प्यारे बच्चों,

"बाल-शिल्पी" पर आज आपके डॉ. मो. अरशद खान अंकल आप के लिये "धरोहर" के अंतर्गत आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का परिचय और उनकी ही एक बाल-कविता "कोकिल"। तो आनंद उठाईये इस अंक का और अपनी टिप्पणी से हमें बतायें कि यह अंक आपको कैसा लगा।

- साहित्य शिल्पी
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साहित्य जगत द्विवेदी जी को प्रायः ‘सरस्वती’ के संपादक, आलोचक, चिंतक और युगांतरकारी साहित्यकार के रूप में स्मरण करता है। खड़ी बोली को साहित्य की भाषा के रूप में स्थापित करने तथा उसे व्याकरण सम्मत बनाने का श्रेय वास्तव में आचार्य द्विवेदी को ही है। ‘सरस्वती’ के माध्यम से उन्होंने साहित्य जगत की जो सेवा की वह निस्संदेह स्तुत्य है।
आचार्य द्विवेदी ने बच्चों के लिए कई उपयोगी कविताएं लिखी हैं। उनकी एक कविता--‘मां, कह एक कहानी!’ आप सबने पढ़ी होगी।

आइए, हम लोग उनकी प्रसिद्ध बाल कविता--‘कोकिल’ का आनंद उठाते हैं।

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कोकिल

कोकिल अति सुन्दर चिड़िया है।
सच कहते हैं, अति बढ़िया है।

जिस रंगत के कुंअर कन्हाई,
उसने भी वह रंगत पाई।

अथवा जामुन का रंग जैसे,
इसका भी होता है तैसे।

ज्यों ही चैत मास लगता है,
जाड़ा अपने घर भगता है,

त्योंही यह अति मीठी बानी,
नित्य बोलती है रस सानी।

मन प्रसन्न होता है सुनकर,
इसके मीठे बोल मनोहर।

इसमें एक और गुण है भाई,
जिससे यह सबके मन भाई,

यह खेतों के कीड़े सारे,
खा जाती है बिना बिचारे।

2 comments:

  1. अरशद जी,
    द्विवेदी जी की कविता बड़ी हीं मनोरम लगी। इसे हम सबके समझ प्रस्तुत करने के लिए धन्यवाद।

    आपने "माँ कह एक कहानी" का ज़िक्र किया है और लिखा है कि इसे द्विवेदी जी ने लिखा था.. लेकिन मुझे तो ऐसी एक भी कविता याद नहीं आ रही। हाँ, मैंने एक पढी तो है, "माँ कह एक कहानी, बेटा समझ लिया क्या तूने मुझको अपनी नानी.... ", लेकिन यह "मैथिली शरण गुप्त" जी की लिखी हुई है और यह कविता "यशोधरा" का एक हिस्सा है..
    साहित्य-शिल्पी पर भी यह कविता उपलब्ध है: http://www.sahityashilpi.com/2010/11/blog-post_16.html

    वैसे अगर आप किसी दूसरी "माँ कह एक कहानी" की बात कर रहे थे तो उसे हमें अवगत कराएँ। मैं उसे भी पढना चाहूँगा।

    धन्यवाद,
    विश्व दीपक

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