कोरिया में आते ही एक खास द्वन्द्व में फँस गया। बौद्ध प्रभाव जितना यहाँ लक्षित है उसकी तुलना में भारत में तो वह न के बराबर ही है। बुद्ध को मानने वाले लोगों और बौद्ध मंदिरों की यहाँ एक बड़ी और महत्वपूर्ण संख्या है। यहां के स्वर्ग समझे जाने वाले एक टापू चेजू मात्र में लगभग 250 बौद्ध मंदिर हैं। बुद्ध के प्रति लोगों की आस्था भी मात्र औपचारिक नहीं, गहरी है। बहुत से लोगों ने तो मिलने पर मुझे बुद्ध के देश का कहा। यहाँ भारत की पहचान प्रायः बुद्ध, गाँधी और टैगोर से है। ‘बुद्ध के देश का’ सुनकर जहाँ एक ओर माथा गर्व से उठ गया वहाँ कुछ अटपटा भी लगा। ख़ैर मुझे कृष्ण, देवकी और यशोदा की सहज ही याद हो आई। जन्म भले ही देवकी ने दिया हो, कृष्ण को पाला यशोदा ने ही था। पालने वाली यशोदा को हमारी संस्कृति में बहुत ऊँचा दर्जा मिला है। बुद्ध को आज तक पाल रहे कोरिया को भी मेरे मन ने वही दर्जा दे दिया।

इसी पृष्ठभूमि और मानसिकता के साथ मेरी भेंट हुई एक ऐसी कोरियायी कवयित्री से जो तन मन से भारत के प्रति गहरा लगाव रखती है। वे टैगोर सोसायटी आॅव कोरिया की संस्थापक अध्यक्षा हैं। राजधानी सोल के केन्द्र में सोसायटी का कार्यालय है जिसकी साज-सज्जा और सामग्री भारतीय परिवेश का पूरा एहसास कराती है। भारतीय चित्रकारी, भारतीय वाद्ययंत्र, भारतीय पुस्तकें, दीवारों पर टंगी भारतीय कलाकृतियाँ आदि सब भारत की संस्कृति की बेहतरीन झलक प्रस्तुत करती हैं। पहली ही भेंट में अध्यक्षा श्रीमती किम मुझे सम्भ्रान्त, हँसमुख और मृदुभाषी लगीं। पूरा नाम किम यांग शिक है।

उस शाम श्रीमती किम का घर पर फ़ोन आया। बोली - ‘मैं आप और आपकी बेटी को कहीं घुमाना चाहती हूं। वह एकदम स्वीकार करने योग्य प्रस्ताव था। मैं स्वयं ही बेटी को किसी विशेष स्थान की यात्रा कराने की योजना बना रहा था। भाषा की समस्या के कारण मन नहीं बैठ रहा था। सो श्रीमती किम के प्रस्ताव को तुरन्त स्वीकार कर लिया। तय हुआ कि दो दिनों के बाद दो दिनों के लिए यात्रा शुरू की जाएगी।

29 जुलाई, शनिवार की वह खुशनुमा सुबह थी। मेरी पत्नी प्रवीण शर्मा का जन्म दिन भी। योजना के मुताबिक मैं और मेरी बेटी दिशा भूमिगत रेल मार्ग से एक स्थान विशेष पर पहुँच गए। यह स्थान सोल के दक्षिण में श्रीमती किम के घर के आसपास था। यहीं पर वे अपने ड्राइवर और अपनी कोरिया में बनी सबसे महंगी और भव्य कार के साथ आयीं। और यहीं से हमारी आगे की यात्रा शुरू हुई - हे इन सा के लिए। सा यानी मंदिर। कोरिया में मंदिर से तात्पर्य बौद्ध मंदिर से होता है। सो अच्छा लगा कि एक प्राचीन बौद्ध मंदिर को देखने का अवसर मिलेगा। जब पता चला कि कोरिया के दक्षिण में स्थित यह मंदिर पहाड़ों के बीचोंबीच है तो उत्सुकता और भी बढ़ी। सुना था यहां के इतिहास में एक समय ऐसा भी आया था जब बौद्ध भिक्षुकों को (भिक्षुणियों को भी) पहाड़ों की शरण लेनी पड़ी थी। यूं कोरिया को मैं पहाड़ों का देश भी कहता हूँ। इस देश का लगभग 70 प्रतिशत भाग पहाड़ है। यह बात अलग है कि यहां के पहाड़ भारत के पहाड़ों से भिन्न हैं। हां भारत की कुछ पहाड़ियों की तरह ठिगने जरूर हैं। यहां के पहाड़ आदमी से बखूबी कंधा मिलाते हैं और अपनी सबसे ऊँची चोटी पर भी उसके पाँव धराने में न हिचकिचाते हैं, न हेठी ही मानते हैं। बिना चुनौती दिए अहंकार से दूर रहना यहाँ के पहाड़ों का सहज स्वभाव है। लेकिन वे किसी भी तरह दयनीय नहीं हैं। सम्पन्न और उदार हैं। कोरियायी भाषा में पहाड़ को सन कहते हैं और हर थोड़ी देर बाद जहां कहीं यह शब्द कानों में पड़ता रहता है। अतः यहां के पहाड़ बहुत जल्दी परिचित होकर घुल मिल जाते हैं। वे भारतीय पहाड़ों की तरह अलभ्य एवं अलंघ्य नहीं हैं, आदमी की पहुंच में हैं। यह बात मैंने अपने एक चीनी मित्र के परिवार के साथ एक पहाड़ पर चढ़ते हुए महसूस की थी। पूर्व एशिया और विशेष रूप से कोरिया के लोगों को फुर्सत मिलते ही पहाड़ों की पीठ पर या उनके शीश पर जा चढ़ने और वहाँ मौज-मस्ती मनाने का बेहद शौक है।

जिस बात की आशंका थी वही हुई। असल में, कोरिया में सड़क की यात्रा करते समय, समय की पाबन्दी निभा पाना ज़ोखिम भरा काम है। तेज़ घूमते पहिए कहाँ धीमे होते होते अटक जाएँगे, कोई भरोसा नहीं। यातायात की बेहतरीन एवं आधुनिक व्यवस्था के रहते भी यह देश - खासकर सोल जैसे बड़े शहर - हाई वे समेत - न दुर्घटनाओं से मुक्त है और न ही ट्रेफ़िक जैम से। सोल से ते जोन नामक औद्योगिक नगरी तक पहले पड़ाव की यात्रा के लिए हमारी गाड़ी अच्छी भली चाल से चल रही थी कि अचानक चक्का जाम होने लगा। परिणाम यह हुआ कि जो दूरी हमें डेढ़ घण्टे में तय करनी थी उसे तीन घण्टे से ज़्यादा में करना पड़ा। गनीमत थी कि हम निजी कार में थे सो अधिक से अधिक समय ही ज़्यादा लगना था। यदि टेक्सी में रहे होते तो रक्तचाप उतनी ही तेज़ी से बढ़ने लगता जितनी धीमी गति से कार चलती। इसलिए कि खड़ी या धीमी चलती टेक्सी में किराया-मीटर कुछ ज्यादा ही फुर्तीला हो उठता है। एक मज़ेदार किस्सा याद आया। मैंने पत्नी को कहा कि घर के पास ही एक स्थान है चोंगयांगनी। वहाँ फल और सब्जियों की मण्डी है। अतः ये चीज़ें काफ़ी सस्ती हैं। सो हम एक दिन वहाँ पहुंच गए। भाव पूछे तो सचमुच दूसरे बाजारों से सब्जी सस्ती थी - काफ़ी। खरीदने के बाद सोचा चलो टेक्सी से चलते हैं। थोड़ी ही दूर पर मुँह फैलाए ट्रेफिक जैम खड़ा था। टेक्सी रूकते रूकते रूक ही गई। अब मीटर ने जो चाल दिखानी शुरू की तो हमारी धड़कनें बावजूद तेज गति के पिछड़ी नज़र आने लगीं। हालत यह हुई कि जब तक घर पहुँचे सब्जियों के सस्ते दामों का मज़ा लगभग लगभग तीन-चार गुणा नीचे उतर चुका था। हम पति-पत्नी के चेहरे देखने लायक थे। लौकिक फणीश्वर नाथ जी - वही अपने रेणु याद हो आए। हमने पहली और आखरी (पता नहीं निभेगी भी कि नहीं) कसम खाई कि अपने कोरिया प्रवास में सब्जी खरीदने के वास्ते अब ससुर टेक्सी का इस्तेमाल कबहू न करेंगे।

तेजोन में, नियत स्थान पर चित्रकार-प्रोफ़ेसर हवांग मन यंग पहले ही से मौजूद हैं। कोरियायी लोग प्रायः समय के पाबन्द हैं। दोपहर के भोजन का समय हो चुका था। कोरिया में जहाँ दोपहर के 12 बजे कि यहाँ के लोग भूख से बेहाल हो उठते हैं। यही हाल शाम के 6 या साढ़े छः बजे का है। भोजन किया गया और आगे की यात्रा शुरू हुई। योजना के अनुसार श्रीमती किम यांग शिक का कार-चालक सोल वापस लौट गया और चित्रकार-प्रोफ़ेसर ने आगे की कमान सम्भाली। वे अपनी असली उम्र से काफ़ी कम लग रहे थे। बहुत ही जिन्दादिल आदमी। हँसमुख। खुले व्यक्तित्व के। आत्मीय स्वभाव। पहली ही भेंट में अनौपचारिक। ड्राइवरी, कुशलता से कर रहे थे। जाने क्या सोच कर उन्होंने बजाय हाई वे या मुख्य मार्ग के भीतरी मार्ग को यात्रा के लिए चुना। यह चुनाव अद्भुत था। इस मार्ग को चुनने का अर्थ था शुरू से ही पहाड़ों भरी यौवनमय प्रकृति के उन्मुक्त आँचल में पहुंच जाना। लगा जैसे हम प्राकृतिक छवि-सम्पदा के गहरे विस्तारों की हरी लहरों में तैरते चले जा रहे थे - अपने और केवल अपने साथ - बार बार झोंको की तरह आकर दूर निकल जाने वाले किसी दिव्य संगीत की जिज्ञासा भरी खोज में। वहां की पूरी सृष्टि मानों कोरियायी ढंग से झुक झुक कर स्वागत करती हुई मार्ग दे रही थी। विनम्रता के उस सागर में, स्थिर जल पर अचंचला होती शान्त किन्तु आनन्द और आत्मविश्वास से दमकती एक बौद्ध छवि सहसा उभर आयी थी - एक अदृश्य राग में तल्लीन करती। एक अद्वितीय मनःस्थिति थी। उस समय, हममें से सब, शायद मेरी ही तरह, स्वयं ही वक्ता थे और स्वयं ही श्रोता। प्रकृति भी आज मानो कुछ कर गुजरने को बेताब थी। लगा जैसे अपने उद्दाम नृत्य में वह अपने वस्त्रों तक की सुध बुध खो बैठी थी। चिर यौवना अप्सरा की भाँति। आज पूरे सौन्दर्य का उद्घाटन कर शायद अद्भुत मादकता का सृजन करना चाहती थी। मुझे याद हो आई अलंबुषा - सौन्दर्य सम्पन्न वह अप्सरा जिसके, नृत्य करते समय, वस्त्र हटने मात्र से इन्द्र आदि देवता स्खलित हो गए थे। लेकिन अच्छा है, न मैं इन्द्र हूँ और न ही शाप देने में समर्थ। काश कि मैं वरदान दे सकता!

सड़क बहुत ही खूबसूरत पगडण्डी की तरह। लगभग अकेली हमारी कार - दूसरी कारें कभी-कभार। दोनों ओर दूर दूर तक फैले खेत - धान के पौधों को हाथ हिलाने की मुद्रा में हिलाकर स्वागत करती अदृश्य पृथ्वी और हवाएँ। उन्हीं के बीच से, किसी स्वप्न लोक की भाँति, रेलगाड़ी की गुजरती हुई पटरी। और थोड़ी ही देर में जाने कहाँ से आकर जाने कहाँ जाती हुई जादू की सी रेलगाड़ी। गुजर जाने के बाद देर तक कानों में थरथराता हुआ स्वर - यहाँ पुल तो था नहीं वरना दुष्यंत की गज़ल का वह मशहूर शेर मौजू हो जाता।
तू किसी रेल-सी गुजरती है,
मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ।
अजीब रास्ता था। मैदानी भी पहाड़ी भी। और कभी परिक्रमा सी लेता हुआ भी। कोरिया का प्राकृतिक वैभव कई मायनों मे चैकाने वाला है। यहाँ पहाड़ों के शिखरों पर अठखेलियाँ करती झीलें भी हैं और मैदान, पहाड़ और सागर के संगम भी। चेजू द्वीप पर मैंने ऐसा ही संगम देखा था।

कुछ घण्टों की यात्रा के बाद हम अपने गन्तव्य के निकट थे। यह पूरा पहाड़ गाया सन के नाम से विख्यात है। कोरिया में गाया राज्य भी रह चुका है। गाया राज्य के एक राजा किम सुरो से भारत में अयोध्या की एक राजकुमारी से विवाह होने की एक मिथकीय कहानी भी यहाँ प्रचलित है। जब मेरे कानों ने गाया शब्द सुना तो वह एकदम आत्मीय और परिचित प्रतीत हुआ। गाया पहाड़ पर धर्म (ज्ञान) के प्रतीक के रूप में स्थित बौद्ध मंदिर हे इन सा की जानकारी मन को भारत की ओर खींचे जा रही थी। तभी श्रीमती किम ने कहा, ‘क्या आप जानते हैं कि कुछ लोग गाया का सम्बन्ध भारत से जोड़ते हैं।’ मैं तो सुनकर जैसे उछल ही पड़ा। सहसा मेरे मुँह से निकला - ‘कहीं भारत के प्रसिद्ध धार्मिक स्थान गया से तो नहीं।’ और उत्तर ‘हाँ’ में सुनकर तो मैं विभोर हो उठा। किसी भी भारतीय की उस समय वही स्थिति होती। देह भले ही कोरिया की हो पर उस स्थान की आत्मा भारतीय थी। यह कैसी आध्यात्मिकता थी मेरे मन की, मैं नहीं समझ पा रहा था। एक ओर से सुन रहा था शंख, घड़ियाल और आरती की आतीं स्वर-गूँजें और दूसरी ओर क्षण क्षण रच रही थीं शान्त, ध्यानस्थ निर्वाण के आनन्द की मन-मुद्राएँ। आत्म से अनात्म का चिन्तन!

हमारी कार ने अब एक बड़े द्वार में प्रवेश पा लिया था। श्रीमती किम के कारण हम यहाँ के विशिष्ट अतिथि थे। अब संकरे रास्ते के साथ-साथ एक छरहरे बदन की नदी भी हमारे साथ हो ली थी। अजीब नदी थी। कितनी ही शर्मीली कोरियायी लड़कियों से भिन्न। पर उन्हीं की तरह विदेशियों से बात करने को उत्सुक। मस्त मस्त। कभी उछलती तो कभी हंसती सी। और एकदम सामाजिक भी। तभी न किनारे - किनारे कितने ही सैलानियों के तम्बू-घर नज़र आ रहे थे। खुले में परिवारों और मित्रों की टोलियाँ - सोजू माकोली और बीयर का आनन्द लेती हुईं। कोरिया में बीयर और चावल से बनी वाइन पीने का ज़्यादा रिवाज है। सोजू को ये लोग सख्त पेय मानते हैं। पर पीने पर आते हैं तो बहुत से लोग काफ़ी पी जाते हैं। सप्ताहांत में कोरिया के लोग मौज मस्ती के लिए घरों से दूर निकलना पसन्द करते हैं। इसीलिए यहाँ भी काफ़ी भीड़ थी। कारों की कतारें कोरिया की सम्पन्नता की प्रतीक थीं। एक जगह तो अधिक कारें और रास्ता तंग होने के कारण हमारी कार भी फंस गई थी। थोड़ी ही देर बाद सैलानियों की यह स्थली हमसे पीछे छूटती चली गई। अब हम पहाड़ की कुछ और ऊँचाइयों पर थे। शाम हो चली थी।

कुछ ही देर बाद हमारी कार एक शानदार भवन के आहते में थी। एक रईसी भवन की तरह इसके आगे-पीछे बड़े-बड़े क्षेत्र थे - लाॅन और खेत के रूप में। तीन सुन्दर कुत्ते अपनी आवाज में स्वागत कर रहे थे। हमारी विशिष्टता भी उन्होंने जल्दी ही पहचान ली थी। वह एक निजी भवन था जो तमाम आधुनिक सुविधाओं से सम्पन्न था और उसके स्वामी एक चित्रकार भिक्षुक किम वॉन हक थे। उस समय वे बड़ी पाइप से पौधों-वृक्षों और घास को सींच रहे थे। 48 या 49 वर्ष के युवा प्रतीत हो रहे व्यक्ति। हमारे पहुँचते ही उनके चेहरे पर एक शान्त मुस्कान हिलोरे लेने लगी थी। उन्होंने जल्दी ही पाइप को एक ओर छोड़ दिया और हमें भीतर ले गए। अपनी पारम्परिक भिक्षु वेश-भूषा में थे। सच पूछिए तो मैंने ऐसे भवन की कल्पना नहीं की थी। सोचता था कि कोई धर्मशालानुमा स्थान होगा जहाँ हम लोग रहेंगे। लेकिन अब भवन अपने स्वामी की समृद्धता की कहानी कह रहा था। यूँ बाद में मुझे साथ आए चित्रकार-प्रोफ़ेसर न बताया था कि भिक्षुक प्रायः सम्पन्न नहीं होते और किम वाॅन हक अपवाद थे क्योंकि वे मंदिर की व्यवस्था समिति के ऊँचे पद पर रह चुके थे।

देर काफ़ी हो चुकी थी। सो सब को भोजन की तलब थी। हम मेहमानों को छोड़ कर शेष लोग भोजन कर चुके थे। रसोई एक महिला ने तैयार की थी। बहुत ही मृदु। चेहरे से जैसे शांति और विनम्रता के फूल झड़ रहे हों - लगातार लगातार - एक क्षण को भी बिना थमे - चैमासे की झड़ से। परम्परा से हटकर भोजन की व्यवस्था मेज-कुर्सी पर की गई थी। यूँ यहाँ ज़मीन पर बैठकर चैंकी पर भोजन रख, भोजन करने की परम्परा है जो मुझे पसन्द आयी। मुझे विश्वास था कि बुद्ध से जुड़े होने के कारण इस स्थान पर केवल शाकाहारी भोजन मिलेगा। विश्वास ठीक भी निकला। हालांकि सुबह के नाश्ते में उसे टूटना था। भोजन सच में स्वादिष्ट था। किमची (एक प्रकार का अचार) तो मुझे बेहद पसन्द है। कोरियायी खाना प्रायः स्वास्थ्य प्रद होता है क्योंकि उसमें तेल और छौंक का अभाव होता है। तला हुआ भी कम ही खाना होता है। मैं अब तक कुछ कोरियायी शब्द सीख चुका था सो रसोइया महिला से बहुत ही स्नेह से कहा - मासिसेयो - यानी स्वादिष्ट है। महिला ने बिना विकृत हुए बल्कि मृदुता को और बढ़ाते हुए झुक कर कहा - खोमसमनिदा - अर्थात् धन्यवाद।

अब बारी बैठक में, गर्म गर्म फर्श पर बैठ कर महफिल जमाने की थी। बैठक पेंटिंग्स और विभिन्न प्रकार की कलाकृतियों से सुसज्जित थी। एक कोने में एक विशाल मेज और उसके आसपास चित्रकारी की बेहतरीन सामग्री। कुछ खाली और अधूरे चित्र वाले कैनवास। भिक्षुक अंग्रेजी नहीं जानते थे इसलिए चित्रकार-प्रोफ़ेसर और कभी-कभी श्रीमती किम हमारे बीच सहायक बने। मेज पर फलों के साथ साथ एक विशेष पेय भी मौजूद था जिसे भिक्षुक ने बहुत ही नजाकत के साथ धीरेे धीरे पेश किया। वह पेय, घर पर ही जड़ी-बूटियों से बनाई गई एक वाइन था - ओह संग छा सू ( Oh Sung Cha Su)। सू का अर्थ वाइन है और ओह संग छा का मस्त्यगंधा घास। मेरी बेटी को छोड़कर उसे सबने पीया। हाँ, इसी बीच एक दूसरे नगर टेगू की दो महिलाएँ भी अपनी कार से वहाँ आ चुकी थीं। वे हमसे मिलने विशेष रूप से आई थीं और बौद्ध-भिक्षुक की अच्छी परिचित थीं। ऐसा कहा भी जाता है कि बौद्ध-मंदिरों के संचालन के पीछे कोरियायी महिलाओं का अधिक हाथ है। वे भरपूर मदद करती हैं।

भारत के बारे में, कोरिया के बारे में, बुद्ध के बारे में, साहित्य के बारे में और कुछ सामान्य बातों के बारे में बातें होती रहीं। हँसने-हँसाने का भी दौर चलता रहा जिसके बिना कोरियायी लोग रह नहीं सकते।

देर काफ़ी हो चली थी। अब सोने का मन था। हालांकि हमारे साथ आए मेजबानों सहित सभी दूसरे लोग अभी तरोताज़ा ही नज़र आ रहे थे। कहीं से भी नहीं लग रहा था कि वे जल्दी ही सोने वाले हैं। इस सूचना के बावजूद कि बौद्ध मंदिर के प्रातः कालीन कार्यक्रम को देखने के लिए चार बजे वहाँ पहुँचना होगा, हमें छोड़, किसी के भी चेहरे पर चिन्ता की ज़रा भी झलक नहीं थी। रात का - या कहूँ - सुबह का एक बज चला था। क्षमा मांगते हुए मैंने और मेरी बेटी ने सोने के लिए अनुमति ले ली। ज़मीन पर ही सोने का अच्छा प्रबन्ध था। यहाँ फर्शों को नीचे से गरम करने की पद्धति प्रयोग में लाई जाती है। सुहाती सुहाती गरमाहट बदन को गरम रखने के साथ-साथ उसकी मालिश भी कर देती है।

जैसा होना था, वैसा ही हुआ। कोई भी छह-सात से पहले नहीं उठ सका। सुबह का कार्यक्रम तो गया। अब जल्दी-जल्दी तैयार होकर, नाश्ता करके मंदिर पहुँचना था और उसके बाद किसी और स्थान की कार यात्रा भी।

चैकी पर विभिन्न प्रकार का नाश्ता सजा था। लेकिन हैरानी की बात यह थी कि नाश्ते में न केवल मांस था बल्कि गाय का मांस भी था। मछली को तो यहाँ मांस समझा ही नहीं जाता। ख़ैर, सदा की तरह, पूछ पूछ कर शाकाहारी भोजन किया।

अब कारों में बैठकर पहले मंदिर जाना था और बाद में आगे। एक भिक्षुणियों के मंदिर को देखने की योजना थी। भवन के द्वार पर छाया चित्र लिए। तभी कुछ लिखे पर ध्यान गया। पता चला कि शब्दों का अर्थ था - चाँद की ओर मुँह। अक्षर चीनी थे। यूँ अब कोरिया की अपनी भाषा है हांगुल - एक वैज्ञानिक भाषा लेकिन उसमें चीनी प्रभाव काफ़ी मिलता है।

कोरिया के किसी भी बड़े परिसर वाले मंदिर के प्रवेश पर एक स्तम्भीय द्वार होता है। इसमें से होकर ही ज्ञान के मार्ग पर जाना होता है। हे इन सा का द्वार अपने सहज सौन्दर्य के लिए प्रसिद्ध है। 1457 से अब तक इसकी पांच बार मरम्मत की जा चुकी है। इस पर बहुत ही खूबसूरत चीनी शब्द लिखे हैं। मालूम हुआ कि उनका मतलब था -- ‘गाया सन हे इन सा’। इसे विख्यात सुलेखक किम ग्युशिन ने लिखा था। बहुत बड़े मंदिरों में दूसरा द्वार भी होता है। हे इन सा के दूसरे द्वार का नाम पोंगवांग मुन है। वह चार रक्षकों का द्वार भी कहलाता है। ये रक्षक दुष्टों से या दुष्ट आत्माओं से मंदिर की रक्षा करते हैं। ये सैनिकों की तरह हमेशा लड़ाई के लिए तत्पर रहते हैं। मंदिर की रक्षा करते हुए शत्रुओं को पैरों के नीचे कुचल देते हैं। इसे बौद्ध धर्म पर हिन्दू प्रभाव माना जाता है। हालांकि अब यह विशेष रूप से लोक-संस्कृति का हिस्सा है। इसके बाद आता है तीसरा द्वार - काफ़ी बड़ा और भव्य - ज्ञान या बुद्ध द्वार। हे इन सा का सम्बन्ध हवा ओम नामक पंथ से है और वह इस पंथ के दस विख्यात मंदिरों में से एक है।

मंदिर के एक एक हिस्से को देखना एक अद्भुत अनुभव लेना था। मुख्य सभागार, अनेक आश्रम, शिक्षालय, संग्रहालय आदि कितने ही भाग हैं जो इस मंदिर को सम्पूर्णता दे रहे थे। इतिहास भी। पता चला कि मंदिर में लगभग 220 मठवासी (बौद्ध भिक्षुक) रहते हैं। सर्दी और गरमी के तीन-तीन महीनों में ध्यान-अर्चना के विशेष अनुष्ठान होते हैं। उस समय उक्त संख्या और भी बढ़ जाती है। अफसोस था कि हम वह नहीं देख सकते थे। मठवासियों के लिए वहाँ एक विश्वविद्यालय भी है जिसमें लगभग 100 की संख्या में शिक्षार्थी शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। मंदिर के आसपास की सुरम्य पहाड़ियों में स्थित लगभग 15 आश्रमों में 200 महिलाओं के होने की भी सूचना मिली जिससे मंदिर की महत्ता का पता चला। लेकिन अभी हमें एक ऐसे प्रभाग की ओर जाना था जो इस मंदिर का ही नहीं बल्कि पूरे कोरिया का गौरव है। उस प्रभाग में एक ऐसा खजाना है जिसे देख कर हम भारतीयों का सिर गर्व से ऊँचा भी हो जाता है और श्रद्धा से नत भी। असल में वह प्रभाग एक विशिष्ट पुस्तकालय है - एक अर्थ में। यह स्थल निःसन्देह इस मंदिर के स्वरूप और उद्देश्य का प्रतीक है। वस्तुतः यहाँ बहुत ही परिश्रम से तैयार किए गए 81340 लकड़ी के एक जैसे टुकड़ों (काष्ठ खण्डों) का अद्भुत और असाधारण भण्डार है। इन टुकड़ों पर पूरी त्रिपिटका उकेरी गई है। जहाँ इन्हें जिस प्रकार से रखा गया है वह भी एक अत्यंत सुरक्षित स्थान और तरीका है। पता चला कि भवन के लिए एक (यह) ऐसा स्थान चुना गया था जिसकी मिट्टी उपयुक्त थी। सीलन से बचाने के लिए कमरों में विशेष ढंग से हवा के आवागमन की व्यवस्था की गई। इस असाधारण खजाने को अपनी गोद में सम्भाले यह प्रभाग भले ही देखने में पुराना और साधारण लगा लेकिन जानकारी के बाद कई मायनों में चुनौतीपूर्ण भी लगा। कुछ साल पहले यह सोचकर कि पुराने ढंग के भवन में कहीं ये काष्ठ खण्ड खराब न हो जाएँ, एक नए भवन का निर्माण किया गया जिस पर काफ़ी पैसा खर्च किया गया। बहुत हिफ़ाजत से टुकड़ों को नए भवन में ले जाया गया। लेकिन कुछ ही सप्ताह के बाद आधुनिक वास्तुकला की पोल खुल गई जब पता चला कि टुकड़ों में विकार शुरू हो गया है। तुरन्त उन्हें पुराने भवन में ही ले जाना पड़ा जो कि पूरी तरह सुरक्षित था।

मैं इन काष्ठ खण्डों के इतिहास को जानने के लिए काफ़ी उत्सुक हो उठा था। मालूम हुआ कि इनके सृजन के पीछे एक दिलचस्प प्रक्रिया छिपी है। सबसे पहले तो द्वीपों पर सफ़ेद मूर्ज वृक्षों को चुना गया। तब लकड़ी के गट्ठों को तीन साल तक समुद्र के पानी में पूरी तरह डुबो कर रखा गया। फिर उन्हें तख्तों के रूप में काट कर समुद्री पानी में उबाला गया और छाया में सुखाया गया। जब वे पूरी तरह सूख गए तो उन्हें समतल या सुघड़ बनाया गया। इसके बाद, उत्कीर्ण से पहले, उन पर ब्रुश से अक्षरों का चित्रांकन किया गया। 52382960 वर्णों के खोदने का काम लगभग 30 व्यक्तियों ने सम्पन्न किया था लेकिन अक्षरों की समानता को देखकर सहज ही चैंका जा सकता है। लगता ही नहीं था कि वह काम एक से अधिक व्यक्तियों ने किया होगा। यह जानकर तो और भी आश्चर्य हुआ कि सुन्दर लिखावट वाले उस भण्डार में एक भी अशुद्धि नहीं देखी जा सकती। इस कोरियायी त्रिपिटका में अनेक सूत्र हैं - कुछ तो ऐसे हैं जो चीनी त्रिपिटका में भी नहीं हैं। जापानी त्रिपिटका के सृजन में भी इस त्रिपिटका का उपयोग किया गया था। कोरिया के लोगों के लिए, सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय पहचान की दृष्टि से इसका अत्यंत महत्व है। इसके द्वारा कोरिया के प्रारम्भिक छापेखाने का भी पता चलता है। अन्यत्र मुझे एक संग्रहालय के अवलोकन के समय बताया गया था कि छापेखाने या छपाई की खोज कोरिया में ही हुई थी।

कोरियन त्रिपिटका का उत्कीर्ण कोरियो राज (918-1392) में दो बार हुआ था। राजा और लोगों का विश्वास था कि उसकी मौजूदगी से कोई भी आक्रमय पीछे धकेला जा सकता है और सौभाग्य बना रह सकता है। पहली बार उत्कीर्ण का कार्य 1087 में पूरा हुआ। लेकिन दुर्भाग्य से 1232 में, मंगोलों के आक्रमण में त्रिपिटका जल गई। इसके बाद 1236 में पुनः कार्य शुरू हुआ - तत्कालीन राजा गो जोंग के हुक्म से। लगभग 16 वर्षों के बाद 1251 में वर्तमान त्रिपिटका का कार्य सिद्ध हो सका। पहले इसे सोल शहर के पश्चिम में कांगहवा दो नामक द्वीप में रखा गया और बाद में 1398 में हे इन सा में लाया गया। उस समय हे इन सा का क्षेत्र काफ़ी उजाड़ और एकान्त था अतः जापानियों से बचाए रखने के लिए कोरियायियों को वह स्थान सर्वथा उपयुक्त प्रतीत हुआ।

त्रिपिटका की मौजूदगी ने हे इन सा को धर्म (ज्ञान) का दर्जा दिलाया है। यह स्थान ज्ञान की स्थली के रूप में ही विख्यात भी है। कोरिया के दो अन्य समान प्रसिद्ध मंदिर क्रमशः ‘बुद्धि’ और ‘संघ’ के प्रतीक हैं जो क्रमश टोंगदो सा (यहाँ ऐतिहासिक बुद्ध का अवशेष मुख्य पैगोडा में मौजूद है) और सोंगवांग सा (यहाँ बहुत से विद्वान रहे हैं) हैं। हे इन सा शान्त सागर या समाधि के अर्थ का द्योतक है। यह समाधि एक ऐसी अवस्था है जिसमें बुद्ध (ज्ञानवान) व्यक्ति हर वस्तु के सत्य रूप का दर्शन कर लेता है। वस्तुतः ‘हे इन सा’ ‘शान्त सागर पर प्रतिबिम्ब’ के रूप में प्रसिद्ध है। एक ही अफ़सोस रहा कि त्रिपिटका के भण्डार को जंगलेनुमा खिड़कियों से ही देखना पड़ा - भीतर जाने की अनुमति नहीं मिली। हाँ खिड़की के पास नमूने के लिए रखी गई एक तख्ती के स्पर्श का अद्भुत सुख अवश्य लिया।

हे इन सा से जुड़ी कई चमत्कारी कहानियाँ भी सुनने को मिलीं। कोरिया-युद्ध के समय, कितने ही छापामार इस मंदिर में छिप गए थे। अतः मंदिर को बम से उड़ा देने का हुक्म हुआ। विमान चालक मंदिर के भवन पर मंडराता रहा लेकिन अन्ततः प्यारे और भव्य भवन का नाश न कर सका। बाद में भले ही हुक्म की अवहेलना के लिए उसे सजा भी मिली। लेकिन युद्ध के बाद वह राष्ट्रीय नायक बन गया। जिस पहाड़ गाया पर हे इन सा स्थित है वह लगभग 8156 एकड़ क्षेत्र में फैला है और उसकी ऊँचाई 1430 मीटर है। पूरा क्षेत्र सघन हरे जंगलों से समृद्ध है और कम से कम मुझे तो वह लगातार एक विशाल हरे समुद्र का एहसास कराता रहा। हरे शान्त समुद्र में, हे इन सा एक समाधिस्थ जहाज की भाँति ्रपतीत होता रहा। जाने कब तक मैं त्री रत्न मंदिर के उस पूरे परिदृश्य में अभिभूत रहा।

लौटते समय श्रीमती किम ने इशारे से चीड़ के पेड़ों की ओर ध्यान दिलाया। कोरिया में चीड़ के पेड़ों की बहुतायत है। किसी पेड़ के राष्ट्रीय न होने की स्थिति में चीड़ को राष्ट्रीय पेड़ कहा जा सकता है। श्रीमती किम ने बताया कि कोरिया में लाल, काले, नीले और यहाँ तक कि सफ़ेद रंग के भी चीड़ के पेड़ हैं। एक प्रकार का समुद्री चीड़ भी यहाँ मिलता है।

अब हमें इस मंदिर के सूत्र को थामे एक अन्यत्र स्थान की यात्रा के लिए प्रस्थान करना था। पूरा काफ़िला साथ था। दो कारों में। समय काफ़ी हो चला था। भोजन के समय से पहले वहाँ पहुँ जाना चाहिए था। तभी कानों में एक शब्द पड़ा जिसने थोड़ा चैंकाता। यह शब्द तेगू से आई महिला ने बोला था। शब्द था - फत्तक फत्तक। अर्थ था जल्दी जल्दी। हमारे यहाँ भी तो कुछ क्षेत्रों में फटाक् फटाक् या फटाफट शब्द का प्रयोग होता है।

हे इन सा का वह अभिभूत कर देने वाला माहौल अपने भौतिक रूप में भले ही पीछे छूटता जा रहा था लेकिन मन-आत्मा से बहुत बहुत करीब था - बहुत कुछ और जानने की प्रेरणा के साथ।
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* प्रोफेसर दिविक रमेश भारत सरकार की ओर से तीन वर्षों तक कोरिया के एक विश्वविद्यालय में अध्यापन कर चुके हॆं ।

बी-२९५, सेक्टर-२०, नोएडा-२०१३०१

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  1. लोक भोगों को तुच्छ समझकर सत्य की खोज में निकलनेवाले थे महात्मा बुद्ध। उनमें स्वार्थ अणुमात्र का भी नहीं थी। सच्चे लोक कल्याणकारी थे।एक जमाना ऐसा था कि भारत में अन्य धर्म न था। सामान्य जनता हृदय से स्वागत किया था। बाद में स्वार्थी के मायाजाल में हमारी मानवता फिर से फँस गयी है।इसे मुक्ति दिलाने का श्रेय हर मानवतावादी पर है। भारत की गरिमा बढ़ाने में धर्म की भूमिका सर्वदा उन्नत शिखर पर होता है। बल्कि वह धर्म सर्वमान्य हो। स्वार्थी मनु धर्म शास्त्र जैसे पाखंडता जूझनेवाला हिंदू धर्म का संप्रेषण होना है।

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