हिंदी के साथ विभिन्न भाषाओँ के सचल तीर्थ वागर्थ आचार्य निशांत केतु जी जिन्होंने साहित्य का अपूर्व भंडार अपने अथक परिशम से साहित्य जगत को दे कर उपकृत किया है उन से डॉ. वेद व्यथित ने उन की रचना प्रक्रिया मूलक कुछ प्रश्न किये हैं जो साहित्य शिल्पी के श्रीद्यों के लिए यहाँ उपस्थित हैं

प्रश्न १ योशाग्नी शीर्षक आप का उपन्यास देश विदेश में खूब चर्चा में आया इस के विषय में मत तथा प्रतिमत बड़ी संख्या में प्राप्त हुए हैं शायद ही ऐसा किसी अन्य उपन्यास के साथ हुआ हो इस की कथा वस्तु के चयन की क्या प्रक्रिया रही और इस पर आप का लम्बा शोध भी रहा होगा तो इस के क्या २ अनुभव रहे ?

उ० योशाग्नी की भूमिका में मैंने इस की रचना प्रक्रिया के सम्बन्ध में विस्तार से लिखा है वहाँ मैंने स्पष्ट किया है कि इस का मूलाधार' काम' है काम से निष्काम की यात्रा होती है कामना और कमानियों के नाम और रूप मिलते हैं काम की निंदा भी की गई है प्रशंसा भी की गई है पुरुषार्थ चतुष्टय में जो क्रम है उस में काम का स्थान तीसरा है ठीक मोक्ष के पूर्व किन्तु काम को इतना दबा कर छिपा कर रखा गया कि वह अपराधिक बन कर रह गया जिस से लाभ के स्थान पर उस से सौ गुना हानि समाज को झेलनी पदी काम से राम भोग से योग अथवा सेक्स से सैल्वेशनकी यात्रा है उस में तांत्रिक पथिकों की अपनी विशेषता व महत्ता है काम के समय तीन ही प्रकार के आचरण शास्त्रों में उल्लिखित हैं दमन नमन व गमन
इस उपन्यास के माध्यम से वैदिक व तांत्रिक रचनाओं के आधार पर काम यहाँ श्रृंगारित और लाभदायी सिद्ध होता है मैंने उन सूत्रों को एकत्र कर अँधेरे में एक दीपक जलाया है
इस ग्रन्थ की रचना प्रक्रिया का सब से प्रमाणिक आधार है महात्मा गाँधी जी के साहित्य से प्रेरणा सन १९२१ के बात है बारीसाल की ३५० वेशयों ने महात्मा गाँधी को अपनी समस्याएं सुनने के लिए आमंत्रित किया वे वहाँ उपस्थित हुए और उन से १७ प्रश्न किये जिन का 'नव जीवन ' में विस्तार से वर्णन है इस की प्रेरणा वहीं से प्राप्त है उपन्यास की नायिका अपर्णा के द्वारा उस के प्रेमी अंगराग को लिखे गये पत्रों की श्रंखला से भी मुझे प्रभूत प्रेरणा मिली इस सब का समाहार इस उपन्यास में है |


प० २ इस उपन्यास में परिवार व विवाह संस्था पर आप ने अलग ढंग से अपना मत प्रस्तुत किया है जो विवाह संस्था को एक प्रकार से अस्वीकार करता सा प्रतीत हुआ है क्या विवाह संस्था की नई व्याख्या की आवश्यकता है ?

उ० प्रेम , दाम्पत्य , परिवार व विवाह ये चारों शब्दों और इन की व्यावहारिक रूप रेख्यें भिन्न्हें इन में सब से सशक्त ,व्यापक अनादी और अनिवार्य है' प्रेम '|प्रेम का क्षेत्र इतना व्यापक है कि उस के अंतर्गत वनस्पति से पशु पक्षी और मानव से परमात्मा तक सभी सम्मिलित हैं मानव हृदय में प्रेम का भाव स्वाभाविक और जन्म जात है इसे अवरूद्ध या विकृत करने से मानव जीवन अव्यवस्थित एवं विकृत हो जाता है दाम्पत्य भी प्राकृतिक ,स्वाभाविक ,आवश्यक और सामाजिक स्वरूप है संसार में प्रगिक्र्ण के मद्ध्य्म से वनस्पति वर्ग का फलं प्रति फलं होता है और उस की प्रजातियाँ सुरक्षित होती हैं मानव वेग में भी दाम्पत्य की प्रकृति और स्वभाव ,आकर्षण और आवश्यकता ,सामाजिकता व अपेक्षा होती है यहाँ दाम्पत्य के साथ प्रेम प्रेम का अवतं होने लगता है
विवाह एक सामाजिक संस्था है वह जन्म जात स्वभाव अथवा प्राक्रतिक भाव नही है मनुष्य की आवश्यकता और प्राकृतिक आकर्षण के आधार पर पुरुष नारी के प्रति अथवा नारी पुरुष के प्रति सम्मोहित होती है तो स्थायी भाव रति श्रृंगार रस में रूपांतरित हो ने लगती है फिर दाम्पत्य बनने लगता है यहाँ तक तो सब कुछ स्वाभाविक है किन्तु विवाह की सामाजिक व कानूनी घोषणा स्वाभाविक व प्राकृतिक नही है अत: जो प्राकृतिक नही है वह तो टूटेगा अथवा संशोधित होगा विवाह वेक ऐसी ही संस्था है प्रताड़ित हो कर विवाह का निर्वहन अथवा एक दूसरे के प्रति घृणा भाव रखते हुए वैवाहिक जीवन व्यतीत करना पशुता भी निकृष्ट है मानव समाज में सन्तति सुरक्षा के लिए परिवार एक आवश्यकता है वनस्पति वर्ग व पशुवर्ग सभी स्वत: संचालित जीवन धारा में प्रवाहित होते हैं उन की सन्तति शीघ्र ही स्वब्ल्म्बी हो जाती अहि जब कि मनुष्य की सन्तति को लम्बा समय लगभग १८ वर्ष लगते हैं इस लम्बी अवधि में इसे परिवार ही अच्छी तरह सम्भाल सकता है शारीरिक विकास ,मानसिक संतुष्टि और सामाजिक सम्बन्ध इन तीनो धरातलों पर निरीह मानव सन्तति को परिवार तो चाहिए ही सब से पहले प्रेम फिर दम्प्त्यफिर परिवार और अंत में विवाह इन सब में यदि सामंजस्य दिया जा सके तो यहाँ कोई व्यवधान नही इन में किसी एक छोड़ देने की बात की जाये तो वह विव्ह ही है क्यों कि विवाह भावके साथ मनुष्य उतन्न नही होता इसी पृष्ठ आधार पर मैंने विवाह संस्था पर संशोधन अथवा विकल्प की बात कही है इस स्थापना का एक उत्तम उदाहरन है योशाग्नी उपन्यास |

प्र० ३ बहुत से लोग इस पुस्तक का प्रकट रूप से विरोध भी करते हैं पर प्रच्छन्न रूप से इसे छाती से भी चिपकाये रहते हैं आप की दृष्टि में इस के क्या कारण हो सकते हैं ?

काम को समाज और परम्परा ने बड़ी निर्ममता और नासमझी के साथ कुचला है रति और श्रृंगार तथा प्रेम और आकर्षण प्राकृतिक हैं यह मनुष्य का जन्मजात स्वभाव है इस के उद्दाम वेग और दुर्दमनीय धारा को रोका नही जा सकता इस लिए आवश्यक है कि इस के लिए सहज ,स्वाभाविक और अनुकूल प्रवाह प्थीनता डी जाये जिस वस्तु एवं विचार को प्रतिबंधित किया जाता है उस की और आकर्षण बढ़ जाना मानव स्वभाव है सेक्स को छिपा कर अथवा दबा कर रखने के कारण मानव समाज का एक बड़ा हिस्सा पूरे संसार में एड्स ,उपदंश इत्यादि अनेक रति रोगों से ग्रस्त और विकलांग हो रहा है तथाकथित नैतिकतावादी अंधत्व पूर्ण धर्मिक्तावादी और अविचारित परम्परावादी समजिक्तावादी द्वारा यौनाचार के रहस्य को अंधकार में दुश्परिनामी स्वेछाचार के लिए chhod दिया और बाहर प्रकाश में यह कुचला गया है आवश्यकता इस बात की है कि स्वस्थ ,वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक रूप से यौनाचार का प्रशिक्ष्ण दिया जाये इसे विश्वविद्यालय में एक अनिवार्य प्रशिक्ष्ण का अंग बना देना चाहिए भारत में जिस शिव शिवा के अर्द्धनारीश्वर रूप को उपस्थित किया गया है वह आदर्श और अनुकरणीय है एडम व ईव को जिस वृक्ष का फल खाने को मना किया गया था उस के प्रति उन का आकर्षण इतना बढ़ गया कि वे वर्जित कार्य ही कर बैठे यह उपन्यास यौनाचार ,रति रहस्य व काम पुरुषार्थ के सूक्ष्म रहस्यों को इतनी स्पस्त्ता से व विश्वसनीयता से खोलता है कि इसे एक बार पढना आरम्भ कर देने वाले पाठक निश्चय ही इसे छाती से चिपकाये रखेंगे मैंने अपने व्यक्तव्य में कहा है और यह सच भी है कि कुछ पाठकों ने इसे 'सर्वोल्लासतन्त्र्म 'के सदृश सम्मान सहित लाल कपड़े में बाँध कर पूजा स्थल पर भी रखा है समाज के कुछ बलाकचारी मनुष्यों ने इस उपन्यास का नामोल्लेख भी पाप की श्रेणी में रखा है
भारत में काम देवता माना गया है काम दे जैसा शब्द प्रयोग विपुलता और सारथी के साथ उपलब्ध है काम कभी कुरूप नही हो सकता काम सौन्दर्य का सागर और एश्वर्य का आकाश होता है इस में सुख की संतुष्टि और आनन्द का उल्लास मिलता है इसे दबा कर रखना हिलते हुए फूल पर लोहे का कवच पहनाने जैसा है मेरी लेखकीय दृष्टि में योशाग्नि यदि ज्वाला मुखी का अग्नि सार है तो केसर पतल्श्री का पुष्पोद्यान भी है इस में कृषि कल्प का करिश्न्त्व है तो दूसरी कल्प ओर ऋषि का अनूत्त्रित आध्यात्म भी है इस ग्रन्थ की रसोपचिती के लिए जिस आस्वद्यता की आवश्यकता है उस के लिए एक अभ्यास संस्कार चाहिए जिन लोगों को रस्तम रसल फल आम्र के खाने से वमन हो जाता है उन के सम्बन्ध में मुझे कुछ नही कहना है |




प्र० ४ आप का दूसरा महत्व पूर्ण उपन्यास है ' जिन्दा जख्म ' इस उपन्यास की नायिका माहजबी के रूप में एक यवती ने अपने को साधारणीकृत रूप में घोषित किया है आज के आतंकवादी वातावरण में क्या माहजबी जैसी नायिका मिलना सम्भव है ?
उ० समाज में वस्तुत: दो तरह के लोग होते हैं एक तो वैसे लोग जो नीति नैतिकता ,अनुशासन एयर प्रशिक्ष्ण में बंध कर जीते हैं ऐसे लोग दूसरों के समक्ष अपनी उपस्थिति को बोझिल बना देते हैं दूसरे प्रकार के वे लोग वो होते हैं जो जीवन की धारा और वायु वेग की तरह जीते हैं नदी के तटबंध नहर की तरह पहले से बने बनाये नही होते इसी प्रकार वायु वेग में एयर कंडीशनर की एकतानता नही होती पवन के उनचास वेग रूप होते हैं किस समय और किस स्थल पर वायु वेग का कौन सा रूप उपस्थित हो जायेगा यह कहना कठिन है इस कोटि के व्यक्ति उसी समय निर्णय करते हैं कि क्या किया जाये जब जैसी परिस्थिति उत्पन्न होती है उस के अनुकूल वे आत्म निर्णय करते हैं ऐसे लोग स्वभाव और सहजता में जीते हैं वे किसी पर बोझ बनने की जगह उन से समरस स्वभाव में जीते हैं 'जिदा जख्म 'के दो पात्र ऐश्वर्य कान्त कुंतल और माहजबी ऐसे ही चरित्र हैं जो प्रशिक्षित जीवन के अपेक्षा प्राकृतिक एवं स्वाभाविक जीवन शैली में जीते हैं
परम्परा से प्राप्त दृष्टान्तों का अनुसन्धान किया जाये तो राम व कृष्ण इन दोनों जीवन वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं राम मर्यादा पुरुषोतम हैं जब कि कृष्ण लीला पुरुष नटवर राम वही करते हैं जो न्याय और उचित है कृष्ण इस के विलोम हैं वे जो कुछ करते हैं वही औचित्य और मर्यादा के रूप में स्वीकृत हो जाता हियो दोनों महान हैं अवतारी पुरुष और लोक नायक हैं लेकिन इतना टी सत्य है कि प्रशिक्ष्ण से स्वभाव ,संस्कृति से प्रकृति और चित्त से आत्मा बड़ी है माहजबी एक उच्छल जीवन धारा प्रकृति प्रवाह और उल्लास भाव है इस लिए वह आत्म नन्दिनी के साथ लोक रंजिनी भी सिद्ध होती है यह प्रकृति और स्वभाव के निकटतम है समाज को ऐसे चरित्र की आवश्यकता है समाज में ऐसे चरित्र के दृष्टान्त भी अनेक हैं
आप ने अपने ब्लॉग पर भी एक युवती के चरित्र को प्रस्तुत कर के इस की पुष्टि की है |
जिन्दा जख्म की नायिका को अंत में आप ने आतंकी गोली का शिकार बनवाया है क्या उस का जिन्दा रह कर क्त्त्रप्न्थ से लड़ना जरूरी नही था ?
चौबीस कैरेट सोने से गहने नही बनते गहने के लिए शुद्ध सोने टांकीकी मिलावट आवश्यक है समाज के जो व्यक्ति मिलावट से रहित अपनी आत्मा और बाहर प्रक्रति के साथ जीते हैं समाज उन्हें जीने नही देता सुकरात, जीजस ,महात्मा गाँधी मार्टिन लूथर अब्राहिम लिंकन जून ऍफ़ केनेडी या ऐसे हजारों उदाहरन हैं जिनको समाज ने इस लिए मार दिया कि उन में मिलावट नही टी पारदर्शिता ही उन के लिए अपराध बन गई माहजबी पूई मनुष्यता का प्रतिनिधित्व करने वाली महिला है उस में सौन्दर्य व एश्वर्य दोनों का संयोग है इस उपन्यास के आरम्भ में जो कुछ स्थापनाएं उपस्थित की गई हैं उन आध्यात्म को सर्वोपरी महत्व देते हुए धर्म या मत को अस्वीकार किया गया है संसार में तीन सौ धर्म हैं समाज का समूचा वर्ग तीन सौ खंडों में विभाजित किया गया है इसी प्रकार भाषा ,जाती देश रीति रिवाज ,वेश इत्यादि अनेक आधारपर मनुष्यता खंड खंडित है मनुष्यता का साम्रस्त्यइन खंडों में खो गया है पूरी तरह शुद्ध स्वर्ण ,शुद्धात्मा व्यक्ति ,पारदर्शी झील अप्रदूषित आकाश का अस्तित्व संसार को सह्य नही होता अत: माहाजाबी का आतंकी गोली का शिकार होना स्वाभाविक है ऐसे व्यक्तियों के प्रति समाज आतंक का विस्फोट करता है आतंक और भी दोनों ही पशुता हैं
एक बाघ आतंक फैला कर मृग का शिकार कता है और मृग भयभीत हो कर भागता है दोनों पशु धर्म और गुण हैं ऐश्वर्य कान्त कुतल और माहजबी दोनों पशुता के पर्याय आतंक के विरुद्ध संघर्ष करते हैं परिणामत: ऐश्वर्य कान्त कुंतल विकलांग बना दिए जाने पर पीड़ा का जो मार्मिक प्रसंग उत्पन्न होता है वह हजार हृदयों में सैदेव सुलगता रहता है यदि वह जीवित रह पाती एयर संघर्ष करती रहती तो ऐसा प्रभाव उतन्न नही हो पता इस लिए माहजबी का शहीद होना ही स्वाभाविक है |
इस उपन्यास के नायक ऐश्वर्य कान्त कुंतल का कट्टर पन्थ से लड़ने के लिए पाकिस्तान चले जाने का कार्यक्रम कहाँ तक उचित है पाकिस्तान के कट्टर वातावरण में उनके क्या कार्यक्रम होंगे और उन की क्रियान्विति कैसे होगी इस बात का उपन्यास में उल्लेह नही है ?
कथा साहित्य में सभी बातें खुलकर नही लिखी जाती प्रसंगों के आधार पर प्रच्छन्न तत्व तथा कतहा श्रृंखला को समझने की आवश्यकता होती है दूसरी बात यह है कि जो आत्मोपलब्ध व्यक्ति होते हैं वे कार्यक्रम और प्रकल्प बना कर नही जीते वे जहां उपस्थित होते हैं वहीं उस स्थान ,काल और समस्या के आधार पर समाधान उपस्थित करते हैं जो उन की आत्मा की आवाज होती है सभी बुद्ध पुरुष ऐसा ही करते है अकास में म्द्रते बादलजिस स्वछंदता और आत्म वृति में जीते हैं वह किसी अनुशासन अथवा पूर्व निर्धारित परिनियमों से बंधा नही है स्वछन्द ही छन्दस सौन्दर्य बन जाता है किसी भी देश और काल की इकोलोजी से वह समरस हो कर वहीं बरस जाता है यही पर्जन्य स्वभाव व पर्जन्य सिद्धांत है पर्जन्य आकास के फलक पर सौन्दर्य के विभिन्न दृश्य उपस्थित करते हैं वहाँ व्र्संत में इंद्र धनुष भी उगते हैं जैसे सबों के लिए उन्मुक्त आनन्द का आमन्त्रण टोरं द्वार |ऐश्वर्य कान्त कुंतल पर्जन्य पुरुष हैं वे कभी किसी बंधन में नही होते देश की सीमाएं उन की दृष्टि में निरर्थक हैं वे हिन्दू मुसलमान जैसा भेद भाव भी नही मानते हिन्दू मुसलमान या इसी कहे जाने से पहले वे क्या थे कवक एक शुद्ध और पारदर्शी मनुष्य और मनुष्यता इसे लोग वेद और पूरण पढ़ कर नही जीते वर्ण जी कर वेद और पूरण की रचना करते हैं वे अगर पाकिस्तान जा आतंक के उन्मूलन के लिए काम करना चाहते हैं तो हम इसे करुणा का क्षैतिज विस्तारं मानेगे यही 'करुणा एव एको रस: 'सिद्धावस्था में पहुंचा हुआ सूत्र बन जाता है भ्रमों का आवरण टूटने पर पारदर्शी मनुष्य का अवतरण होता है प्रकृति ने पृथ्वी बनाई है जिस पर सबों का अधिकार है हवा भी एक ही है जिस में सभी साँस लेते हैं अग्नि की ऊष्मा और आकाश का विस्तार भी सबों के लिए समान है समाज ने खंडन की परम्परा बनाई और लोगों ने टुकड़ों में जीने के लिए लाचार कर दिया ऐश्वर्य कान्त इस का विरोध करते हैं उन के लिए हिन्दुस्थान पाकिस्तान का बंटवारा और हिन्दू मुसलमान जैसा विभाजन बेमानी है वे अविभाजित भूगोल और अखंडित मनुष्यता में आस्था रखते हैं इसी अंड में वे पाकिस्तान जाते हैं राष्ट्र और धर्म के आवरण के पहले जिस अराष्ट्र और धर्म साहित्य का अस्तित्व था वही मानव वंश की आपेक्षित प्रकृति है |

प्र० हिंदी साहित्य में बहुत से साहित्य आन्दोलन चले ,पर काफी समय से एक खालीपन का अनुभव हो रहा है उत्तर आधुनिकता वादी अपना स्वरूप निर्धारित नही कर सके कुछ उपयोगिता वादी .यथार्थ वादी भी साहित्य में अपना स्थान नही बना पाए आप को क्या लगता है ?निकट भविष्य में साहित्य की २ आन्दोलन देने वाला है ?

उ० आप ठीक कह रहे हैं हिंदी साहित्य में उत्तर आधुनिकता के धरातल पर कोई उल्लेखनीय आन्दोलन क्रांति या हलचल नही हुई पहले धर्म ने साहित्य को अनुगामी बनाया था बाद में राजनीति ने विज्ञानं के प्रभाव ने भी साहित्य की धारा में बाधा उत्त्पन्न की है पत्र साहित्य भी साहित्य के अंतर्गत एक महत्व पूर्ण विधा है मोबाईल के व्यापक प्रचार ने पत्र लेखन को भी प्राय: स्प्माप्त ही कर दिया है गाँधी जी के पत्र आचर्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ,आचर्य शिव पूजन शय और नलिन विलोचन शर्मा के पत्र हिंदी साहित्य की धरोहर हैं ऐसे और भी पत्रिक साहित्य हिंदी में उपलब्ध हैं इंटरनेट ,डाट कॉम ,ब्लॉग ,लैपटाप कम्पुटर इत्यादि ने क्रांति उपस्थित की है ग्रन्थ पुस्त्काल्ट और वाचनालय एक सीडी के माध्यम से जेब में समा जाते हैं कलम के निर्माण और विक्रय पर भ चोट आई है अब उँगलियाँ कलम पकड़ने की जगह कम्पोज करती हैं तात्विक शोध की एक स्वस्थ्य परम्परा रही है जिस को बहुत ही शिथिल किया गया है नेट पर बहुत सारी सूचनाये बहुत से ग्रन्थों से ले कर एकत्र कर दी जाती हैं मूल ग्रन्थ का साक्षात् किये बिना इंटर नेट के सहारे शोध सम्पन्न कर लना बिलकुल अधूरापन है यह ठीक है कि उत्तर आधुनिकता के इस काल में श्रेष्ठ रचनाएँ नही हो रही हैं समय आभाव व झितित के इस युग में हर चीज छोटी होती चली जा रही है बाजार वाद और शीग्रता के इस युग में न तो कोई अभिज्ञान शाकुंतलम पढ़ता है न राम चरित मानस न रामायण न ही महाभरत न बालजाक पढ़ता है न ही सेकश्पीयर जो मूल का आनन्द ऐ उस से व्यक्ति वंचित रह जाता है
यद्यपि यह बोनापन का युग है किन्तु प्रज्ञा का घनत्व घटा नही है कोई वामन ही विरत बन जाता है बिंदु सिन्धुत्व धारण कर सकता है एक प्रकार से सूत्र शैली का इसे पुनर्जागरण कह सकते हैं |

प्र० क्या साहित्य को वाद से उपर उठ कर मानवीय स्म्वेद्नायों के अधिक निकट होना चाहिए था या वाद में फंसना चाहिए या तथाकथित मठाधीशों के चंगुल से साहित्य को बाहर रहना चाहिए?

उ० आप की चिंता स्वाभाविक है वाद ग्रस्त और मठाधीशों का शरण आश्रय दोनों ही गलत हैं बिना उन्मुक्ति और स्वछंदता के विराट और सनातन कार्य नही हो सकता ,किन्तु विचारक और आलोचक प्रत्येक रचनाकार को किसी न किसी वाद में बांध कर ही देखना चाहते हैं किसी रचना कार का उस की स्वतंत्र गुणवत्ता के आधार पर उस का मूल्यांकन सचमुच कठिन काम है इस से उन्हें सहूलियती होती है फिर निश्चय ही इस प्रक्रिया के द्वारा वे निष्पक्ष मूल्यांकन नही कर पाते हैं तटस्थ मूल्यांकन और विश्लेष्ण का यहाँ आभाव है
यहीं प्रतिबद्धता का प्रश्न उठता है यदि कोई प्रतिबद्ध है तो वह वाद से बद्ध है अथवा वाद्ब्द्ध है तो स्वाभाविक वह प्रतिबद्ध है वाद शेष को अशेष से खंडित कर अलग कर देता है वहाँ समूचा पन नही होता जहाँ तक साहित्य का प्रश्न है यह भाव समरस दृष्टि ,निर्वाद बोध निश्प्र्तिब्द्ध नीति और मूल सौन्दर्य शिल्प के साथ संयुक्त और सम रस है अपने को कंद कर खड़ा कर लेने से अखंडता का विराट लोक नही दीखेगा घटाकाश का घेरा जब तक नही टूटता तब तक महाकाश की अनुभूति नही होती इस के लिए कुछ करना नही होता यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है घटाकाश टूटते ही महाकाश उपलब्ध हो जाता है

प्र० आज दलित साहित्य की चर्चा जोरों पर है इस में भी कुछ मठाधीशों से ही कहना पूर्ति हो रही है क्या साहित्य को भी नागरिकों की भांति उदासीन रहना चाहिए स्वयम दलित, महिला अल्पसंख्यक आदि अपने खेमे से बाहर जा रहे हैं इस पर आप के विचार ?

उ० दलित और अदलित जैसा विभाजन रचना कार और साहित्य दोनों के लिए खतरनाक है साहित्य का अर्थ ही होता है सब के साथ सामरस्य वहाँ एकत्व ,विश्व्त्व एवं सनातनत्व की भावना प्रबल होती है वहाँ कोई भेद भाव नही होता वहाँ रागद्वेष की भवना उत्पन्न नही होती जब हम अखंड से खंड को कट कर कहीं खड़ा कर देते हैं बगीचा से फूल तोड़ कर ड्राइंग रूम में सजा देने से पूरा बगीचा उपस्थित नही होता
संत कवि रविदास बेशक किसी भी जाती से सम्बन्धित थे परन्तु उन्होंने 'प्रभु जी तुम चन्दन हम पानी 'जैसी मार्मिक पंक्ति लिखी है क्या हम उसे दलित साहित्य माने और कवि को दलित कवि ?संत कबीर जुलाहा थे उन के साहित्य में साहित्य को क्या दलित वर्ग में ही रखना होगा ?फिर यह निर्देश भी उपस्थित करना होगा कि इसे केवल इसे दलित लोग ही पढ़ें दलित और द्लितेतर साहित्य का बंटवारा अमानवीय एवं लघु चिन्तन का परिणाम है मैं इस अप्राकृतिक एवं अस्वाभाविक विभाजन के दृष्टिकोण के विरूद्ध हूँ |
प्र० क्या प्रश्नोत्तर को साहित्य की एक स्वतंत्र विधा में स्वीकार किया जाना चाहिए ?

उ० प्रश्नोत्तर वांग्मय की प्राचीनतम विधा है तुटली आवाज में एक नन्हा सा बच्चा एक पक्षी को देख कर अपने पिता से पूछता है ,यह क्या है ? अनुभवी पिता उत्तर देता है और बालक ग्यानाब्द्ध होता चला जाता है यही क्रम गुरु शिष्य के बीच में चलता है फिर समाज के धरातल पर व्यक्ति विभिन्न समस्याओं के बीच उन के समाधान के लिए खड़ा होता है तब प्रश्नोत्तर का व्यवहारिक क्रम बनने लगता है प्रश्न से उत्तर निकलते हैं समुद्र मंथन होने पर चौदह रत्न निकले थे यह ठीक है कि सभी रत्न समुद्र में विद्यमान थे किन्तु उन का उद्भव व प्र्क्तिक्र्ण समुद्र मंथन से ही हुआ था महाभारत में यक्ष प्रश्न के अंतर्गत १२६ प्रश्न और उन के उत्तर दिए गए हैं यह प्र्शोत्तर आज भी ज्ञान वर्धक हैं महाभरत के गीता खंड में भी प्रश्नोत्तर विधान है या तो धृत राष्ट्र संजय से प्रश्न करते हैं अथवा अर्जुन कृष्ण से संस्कृत के अनेक सुभाषित ग्रन्थ इसी प्रश्नोत्तर शैली पर आधारित हैं प्रश्नोत्तर शाश्त्रर्थ का ही सुनियोजित रूप है इसे साहित्य की सशक्त और अपरिहार्य विधा के रूप में स्वीकार कर लेने में कोई आपति नही होनी चाहिए |


प्र० वर्तमान साहित्य जगत के लिए आप के क्या संदेश और आशीर्वाद हैं ?

सच पूछिए तो साहित्य का पाठक किसी संदेश और आशीर्वाद की अपेक्षा नही रखता जो भी हम से ऐसी अपेक्षा रखते हैं उन्हें मेरे साहित्य से गुजरना होगा संदेश और सुभकामना सब कुछ वही उपलब्ध हैं संदेश और शुभकामना प्रकट करने वाले ऊंचाई पर बैठ जाते हैं और श्रोता पर बोझ बन जाते हैं सच्चा साहित्यकार कभी किसी पर बोझ नही बनना चाहता वह समरस होना जनता है उस की प्रकृति असम्बद्ध और स्वच्छंद की होती है धर्म गुरुओं और संत परम्परा में उपदेश की परम्परा है साहित्य में तो हद से हद "कन्तासम्मितात्योप्देश्युजे "का स्वरूप माना जाता है रचना कार सभी भूत (मानव ,पशु पक्षी ,वनस्पति )इत्यादि पर अपने स्व का विस्तारं कर फ़ैल जाता है और फिर अपने भीतर समान रूप से सब को स्थान देने वाला व्यक्ति साहित्यकार बन जाता है ईशोपनिषद की पंक्ति है

यस्तु सर्वाणि भूतान्यत्म्न्ये वानुप्श्यती
स्र्व्भूतेशु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते

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