मकान जगमगा रहे कितने

भूखों दिन बिता रहे कितने?
और पचनोल खा रहे कितने?

झूठ नें सत्य को पछाडा, तो
झूठ की कीर्ति गा रहे कितने?

कमी नहीं यहां सियारों की,
रोज मुर्गे फसा रहे कितने!

कहकहों की गिरफ्त में पड कर,
अश्रु भी खिलखिला रहे कितने!

कितने डूबे अंधियारे में,
मकान जगमगा रहे कितनें!

आंखों को बंधक में रख कर,
लोग चश्में लगा रहे कितने!
----------

सिंधु जो अँट गये खारे न रहे

नदी चढी कि किनारे न रहे,
अमन की चाह के मारे न रहे।

रात कैसे कटी बताएं क्या?
व्योम पर चांद सितारे न रहे।

हमें मिले भी सहारे ऎसे,
जो स्वयं अपने सहारे न रहे।

रात भर प्रात साधने वाले,
कहां गए? भिनसारे न रहे!

बात उनकी क्या करे बूँद कोई,
सिंधु जो अँट गये, खारे न रहे!
----------

जी रहे हम ऎसी ज़िन्दगी

फूल जो आंखों में गड गये,
रंगे-हाथों वे पकड गये।

उन्हें सोने से फुरसत कहां,
रतन जो सोने में जड गये।

जवानी खडी सामने, किंतु,
जवानी के लाले पड गये।

हुए भूकम्प, उठे तूफान,
दर्द जब आपस में लड गये।

जी रहे हम ऎसी जिंदगी,
कहीं सिर गए, कहीं धड गये।

7 comments:

  1. आनंद, गीदम10 जनवरी 2011 को 9:06 am

    लाला जगदलपुरी बस्तर की शान हैं

    उत्तर देंहटाएं
  2. अध्भुत कल्पनाशीलता से भरी ग़ज़लें हैं। सोमवार की प्रतीक्षा रहने लगी है।

    उत्तर देंहटाएं
  3. भूखों दिन बिता रहे कितने?
    और पचनोल खा रहे कितने?
    कमाल का व्यंग्य। तीनों ही बेहतरेन ग़ज़लें हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  4. सच कहूँ ...लाला जगदलपुरी जी की लेखनी
    मन के भावों को ऐसे लिखती है जैसे
    कोंई झरना स्वत: कंदराओं से निकलकर गीतों में,
    कविताओं में, गज़लों में बह निकला हो....

    .आभार...

    उत्तर देंहटाएं
  5. जी रहे हम ऎसी जिंदगी,
    कहीं सिर गए, कहीं धड गये।
    इन गज़लों की प्रशंसा के लिये कोई उपमा नहीं है।

    उत्तर देंहटाएं

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