यावानर्थ उदपाने सर्वत: सम्प्लुतोदके।
तावान सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानत:॥46॥
अनुवाद:- छोटे-छोटे अनेक जलाशयों से होने वाले काम एक बड़े भारी परिपूर्ण जलाशय से जैसे सहज में हो जाते है; वैसे संपूर्ण वेदो से होने वाले जो प्रयोजन है वे ब्रह्म जानने वाले को सहज में प्राप्त होते है।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोSस्त्वकर्मणि॥47॥
अनुवाद:- हे अर्जुन, तेरा केवल कर्म ही के विषय में अधिकार है, कर्मफलो के विषय में कदापि नही। तुम कर्मफलो का हेतु मन बनो, नाही कर्म त्याग का विचार मन मे लाओं।
रचनाकार परिचय:-
अजय कुमार सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया) में अधिवक्ता है। आप कविता तथा कहानियाँ लिखने के अलावा सर्व धर्म समभाव युक्त दृष्टिकोण के साथ ज्योतिषी, अंक शास्त्री एवं एस्ट्रोलॉजर के रूप मे सक्रिय युवा समाजशास्त्री भी हैं।


योगस्थ: कुरू कर्माणि संगं त्यक्तवा धनजय।
सुद्धयसिद्धयो: समो भूत्वा समत्वं योगे उच्यते॥48॥
अनुवाद:- हे धनंजय! तू आसक्ति को त्याग कर, सफलता और विफलता मे एक जैसा बना रह, प्रभु परायण होकर कर्मों को कर। इस सुबुद्धि को योग कहते है।
 संक्षिप्त टिप्पणी:- श्री कृष्ण अर्जुन को समझाते हुए कहते है कि जिस प्रकार कई जलाशयों से होने वाला काम एक बड़े जलाशय से बड़ी आसानी से हो जाता है उसी प्रकार सम्पूर्ण वेदो से जो प्रयोजन है वे बह्म को भलीभांति जान लेने वाले परमज्ञानी को आसानी से प्राप्त हो जाते है। अत: अर्जुन तेरा सिर्फ कर्म करने में अधिकार है इसके गल(परिणाम) मे नहीं। न ही तुम कर्म फल अका हेतु बनो और न ही कर्म त्याग का विचार मन में लाओं। तु आसक्ति का त्याग कर हर स्थिति में एक जैसा रहो यही योग है।
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगादुंभ्ज्य।
बुद्धौ शरणमंविच्छ कृपणा: फलहेतव:॥49॥
अनुवाद:- हे अर्जुन। बुद्धियोग से कर्म अत्यंत ही निम्न श्रेणी का है। इसलिए तू समत्वबुद्धि में ही शरण ढूँढ़। क्योंकि फल का कारण बनने वाले अधम है।
बुद्धियुक्तो जहातीय उमे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्य योग: कर्मसु कौशलम्॥50॥
अनुवाद:- ज्ञान योग युक्त पुरूष इस लोक में पुण्य और पाप से लिप्त नही होता है; इसलिए समत्व-बुद्धि के लिए तुम उपाय करो।
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्तवा मनीषिण:।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ता: पद गच्छंत्यनामयम्॥51॥
अनुवाद:- क्योंकि, माननिष्ठ विचारशील पुरूष कर्मजन्य फल को छोड़कर निष्काम कर्म करके जन्म बन्धन से मुक्त होकर निर्विकार परमधाम को चले जाते है।
यदा ते मोहकलोलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।
तदा गंतासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥52॥
अनुवाद:- जब तेरी बुद्धि मोहरूपी मालिन्य को पूरी तरह छोड़ेगी, तब तू सुने हुए और सुनने योग्य पदार्थो से वैराग्य को प्राप्त हो जायेगा।
संक्षिप्त टिप्पणी:- उपरोक्त श्लोको में भगवान कृष्ण ने अर्जुन को समझाते हुए कहते है कि तुम समत्वबुद्धि में ही शरण ढुढ क्योंकि बिना किसी इच्छा व स्वार्थ के किए हुए कर्म, कोई भी फल वा परिणाम पैदा करने में समर्थ नहीं होता है अर्थात् पुराने संचित कर्मफलो का क्षय होता रहता है इस प्रकार उसके समस्त कर्म विलीन हो, पुनर्जन्म आदि कर्मफल मिलने का प्रश्न समाप्त कर देते है। इस प्रकार जब बुद्धि मोहरूपी दल दल को जब पुरी तरह पार कर जायेगी तब सभी बातों से वैराग्य प्राप्त हो जाएगा।
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यासि॥53॥
अनुवाद:- जब भाँति-भाँति के अनेक सिद्धातों को सुनने से विचलित हुई तेरी बुद्धि जब निश्चल होकर परमात्मा के स्वरूप मे अडिग और स्थिर होगी तब तू योगफल( तत्वज्ञान) को पावेगा।
अर्जुन उवाच।
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।
स्थितधी: किं प्रभाषेत केमासीतव्रजेत किम्॥54॥
अनुवाद:- अर्जुन ने कहा- हे कृष्ण! समाधि मे स्थित, स्थिरबुद्धि वाले पुरूष का क्या लक्षण है। वह कैसे बैठता है और कैसे चलता है?
श्रीभगवानुवाच।
प्रजहाति यदा कामांसर्वांपार्थमनोगतान।
आत्मन्येगात्मना तुष्ट: स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥55॥
अनुवाद:- श्री कृष्ण ने कहा – हे अर्जुन, जब को ई अपने मन में आई हुई कामनाओं को छोड़ अपने आत्मा से आत्मा में संतुष्ट रहता है, तब वह “स्थितप्रज्ञ” कहा जाता है।
दु:खेष्वनुद्विग्नमना: सुखेषु विगतस्पृह:।
वीतरागभयक्रोध: स्थितधीर्मुनिरूच्यते॥56॥
अनुवाद:- दु:खो मे जिसका मन क्षुब्ध न होता हो, सुखो में जिसकी लालसा न हो तथा जो आसक्ति(लगाव), डर तथा गुस्से से शून्य हो (अर्थात् प्रभावित न होता हो) ऐसा ध्यानशील मनुष्य “स्थिर बुद्धि कहलाता है।
क्रमश:
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1 comments:

  1. ऐसे स्तंभ चलते रहना चाहिए...पढ कर अच्छा लगा..धन्यवाद

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