7 फ़रवरी, 2011 (सोमवार) सांय छ: बजे से नई दिल्ली के रविन्द्रा भवन में प्रवासी मंच के सानिध्य में श्री तेजेन्द्र शर्मा जी के कहानी पाठ का आयोजन किया गया. कार्यक्रम के आरम्भ से पूर्व जलपान की व्यवस्था थी.  कहानी पाठ से पूर्व श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी (उपसचिव)  साहित्य अकादमी,  ने विधिवत श्री तेजेन्द्र शर्मा जी का परिचय उपस्थित जनसमूह के समक्ष रखा.


अपने अपने मोबाईल फ़ोन आफ़ करने के आग्रह के साथ तेजेन्द्र जी ने बताया कि आज वह अपनी दो कहानियों का पाठ करेंगे. उनकी पहली कहानी "होमलेस" ब्रिटेन में रह रहे बेघर लोगों पर आधारित है और कहानी का आरम्भ होता है "बाजी" व "सिकन्दर" के बीच वार्तालाप से.  तेजेन्द्र जी की कहानी कि यही विशेषता है कि वह सामान्य संवादों को कहानी में इस तरह से गूंथ देते हैं कि पाठक अथवा श्रोता एक लय में बहे चले जाते हैं.

इस कहानी की मुख्य पात्र "बाजी" जो एक मुस्लिम महिला हैं,  जिनका जन्म भारत में हुआ, शादी पाकिस्तान के शहर कराची में हुई और अब वह ब्रिटेन में रह रही है. कई वर्षों से काऊंसलर हैं और समाज सेवा की गतिविधियों में संलग्न हैं. वह घर में एक साधारण ग्रहणी हैं जिसका पति शायद यह समझता है कि उसको बाहर की दुनिया की अधिक जानकारी नहीं है. घर से हट कर वह एक समाज सेवक है और उनके साथ काम करने वालों के लिये एक सह्र्दय महिला हैं. ब्रिटेन में समाज सेवा के दौरान भी उन्हें मुस्लिम होने का बोध बार बार कराया जाता है जैसे मुस्लिम होना कोई अपराध हो और मुस्लिम केवल आतंकवादी ही हो सकते हैं, समाज सेवक नहीं और वो भी ब्रिटेन में. कहानी के माध्यम से उनके चरित्र की एक और बात जो सामने आती है वह है उनका अपने काम के प्रति निष्ठावान होना. उन्हें अपने काम में किसी प्रकार की देरी या कौताही बिल्कुल भी पसन्द नहीं है. ऐसे समय में वह बेहद गंभीर हो जाती हैं और अपनी प्रतिक्रिया सामने वाले पर सबके सामने उजागर नहीं करती. इस बात का संकेत उनके वार्तालाप से उजागर होता है जो एक अन्य पात्र "सिकन्दर" के साथ होता है. सिकन्दर उन्ही के साथ समाज सेवा में लगा है और जिसे एक दिन "होमलेस सेन्टर" में भोजन की व्यवस्था का जिम्मा सोंपा गया है.

जहां "सिकन्दर" की बातों से एक कट्टर पंथी समुदाय का समर्थन झलकता है वहीं "बाजी" का प्रत्येक शब्द मानवता के मूल्यों को सार्थक करता है.

इसके अतिरिक्त कथा में भूख को अत्यंत स्वाभविक रूप में परिभाषित किया गया है. उनकी विशेष गंध, उनके माहौल व स्थिति का जो खाका खींचा गया है वह हमारे यहां के गरीबों से भिन्न नहीं है.

एक जगह फ़िलिपीनो मेड का जिक्र जिसे न तो हिन्दी आती है न अंग्रेजी और उर्दू का तो प्रशन ही नहीं कहानी में रोचकता ले आता है.

होमेलेस डे केयर सेंटर में "बाजी" और "फ़र्नान्डिस" के बीच हुए वार्तालाप से ऐसा लगता है संसार में जो कुछ व्यर्थ होने जा रहा है वही गरीबों का नसीब है. जैसा खाना उन्हें इस सेन्टर में मिलता है उसे तो शायद गरीबों का मादा ही पचा पायेगा. सच भी तो है भीख में जो मिल जाये वही गनीमत है....कोई अधिकार तो है नहीं.

एक बात और जो साफ़ उभर कर आती है वह है कि यहां आने वाले सभी लोग परिवार व समाज के ठुकराये हुये और आधुनिक युग की प्रवृत्तियों, अकेलेपन, स्वार्थ और अवसाद की देन हैं.
जहां "ऎंजला व स्टैला" को समाज लेस्वियन कह कर हीनता व उपेक्षा की नजर से देखता है वहीं वह दोनों एक दूसरे को अपना पूरक समझती हैं और अपनी हर आवश्यकता का निवारण एक दूसरे के पहलू में ही खोजती हैं व पाती हैं. उन दोनों का यह कहना कि क्या बाजी उन पर एक कहानी या उपन्यास लिखेगी और फ़िर यह पूछना कि उसकी रोयलटी किसे मिलेगी, कथा में रोचकता का एक आयाम है.
एक बेघर द्वारा "बाजी" का चित्र बनाना और उसे दिखा कर कहना कि वह दुनिया की सबसे सुन्दर स्त्री हैं और उनके चेहरे पर जो नूर है वह अनूठा है... प्रेम की अनुभूति की एक और प्रकाष्ठा नहीं तो और क्या है.

कहानी के अन्त में गाडी पर पार्किंग जुर्माने की चिट चिपकी देख कर यह कहना कि अब वह कभी यहां नहीं आयेगी और फ़िर अचानक एक दिन कापी, पैंसिल, कैन्वस और रंगों की शीशीयां लेकर सेन्टर लौटना उनके ह्र्दय के करुणा भाव को उजागर करता है.



चूंकि पहली कहानी थोडी लम्बी थी इसलिये तेजेन्द्र जी ने एक छोटी कहानी का चयन किया जिसका शीर्षक था " कैलिप्सो".   कैलिप्सो ग्रीक गोड ऎटलेस की पुत्री का नाम था और इस शब्द का अर्थ है "जानकारी को छुपाना" यानि कैलिप्सो के ह्र्दय में अनेकोनेक राज छिपे हुये थे. 

इस कहानी के मुख्य पात्र "कैलिप्सो"  (एक युवती है जिसके बाल खिचडी रंग है और जिसे दूर से देख कर उसकी आयु का अनुमान लगाना मुश्किल है),  "नरेन"  और उसकी प्रेमिका "सीमा" हैं.

नरेन जब कैलिप्सो को हेन्डन सेन्ट्र्ल अण्डरग्राऊंड स्टेशन के बाहर क्वीन्स रोड के बस स्टाप के पीछे बैठे देखता है तो कई तरह के विचार उसके मन में उमढते हैं कि यह युवती कौन है और इन्हीं विचारों के इर्द गिर्द यह कहानी बुनी गई है.

पहली बार इस युवती को देख कर नरेन कई नाम जैसे जूली, आड्री, क्लेयर, शिनेड आदि उस पर फ़िट कर के देखता है पर यह नाम उसे जंचते नहीं.. अन्त में  उसे कैलिप्सो  नाम ही जंचता है.

नरेन सोचता है वह यहां क्यों और कब से बैठी है... इसका दुनिया में अपना कोई है या नहीं और वह मन ही मन कैलिप्सो की तुलना चार्लस डिक्न्स के नावल ग्रेट एक्पेक्टेशन की पात्र मिस हैविशाम से करने लगता है जिसका प्रेमी उससे विवाह की शाम विवाह रचाने आया ही नहीं.

और फ़िर उसे अपने मित्र की कहानी ग्रेसी रेफ़्ल  की याद आ गई जिसके पति ने उसे लूट कर सडकों पर घिसटने के लिये छोड दिया था.

नरेन मन ही मन सोचता है कि शायद कैलिप्सो के साथ भी शायद ऐसा ही कुछ हुआ होगा.  परन्तु फ़िर वह देखता है कि यह तो एक अच्छे कपडे पहने साफ़ सुथरी महिला है.  साथ ही उसे मंहगी काफ़ी पीते देख कर उसके मन में दूसरी तरह के विचार पनपने लगते हैं.  नरेन सोचता है कि यदि सीमा को पता चला कि वह कैलिप्सो में इतनी रुचि ले रहा है तो वह नाराज हो जायेगी.  नरेन इस बस स्टाप पर सीमा से मिलने ही आता है जो उसके नाटक में अभिनय करते करते उसके दिल में भी जगह बना गई है हालांकि वह तालाकशुदा है और उसकी एक बेटी भी है. नरेन के भीतर का लेखक कैलिप्सो के बारे में जानने को उत्सुक है.  वह सीमा के ईर्श्यालू स्वभाव से परिचित है परन्तु यह भी समझता है कि वह उसका बहुत ख्याल रखती है.  वह मन ही मन सोचता है कि वह कैलिप्सो के बारे में सीमा को कुछ नहीं बतायेगा. 

अगले दिन जब वह बस से उतरा तो देखा एक व्यक्ति कैलिप्सो से बात कर रहा है.. उसे जलन महसूस होने लगी जैसे कोई रकीब पैदा हो गया हो. वह सोचने लगा कि वह कैलिप्सो से बात कर ही लेगा... डरेगा नहीं.

मन ही मन नरेन सोचता है कैलिप्सो किसी से डरती नहीं, मंहगी काफ़ी पीती है कहीं यह आतंकवादियों से मिली हुई तो नहीं है.  फ़िर एक दिन वह हिम्मत कर कैलिप्सो के पास पहुंच ही गया और उसे काफ़ी पीने का निमन्त्रण  दे डाला जिसे उसने स्वीकार भी कर लिया.  परन्तु काफ़ी के दौरान नरेन को सीमा के आने का डर सताता रहा और कैलिप्सो से कुछ बात न हो पाई.   नरेन सोचने लगा कि अगर कैलिप्सो काफ़ी का आफ़र स्वीकार कर लेती है तो कहीं वह पैसे तो नहीं लेती और धंधा तो नहीं करती. 

एक दिन हिम्मत कर नरेन ने सीमा से कहा, "यहां एक औरत बैठी दिखाई देती है, कौन हो सकती है ? सोचता हूं उससे पूछूं और उस पर एक नाटक लिखूं और उस नाटक में मुख्य भूमिका तुम करो.  सीमा इस बात पर गंभीर हो गई और फ़िर नरेन को भी किसी काम से तीन सप्ताह के लिये बाहर जाना पडा.

जब नरेन लंदन आया तो सीमा ने कैलिप्सो से मिलने की इजाजत दे दी.
अगले दिन नरेन जब हेन्डन स्टेशन के बस स्टाप पर पहुंचा तब उसे कैलिप्सो उसे कहीं नजर आई.  छ: दिन बीत गये मगर वह फ़िर न लौटी... प्रशन वहीं का वहीं था कि वह कौन थी, कहां से आई थी और कहां चली गई.

कहानी में कैलिप्सो के रहस्यात्मक चरित्र,  नरेन की उत्सुकता और सीमा के शक्की स्वभाव को लेखन ने खूबसूरती से उभारा है.


कार्यक्रम में उपस्थिति
वरिष्ठ लेखक
श्री गंगा प्रसाद विमल, श्री महीप सिंह, डा० कमल किशोर गोयनका, श्री लीलाधर मंडलोई, नूर जहीर, डा० प्रेम जनमेजय, डा० दिविक रमेश, श्री भगवान दास मोरवाल, श्री प्रमोद कुमार तिवारी, श्री प्रेमचंद सहजवाला
प्रवासी लेखक
काऊंसलर जाकीया जुबैरी, डा० अचला शर्मा, श्रीमति दिव्या माथुर, डा० कृष्णा कुमार, श्रीमति जय वर्मा, श्रीमति नीना पाल, श्रीमति अरुणा सब्बरवाल, श्री परवेज आलम.

वरिष्ठ समालोचक

श्री भारत भारद्वाज
वरिष्ठ पत्रकार/मीडिया

श्री राहुल देव (आज समाज), डा० लक्ष्मी शंकर वाजपेयी

अन्य लेखक, ब्लोगर व माननीय उपस्थित
डा० अजय नावरिया, श्री मति मनीषा कुलश्रेष्ठ (हिन्दी नेस्ट), श्रीमति मीनाक्षी जीजिविषा, डा० पुष्पा सिंह "विसेन", डा० वन्दना पुष्पेन्द्र, श्री अनुज, डा. साधना अग्रवाल, डा. विवेकानंद, श्री आर एन नन्दवानी, श्री अजय कुमार (मेघा बुक्स), श्री प्रदीप पंत, श्रीमति नीलम, श्री ललित शर्मा, श्रीमति अल्का सिन्हा, श्री मनु सिन्हा, श्रीमति सरोज श्रीवास्तव, श्री राजेश जैन, श्री श्याम कश्यप, श्री सीमाब सुल्तानपुरी, श्रीमति अल्का सिन्हा, डा. रीता सिंह, श्री अर्पण कुमार (सहायक अनु. अधिकारी, केन्द्रीय हिन्दी सचिवालय), श्री केशव राय, मेजर कृपाल वर्मा, डा. हरनेक सिंह गिल, श्री उपेन्द्र कुमार राय, श्री फ़जल इमाम मलिक, श्री हीरालाल नागर, श्री अभिषेक सोलंकी, श्री जितेन्द्र कुमार निरुला, श्री अरमान, श्री रंजीत कुमार झा, श्री सुरजीत कुमार, श्री राकेश दुबे, श्री प्रेम भारद्वाज, श्रीमति इन्दिर चौधरी (प्रिन्सीपल अक्षय संसथान), श्री राकेश पाण्डेय, श्री राजीव तनेजा, श्रीमति संजू तनेजा, श्रीमति चित्रा कुमार, श्रीमति ममता किरण, श्री मुकेश पोपली (राजभाषा विभाग स्टेट बेंक आफ़ इन्डिया).

अन्त में यह भी स्पष्ट कर दूं कि मैं भी साहित्य शिल्पी की और से वहां उपस्थित था और जो चित्र यहां पर लगाये गये हैं वह श्री तेजेन्द्र जी के कैमरे से मैंने ही चित्रित किये हैं. एक बात और चूंकि अधिकतर लोगों से पहली बार मिलना हुआ इस कारण यदि किसी उपस्थित का नाम भूल वश छूट गया हो, गलत लिखा गया हो अन्यथा उचित श्रेणी में न आ पाया हो तो क्षमा प्रार्थी हूं.



6 comments:

  1. आलेख बहुत अच्छा लगा...
    चित्र भी बहुत सुंदर हैं...आभार मोहिंदर जी..


    कहानीकार तेजेन्द्र जी को बधाई |
    शुभ कामनाएँ...

    काश! मैं भी वहाँ होती...

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  2. jaan kar bahut achha laga

    sabhi ka abhinandan !

    aayojan ke liye badhaai !

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  3. यदि किसी को भी भारत में बैठे बैठे प्रवासी भारतवासियों की जिंदगी की एक झलक देखनी हों तो तेजेन्द्र शर्मा की कहानियां एक दर्पण जैसा काम करती हैं. प्रवासी भारतीय किन किन विदेशी बातों पर चौंकता है या दुसरे देश के कौन से रीति रिवाज पसंद या नापसंद करता है, इस का बहुत सुंदर लेखा जोखा उनके द्वारा पढ़ी हुई कहानी 'होमलेस' में था. इस कारन उनकी तथा अन्य प्रवासी भारतीय लेखकों की रचनाएँ पढ़ने की इच्छा तीव हो उठी है. तेजेन्द्र जी को व अन्य सभी प्रवासी हिंदी लेखकों को मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ. - प्रेमचंद सहजवाला

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  4. डॉ. वंदना पुष्पेन्द्र13 फ़रवरी 2011 को 10:49 pm

    मोहिंदर जी, मैं स्वयं इस कार्यक्रम में उपस्थित थी| तेजेंद्र जी की दोनों कहानियाँ सुनी, उन्हें आप के माध्यम से हार्दिक बधाई| कार्यकम का संचालन ब्रजेन्द्र त्रिपाठी जी ने किया था उन्हें भी बहुत-बहुत बधाई |

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  5. चित्र स्वयं उस कार्यक्रम की जीवंतता का उद्घोष कर रहे हैं |उस पर सुहागा यह कि , मोहिन्दर जी की प्रस्तुति इतनी सुंदर --- क्या कहिए -- !
    अनुपस्थिति अब उतनी नही खलेगी |

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