लिखी है मैंने कहानी एक
खुद अपने खून से,

झेले हैं ....
अपनों से अपमान
और परायों का दर्द

कल्पना नहीं,
यथार्थ को ...
दी है चुनौती
बार बार .....

उगाये हैं,
हथेली पर कैक्टस
चला हूं नंगे पांव
तपती हुयी रेत पर

उपदेश ….,
सभाओं में देना
आसान है
किन्तु मैं …,
'एक आम आदमी'
यह जिन्दगी …
बिना टूटे ....
हिम्मत के साथ जी है

झोंकना पड़ता है
खुद को कई बार
अपने ही हांथों
बहुधा बरबादी की
अंधेरी डगर पर

बुद्धिजीवियों का....
'मैं तो करता हूं सम्मान'
किन्तु …,
उल्लू बना देते हैं प्राय:
'कुछ लोग'
प्रशंसा के दो शब्द कह कर

मान और अपमान में
कोई अन्तर नहीं है 'कान्त'
देखना है …?
तो बस जाओ
अवहेलानाओं के ...
इस मुहल्ले में आकर

5 comments:

  1. SHRIKANT KO UNKEE MAN-MASTISHK
    KO JHAKJHORNE WAALEE KAVITA KE
    LIYE BADHAAEE AUR SHUBH KAMNA .

    उत्तर देंहटाएं
  2. बुद्धिजीवियों का....
    'मैं तो करता हूं सम्मान'
    किन्तु …,
    उल्लू बना देते हैं प्राय:
    'कुछ लोग'
    प्रशंसा के दो शब्द कह कर

    मान और अपमान में
    कोई अन्तर नहीं है 'कान्त'
    देखना है …?
    तो बस जाओ
    अवहेलानाओं के ...
    इस मुहल्ले में आकर


    बिना मुखौटा के सीधे सादे शब्दों में
    मन की वेदना को आपने सुंदर तरीके से उकेरा है...
    जो हर लेखक की,
    हर कवि की पीड़ा है...आभार आपका श्रीकान्त जी....और बधाई सुंदर रचना के लियें...


    लेखनी चलती रहे...शुभ कामनाये...



    " नहीं लिखती हूँ तो शब्द मुझे आहत करते हैं,

    इसीलियें लिखना तो मेरी मजबूरी है,

    ... गीता पंडित

    उत्तर देंहटाएं
  3. बुद्धिजीवियों का....
    'मैं तो करता हूं सम्मान'
    किन्तु …,
    उल्लू बना देते हैं प्राय:
    'कुछ लोग'
    प्रशंसा के दो शब्द कह कर

    बहुत अच्छी कविता

    उत्तर देंहटाएं
  4. haasya, samvvedna,sandesh,sabhi chupe hai is rachna main---dhero badahai

    उत्तर देंहटाएं

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