एक खाली कैनवास, अधूरी पेंटिंग, चित्रकला की कुछ पुरानी किताबें और रंग तथा ब्रशों से भरा पैकेट कार की पिछली सीट पर डालकर मैं उस भवन के मुख्य द्वार से बाहर निकल आया। बाहर आकर पारिवारिक सदस्यों से औपचारिक अभिवादन करने के बाद कार स्टार्ट कर आगे बढा दी। इस सामान को लेकर मुझे जल्दी से जल्दी कलात्मक अभिरूचि कक्षा की छात्रा अर्चना के घर पहुंचना था क्योकि उसे ही यह जिम्मेदारी दी गयी थी कि ‘विश्व कल्याण दिवस’ पर आयेाजित होने वाली कला प्रदर्शनी के लिये इस खाली कैनवास पर हमारे संस्थान की पूर्व छात्रा कृति का पोर्ट्रेट बनाये। कार का रियर व्यू मिरर भी एक कैनवास सरीखा जान पडा जिसमें सबसे पहले कृति के घर का मुख्य द्वार और उसके सहारे लहराती कुछ लतायें उभरीं तथा कुछ दूर बढ़ने पर हरे भरे पेड़ और पार्क की सी आकृति उभरी जो एक्सिलेटर पर पैर का दबाव बढने के साथ ही धीरे धीरे छोटी होती चली गयी और अंत में ठीक वैसे ही आंखों से ओझल हो गयी जैसे कृति हमारे बीच से अचानक ओझल हो गयी थी।
कृति से मेरा परिचय अभी हाल ही में हुआ था जब उसने कलात्मक अभिरूचि कक्षा में प्रवेश लिया था । कला की औपचारिक शिक्षा पाने से वंचित रह गये कला प्रेमियों के लिये अनुकूल माहौल प्रदान करने के उद्देश्य से इन कक्षाओं में उन सभी छात्रों को प्रवेश दिया जाता है जिन्हें कला के माध्यम से आत्म-संतुष्टि की तलाश रहती है। यहाँ शिक्षा पाने के लिये उम्र ,परिवेश, लिंग आदि की सीमायें अर्थहीन होती हैं। नया बैच प्रारंभ हेाने पर कक्षा में पढ़ने वाले अन्य छात्र छात्राओं के अनुरूप मैंने कृति को भी एक नया कैनवास लेकर आने की हिदायत दी थी परन्तु कई अवसरों पर नया कैनवास न लाने के कारण वह कोई नयी पेंटिंग नहीं शुरू कर पायी थी। उस दिन मैंने लगभग डाँटने के अंदाज में उससे कहा था:-
रचनाकार परिचय:-
5 जनवरी सन् 1965 को पौड़ी-गढ़वाल में जन्मे श्री डॉ0 अशोक कुमार शुक्ला ने भौतिकी में स्नातकोत्तर तथा शिक्षा शास्त्र में एम.एड. व पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त हैं। आप हिन्दुस्तान एरोनाटिक्स विद्यालय, अमेठी में भौतिकी विभाग के विभागाध्यक्ष रहे हैं और वर्तमान में उ0प्र0 राजस्व (प्रशासनिक) सेवा के अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं।

पहली रचना कविता ’संकल्प’(उद्बोधन)1978 में साप्ताहिक गढवाल मंडल में प्रकाशित, उसके उपरांत अनेक रचनायें(कवितायें, संस्मरण, कहानियां तथा विज्ञान विषयक लेख) नवभारत टाइम्स, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, धर्मयुग,‘दैनिक अमर उजाला’,‘साप्ताहिक पर्वतीय टाइम्स’,‘साप्ताहिक जन लहर’,‘मधु-मुस्कान’,‘दैनिक स्वतंत्र भारत’,‘विज्ञान प्रगति’,‘हिन्दुस्तान फीचर समाचार सेवा’,पौडी टाइम्स’,‘संवाद-भारती फीचर सेवा’, ‘अहा जिंन्दगी’, ‘युगवाणी’,‘उत्तरांचल पत्रिका’,‘तहलका’,‘दिगन्त’, ‘गृहनंदिनी’,‘बालवाणी’, सहित विभिन्न समाचार पत्रोंपत्रिकाओं में समय समय पर प्रकाशित होती रही हैं।
आकाशवाणी लखनऊ से विज्ञान विषयक वार्ताओं का प्रसारण भी हुआ है।


विभिन्न समाचार पत्रों में स्फुट प्रकाशित कविताओं का एक संग्रह ’प्रतिनिधि कविताएं’ 1993 में संग्रहीत, एक कविता संग्रह ’कविता का अनकहा अंश’ 2009 में अभिव्यक्ति प्रकाशन हरदोई से प्रकाशित तथा दो कहानी संग्रह ‘पुनरावतरण’ तथा ‘एक संस्कार ऋण’ क्रमशः 2008 तथा 2010 में साकार प्रकाशन लखनऊ द्वारा प्रकाशित, दैनिक स्वतंत्र भारत में ‘विज्ञान के खेल’ शीर्षक से लिखे स्तंम्भ में सम्मिलित विज्ञान विषयक प्रयोगों का संकलन ‘विज्ञान के खेल’ शीर्षक से उत्तरायण प्रकाशन के अधीन प्रकाशनाधीन व संस्मरणों का संग्रह ‘फिर जी उठा वह’युगवाणी प्रकाशन देहरादून से प्रकाशनाधीन है।
‘‘कृति! आपके सभी साथी अपनी नयी पेंटिंग पर काम शुरू कर चुके हैं, अब अगर आप नया कैनवास लेकर नहीं आयीं तो मैं आपको यहाँ बैठने की अनुमति नहीं दे पाऊँगा! समझीं।’’ मैंने पाया कि कृति का चेहरा रूआंसा सा हो गया था। चेहरे पर पसर आयी उदासी को अपने अधकटे लटकते बालों के पीछे छिपाने का प्रयास करते हुये उसने कातर स्वर में कहा:-
‘‘सर! अकेली होने के कारण अमीनाबाद जैसे भीड़ भाड़ भरे इलाके में नहीं जा सकी। अगले दिन की क्लास में आपको शिकायत न होगी।’’ यह कहकर वह फिर से अपने ड्राइंग बोर्ड पर झुक गयी।
मुझे ऐसा लगा जैसे अनजाने में किसी वेदना की अनुभूति को शायद मैंने उभार दिया है सो मैंने संभलकर फिर कहा:- ‘‘अगर आपको किसी तरह की समस्या है तो अपने सहपाठियों की या मेरी मदद लेकर भी जरूरी सामान मंगा सकती हैं।’’ परन्तु वह कुछ न बोली और अपने ड्राइंग बोर्ड पर पूर्ववत झुकी रही।
मैंने पाया कि उस दिन कक्षा की समाप्ति के बाद कुछ सहपाठी उससे चुहल करते हुये कह रहे थे, ‘‘अरे कृति जी! आप अपने आपको अकेली क्यों समझती हैं, सर तो हैं न आपके साथ। अरे आपका कैनवास लाने की इच्छा जतायी है उन्होंने। क्यों नहीं आप उनके साथ जाकर हमारे लिये भी जरूरी सामान ले आतीं।’’ सहपाठियों के मजाक पर कृति के चेहरे पर छायी रहने वाली रहस्यमयी उदासी कुछ क्षणों के लिये हट गयी और उसने हल्की सी मुस्कान बिखेर दी।
उस दिन के बाद कृति अपने पूरे साजो सामान के साथ ही कक्षा में आने लगी। लेकिन मैंने यह पाया कि कक्षा के अन्य छात्रों की तुलना में कृति अब भी कुछ ज्यादा ही शान्त रहती थी और लगातार अपने काम में व्यस्त रहती थी। ऐसा लगता था जैसे उसे अपने काम में बहुत शीघ्रता के साथ संपूर्णता की तलाश हो। वह आये दिन वाटर कलर, ऐक्रेलिक कलर, ड्राई पेस्टल, आयल पेंट, क्रेयान पेस्टल और न जाने कितने तरह के कलर लेकर आती और कहती, ‘‘सर! प्लीज मुझे बताइये कि हम लोग आयल कलर से पोर्ट्रेट कब बनाना सीखेंगे।’’
‘‘अभी नहीं। पहले आपको अपनी ड्राइंग को सुधारना होगा। किसी का पोर्ट्रेट बनाने से पहले अपनी भावनाओं को कैनवास पर उतारने का हुनर सीखना होगा। इसके लिये कुछ दिन बाद आपको कक्षा के बाहर जाकर प्रकृति के बीच जाकर उसे अपने कैनवास पर उतारना होगा। फिर ‘विश्व कल्याण दिवस’ पर शीघ्र ही कला प्रदर्शनी भी आयोजित होनी है जिसमें आप सब को भी भाग लेना है।’’ मैंने कलात्मक अभिरूचि विकसित करने के संभावित सोपानों के संबंध में एक संक्षिप्त सा उत्तर देकर उसकी जिज्ञासा शांत करनी चाही परन्तु कक्षा के बाहर चलकर प्रकृति के बीच बैठकर उसको कैनवास पर उतारने वाली मेरी बात ने उसे जैसे उत्साहित कर दिया और वह चहक कर बोली थी:-
‘‘सच में सर! फिर जल्दी ही बाहर चलकर ड्राइंग कराने का कार्यक्रम बनवाइये न!’’
‘‘नहीं अभी नहीं। अभी बहुत जल्दी है, अभी बहुत समय बाकी है। समय आने पर आपको कार्यक्रम की जानकारी दे दी जायेगी।’’ लगभग आदेशात्मक स्वर में मैंने कृति को चुप करा दिया था। वह कुछ उदास और अनमनी सी हो गयी थी।
वह अक्सर कक्षा से बाहर चलकर पेंटिंग बनाने के लिये कहा करती थी। उसमें यह जानने की प्रबल इच्छा थी कि आखिर कैसे अपने विचारों को कैनवास पर उतारा जाता है? ऐसा लगता था कि जैसे वह प्रकृति के बीच जाना चाहती थी और उसमें खोकर कुछ ढूँढना चाहती थी, उसकी आंखों में एक अनोखा खालीपन हमेशा विद्यमान रहता था, वह अपनी पेंटिंगों के माध्यम से ऐसा कुछ खोजना चाहती थी जिसे अब तक वह शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकी थी, लेकिन वह क्या ढूँढ रही थी यह मैं कभी न जान सका।
मैने देखा कि कई अवसरों पर उसने यह अनुरोध किया कि क्लासेज छूटने के बाद सभी छात्रों को किसी कलादीर्घा में लेकर चलूँ और वहाँ जाकर चित्रों के माध्यम से कलाकर और वास्तविक कला के संबंधों को प्रायोगिक तौर पर समझाऊँ लेकिन अपनी कक्षा समाप्त करने के बाद अन्य कार्यो के लिये समय बचाने के उद्देश्य से मैंने बड़ी सहृदयता और चालाकी से छात्रों के इस अनुरोध को लगातार टाल दिया था।
उस दिन विद्यालय में दिन भर की उबन भरी दिनचर्या के बाद सांयः घर लौटते हुये यूँ ही मन में विचार आया कि ललित कला अकादमी से होकर चला जाय जहाँ बनारस के किसी कलाकार के चित्रों की प्रदर्शनी लगी थी। किसी कलाकार का रंगों में डूबकर अपने मनोभावों को पेंन्टिग्स में उकेरा हुआ देखना मुझे भी बहुत प्रभावित करता था। इसी जादू को देखने की ललक ने मुझे उस शाम ललित कला अकादमी पहुँचा दिया था।
कलादीर्घा में सजी पेंटिंग्स को मनोयोग से देखना प्रारंभ ही किया था कि एक परिचित आवाज ने मुझे चौंका दिया:- ‘अरे सर! आप, आखिर आपको कैसे फुरसत मिल गयी यहाँ तक आने की?’
मैंने पलटकर देखा, मेरे पीछे कृति खड़ी थी। मैं पूर्व में अपने छात्रों के इस अनुरोध को टालता रहा था इसलिसे आज अचानक ललित कला अकादमी में अपने किसी छात्र के सामने इस तरह अचानक टकराना कुछ ऐसा था जैसे किसी ने मुझे चोरी करते रंगें हाथ पकड लिया हो। कृति का इस तरह मिलना सचमुच अप्रत्याशित था। मैं अचकचा गया और बोला:-‘‘नहीं ऐसी बात नहीं है, मैं आप लोगों को भी किसी दिन कलादीर्घा में लाकर कला के वास्तविक स्वरूप से जरूर परिचित कराऊँगा । अभी आप लोग कला की प्राथमिक जरूरतों में तो महारत हासिल करो।’’
मैंने पाया कि वह लगातार मेरे साथ चल रही थी और कलादीर्घा में टंगी हर एक पेंटिंग के बारे में कुछ न कुछ जरूर पूछ रही थी। उसके अंदर कुछ अनकहा अनसुना रहस्य भाव था जो परिभाषित नहीं हो पा रहा था और बाहर आने के लिये लगातार छटपटा रहा था। वह इसी तरह पूरी दीर्घा में मेरे साथ रही और जब मैं चलने को हुआ तो मुझे विदा करने कार तक मेरे साथ आयी। कार का दरवाजा खोलकर जब मैं उसमें बैठा तो फिर बोली:-‘‘सर! प्लीज आप हम लोगों केा लेकर विद्यालय के बाहर जल्दी चलिये ना। आखिर क्यों नहीं चलते हैं आप? क्या आप जानते हैं कि हम आपके साथ कहीं भी चलने के लिये तैयार हैं।’’
मैंने वातावरण में उभर आयी अनचाही गंभीरता केा समाप्त करने के उद्देश्य से कृति के द्वारा कही गयी बातों में ‘कहीं भी’ शब्द को रेखांकित करते हुये हंसकर कहा:- ‘‘ क्या कहा आपने ? कहीं भी! सचमुच! फिर तो शायद मुझे आपसे बचना होगा।’’ यह सुनकर वह शरमा सी गयी थी और मैंने देखा कि हँसी की इस खिलखिलाहट के साथ एक संकोच और शर्मीलापन भी उसके चेहरे पर उभर आया था।
अगले दिन कक्षा में एक अधूरी पेंटिंग और एक खाली कैनवास लिये सबसे आगे बैठी मिली थी वह। मेरे पहुँचते ही बोली:- ‘‘सर प्लीज! आज मुझे पोर्ट्रेट बनाना सिखा दीजिये।’’
मैंने उसके पास रखी अधूरी पेंटिंग देखकर पहले उसे पूरा करने की हिदायत के साथ उसके अनुरोध को अस्वीकार कर दिया। हालाँकि मन ही मन यह सोचा कि दूसरी बार अनुरेाध करने की स्थिति में कुछ टिप्स् अवश्य दूँगा। परन्तु उस दिन कृति ने पुनः अनुरोध ही नहीं किया और पूरे समय अपनी अधूरी पेंटिंग में ही उलझी रही। मैंने पाया कि वह पहले से ज्यादा उदास हो गयी थी । पता नहीं क्यों मुझे उसकी उदासी अच्छी नहीं लगी और अपने निर्णय पर पछतावा हुआ। एक जिम्मेदार अध्यापक की तरह स्वयं से ही यह प्रोमिस किया कि अगले दिन उसे नये कैनवास पर पोट्रेट बनाने के गुर अवश्य सिखाऊँगा। मैं ही नहीं यह बात शायद कोई भी नहीं जानता था कि यह कृति की आखिरी कक्षा थी और उसका यह कैनवास यूँ कोरा ही रहने वाला है क्योंकि उस दिन के बाद वह मुझे कभी कक्षा में नहीं दिखी। अन्य छात्रों से उसके बारे में पूछने पर पता चला कि उसका स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण वह कक्षा में नहीं आ रही थी।
एक दिन मोबाइल पर एक अनजानी काल आयी जिसमें मुझसे पूछा गया कि क्या मैं कृति का कला शिक्षक हूँ। मेरे सकारात्मक उत्तर के बाद फोन कृति को दिया गया । मैंने उसके स्वास्थ्य के संबंध में पूछताछ की। बातचीत का औपचारिक सिलसिला समाप्त होने पर उसने फिर वही पुराना अनुरोध दोहरा कर कहा:- ‘‘सर! अब जब ठीक होकर कक्षा में आऊँगी तब पोट्रेट बनाना जरूर सिखाइयेगा। ’’ मैंने कहा, ‘‘जी हां कृति! आप जिस दिन ठीक होकर आयेंगी हमलोग उसी दिन कक्षा से बाहर चलकर प्रकृति के बीच पेंटिंग बनाना सीखेंगें। बस अब जल्दी से ठीक होकर आ जाइये। हम सब आपको मिस कर रहे हैं। गेट वेल सून! कृति!’

मेरा यह उत्तर उसके मन में क्या प्रभाव डाल पाया यह मैं न जान सका क्योंकि मोबाइल फोन पुनः किसी ने ले लिया और मुझसे आग्रह पूर्वक कहा:- ‘‘सर! प्लीज आप एक दिन घर पर आ जाइये।’’ मैने इसे शिष्टता का औपचारिक आमंत्रण समझ कर यूँ ही टाल दिया।
एक दिन विद्यालय आने पर यह दुखद समाचार मिला कि हमेशा कक्षा से बाहर चलकर पेंटिंग बनाने का आग्रह करने वाली कृति नहीं रही। यह सुनकर हक्का बक्का रह गया मैं। कक्षा समाप्त होने के बाद सीधे उसके घर जा पहुँचा। वहाँ पहुँचकर यह पाया कि कृति के घर के बाहरी कमरे में एक खाली कैनवास, अधूरी पेंटिंग और चित्रकला की कुछ पुरानी किताबें और रंग तथा ब्रशों से भरे पैकेट रखे हैं। औपचारिक परिचय के बाद वहाँ उपस्थित एक बुजुर्ग महिला ने कहाः- ‘‘हम लोग जान ही न सके कि यह क्या हो गया? वह आपको बहुत याद करती थी और आखिरी समय तक आउटडोर पेंटिंग बनाकर ‘विश्व कल्याण दिवस ’ पर उनकी प्रदर्शनी लगाने को लेकर उत्साहित रही। उसका ड्राइंग का यह सारा सामान यहाँ बेकार पड़ा रहेगा। अब आप प्लीज! यह सामान ले जायें और जिसे उचित समझें उन्हें देदें।’’
यह अवस्था मेरे लिये अप्रत्याशित थी और मैंने इतने कठोर वातावरण की कभी कल्पना भी नहीं की थी। न ही ऐसे किसी प्रश्न के लिये मैं तैयार होकर आया था सो मैं समझ ही न सका कि इस आग्रह का क्या उत्तर दूं। बस नजरें उठाकर चुपचाप उस घर में अलग थलग पड़ चुके रंगों के ब्रश और पेंटिंग बनाने के अन्य सामान की ओर देखने लगा। उस खाली कैनवास पर मुझे कृति का उदास चेहरा उभरा हुआ दिखायी दिया जैसे वही आग्रह दोहरा रही हो:- ‘‘सर प्लीज ! कहीं बाहर चलकर आज मुझे पोर्ट्रेट बनाना सिखा दीजिये ना।’’ मैं अपलक उस कैनवास को निहारता रहा। देखते ही देखते उस पर पानी की दो ताजा बूंदे टपक पडीं, शायद मेरी आँखे नम हो चली थीं।
मैंने अपने आप को संभाला और अचानक जिंदगी के कैनवास पर उभर आये उन स्याह रंगो के बारे में सोचने लगा जो न जाने कितने अरसे से कृति के आसपास मंडरा रहे थे। वह घर मुझे शमशान घाट की ऐसी चिता जैसा जान पड़ा जिसमें एक अरसे से कृति का शरीर लगातार जलता रहा हो और आज जिसकी कपाल क्रिया पूर्ण हुयी हो। मैने शमशान घाट पर चिता में जल चुके शरीर के अवशेष फूलों की मानिंद उस कमरे से वह आधी अधूरी पेंटिंग, खाली कैनवास और चित्रकला की किताबें और रंग तथा ब्रशों से भरा पैकेट चुनकर उठाया और उसे अपनी कार में डालकर एक बार भारी मन से उस घर की ओर देखा जो उस शमशान के चांडालों से घिरा जान पड़ता था।

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