क्या हुआ मार्क्स जी,
आप भोपालपटटनम, दंतेवाडा में
व्याख्यान देने जाने से डरते हैं,
जब से सुना है आपने कि,
कानू सान्याल के आमंत्रण पर,
माओ भारत आये
जंगलों में छाए,
लाल अंधेरे नें उनका गला रेत दिया
फिर फेंक दिया एन.एच किनारे,
मुखबिरी के शक में,
वे तडपते देखे गये,
रात 9.00 बजे, गुजरती रही
राजधानी को जाती बसें करीब से
ठिठकी भी नहीं
थाने खबर कर दी थी, 9.30 बजे किसी कंडक्टर नें,
खबर, चारा समझी गयी पुलिस को फंसाने का,
और सुबह सुबह पर्चे भी मिले, उनके शव के पास
शोषित, निहत्थे, निर्दोष पर अत्याचार
के खिलाफ युद्ध के,
शव पर धारदार हथियार के कई वार थे।
मरने का पूरा आनंद दिया गया था,
जीने के भरपूर आनंद से वंचित,
शोषित जन के लिये सोचने वाले को।

दूसरे दिन छपा कि, लाल अंधेरे वालों का,
एक धडा माओं की हत्या के खिलाफ था,
दूसरा, उन्हें जीवित छोडने के,
एक नहीं चाहता था माओ को खोना,
दूसरा खेमा चाहता था तथाकथित होना।

लेनिन भी इन दिनों लापता हैं।
शायद उनकी रिहाई के लिये
मस्कवा तट पर भी
कोई बेचैन नहीं टहल रहा, यकीन मानिये,
किसी नें ठीक ही कहा।

पर मार्क्स जी, इन दिनों,
आप कम घूमते फिरते हैं।
मैं नहीं मानता कि आप
किसी भी जुल्म या आतंक से डरते हैं
उनके पास सिर्फ धारदार हथियार है
आपके पास चिंतन, मानवता, विचार है?
नवीनतम घातक हथियार भी,
विचार के सामने बौना है,
क्यों नहीं लूट लेते लाल अंधेरे के लोग,
हथियारों के साथ साथ,
मृत जवानों के विचार और सपने?
तभी क्रांतियाँ सफल होना है।

आप कैसे समझा पायेंगे,
हर पेड/व्यक्ति को कि,
युद्ध का कोई वास्तविक कारण नहीं होता।
जडें समझती हैं सार्त को,
पत्ते कहाँ समझ पायेंगे।
कि क्यों हाँका लग रहा है, जंगल में।
हाथियों को खदेडा जा रहा है जंगल से
हाँथ को हाँथ नहीं सूझ रहा,
पंकज, पंक से जूझ रहा।

आप कैसे देख पायेंगे
यह भी कि, हथौडा दरका हुआ है,
हंसिया, होरी की गर्दंन पर रखा है,
बालियाँ, धनिया से गले मिल
सिसकियाँ भर रही है,
गोबर एस.पी.ओ या
संघम सदस्य बन कर ही
कुछ दिन और जिन्दा रह सकता है, तन से।
होरी सरपंच बनने को तैयार था, मन से।
कुछ मददगार भी थे, धन से।
पर लाल अंधेरे नें लीले लिये होरी के सपने
अब होरी गोदान नहीं,
ग्राम दान चाहता है,
लाल अंधेरे वालों से।

लाल गाजरघास
फैलती जा रही है देश में इन दिनों,
हरे जंगलों में हर ग्राम में, हरी वर्दियों में।
माफी नहीं चाहूंगा, यदि मेरा सच,
आपके वैचारिक धरातल को हिलाता है।
यदि मेरा बचे रहना, कुछ कहना,
संविधान या माओवाद की परिधि में नहीं आता है।

11 comments:

  1. सभी सवाल जायज हैं। बस्तर का कवि बस्तर के दर्द को इसी तरह आवाज दे तो भीतर का दर्द बाहर आये।

    उत्तर देंहटाएं
  2. कवि नें माओवादी बरबरता और विचारधारा के विरोधाभास को खूब उजागर किया है। कवि जमीन से जुडा प्रतीत होता है तभी वह उन प्रतिमानों को भी कटघरे में खडा कर सका जिसपर टिप्पनी करने मात्र से उसका कवि होने का स्टेटस छिन सकता है।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बस्तर के भीतर से एसे ही आवाज बुलंद होगी तो लाल गाजर घास का फैलना जरूर रुकेगा।

    उत्तर देंहटाएं
  4. लेखनी सशक्त होकर सामने आयी है...बस्तर के लियें एसी ही लेखनी की आवश्यकता है...आभार...और बधाई....इस बुलंद आवाज के लियें...

    .

    उत्तर देंहटाएं
  5. लाल गाजरघास
    फैलती जा रही है देश में इन दिनों,
    हरे जंगलों में हर ग्राम में, हरी वर्दियों में।
    माफी नहीं चाहूंगा, यदि मेरा सच,
    आपके वैचारिक धरातल को हिलाता है।
    यदि मेरा बचे रहना, कुछ कहना,
    संविधान या माओवाद की परिधि में नहीं आता है।

    आपने स्वयं महसूस कर के लिखा है इसलिये संवेदित करती है बात।

    उत्तर देंहटाएं
  6. dr. suresh tiwari tokapal bastar c.g.8 जनवरी 2011 को 8:14 pm

    bhitar ka virodh jab antarvirodh ko samjhega to kavi sarthak hoga, bhitar walon suno rathor ji ki awaj aur tyag do hathiyar, ab man me daro vichar yogendra bhai aapne to lenin - marx ki aankhen bhigo di , kya unake followers vichhar karenge. aapako bahut badhai. suresh

    उत्तर देंहटाएं
  7. कविता में बस्तर के समकालीन हालात ही नहीं, बल्कि एक गहरा वैचारिक धरातल भी है.

    उत्तर देंहटाएं

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