अभी विश्वकप क्रिकेट का दौर चल रहा है। खिलाड़ी जो प्रदर्शन कर रहे हैं, वो जैसा भी हो, मगर हर कोई अपना राग अलाप रहा है। स्थिति तो ऐसी हो गई है कि जितने मुंह, उतनी बातें। विश्वकप कोई भी टीम जीते, लेकिन जुबानी जमा खर्च करने में हर कोई माहिर नजर आ रहे हैं। यही कारण है कि क्रिकेट की किचकिच में देश का हर मुद्दा चर्चा से गायब हो गया है। फिलहाल क्रिकेट में सब उलझे हुए हैं। जब क्रिकेट की बात शुरू होती है तो क्रिकेटेरिया के हर बाहरी खिलाड़ी अपने तर्क का हथौड़ा लगाने तथा बातों-बातों में दो-दो हाथ आजमाने से नहीं चूकते।

एक दिन पहले की बात है, मैं घर से निकल रहा था। देखा, पड़ोस के एक मकान में लोगों का मजमा लगा है। पूछने पर पता चला कि विश्वकप क्रिकेट का मैच चल रहा है। घर के एक छोटे से कोने में टीवी चल रही थी और जहां दो कुर्सियां लगानी मुश्किल है, वहां एक-दूसरे पर, पैर पसारे कई लोग क्रिकेट के बुखार में तप रहे हैं। ऐसा लगा, जैसे वह घर न होकर क्रिकेटेरिया का गढ़ बन गया हो। बात यहीं खत्म नहीं होती, क्रिकेट मैच चल रहा है, किन्तु हर किसी के अपनी बानगी है। क्रिकेट की दीवानगी इस कदर छाई है कि न भूख की चिंता, न प्यास की। मुंह से निकली एक-दूसरे की बातों से ही भूख मिट रही है। कई तो ऐसे हैं, जो सुबह घर से निकले तो फिर देर रात घर पहुंचते हैं। पूरे दिन क्रिकेटेरिया निशाचर होकर रह गए हैं।

घरेलू क्रिकेटेरिया में ऐसे लोगों का मजमा देखकर मुझे हैरानी हुई कि जिन्हें क्रिकेट की एबीसीडी मालूम नहीं है, वह भी आंख गड़ाए ताक रहा है ? केवल इतना देख रहा है कि कोई सामने खड़ा व्यक्ति लकड़ी का पाटा पकड़ा हुआ है और कई लोग उसकी ओर निहार रहे हैं। दूसरी छोर से एक व्यक्ति दौड़ रहा है और अपने हाथ में रखी गोलनुमा कोई चीज फेंक रहा है। बातों-बातों में उसे पता चलता है, जिसे पूरी ताकत लगाकर फेंकी जा रही है, उस ना चीज को गेंद कहते हैं। इस खेल में भी गेंदा को ही क्रिकेटेरिया में घूमने की पूरी छूट है और इस हाथ से उस हाथ में मसलाने का भी सौभाग्य उसे ही मिला हुआ है ?

इस बीच मैं सोचने लगा कि हम भी तो ऐसी किसी गेंद की तरह हैं, जिसे एक धड़ा फेंकता है तथा दूसरा धड़ा जहां चाहता है, वहां उठाकर रख देता है, नही तो पटक देता है। मन किया तो सुध ले ली, नहीं तो भाड़ में जाए...। फिर ध्यान में आया कि खिलाड़ियों पर प्रशंसकों की पैनी निगाह होती है, वह कितना रन बना रहा है ? गेंदबाज कैसा कमाल दिखा रहा है ? फिल्डर तंदुरूस्त कितना है? साथ ही मैदान के बाहर भी खिलाड़ियों के कई मार्गदर्शी होते हैं, लेकिन एक बात है कि देश की सत्ता चलाने वाले जो खिलाड़ी तैनात हैं, उन पर क्या कोई इतनी पैनी निगाह रखता है? जो चल रहा है, अच्छा है, चलने दो, मेरा क्या जाता है? ऐसा ही कुछ माहौल, क्यों न क्रिकेट में भी रहने दिया जाए ? वहां खिलाड़ी खेलते रहें और हम जिस तरह सत्ता की किचकिच से खुद को किनारे किए हुए हैं, कुछ उसी तरह क्रिकेटेरिया से भी परहेज कर लें। अभी के हालात में शायद किसी को मेरी यह बात अच्छी न लगे, क्योंकि हर कोई क्रिकेट की किचकिच में उलझा हुआ है तथा बातों का ताना-बाना बुनने में जुटा हुआ है। क्यों न, क्रिकेट की किचकिच पर भी कोई पुस्तक लिखा जाए। शायद अब इसकी जरूरत नहीं लगती, क्योंकि खुलासे के लिए विकीलीक्स है न...। जो हर दिन धमाकेदार खुलासे कर चौके पर चौके जड़ रही है।

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राजकुमार साहू
लेखक व्यंग्य लिखते हैं

जांजगीर, छत्तीसगढ़
मोबा - 098934-94714

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