वर का अनुचित उपयोग आम जनता में भय के निर्माण हेतु करते हैं।

इस लेख में भगतसिंह इस बात को स्वीकार करते हैं कि वे प्रारम्भ में नास्तिक नहीं थे। उनके दादा व पिता आर्यसमाजी थे और प्रार्थना उनके जीवन का एक अंग था । जब उन्होनें क्रांतिकारियों का साथ देना शुरू किया तब वे सचिन्द्रनाथ सान्याल के सम्पर्क में आए जो स्वयं आस्तिक थे । काकोरी कांड के क्रांतिकारियों को भी उन्होनें देखा कि वे अन्तिम दिन तक प्रार्थना करते रहे । रामप्रसाद बिस्मिल आर्यसमाजी थे तथा राजन लाहिरी साम्यवाद का अध्ययन करने के बावज़ूद गीता पढ़ते थे ।

भगतसिंह कहते हैं कि इस समय तक वे भी आदर्शवादी क्रांतिकारी थे लेकिन फिर उन्होनें अध्ययन की शुरुआत की । उन्होनें बाकनिन को पढ़ा , मार्क्स को पढ़ा । फिर उन्होने लेनिन व ट्राटस्की के बारे में पढ़ा , निर्लंब स्वामी की पुस्तक “ कॉमन सेन्स “ पढ़ी । इस बात को सभी जानते हैं कि वे फ़ाँसी के तख्ते पर जाने से पूर्व भी अध्ययन कर रहे थे । इस तरह बुद्ध , चार्वाक आदि विभिन्न दर्शनों के अध्ययन के पश्चात अपने विवेक के आधार पर वे नास्तिक बने ।

यद्यपि इस बात को लेकर उनकी अपने साथियों से बहस भी होती थी । 1927 में जब लाहौर में उन्हें गिरफ़्तार किया गया तब उन्हें यह हिदायत भी दी गई कि वे प्रार्थना करें । उनका तर्क था कि नास्तिक होना आस्तिक होने से ज़्यादा कठिन है । आस्तिक मनुष्य अपने पुनर्जन्म में सुख भोगने की अथवा स्वर्ग में सुख व ऐश्वर्य प्राप्त करने की कल्पना कर सकता है । किंतु नास्तिक व्यक्ति ऐसी कोई झूठी कल्पना नहीं करता । वे जानते थे कि जिस क्षण उन्हे फ़ांसी दी जाएगी और उनके पाँवों के नीचे से तख्ता हटाया जाएगा वह उनके जीवन का आखरी क्षण होगा और उसमे बाद कुछ शेष नहीं बचेगा । वे सिर्फ अपने जीवन के बाद देश के स्वतंत्र होने की कल्पना करते थे और स्वयं के जीवन का यही उद्देश्य भी मानते थे।

भगत सिंह ने यह लेख जेल में रहकर लिखा था और यह 27 सितम्बर 1931 को लाहौर के अखबार “ द पीपल “ में प्रकाशित हुआ । इस लेख में भगतसिंह ने ईश्वर कि उपस्थिति पर अनेक तर्कपूर्ण सवाल खड़े किये हैं और ऐतिहासिक भौतिकवाद के अनुसार इस संसार के निर्माण , मनुष्य के जन्म , मनुष्य के मन में ईश्वर की कल्पना के साथ साथ संसार में मनुष्य की दीनता , उसके शोषण , दुनिया में व्याप्त अराजकता और और वर्गभेद की स्थितियों का भी विश्लेषण किया है । भगतसिंह को अगर सम्पूर्ण रूप में जानना है तो यह लेख पढ़ना आवश्यक है ।

भीगे विश्वास का दर्द [कहानी] - रचना श्रीवास्तव

वो चल रही थी पर उसका मन भाग रहा था .धीरे धीरे उसने गति बढा दी वो लगभग दौड़ने लगी थी शायद वो अपने मन से आगे निकल जाना चाहती थी उसकी साँस फूलने लगी पसीने की चन्द बूंदें उस के माथे पर चमकने लगी पर फिर भी वो रुकी नहीं पता नहीं वो खुद से भाग रही थी या कुछ आवाजों से ................

जब से वो अर्डमोर आई थी उस ने सुबह टहलने का नियम सा बना लिया था अपने घर से निकल कर वालमार्ट (America ki ek badi dukan )तक अपने आई पौड़ पर गाने सुनते हुए जाना उस को बहुत अच्छा लगता था .सूरज का पीला प्रकाश जब उस के बदन को छूता था तो एक अजीब सी उर्जा वो अपने में महसूस करती थी. सूरज के निकलने के साथ ही चिड़ियों का चहचहाना भी बढ़ जाता ऐसा लगता मानो सूर्य कि मध्यम किरणों ने उनको हलके से सहला के जगा दिया हो .जैसे उसकी माँ जगाती थी प्रकृति से उस को प्रारंभ से ही प्यार था पर जब से अमेरिका आई थी पढाई और उसके बाद नौकरी की तलाश में उस को कभी फुर्सत ही नहीं मिली .साइंटिस्ट के पद पर जब से वो यहाँ आई है वो मौसम से रोज मिलती है हवा उसके बाल सहलाती है चिड़ियाँ गीत सुनती है और पेड़ों से झड़े फूल और पत्तियां शबनम में नहा के उस के आने की राह देखते हैं .

जब उसे लगा कि अब वो नहीं दौड़ पायेगी तो पार्क में लगी एक बेंच पर बैठ गई .वो पूरा पसीने से भीग चुकी थी उसने जींस से रुमाल निकाली धानी रंग के इस रुमाल के कोने में बहुत सुंदर फूल बना था उसने फूल पर हाथ फेरा माँ ने कितने प्यार से इसको काढ़ा था पर आज के दिन उसको न कुछ सोचने का मन कर रहा था और न ही मौसम का कोई भी रंग आकर्षित कर रहा था ......... .अभी दो दिन पहले वो कितनी खुश थी शुक्रवार की रात से ही समय मानो कट ही नहीं रहा था इंतजार का समय बहुत भारी होता है शायद इसी लिए बहुत धीरे बीतता है ,लैब से आने के बाद से ही वो कामों में लगी थी धुले कपडे पहाड़ की तरह अचल खड़े थे ,उसकी अलमारी उस को मुह चिढ़ा रही थी और बेसिन में बर्तन बातें कर रहे थे. फिर अभी खाना भी बनाना था .उस के हाथ मशीनवत चल रहे थे ,कपडे तह कर के रखते और अलमारी सही करते करते रात के १२ बज गए थे ,अभी बर्तन धुलना बाकी थी वो डिश वाशर में बर्तन कम ही धुलती थी पर आज वो बहुत थक गई थी और उस को भूख भी लग गई थी अतः उसने बर्तन डिशवासर में डाल दिया .और खुद मैगी खा के बिस्तर पर आ गई .पर नींद मानो आँखों में आने से इंकार कर रही थी मन भी कहाँ शांत था बस शारीर ही थकन का जमा नहीं उतार पा रहा था .ये सब बैचेनी उस को इस लिए थी की कल माँ आ रही थी .पाँच साल पहले जब वो यहाँ आ रही थी माँ उस को गले लगा कितना रोयीं थी उनकी वो हलकी गुलाबी साड़ी और उस पर बने नीले फ़ूल आज भी उसकी आँखों की खिड़की में टंगे थे.माँ को गहरे रंग बहुत पसंद थे पर पिता जी की मौत के बाद माँ ने चटकीले रंगों में सफ़ेद रंग मिला उनको हल्का कर लिया था और अब यही हलके रंग इनकी अलमारी में सिसकते हुए समां गए थे..उस दिन से पहले घर में सब कुछ ठीक था .माँ सुबह घर में संस्कार बोती.खिड़कियाँ खोल पिली नर्म धूप को आमंत्रित करती जब तक मै और पापा उठते घर बातें कर रहा होता और उस के कोने कोने में पवित्रता आसन लिए बैठी होती .मै जब प्रशाद के लिए हाथ बढाती मेरे हाथों पर एक हलकी चपत लगते "कहती पहले मुंह तो साफ कर ले".माँ के हाथों में जादू था जो भी बनाती बहुत स्वादिष्ट बनाती .मैने कभी कभी माँ को पापा से नाराज भी देखा था पर कारण क्या होता पता न चलता कुछ घंटों में ही वो दोनो फिर घुल मिल कर बातें करने लगते पर उस दिन ......"सताक्षी देख तेरे पिता जी को क्या हुआ है माँ चीख रही थी मै भाग के उनके पास पहुंची तो पापा अजीब अजीब सांसे ले रहे थे माँ बदहवासी की हालत में पड़ोस के हिमांशु अंकल को बुलाने भागी .मैने पापा को सीधा किया उनके मुह से झाग निकल रहा था वो कुछ कहना चाहते थे .पर आवाज कुछ साफ नहीं थी वो बार बार बोलने की कोशिश कर रहे थे इतने में माँ आ गईं साथ में हिमांशु अंकल भी थे मयंक आप घबराइए नहीं सब ठीक हो जायेगा माँ ने कहा और आंचल से उनका मुंह पोछने लगीं कितनी बार कहा की शराब न पियें पर मेरी सुनता कौन है माँ बडबड़ाती जा रहीं थी और रोती जा रहीं थी हिमांशु अंकल की सहायता से उन्होंने पापा को कार में लिटाया पापा बार बार मेरा हाथ पकड़ रहे थे कार में लेटते समय उन्होंने जिस निराश निगाह से मुझे देखा आज भी वो निगाहें मेरे मन में गडी हुई सी महसूस होती हैं .माँ लौटी तो सब कुछ ख़त्म हो चुका था.अब न घर बातें करता था ,न सूरज घर आता था और न ही संस्कार घर में दिखते थे बस घायल आवाज और सन्नाटे की फुसफुसाहट पसरी रहती . ये सब सोचते सोचते वो कब सो गई पता ही न चला .उस कि नींद खुली तो ७ बज चुके थे माँ को लेने हवाई अड्डा जाना था .आर्डमोर से वहां पहुँचने में करीब १ घंटा ४० मिनट लगते हैं अब क्या करूँ सताक्षी सोच रही थी क्योंकि प्लेन ९.०० बजे आने वाला था .मरी नींद का क्या करूँ इसका अपनी आप को कोसते हुए सताक्क्षी जल्दी जल्दी तैयार होने लगी .जब तक वो घर से निकली ७ ३० हो चुके थे .अभी माँ के लिए फूल भी लेने थे जल्दी ही कार हवा से बातें करने लगी लाल गुलाब ले के जब कार .हाईवे पर पहुंची ८ बज चुके थे .गति सीमा ७० कि थी तो सताक्क्षी ने स्पीड सेट कर गाड़ी क्रूस पर डाल दी .

पिता जी के जाने के बाद रिश्तेदारों ने एक एक कर नाता तोड़ लिया .माँ को कुछ भी देने से इंकार कर दिया .माँ सुबह बाहर जाती और जब लौटती मायूसी की गहरी रेखा उस के माथे पर दिखती .परिवार में लोग माँ पर तरह तरह के लांछन लगाते.मुझे ज्यादा समझ में नहीं आता पर जितना आता बुरा बहुत लगता .पापा की जगह माँ को काम मिल गयाथा .अँधेरे में दिए की रौशनी ही बहुत होती है दिन भर काम करने के बाद माँ मुझे भी खुश रखने की कोशिश करती .बहारों का मौसम जब मुझपर आने लगा लोगों की गिद्धी नजर मुझको छेड़ने लगीं माँ को अब मेरी चिंता रहने लगी थी उस दिन तो हद ही हो गई जब मेरे चचेरे भाई ने मुझे दबोचने की कोशिश की माँ ने चाचा चाची से शिकायत कि पर चाची ने माँ को उल्टा सीधा कहना शुरू कर दिया और मुझे भी ताने देने लगी चाची ने कहा क्या करेगी पेड़ में फल लगेगा तो पत्थर तो उछलेंगे ही .कई दिन सोचने के बाद माँ ने मुझे यहां अमेरिका पढने भेज दिया .

तेज होर्न से उसकी निद्रा टूटी तो देखा लाल बत्ती हरी हो चुकी थी.उसने जल्दी से गाड़ी आगे बढा दी . उसकी निगाह बगल की सीट पर रखे फूलों के गुलदस्ते पर पड़ी जिसमे सुर्ख गुलाब मुस्कुरा राहे थे.उसने एक बार फूलों को ऐसे सहलाया जैसे माँ उसके माथे को सहलाती थी. .पास रखी पानी की बोतल को उठा कर उसने मुंह से लगा लिया और सारा पानी एक साँस में पी गई ..आज डैलस में गर्मी कुछ ज्यादा ही थी उस ने ऐ सी बढा दिया.

जब वो एयर पोर्ट पहुंची तो ९ बज के २० मिनट हो चुके थे. कार पार्क कर के वो जल्दी से अंदर भागी. वहां देखा तो फलाइट ९०१ ,३० मिनट लेट थी .उफ्फ्फ .............उसने चैन की साँस ली .पेट में उठती भूख की लहरों का अभी ध्यान आया ,सुबह से एयर पोर्ट पहुँचने की जदोजहद में उसे कुछ खाने का समय ही नहीं मिला .समय बिताने के लिए और अपनी जठराग्नि को शान्त करने के लिए उसने कौफी ली और धीरे धीरे उनकी चुस्कियां लेने लगी .कौफी के एक एक घूंट में मनो वो एक एक पल पी रही थी .तभी अनाउंस हुआ की फ़्लैट नंबर ९०१ आने को है दिल की घडकन बहुत तेज होने लगी थी करीब २० मिनट बाद माँ आती दिखी माँ ने आज भी वही नीले बूटों वाली पिंक साड़ी पहनी हुई थी सताक्क्षी दौड़ के माँ से लिपट गई .माँ को कस के इस तरह पकडे थी कहीं फिर माँ चली न जाएँ .माँ आप का सामान कहाँ है " सुधांशु अंकल ला रहे हैं क्या???.......वो भी आयें है तुम ने बताया नहीं ."अरे बेटा लास्ट समय में उनका प्रोग्राम बना .ऑफिस के काम से उनको न्यू योर्क जाना है २ दिन बाद चले जायेंगे ". इतने में अंकल सामान लेके आ गये ."हेल्लो अंकल कैसे हैं?" .संक्षिप्त सा औपचारिक प्रश्न किया था सताक्क्षी ने ."ठीक हूँ बेटा "अंकल ने मुस्कुरा के कहा आप तो बहुत बड़ी हो गईं है ". सताक्षी. ने कोई उत्तर नहीं दिया .

" माँ मेरे कठहल का अंचार ,सिरका और अमावट लाई हो ना

"सब लाई हूँ बेटा पर सब यहीं पूछ लोगी या घर भी ले चलेगी " औ मम्मी कह के वो फिर से माँ से लिपट गई .

"इतनी बड़ी हो गई पर बचपना नहीं गया ".कह कर माँ ने सताक्षी के सर पर हलकी सी चपत लगाई.

आर्डमोर के रास्ते में माँ उसको पूरे मोहल्ले का हाल बताती रही .कुछ लोगों को तो वो जानती भी नहीं थी फिर भी सुनती रही माँ का बोलना उस को बहुत अच्छा लग रहा था पाँच साल वो इस आवाज के बिना वो कैसे रही ??घर में घुसते ही माँ ने कहा "अरे सत तुने घर तो बहुत अच्छा रखा है साफ सुथरा .याद है अपने घर में कितना सामान फैलाया करती थी ".

सताक्षी को हसी आ गई बीता शुक्रवार याद आ गया. बातचीत में कब २ बज गया पता न चला

"माँ कुछ खाओगी "

"नहीं बेटा कुछ नहीं अब बस आराम करना चाहती हूँ और तुम्हारे अंकल भी यही चाहते हैं ".पर सताक्क्षी को भूख लगी थी उस ने अपने लिए सेंविच बनाया खा के अंकल का बिस्तर लिविंग रूम में लगा दिया और खुद वो माँ को लेके बेड रूम में आगई .माँ के कमर में हाथ दाल वो माँ के साथ लेट है सताक्षी माँ के साथ हमेशा ऐसे ही सोती थी .

"माँ तुम्हारे आने से आज हर शय बातें कर रही है देखो ये तकिया बता रहा है की तुम को याद कर कभी कभी मैने इस को कितना भिगोया है .और वो देखो ना माँ मेज पर तुम्हारी तस्वीर कह रही है की इस को सीने से लगा के कितनी रातें जागी हूँ मै और प्यारी कर कर के इस को कितना तंग किया है .मेज के सामने लगे इस बड़े पेपर को देखो ये कह रहा है कि "मै तो आप के नाम से भरा हूँ "जितनी बार तुम्हारी याद आती थी मै इस पर लिखती थी माँ .माँ मेरी अच्छी माँ ............

रात खाने की मेज पर माँ ने उसकी पसंद की सभी चीजें परोसी थी .जिनमे भारत से लाया कटहल का अचार भी शामिल था ."वाह !क्या स्वाद है मेरी भूख तो आज शांत हुई" .

"हाँ बेटा सच कहा तुम्हारी माँ बहुत अच्छा खाना बनती है अंकल ने माँ की तरफ देख के कहा ".

."यदि खाना इतना अच्छा लगा है तो बेटा एक रोटी और लो न ".

"अरे नहीं मैने तो ३ रोटी खा ली है एक कौर और खाया तो फट जाउंगी ."

"अरे कोई बात नहीं मै सिल दूंगी तू खा ' सभी हसने लगे बर्तन समेत माँ धुलने लगी

"अरे नहीं माँ मै डिश वाशर में डालती हूँ .मैने सारे बर्तन डिशवाशर में डाल के नोब घुमा दिया .मशीन ने अपना काम शुरू कर दिया .

"अरे सत वह ये तो कमल की मशीन है .क्या सब बर्तन साफ हो जायेंगे "

"जी माँ आप स्वयं देख लीजियेगा "

भारत और अमेरिका बीच के समय अन्तर के चक्कर में माँ और अंकल को बहुत नींद आ रही थी .अतः सभी ने अपना अपना सोने का ठिकाना पकड़ लिया .थोड़ी हो देर में दोनों सो गए .सताक्षी को नीद नहीं आ रही थी .थोडा सफाई कर के और लैब का कुछ अधुरा काम ख़त्म कर जब सताक्षी सोने आई तो रात के १२ बज रहे थे .माँ बहुत गहरी नींद में सो रहीं थी .ऐसा लग रहा था की नींद उनको आगोश में ले के खुद सो गई है .माँ को देखते देखते वो भी सो गई .सुबह करीब चार बजे माँ और अंकल के हँसने की आवाज से उस की नींद टूटी .माँ कह रहीं थी अजी थोडा धीरे हंसिये सताक्षी उठ जाय़ेगी.

क्या कहती हो मन वो नहीं उठेगी गहरी नींद में हैं

माँ के लिए मन सम्बोधन सुन कर सताक्क्षी को बहुत बुरा क्योंकि पापा माँ को प्यार से मन बुलाते थे .माँ का नाम मन्जरी जो था फिर अचानक अंकल के मुहँ से मयंक अपने पापा का नाम सुन कर वो ध्यान से उनकी बातें सुनने लगी अंकल बोले कह रहे थे उस दिन यदि मयंक की शराब में हम ने जहर ................सताक्षी को लगा की एक साथ लाखों बिच्छुओं ने उस को डंक मारा हो .

बेंच पर बैठी सताक्षी अपने बिखरे वजूद को समेटने की कोशिश कर रही थी इधर शब्द और घटनाये एक दूसरे से तारतम्य बैठाने की कोशिश कर रहे थे और उधर सताक्षी पतझर के बाद झड़ी पत्तियों सा असहाय महसूस कर रही थी . पापा के जाने के बाद उसको नहीं लगा पर आज वो खुद को अकेला और अनाथ महसूस कर रही थी वो बार बार यही कह रही थी माँ तुम.......... क्यों माँ क्यों ? उसने आंसुओं को टी शर्ट की आस्तीन में सुखाया और माँ के लिए न्यू योर्क का टिकट खरीदने का निश्चय कर वो उठ कर चल दी उसने मुड कर देखा बेंच पर धानी रुमाल पड़ा था

ज़िंदगी जी का जंजाल हो चली है [कविता] - विश्वदीपक 'तनहा'


ज़िंदगी जी का जंजाल हो चली है,
मौत भी ससुरी मुहाल हो चली है..

न राशन रसद में,
न ईंधन रसद में,
न महफ़िल हीं जद में,
न मंज़िल हीं जद में,

ना पग ना पगडंडी,
सौ ठग हैं सौ मंडी,
दिल ठंढा, जां ठंढी,
शक्ति की सौं... चंडी
भी अब तो बेबस बेहाल हो चली है..
ज़िंदगी जी का जंजाल हो चली है..

न चेहरा हीं सच्चा,
न सीसा हीं सच्चा,
या किस्मत दे गच्चा,
या हिम्मत दे गच्चा..

जो थम लूँ तो अनबन,
जो बढ लूँ तो अनशन,
जो दम लूँ तो मंथन,
गंवा के सब अनधन
ये धरती तो अब पाताल हो चली है...
ज़िंदगी जी का जंजाल हो चली है..

मुस्टण्डे और आरक्षण [सप्ताह का कार्टून] - अभिषेक तिवारी

हमने छुपा के रक्खी थी सबसे जिगर की बात [ग़ज़ल] - श्रद्धा जैन


हमने छुपा के रक्खी थी सबसे जिगर की बात
गैरों से फिर भी सुन रहे हैं अपने घर की बात

छोटी सी बात से ही तो बुनियाद हिल गई
हम क्या बताएँ आपको दीवार-ओ-दर की बात

बनना सफ़ेदपोश तो कालिख़ लगाना सीख
उंगली उठाना बन गया अब तो हुनर की बात

बातें फक़त बनाने में, जाए न उम्र बीत
लाओ अगर अमल में तो होगी असर की बात

दिलवर के इन्तज़ार में, जब रात ढल गई
महफ़िल में तब से हो रही है चश्मे-तर की बात

मंज़िल मिली तो, हमने ही बदला है रास्ता
“श्रद्धा” है करती शौक़ से अब तो सफ़र की बात

कन्हैयालाल नंदन-एक जीवंत नौकुचिया ताल [कन्हैय्या लाल नंदन जी को विनम्र श्रद्धांजलि सहित] - डॉ. प्रेम जन्मेजय

अत्यंत दु:ख के साथ सूचित करना पड रहा है कि आज दिनांक २५ सितम्बर २०१० को सु-प्रसिद्ध साहित्यकार डा. कन्हैया लाल नंदन का निधन हो गया। हिन्दी जगत को यह अपूरणीय क्षति है। साहित्य शिल्पी परिवार उन्हे श्रद्धांजलि अर्पित करता है।


डॉ. प्रेम जनमेजय ने डा. कन्हैया लाल नंदन के साथ ३६ वर्षों तक रिश्ते निभाए हैं। पेश है प्रेम जी की श्रद्धांजलि।

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मैं पिछले 36 वर्षों से नंदन जी को व्यक्तिगत रूप से जानता हूं और हमारे रिश्ते की शुरुआत 36 के आंकड़े से ही हुई पर यह 36 का आंकड़ा जल्दी ही 63 के आंकड़े में बदल गया । मैं पहली बार सन् 1974 में मिला था और वह मिलना एक घटना हो गया । इस घटना पर आधारित एक लेख मैंनें लिखा था -- सही आदमी गलत आदमी। पर जैसे समय बीता, उसने बताया कि रिश्तो को सहेजकर रखने वाला तथा उसे बुरी नजरों से बचाने वाला कन्हैयालाल नंदन नामक यह जीव संबंधों में गलत नहीं हो सकता है। जो व्यक्ति अपनी बीमारी को भी लोगों की निगाह से बचाकर रखता हो,उसका जिक्र आते ही उसके साथ जुड़े अपने संबंधों को व्याख्यायित न करता हो, वो मानवीय रिश्तों में कैसे 36 का रिश्ता बर्दाश्त कर सकता है।

नंदन जी बीमार हैं। बीमारी ने उन्हें शारिरिक रूप से दुर्बल कर दिया है परंतु बीमारी सबंधों की आंच को धीमा नहीं कर पाई है। आज भी अपने किसी का निमंत्रण हो तो कैसे भी वहां पहुंचना उनकी पहली प्राथमिकता होती है। अस्वस्थता बहाना भी तो नहीं बन पाती है।

पिछले दिनों परंपरा के कार्यक्रम में वे अपने दोस्तों की फौज के साथ उसी तरह से मिलने का यत्न कर रहे थे जैसे पहले मिला करते थे। अपनी बीमारी का जिक्र आते ही एक मुस्कान चेहरे पर खेलकर जैसे कहती कि, ये अपना काम कर रही है मैं अपना। उस दिन उन्होने बताया कि मैं अपनी आत्मकथा के अगले खं डमें व्यस्त हूं। मैं और उत्सुकता जाहिर की तो बोले कि आ जाओ। बुध का समय तकय हुआ और इससे पहले कि मैं उनके घर के लिए निकलता,उनका फोन आ गया-राजे, अभी रहने दो, तबीयत जरा ठीक नहीं है।’ मैं समझ गया कि जिस तबीयत को वह जरा बता रहे हैं वो कुछ अधिक ही है वरना मिलने से जो मना करे वो नंदन नहीं हो सकता ।

मेरा मन था कि इस स्तंभ के लिए उनसे एक बातचीत की जाए। इस आयोजन के लिए मैंने कृष्णदत्त पालीवाल से आग्रह किया तो वे बोले- प्रेम, उनका स्वास्थ इस योग्य नहीं है।वे कुछ मना तो नहीं करेंगें पर उन्हें परेशान करना उचित न होगा।’ ऐसे में सोचा कि मैं ही उनके संदर्भ में,औरों का जोड़कर लिख दूं।

कन्हैयालाल नंदन के संबंध में लिखने को कुछ सोचता हूं कि एक विशाल चुनौती युक्त दुर्गम किंतु इंद्रधनुषी प्राकृतिक सौंदर्य से युक्त ,निमंत्राण देता पर्वत मेरे सामने खडा है। ऐसी चुनौतियों को स्वीकार करना मुझे अच्छा लगता है । और इतने बरस से नंदन जी को जानता हूं, इतनी यादे हैं कि उनपर लिखना बांए हाथ का खेल है । पर लिखने बैठा तो उंट पहाड के नीचे आ गया । पता चला कि दोनों हाथों , दिलो - दिमाग और अपनी सारी संवेंदनाओं को भी केंद्रित कर लूं तो इस लुभावने पर्वत के सभी पक्षों को शब्द बद्ध नहीं कर पाउंगा । नैनीताल के पास एक ताल है -- नौकुचिया ताल । कहते हैं इसके नौ कोणों को एक साथ देख पाना असंभव है । इस व्यक्तित्व में इतने डाईमेंशंस हैं कि ... । तुलसीदास ने कहा है कि जाकि रही भावना जैसी प्रभु मूरति देखी तिन तैसी । अब कन्हैयालाल नामक यह प्राणी प्रभु है कि नहीं अथवा नाम का ही कन्हैया ,यह खोज करना आधुनिक आलोचकों का काम है पर इस मूरति को लोग अनेक रूपों में देखते हैं , यह तय है। इस नौकुचिया ताल के कोणों में- कला,कविता,मंच, पत्रकारिता,मीडिया, संपादन,अध्यापन, मैत्री, परिवार आदि ऐसे कोण हैं जिन्हे किसी एक साथ देख पाना संभव नहीं है।

मेरी इस घोषणा पर कई महानुभाव त्योरी चढ़ाकर , आलोचकीय गंभीर मुद्रा ग्रहणकर , कह सकते हैं कि क्या इतना उलझाउ, गडमड, अबूझ और रहस्यात्मक व्यक्ति है कन्हैयालाल नंदन नामक जीव । और अगर ऐसा है तो हमारा दूर से लाल सलाम , काला सलाम या भगवा सलाम। हम तो सीधे साधे इंसान हैं और ऐसे ही इंसान को जानना चाहते हें । तो मिलिए न इस सीधे साधे इंसान से । दर्शन कीजिए पर्वत पर उतरती आलोकित किरणों का , देवदार से समृद्ध इस पर्वत के सौंदर्य को निहारिए नं । नीचे से ही इसकी उंचाई को देखकर प्रसन्नचित्त होईए नं ।अब आप एक पर्यटक बनकर इस व्यक्तित्व को जानना चाहते हैं या एक पर्वतारोही बनकर , ये आपकी इच्छा है। विभिन्न कोणों से युक्त इस पूरे ताल की तरल,स्नेहिल एवं विपुल राशि का आत्मीयता अनुभव करना उसी के लिए सहज है जिसके लिए नंदन जी सहजता से उपलब्ध करवाना चाहते हैं।


सारिका,पराग,दिनमान,नवभारत टाईम्स, संडे मेल, इंडसइंड जैसी अनेक कुरसियां बदली और कभी ये कुरसियां नहीं भी रहीं पर यह इंसान नहीं बदला । इसका कष्ट बहुतों को रहा और नंदन जी ने बहुतों को यह कष्ट मुक्त भाव से बहुत बांटा भी । दोस्तों से मिलने पर हंसी के जो फव्वारे मैंनें सारिका में छूटते देखेे थे वही सफदरजंग एंक्लेव के इंडसईड के कार्यालय में, जनपथ की कॉफी शाप में और अनेक साहित्यिक गोष्ठीयों में छूटते देखे हैं । यह फुव्वारे अपनों के लिए एक्सक्लुसिव हैं । अपरिचितों के बीच यही धीर गंभीर मुद्रा में बदल जाते हैं । अपने निजत्व में हर किसी को झांकने की इज्जात नहीं देता है यह व्यक्ति । कन्हैयालाल नंदल के विभिन्न समयों पर आवश्यकतानुसार बदलते इस सटीक बदलाव को देखकर लगता है जैसे आप किसी महाकाव्यात्मक उपन्यास के पात्रों को जी रहे हैं । जहां देश काल और चरित्रा के बदलते ही भाषा और शैली बदल जाती है । जो नंदन सिंह बंधु, बीर राजा, महीप सिंह गोपाल चतुर्वेदी के सामने टांग खिंचाई का मुक्त दृश्य प्रस्तुत करते हैं और उस माहौल में बातें कम ठाहके ज्यादा होते हैं वही अपने किसी आदरणीय से बात करते समय शब्दों के प्रति अतिरिक्त सचेत होते हैं । जो पसंद है उसपर समस्त स्नेह उडेलने और जो नहीं है उसपर टरकोलॉजी के बाणों का प्रयोग करने में सिद्धहस्त यह व्यक्ति आभास तक नहीं होने देता है और आप घायल हो जाते हैें । अगर आप पसंद आ गए तो आप दोतरफा घायल होंगें । ( हां अपनों से भी घायल होते , सही शब्द होना चाहिए आहत होते भी मैंनें इस दिल को देखा है । हिंदी साहित्य में आपके अनेक ऐसे ज्ञानी ध्यानी आलोचक मिल जाएंगें जो जब आपसे अकेले में मिलेंगें तो आपकी रचनाशीलता के पुल बांध देंगें , जो रचनाएं आपने लिखी नहीं हैं उनकी भी प्रशंसा कर डालेंगें और खुदा न खास्ता आप अपनी कुरसी के कारण महत्वपूर्ण हैं तो ऐसे प्रशंसात्मक पुलों का कहना ही क्या । पर यही ज्ञानीजन जब आपके बारे में लिखने बैठते हैं तो इनकी अंगुलिया थरथराने लगती है और कलम बचकर चलती हुई चलनें लगती है ।)

नंदन जी के मित्रों,शुभंकचिंतको,आलोचकों,प्रशंसको, राजनैयिकों, राजनैतिज्ञों, नौकरशाहों, अनुजों, अग्रजों आदि की एक लंबी फौज है। इस फौज का प्रत्येक अंश उनके साथ न जाने किस गोंद से जुड़ा है। इस फौज ने सुअवसर तलाश कर नंदन जी के व्यक्तित्व कृतित्व के संबंध में अपने विचार व्यक्त करने में कोई कृजूसी नहीं की है।उन सबके उद्धरण ही दूं तो ‘गगनांचल’ के तीन-चार अंक तो निकालने ही पड़ेंगें। चावल के दानों से कुछ हाजिर हैं।

इंदरकुमार गुजराल ,पूर्व प्रधानमंत्री
एक ऐसे दोस्त का तआरुफ करना,जिसकी जहानत और दानिशमंदी के आप कायल हों, उतना ही मुश्किल काम है जितना खुद अपना तआरुफ खुद करना।दोनो में यकसा मुश्किलें हैं।और फिर कन्हैयालाल नंदन के बारे में कुछ लिखना हो तो और भी मुश्किल है क्योंकि मैं यह तय नहीं कर पा रहा हूं कि उनकी शख़्सियत के किस पहलूं को लूं और किसे छोड़ूं।उनका हास्य, उनका व्यंग्य, उनकी दार्शनिक सोच, उनकी राजनीतिक टिप्पणियां, उनकी शानदा कविता या फिर अपने नन्हे-किशोर दोस्तों से बातचीत करने का उनका पुरलुत्फ़ अंदाज!’’

डॉ0लक्ष्मीमल सिंघवी,
कसाले बहुत सहे हैं उन्होंने, किंतु कड़वाहट नहीं है उनके विचारों में। पद,प्रतिष्ठा अधिकार और संपन्नता उनको अपना जरखरीद बंदी नहीं बना पाए। वे एक समर्थ, स्वाभिमानी साहित्यकार है जो कभी टूटा नहीं, कभी झुका नहीं।झुका तो केवल स्नेह के आगे।

महीप सिंह, सुप्रसिद्ध साहित्यकार
नंदन ने सबकुछ सहा सबकुछ झेला किंतु अपनी मधुर मुस्कराहट में रत्ती भर भी कमी नहीं आने दी और अत्यंत पीड़ाजनक स्थितियों में भी कनपुरिया मस्ती नहीं छोड़ी। मुझे नंदन के संपूर्ण काव्य -सृजन में यह मस्ती, अक्खड़ता, भावुकता और सबसे उपर मानवीयता दिखाई देती है ।

कृष्णदत्त पालीवाल
नंदन जी की कविताओं की अंर्तयात्रा करते हुए मुझे टी0एस0 एलियट की यह बात कौंधती है कि कविता अपनी परंपरा से निरंतर संवाद है। स्वयं नंदन जी कभी अज्ञेय जी को ‘मैं वह धनु हूं’ कभी ठाकुर प्रसाद सिंह को ‘ हमें न सूर्य मिलेगा न सूर्य बिंब’ कभी दिनकर जी को ‘चाहिए देवत्व पर इस आग को धर दूं कहां पर’ कभी अशोक वाजपेयी को ‘हमारे साथ सूर्य हो ’ कभी कैलाश वाजपेयी को ‘जंग की तरह लगा भविष्य’ कभी दुष्यंत कुमार को ‘हर परंपरा को मरने का विष मुझे मिला’ कभी गियोमिलोव को ‘आओ छाती में बम लेकर आसमान पर हमला करें’ - याद करते हैं।


सुरिंदर सिंह
नंदन के हर प्रेम-गीत की धड़कन उसकी पत्नी है- मूर्ख है मेरा यार!उसकी ‘रातों का हर सलोना झोंका’ हर ‘भीनी सी खुशबू’ एक वजूद से है। आजतक वह इंतजार कर रहा है उस रात का ज बवह अपने ‘इंद्रधनुष’ से पूछने का साहस जुटा पाए कि वह उसके सपनों में क्यों आता है...

गोपीचंद नारंग, उर्दू अदब की शख़्सियत
कन्हैयालाल नंदन की शायरी शउरे जात व काइनात की शायरी है। उन्होंने आम हिंदी के शायरों की तरह अपनी शायरी में खातीबाना बहना गुफ्तारी का मुज़ाहरा नहीं किया है बल्कि तमकिनत और कोमलता के साथ अपनी तख़लीकी इस्तेआशत को इज़्हारी कालब में ढाला है।

यह चेहरा इतना संवेदनशील है , और चश्में के पीछे छिपी आंखें इतनी बातूनी हैं कि लाख छुपाने पर भी दिल की जुबान बोलने लगती हैं । पहनने का ही सलीका नहीं बातों का भी सलका सीखना हो तो हाजिर है । अपनों के लिए धड़कता यह दिल प्यार के नाम पर कुछ भी लुटाने को तत्पर रहता है , और कोई इस लूट को नहीं लूटता है तो उस बौड़म पर गुस्सा आता है । मुझे याद है, एक बार खीझकर नंदनजी ने कहा था-- राजे इस बदमाशी का क्या मतलब है कि पत्रिका में यह छाप दो वो छाप दो कि रट लगाए लोग मेरे पीछे डोलते है और तुम कुछ भी छपवाने के लिए नहीं कहते । ’’ मैंनें पाया कि आंखें साफ कह रही हैं कि यह दर्द जेनुइन है । मैंनें कुछ नहीं कहा बस उन आंखों को अपनी आत्मीय मुस्कान दे दी । दिल ने बात समझ ली । शायद यही कारण है कि सितम्बर 1995 में गगनांचल का संपादकीय भार संभालते हुए संपादन सहयोग के लिए पूछा नहीं गया था, सूचित भर किया गया था कि यह काम करना है । सच कहूं पत्रिका निकालने की शाश्वत खुजली के कारण मैं ऐसे प्रस्ताव की प्रतीक्षा में था । मत चूके चौहान की शैली में हां कह दी । इस हां के अनेक सुख थे । सबसे बडा तो यही कि संपादन के विशाल अनुभव सम्पन्न व्यक्ति का साथ , सरकारी पत्रिका होने के कारण साधन जुटाने की चिंता से मुक्ति तथा कुछ करो इस चांदनी में सब क्षमा है जैसा संपादकीय अभयदान । इस अवसर ने अजय गुप्ता जैसा मित्र भी दे दिया । मैनें इस व्यक्तित्व से बहुत कुछ सीखा है । इस सीखने की प्रक्रिया में डांट अधिक खाई है शाब्बासी कम पाई है और कहूं कि पाई ही नहीं तो बेहतर होगा । इस श्रीमुख से शाब्बासी नहीं मिली है पर वाया भंटिडा आई इस श्रीमुखीन शाब्बासियों ने मेरा उत्साह बढाया है । यह अच्छा ही रहा , एक सारहीन अहं नहीं पलने दिया गया ।‘गगनांचल’ को 2003 में छोड़ने के बाद मैंने नंदन जी से कहा कि मैंने आपसे बहुत कुछ सीखा है। वे बोले-क्या सीखा है, राजे!’ मैं- वो फिर कभी बताउंगा।’ इसके बाद नंदन जी ने जब ‘व्यंग्य यात्रा’ के संपादन और प्रस्तुति की प्रशंसा की तो मैंनें कहा- यही सीखा है जिसने आप जैसे अनुभवी एवं वरिष्ठ संपादक से मेरे संपादकीय कर्म की निष्पक्ष प्रशंसा करवा दी।

नंदन जी का एक काव्य संकलन है, ‘ समय की दहलीज पर ’ ।‘ समय की दहलीज ’ समय - समय पर लिखी कविताओं को एक किताब में संकलित कर प्रस्तुत मात्रा करने का प्रयत्न नहीं है अपितु कविता को एक वैचारिक सलीके से अपनी सम्पूर्ण गम्भीरता के साथ पाठकों से संवाद करने का आत्मीय आग्रह है । संकलन के हर पन्ने पर कवि नंदन उपस्थित हैं । यही कारण है कि संकलन की भूमिका नारे बाजी से अलग, एक कवि की विभिन्न समय- अन्तरालों में संचित सोच और काव्य अनुभवों का गद्य - गीत है । कवि नें जिन्हें अपने नोट्स कहा है वे वस्तुतः सारगर्भित सूत्रा हैं जो कन्हैयालाल नंदनीय दृष्टि से अपने परिवेश को समझने के प्रयत्न का परिणाम हैं और अपने अनुभवों को बिना कंजूसी के बांटते हुए दृष्टिगत होते हैं । इन नोट्स के आधार पर ही कविता पर एक सार्थक बहस की जा सकती है । इस सागर में से कुछ बूंदें आपके सामनें प्रस्तुत हैं ---‘ किसी कविता में जितना सम्पूर्णता का अंश डाला जा सकेगा , वह उतना ही समयातीत हो सकेगी ..... तात्कालिकता से हटना अच्छी कविता की अनिवार्यता है । .... आत्मालोचन करने का गुण अगर कवि में पनप जाये तो उसे किसी अन्य आलोचक की जरूरत नहीं होती । ....... कविता मन भी है , मस्तिष्क भी है , दिल भी है दिमाग भी है ।...... सकारात्मक कविता नकारात्मक कविता से हमेशा बडी होती है । ....... प्रेम की ज्योति अपने स्थान और समय से आगे तक की रौशनी देती है ।......... कविता का अच्छा पाठक अपने अंदर एक कवि होता है । ...... कवि के अंदर कुतूहल का जिंदा होना उसकी रचनाशीलता को आयाम प्रदान करता है । ....... आभ्यांतरिक संघर्ष रचनाशीलता में सबसे अधिक सहायक होता है । ........ सिकंदर पर सुकारात की अहमियत का युग लौट सके ।.......... ’’


समय की इस दहलीज को कवि नंदन नें पांच कोणों से देखा है और हर कोण को एक नाम दिया है । ‘ राग की अभ्यर्थना ’ के अंर्तगत संकलित कविताओं में कवि को ‘आत्मबोध’ होता है , वह अपने ‘विस्तार’ में आकाश को छोटा पाता है , और ‘संस्पर्श का कलरव ’ उसे अनुभव देता है --- राग की अभ्यर्थना में / धरती को जल नें / जल को हवा ने / हवा को आकाश ने छुआ / वृक्ष के अंग अंग / डाल - डाल / फुनगी - फुनगी / फूट पडा अंखुआ । / पृथ्वी / जल / हवा / आकाश / सबके संस्पर्श से वृक्ष की देह में / नया कलरव हुआ ।’’ इन कविताओं में एक उत्कट जीजीविषा है । ‘ समय ठहरा हुआ ’ कितना भी क्यों न हो पर कवि के सपनों में एक ‘इंद्रधनुष’ रोज आता है और सांसों के सरगम पर तान छेड जाता है । प्रकृति के विभिन्न रंगों में डूबता उतरता कवि अपनी संवेदनाओं का आत्मीय संस्पर्श छोडता चलता है । ब्रहाण्ड की विराटता को अपनी बाहों में बांध लेने को लालयित कवि इस विशाल शून्य को अपने अंदर भर लेना चाहता है --- कहना कठिन है / कि शून्य को खाली कर रहा हूं / या शून्य को भर रहा हूं /सच यह है कि / फूल/ रंग / कोमलता की तलाश कर रहा हूं । ’’

कविता को गुनगुनाने और कंठस्थ करने वाले पाठको को आज लगता है कि कविता कहीं उनसे बहुत दूर हो गई । मंच पर जो कविता विराजमान है उससे मानवीय मूल्यो के लिए चिंतित सजग पाठक वितृष्णा करता है । ऐसे में नंदन की कविता एक सहज मार्ग दिखाती है । यह कविता शुद्ध भारतीय मन और परिवेश की है । इस संकलन की कविताएं पाश्चात्य वादों या विवादों में उलझी भारतीय मानसिकता का अनुवाद नहीं हैं । यह कविताएं निराशा के दलदल में नहीं डूबोती हैं अपितु तमाम विरोधों के बावजूद एक सशक्त सम्बल हाथ में थमाती हैं । अपनी मिट्टी की गंध का स्नेहिल स्पर्श देती इन कविताओं को पढना एक साहित्यिक उपलब्धि है ।

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नंदन जी का संक्षिप्त परिचय

जन्म- जुलाई १९३३ को गाँव परस्तेपुर (जिला फतेहपुर) में

निधन -25 सितम्बर 2010

शिक्षा - बी.ए. (डी.ए.वी कॉलेज, कानपुर), एम.ए. (प्रयाग विश्वविद्यालय), पीएच.डी. (भावनगर विश्वविद्यालय)

कार्यक्षेत्र- ४ वर्ष तक मुंबई विश्वविद्यालय से सम्बद्ध कॉलेजों में अध्यापन। १९६१ से १९७२ तक टाइम्स ऑफ इंडिया प्रकाशन समूह के धर्मयुग में सहायक संपादक। १९७२ से दिल्ली में क्रमशरू पराग, सारिका और दिनमान के संपादक। तीन वर्ष तक दैनिक नवभारत टाइम्स में फीचर संपादक, ६ वर्ष तक हिन्दी संडे मेल में प्रधान संपादक तथा १९९५ से इंडसइंड मीडिया में निदेशक के पद पर।

प्रमुख कृतियाँ- लुकुआ का शाहनामा, घाट-घाट का पानी, अंतरंग नाट्य परिवेश, आग के रंग, अमृता शेरगिल, समय की दहलीज, बंजर धरती पर इंद्रधनुष, गुजरा कहाँ कहाँ से।

सम्मान पुरस्कार- भारतेंदु पुरस्कार, अज्ञेय पुरस्कार, मीडिया इंडिया, कालचक्र और रामकृष्ण जयदयाल सद्भावना पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।

सुना उन से कोई प्यासा नहीं है [ग़ज़ल] - शहरयार


जो कहते हैं कहीं दरिया नहीं है
सुना उन से कोई प्यासा नहीं है।

दिया लेकर वहाँ हम जा रहे हैं
जहाँ सूरज कभी ढलता नहीं है।

न जाने क्यों हमें लगता है ऎसा
ज़मीं पर आसमाँ साया नहीं है।

थकन महसूस हो रुक जाना चाहें
सफ़र में मोड़ वह आया नहीं है।

चलो आँखों में फिर से नींद बोएँ
कि मुद्दत से उसे देखा नहीं है।

[संग्रह शाम होने वाली है; प्रकाशक - वाणी प्रकाशन; से साभार]

यह दौर बड़ी शायरी का दौर नहीं है [डॉ. शहरयार से बातचीत] [डॉ. शहरयार को ज्ञानपीठ प्राप्त होने की बधाई स्वरूप विशेष प्रस्तुति] - डॉ. प्रेमकुमार


भारतीय ज्ञानपीठ ने शुक्रवार को 43वें और 44वें ज्ञानपीठ पुरस्कारों की एक साथ घोषणा की। ये पुरस्कार उर्दू के जाने-माने साहित्यकार शहरयार और मलयालम कवि नीलकानंदन वेलु कुरुप को दिए जाएंगे। ज्ञानपीठ की ओर से जारी विज्ञप्ति के अनुसार ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता सीताकांत महापात्र की अध्यक्षता में चयन समिति की बैठक में यह निर्णय लिया गया। चयन समिति के अन्य सदस्य प्रो. मैनेजर पाण्डेय, डा. के.सच्चिदानंदन, प्रो. गोपीचंद नारंग, गुरदयाल सिंह, केशुभाई देसाई, दिनेश मिश्रा और रवींद्र कालिया बैठक में मौजूद थे।
साहित्य शिल्पी पर डॉ. शहरयार का यह साक्षात्कार हमने लगभग डेढ वर्ष पूर्व प्रस्तुत किया था। आज उनकी इस महति उपलब्धि के अवसर पर हम इसे पुनर्प्रकाशित कर रहे हैं।

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कमलेश्वर शहरयार को एक खामोश शायर मानते थे। एक ऐसा खामोश शायर जब इस कठिन दौर व खामोशी से जुड़्ता है, तो एक समवेत चीखती आवाज मे बदल जाता है। बडे अनकहे तरीके से अपनी खामोशी भरी शाइस्ता आवाज को रचनात्मक चीख में बदल देने का यह फन शहरयार की महत्वपूर्ण कलात्मक उपलब्धि है। वे मानते है कि शहरयार की शायरी चौकाने वाली आतिशबाजी और शिकायती तेवर से अलग बड़ी गहरी सांस्कृतिक सोच की शायरी है और वह दिलो दिमाग को बंजर बना दी गयी जमीन को सीचती है।

अकादमी पुरस्कार के अतिरिक्त विभिन्न स्तरों पर देश विदेश में सम्मान और ख्याती प्राप्त शहरयार के उर्दू में ‘इस्में आज़्म’, ‘सातवाँ दर’, ‘हिज्र की जमीन’ शीर्षकों से आए काव्य संग्रह काफी चर्चित और प्रशंशित हुए हैं। ‘ख्वाब का दर बंद है’ हिन्दी और अंग्रेजी मे भी प्रकाशित हो चुका है तथा ‘काफिले यादों के’, ‘धूप की दीवारे’, ‘मेरे हिस्से की ज़मीन’ और ‘कही कुछ कम है’ शीर्षकों से उनके काव्य संग्रह हिन्दी मे प्रकाशित हो चुके है। ‘सैरे जहाँ’ हिन्दी मे शीघ्र प्रकाश्य है।

‘उमराव जान’ की गजलों से शहरयार को जो ख्याति, जो सम्मान मिला उसे वे अपनी उपलब्धि और खुशकिस्मती मानते हैं। फिल्म को आज के संदर्भ में वे काफी ‘इफेक्टिव मीडिया’ मानते हैं। वे कहते है कि उन्होने अपनी आइडियोलाजी के लिये इस मीडिया का बेहतर इस्तेमाल किया। एक श्रेष्ठ और समर्पित कवि के अतिरिक्त वे एक संवेदनशील, विनम्र, आत्मीय और दूसरों की भावनाओं का सम्मान करने वाले व्यक्ति हैं। प्रस्तुत है डॉ. प्रेम कुमार से उनकी बातचीत

[ नोट - डॉ. प्रेम कुमार ने बेहद विस्तार से शहरयार को जानने व इस मंच पर प्रस्तुत करने का उल्लेखनीय कार्य किया है इसके लिये साहित्य शिल्पी समूह उनका आभार व्यक्त करता है। अंतरजाल की सीमाओं के मद्देनजर दो खंडो और चालीस पृष्ठों में प्रेषित इस साक्षात्कार के महत्वपूर्ण अंश मुख्य पृष्ठ पर प्रस्तुत किये जा रहे हैं। शेष बातचीत पढने के लिये प्रस्तुत साक्षात्कार के नीचे दिये गये लिंक पर चटखा लगायें]

लेखन के शुरुआती दौर के विषय में कुछ बतायें

ये मुझे याद नहीं आता. बार-बार सोचा है - कोई ऐसा सिरा नहीं मिला कि पकड़ कर कह सकूँ कि मैं शायरी की तरफ जाने वाला था। बेसिकली यह याद आता है कि खलीलुर्रहमान साहब, जो बड़े कवि और आलोचक थे, ए.एम.यू. में रीडर थे; से मिलना-जुलना होता था। जब मैंने तय किया कि मुझे थानेदार नहीं बनना है तो घर से अलग होना पड़ा। तब मैं खलीलुर्रहमान के साथ रहने लगा।...। तो शुरू में मेरी जो चीजें छपीं, ऐक्चुअली वो मेरी नहीं हैं। बाद में अचानक कोई मेरी ज़िंदगी में आया.... नहीं, यह कांफीडेंशियल है... मैं कितना ही रुसवा हो जाऊँ इस उम्र में, किसी और को रुसवा क्यों करूँ?.... तब दुनिया मुझे अज़ीब लगने लगी और फिर मैं शायरी करने लगा। बी.ए. की आखिरी साल में शेर लिखने की रफ़्तार तेज हो गई। एम.ए. में साइकोलोजी में दाखिला लिया और जल्दी ही अहसास हुआ कि फैसला गलत लिया है। दिसम्बर में नाम कटा लिया। फिर चार छ: महीने केवल शायरी की - खूब छपवाई। ऊपर वाले की मुझ पर.... हाँ, यूँ मैं मार्क्सिस्ट हूँ फिर भी मानता हूँ कि कोई शक्ति है; कोई बड़ी ताक़त है जो मेरी चीजों को तय करती रही है। उर्दू की बहुत अच्छी मैगजींस में मेरी चीजें छपने लगीं। तेज़ रफ़्तारी से सामने आया। फिर एम.ए. उर्दू में ज्वाइन किया। उस दौर में मेरा और मासूम रज़ा राही का कम्पिटीशन चलता था। जी, हमने बी.ए. साथ-साथ किया, फिर मैं एक साल पीछे हो गया।

इस पर खुश नहीं होना चाहिये कि यह फिक्शन का दौर है। इस पर अफसोस होना चाहिये है, यह अदब का दौर नहीं है। महसूस करने को आला जुबान है- हर शख्स की मादरी जुबान और उसकी सबसे अच्छी चाहते है, तो महसूस करने का यह माद्दा खत्म नहीं होना चाहिए। जो शख्स महसूस नहीं कर सकता, वह खासा खतरनाक होता है। वह न तो अच्छा शायर हो सकता है, न अच्छा बाप, न शौहर, न पड़ोसी। इसलिये वे आर्गनाइज्ड लोग, जो समाज मे उथल-पुथल करना चाहते हैं, वे इंसानो से उनके महसूस करने का हक छीन लेना चाहते हैं। शायरी, पेंटिग, म्यूजिक सब इमेजिनेशन की पैदावार है। सोसायटी में इनका न होना खतरनाक है। वैल्यूज को जितनी फोर्सफुली और पर्फेक्टली पोयट्री रेप्रेजेंट कर सकती है, उतना और कोई फैकल्टी आँफ आर्ट नहीं कर सकती।


पिछले दिनों हिन्दी में “ कविता की मौत “ और गद्य के भविष्य पर काफी कुछ कहा गया है। पिछले दिनों काजी अब्दुल सत्तार ने पोयट्री पर कई कोणों से प्रहार करते हुए इक्कीसवीं सदी को फिक्शन की सदी कहा है। एक शायर होने के नाते आप इन बिन्दुओं पर किस प्रकार सोचते है?

देखिये इस पर खुश नहीं होना चाहिये कि यह फिक्शन का दौर है। इस पर अफसोस होना चाहिये है, यह अदब का दौर नहीं है। महसूस करने को आला जुबान है- हर शख्स की मादरी जुबान और उसकी सबसे अच्छी चाहते है, तो महसूस करने का यह माद्दा खत्म नहीं होना चाहिए। जो शख्स महसूस नहीं कर सकता, वह खासा खतरनाक होता है। वह न तो अच्छा शायर हो सकता है, न अच्छा बाप, न शौहर, न पड़ोसी। इसलिये वे आर्गनाइज्ड लोग, जो समाज मे उथल-पुथल करना चाहते हैं, वे इंसानो से उनके महसूस करने का हक छीन लेना चाहते हैं। शायरी, पेंटिग, म्यूजिक सब इमेजिनेशन की पैदावार है। सोसायटी में इनका न होना खतरनाक है। वैल्यूज को जितनी फोर्सफुली और पर्फेक्टली पोयट्री रेप्रेजेंट कर सकती है, उतना और कोई फैकल्टी आँफ आर्ट नहीं कर सकती। पोयट्री से लुत्फ उठाने के लिये, उसे एप्रीशिएट करने के लिए कई चीज जरूरी हैं-म्यूजिक, पेंटिग, फिलासफी, मीटर्स बगैरह। उन्हें जानना जरूरी है। यदि आपको आईरकी सोसायटी चाहिये और उसमें वैल्यूज की बुनियाद चाहिये, तो पोयट्री जरूरी है। सारी दुनिया की जुबानों में पहले पोयट्री पैदा हुई फिर फिक्शन। फिक्शन को लोमैन भी पढ़ सकता है, पर पोयट्री का लुत्फ बहुत कुछ जानने पर ही लिया जा सकता है। बड़ा फिक्शन भी पोयट्री के बिना नहीं लिखा जा सकता।

हिंदी में तो मंच के स्तर के गिरते जाने की........?

वो तो उर्दू में भी है। अच्छे बुरे हर तरह के लोग जाते भी हैं। नहीं किसी के साथ पढने-न-पढ़ने की शर्त नहीं रखी। यह सही है कि खाली लिटरेरी हैसियत के प्रोग्राम अच्छे लगते हैं यह दुनिया कुछ खास लोगों के लिए नहीं बनी है, हर तरह के लोग उस में मौज़ूद हैं। और उन्हें मौजूद और जिंदा रहने का हक है। खुद हम जिन लोगों को कंटेम्प्ट के साथ देखते हैं, उनका एक रोल है वो जिस सतह पर लोगों को एंटरटेन करते हैं, उसकी भी एक जरुरत है। हम-आप भी अगर अपने आपको अपने बनाए हुए जाल से थोडा सा निकाल सकें तो हमको भी वो चीजें अच्छी लगती हैं।

मंच में और सीरियस लिटरेचर में जो फ़ासला पैदा हो गया है, उसकी थोडी बहुत जिम्मेदारी सीरियस राइटर्स पर भी है। वो उस इडियस में बात करने लगे है कि जो बहुत खास लोगों के लिए रह गया है। इसका मतलब यह नहीं है कि हमें अपने से नीचे उतरना चाहिए, पर अर्थ यह है कि हमें अपनी गंभीर बात को सहज अंदाज में कहने का आर्ट हासिल करना चाहिए।


मंच में और सीरियस लिटरेचर में जो फ़ासला पैदा हो गया है, उसकी थोडी बहुत जिम्मेदारी सीरियस राइटर्स पर भी है। वो उस इडियस में बात करने लगे है कि जो बहुत खास लोगों के लिए रह गया है। इसका मतलब यह नहीं है कि हमें अपने से नीचे उतरना चाहिए, पर अर्थ यह है कि हमें अपनी गंभीर बात को सहज अंदाज में कहने का आर्ट हासिल करना चाहिए।

अदब में फ़ार्म और कटेंट की बहस में हमेशा उलझावा रहा है, इसीलिये कि अदब में इन दोनो को अलग-अलग देखना नामुमकिन है। ये तो हम उसका असेस्मेंट करने में, उसको एप्रीशिएट करने में अपनी सहूलियत के लिये अलग-अलग कर के देखते हैं और कभी एक चीज पर और कभी दूसरी चीज पर ज्यादा एम्फ़ैसिस देने लगते हैं। मैं उन लोगों में हुँ जिनका ख्याल है कि अगर कोई मजबूरी आन पड़े और हमें फ़ार्म और कटेंट में से किसी एक को तस्लीम करना पडे तो मैं कंटेट को अहमियत दूंगा

उर्दू में शायरी की ताकत के नाम पर प्राय: गज़ल का जिक्र किया जाने लगता है। आप भी पहले नज़्म की तुलना मे गज़ल के रूप को बेहतर मानते रहे हैं। गज़ल और नज़्म के स्तर पर आज आप शायरी या शायर को किस तरह अलग अथवा बेहतर-कमतर मानते हैं।

गज़ल मे जो भी ट्रुथ होता है वह जनरल बन जाता है। उसकी डिटेल्स मौजूद नहीं होती इसलिये शेर कई जगह कई बातों को निकालते हुए आता है। यह उसकी ताकत भी है कमजोरी भी। आप चाहते है कि किसी पर्टिकुलर चीज पर निगाह डालें लोग, पर जनरल होने की वजह से सुनने-पढ़्ने वाला अपनी तरह से अर्थ ले लेता है। नज़्म में जिस तरह आप अपनी बात कहते है, उसमे पढने-सुनने वाला पूरी तरह नहीं तो काफी बड़ी हद तक आपकी सोच के आस-पास रहता है। गज़ल कहते समय उस फार्म की कुछ बंदिशे है, जिनकी वजह से कभी-कभी कुछ ज्यादा कह जाते हैं या कुछ कम रह जाता है। जरूरी नहीं कि हर नज़्म मे सौ फीसदी कामयाब हों, लेकिन गज़ल के मुकाबले मे लिखने वाले को यह अहसास होता है कि वह अपनी बात दूसरों तक पहुँचा सका है।


पहले मेरा इस पर रूख दूसरा था। अब चेंज किया है, मैने अपनी राय को। अब दोनों में ही में सभी तरह की प्राब्लम्स फेस करता हूँ। गज़ल मे जो भी ट्रुथ होता है वह जनरल बन जाता है। उसकी डिटेल्स मौजूद नहीं होती इसलिये शेर कई जगह कई बातों को निकालते हुए आता है। यह उसकी ताकत भी है कमजोरी भी। आप चाहते है कि किसी पर्टिकुलर चीज पर निगाह डालें लोग, पर जनरल होने की वजह से सुनने-पढ़्ने वाला अपनी तरह से अर्थ ले लेता है। नज़्म में जिस तरह आप अपनी बात कहते है, उसमे पढने-सुनने वाला पूरी तरह नहीं तो काफी बड़ी हद तक आपकी सोच के आस-पास रहता है। गज़ल कहते समय उस फार्म की कुछ बंदिशे है, जिनकी वजह से कभी-कभी कुछ ज्यादा कह जाते हैं या कुछ कम रह जाता है। जरूरी नहीं कि हर नज़्म मे सौ फीसदी कामयाब हों, लेकिन गज़ल के मुकाबले मे लिखने वाले को यह अहसास होता है कि वह अपनी बात दूसरों तक पहुँचा सका है।

गज़ल की ताकत या कमजोरी की बात नहीं है। उसके फार्म ने न खुशी है, न खामी है। इस्तेमाल करने वाले पर है। हमारे यहाँ इसका बहुत चलन रहा है। उसके जरिये जो भी कहा जाता है वो बहुत ही जल्द और बहुत से लोगों तक पहुचता है। ग़ज़ल के बारे मे हर बार कहा गया है कि अपने जमाने का साथ नहीं दे सकरी पर इकबाल, फैज सबने साबित किया कि दे सकती है। मुशायरे की शायरी से हिन्दी या उर्दू मे अंदाज नहीं लगाना चाहिए।

हमारे यहाँ बहुत से शायर है-अच्छे शायर, जिन्होने गजल बिल्कुल नहीं लिखी पर उनकी शायरी कुछ खास लोगों की शायरी है। शायरी मे शायर की अपनी सोच होनी चाहिए, पहचान होनी चाहिए। कुछ खास बातें उसकी होनी चाहिए, लेकिन उसकी पहुँच खास के साथ आम लोगों तक भी हो। तब वह एक सच्ची और अच्छी शायरी होती है। उर्दू मे इसकी सब से बड़ी मिसाल गालिब है, बहुत गहरी, बहुत फिलासफी कल बातें करते है और जिन्दगी की ऐसी सच्चाइयाँ सामने लाते है, जो हमें हैरान कर देती हैं। उनकी जुबान भी , ईडियम कहिए, वो आसान नहीं है, लेकिन इसके बावजूद एक सतह पर आम आदमी भी उससे लुत्फंगूज होता है, मजा लेता है।

गज़ल और नज़्म की जहाँ तक बार है, हम उर्दू वालों का मिजाज गज़ल मे इतना रच-बस गया है कि वो नज़्म को उतना पसंद नही करता। यही वजह है कि उर्दू में वो शायर नुक्सान में रहे, जिन्होने सिर्फ नज़्में लिखी। आम मकबूलियत में अनकी गजलों का बड़ा हाथ है। अगरचे अदब को सतह पर देखा जाए तो उनका असली कंट्रीब्यूशन उनकी नज़्मो मे है।

आपने गजल की जिस खूबी-खामी और उर्दू शायरों की पसंद व मिजाज की बात की है वह तो अपनी जगह है पर आपको भी ऐसा लगता है कि गजलों में अपने पूर्वर्तियो की छाया अथवा नकल या दोहराव अधिक बहुत अधिक दिखाई देता है। मौलिकता के संदर्भ में आप उर्दू गजल को कहा देखते है?

ऐसा नही है। ये दौर बड़ी शायरी का दौर नहीं है। दूसरे दर्जे के शायर है और वे सब मिलकर बड़ी शायरी बनते है। फैज, मकदूम, मज़ाज़, जज़्बी, सरदार बगैरह मिलकर एक शक्ल बनाते है। अच्छे शायर है ये सब और अच्छी बात यह है अलग-अलग अच्छे शायर होना। हर शायर का जहाँ प्वांइट आफ व्यू होगा वह उससे देखेगा चीजों को। सिलेक्ट करने न करने का आला प्वाइंट आफ व्यू है। ऐसा मालूम होता है कि कुछ सिमलीज व मेहाफर्स बार बार आ रहे है। उससे लगता है कि रिपिट कर रहा है शायर अपने को। अच्छा सच्चा शायर कोशिश करता है कि अपने को रिपीट न करे। अब जैसे रात आया या सहर आया कहीं। पालिटिकल सोशियो प्राबलम्स है, अपनी बात है, कहने मे कुछ सिम्बल हैल्प करते है। इसलिये रात और दिन सिम्बल बन गए। सिचुएशन की मुख्तलिफी से फैज की, मेरी, पाकिस्तान का रात या दिन अलग होंगे। बहुत से दौर अदब मे ऐसे आते है और आए है जहाँ शायरो की बात ओवर लैप करती है। वह पूरे दौर की बात बन जाती है। एक्सटर्नल फोर्सेज, बहुत से लोगों को एक तरह से सोचने को मजबूर कर देती है। जब सब लोग एक तरह से सोचने को मजबूर हो जाए तो जाहिर है कि उनकी जुबान मे भी समानताएँ नजर आती है। पर ये उपरी समानताएँ होती है। सरसरी नजर से, कैजुअली जो पढ़्ता है, उसे यह धोखा है कि सब एक तरह की बातें कर रहे हैं। शायरी मे हर शायर की इडिवीजुअलिटी जरूर मौजूद रहती है। इसलिए क्रिएट करने वाले की अपनी जो आइडैंटिटी है, वह गुम नही होती। शायरी या कोई भी सीरियस आर्ट-फार्म पढ़्ने सुनने देखने वाले से थोडी सावधानी और थोडा वक्त मांगता है। जाकिर साहब का यह कथन कि “अगर कोई काम इस काबिल है कि किया जाए तो फिर उसे दिल लगाकर किया जाए अदब पर भी पूरी तरह लागू होता है।

आपको मुशायरो मे भी बुलाया जाता रहा है। आप शिरकत भी करते रहे है। ऐसा क्यों है कि आपकी मुशायरो के बारे मे अच्छी राय नही है? अपनी कुछ खामियो के बावजूद मुशायरो या कवि सम्मेलन अपनी अपनी भाषाओं को लोकप्रिय तो बना ही रहे है?

इंडिया मे मुशायरों और कवि सम्मेलनों मे सिर्फ चार बाते देखी जाती है- पहली, मुशायरा कंडक्ट कौन करेगा? दूसरी- उसमे गाकर पढ़्ने वाले कितने लोग होगे? तीसरी- हंसाने वाले शायर कितने होंगे और चौथी यह कि औरतें कितनी होगीं? मुशायरा आर्गेनाइज –पेट्रोनाइज करने वाले इन्ही चीजों को देखते है। इसमे शायरी का कोई जिक्र नहीं। हर जगह वे ही आजमाई हुई चीजें सुनाते है। भूले बिसरे कोई सीरियस शायर फँस जाता है, तो सब मिलकर उसे डाउन करने की कोशीश करते है। इसे आप पॉपुलर करना कह लीजिए। फिल्म ग़ज़ल भी बहुत पॉपुलर कर रहे है। पर बहुत पापुलर करना वल्गराइज करना भी हो जाता है बहुत बार। इंस्टीट्यूशन मे खराबी नहीं, पर जो पैसा देते है, वे अपनी पसंद से शायर बुलाते है। उनके बीच मे सीरियस शायर होगे तो मुशकिल से तीन चार और उन्हे भी लगेगा जैसे वे उन सबके बीच आ फँसे है। जिस तरह की फिलिंग मुशायरो के शायर पेश करते है, गुमराह करने वाली, तास्तुन, कमजरी वाली चीजें वे देते है, सीरियस शायर उस हालात मे अपने को मुश्किल मे पाता है।

आप हिन्दी के साहित्य और साहित्यकारों से भी आत्मीय व करीबी स्तर पर जुडे रहे है। हिन्दी –उर्दू साहित्य को अगर आज तुलनात्मक दृष्टि से हम देखना चाहें, तो क्या मुख्य समानताए या असमानताए उनके बीच दिखती है? हिन्दी गजल के बारे मे विशेष रूप से अपनी राय जाहिर करते हुए आप अन्य विधाओ मे लिखे गए साहित्य की वर्तमान स्थिति के बारे मे अपने अनुभव, अपने विचार प्रकट करना अवश्य चाहेगे?

हिन्दुस्तानी वाला इलाका बैक्क बर्ड है। यहाँ अदब के बूते जिन्दा नहीं रहा जा सकता। रीजनल जुबानों में रिकॉगनीशन मिलने पर जिन्दगी गुजारी जा सकती है। मराठी, उडिया, बंगाली, तमिल वगैरह मे पढ़ा-लिखा कोई आदमी ऐसा नहीं होगा जो अपनी भाषा के लेखको को न जानता होगा। हिन्दी-उर्दू वाले आसानी से नये लोगों को रिकगनाइज नहीं करते। हम ही रहें नये न आए। एस्टेबलिशमेंट बन गया है। एकेडमिक इंस्टीयूशंन और हिन्दी-उर्दू डिपार्ट्मेंट्स की स्थिति यह है कि वहा लिटरेचर से लेना देना नहीं। साहित्य पढ़ाने मे लगे है, किंतु एकेडिमिक काम के अलावा दुनिया भर के काम उन्हे है। प्रोग्रेसिव आइडियाज से हिन्दी उर्दू दोनो मे लोग बिदकते है।


मैने हिन्दी साहित्य को हिस्टोरिक प्रोस्पेक्टिव मे सिस्टेमेटिक और आर्गेनाइज्ड ढंग से नही पढ़ा। पर हाँ जिन लोगो से सम्बन्ध रहे है उन्हे पढा है। भले ही सिस्टेमेटिक ढंग से नहीं पर मैने सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, गिरिधर राठी, अशोक वाजपेयी, भारती, शमशेर, दुष्यंत, केदारनाथ, त्रिलोचन, नागार्जुन, श्रीकांत वर्मा वगैरह को पढ़ा है। वह अलग शायरी है। इसमे कम्पेयर नहीं। हिन्दी मे लोग गजल लिखते है, यह अच्छी बात है। पर दुष्य़ंत ने जो छाप लगा दी, वह बिलकुल अलग है। किसी भी तरह देखे वह गजल है। हम जिस तरह के मीटर के आदी है, हिन्दी शायरी हमें थोडी प्रोजेक लगती है। हम जिस तरह के मीटर और रिदम के कायल है, उसकी वजह से यह अहसास होता है कि जैसे वह प्रोज के करीब है। महादेवी, निराला मे ऐसी बात नहीं। पर जहा तक थाट-कंटेट को बात है, बहुत सीरियस शायरी है। वहाँ क्रिटीहिज्म मैने सुनी ज्यादा है, पढ़ी कम है। अपनी तकरीर मे नामवर सिंह बहुत इम्प्रेस करते है। उनका रिकार्ड काफी दिनों से एक जगह ठहरा हुआ है। मुझे कमलेश्वर और नामवर की तकरीर में अंतर नहीं लगता। दोनो इम्प्रेस करते है और दोनो के कुछ पहलू ऐसे है तो ज्यादा देर मुतस्सिर करते है। हिन्दी मे फिक्शन अच्छा है। कमलेश्वर, मोहन राकेश यादव, मुन्नू, शानी, श्रीलाल शुक्ल को पढ़ा है। एक खास पीरियड में राकेश , कमलेश्वर, यादव, शानी ने अच्छा लिखा है।

खराबियाँ-अच्छाइयाँ दोनो मे कॉमन है। हिन्दुस्तानी वाला इलाका बैक्क बर्ड है। यहाँ अदब के बूते जिन्दा नहीं रहा जा सकता। रीजनल जुबानों में रिकॉगनीशन मिलने पर जिन्दगी गुजारी जा सकती है। मराठी, उडिया, बंगाली, तमिल वगैरह मे पढ़ा-लिखा कोई आदमी ऐसा नहीं होगा जो अपनी भाषा के लेखको को न जानता होगा। हिन्दी-उर्दू वाले आसानी से नये लोगों को रिकगनाइज नहीं करते। हम ही रहें नये न आए। एस्टेबलिशमेंट बन गया है। एकेडमिक इंस्टीयूशंन और हिन्दी-उर्दू डिपार्ट्मेंट्स की स्थिति यह है कि वहा लिटरेचर से लेना देना नहीं। साहित्य पढ़ाने मे लगे है, किंतु एकेडिमिक काम के अलावा दुनिया भर के काम उन्हे है। प्रोग्रेसिव आइडियाज से हिन्दी उर्दू दोनो मे लोग बिदकते है।

आपके बारे में कहा जाता है कि आपने अपने लेखन से हिन्दी उर्दू के बीच एक पुल बनाया है। आप हिन्दी में भी काफी लोकप्रिय हैं। आपकी लोकप्रियता में फिल्म के गीतों की क्या भूमिका है? आप अपनी उपलब्धियों और देश की वर्तमान हालत पर क्या कुछ कहना चाहते हैं?

मैं हिन्दी या उर्दू को नहीं लिख रहा, बल्कि उन लोगों के लिये लिख रहा हूँ जो खास तौर पर उर्दू भाषा भाषी हैं पर स्क्रिप्ट नहीं जानते, उन लोगों के लिये इनकी मातृभाषा उर्दू नहीं है पर मेरी शायरी पसंद करते हैं। मेरे शेर सुन कर, मुझसे मिल कर खुश होते हैं, मुझे प्यार देते हैं। हिन्दी में ज्यादा पॉपुलर होने की वजह यह है कि वे छापते हैं, पैसे देते हैं, इज्जत देते हैं, मानते हैं। उर्दू में खुद छपवानी पडती हैं किताबें।

मेरी ज़िन्दगी में फिल्म के मेरे गीतों नें बहुत अहं रोल अदा किया है। मैं अपनी लिटररी अहमियत की वजह से फिल्म में गया फिर आम स्तर पर फिल्म की वजह से लिटरेचर में मेरी अहमियत बढी। मोहब्बत, शौहरत, दौलत, इज्जत, बच्चे...आदमी जो ख्वाहिश कर सकता है मुझे खूब मिला। वैसे आप जानते हैं पूरी तरह कोई मुतमइन नहीं होता। शायद आदमी के ज़िन्दा रहने को जरूरी है कि वह किसी चीज की ख्वाहिश करता रहे।किसी चीज की कमी महसूस करता रहे।

जहाँ तक देश के सूरत-ए-हाल का सवाल है, तो जैसे मुल्क का फ्यूचर तय हो रहा है, रिफॉर्म्स के नाम पर जैसे जो हो रहा है और आम आदमी को कुछ नहीं मिल रहा है, हम खुली आँखों से देख रहे हैं और अपने को बेबस महसूस करते हैं। ईस्ट ईंडिया कम्पनी दूसरी तरह से आ रही है। आम आदमी को सच्चाईयों से दिन प्रतिदिन दूर किया जा रहा है। लेकिन हिन्दुस्तान के बारे में मेरा जो अनुभव है वह यह कि वह पाखंड को बहुत समय तक बर्दाश्त नहीं कर सकता। यहाँ लोग शोर नहीं मचाते लेकिन जब फैसले का वक्त आता है तो सच्चे और अच्छे फैसले करते हैं। मेरा यह ईमान मुझे फ्यूचर से मायूस नहीं होने देता। मुझे यकीन है कि आने वाली जनरेशन को वह सब कुछ नहीं देखना पडेगा जो हम देख सह रहे हैं।


न जिसकी शक्ल है कोई, न जिसका नाम है
कोई इक एसी शै का क्युँ हमेँ अज़ल से इंतज़ार है

जहाँ तक देश के सूरत-ए-हाल का सवाल है, तो जैसे मुल्क का फ्यूचर तय हो रहा है, रिफॉर्म्स के नाम पर जैसे जो हो रहा है और आम आदमी को कुछ नहीं मिल रहा है, हम खुली आँखों से देख रहे हैं और अपने को बेबस महसूस करते हैं। ईस्ट ईंडिया कम्पनी दूसरी तरह से आ रही है। आम आदमी को सच्चाईयों से दिन प्रतिदिन दूर किया जा रहा है। लेकिन हिन्दुस्तान के बारे में मेरा जो अनुभव है वह यह कि वह पाखंड को बहुत समय तक बर्दाश्त नहीं कर सकता। यहाँ लोग शोर नहीं मचाते लेकिन जब फैसले का वक्त आता है तो सच्चे और अच्छे फैसले करते हैं। मेरा यह ईमान मुझे फ्यूचर से मायूस नहीं होने देता। मुझे यकीन है कि आने वाली जनरेशन को वह सब कुछ नहीं देखना पडेगा जो हम देख सह रहे हैं:-

आज का दिन बहुत अच्छा नहीं तस्लीम है
आने वाला दिन बहुत बहतर है, मेरी राय है।

आपको उमरावजान के गीतों के कारण बेहद ख्याति मिली। फिल्म जगत के आपके अनुभव कैसे रहे हैं? फिल्मों के लिये गीत लिखते हुए स्वयं को कितना समर्थ और अनुकूल मानते हैं?

मुझे ज़िन्दगी में बहुत सी चीजें फिल्म के गानों की मकबूलियत से मिलीं। दूर दराज मुल्कों में जो मुशायरों में बुलाया जाता है तो उसमें यही इंट्रोडेक्शन काफी होता है कि ये उमरावजान के गीतों के लेखक हैं। मेरे बच्चों से अक्सर यह सवाल किया जाता है कि आप उन्ही शहरयार के बच्चे हैं, जिन्होने उमरावजान के गाने लिखे हैं? मैं आवाम की पसंद की अहमियत का हमेशा कायल रहा हूँ। अगर कोई किसी को पसंद करता है तो उसमें कुछ न कुछ अच्छा जरूर है। नासिर काज़मी का एक मिसरा है – “कुछ होता है जब पलके खुदा कुछ कहती है” मकबूलियत की अपनी जगह है।

वहाँ निन्यानबे प्रतिशत गाने धुनों पर लिखे जाते हैं, फौरन वहीं पर। हम नहीं लिख सकते। बहुत दिनों से यह काम हो रहा है। साहिर वगैरह बहुत लोगों नें लिखे। लगता है जैसे कफन तैयार है अब मुर्दा तैयार कीजिये। जब तक हम कहानी कैरेक्टर का हिस्सा न बना लें गीत को कैसे लिखें? क्रियेटिव प्रोसेस इंटरकोर्स से मिलता जुलता है। उसको प्राईवेसी जरूरी है। हम दनादन धुन पर तुरंत नहीं लिख सकते।

पिक्चर को मन इस लिये होता है कि उस मीडियम का इफैक्ट है। हमारी बहुत सी बातें जो वैसे नहीं पहुँच रहीं वहाँ से पहुँचें। हमने उस मीडिया को अपनी आईडियोलॉजी के लिये इस्तेमाल किया है। हमें खडे होने के लिये सही जगह मिलनी चाहिये, हम उसके सारे रिग्वायरमेंट पूरे कर सकते हैं। मेरे अनुभव बहुत अच्छे रहे हैं वहाँ के। हमें हमेशा यह अहसास रहा कि हम युनिवर्सिटी के नौकर हैं। हमने मुशायरों फिल्मों के लिये छुट्टियाँ जाया करना ज़रूरी नहीं समझा। बाहर के ऑफर्स उन दिनो एवायड करते रहे। अब रिटायरमेंट के बाद हम वक्त देना अफोर्ड कर सकते हैं।
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अंत में शहरयार साहब की लिखी एक बेहद खूबसूरत गज़ल! तलत अज़ीज साहब की गाई इस गज़ल को फिल्म ’गमन’ के लिये संगीतबद्ध किया था सुप्रसिद्ध संगीतकार जयदेव ने। तो आइये सुनते हैं ये गज़ल:

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