गतांक ['शूद्रों की खोज'', एक विमर्श (भाग-1)] से आगे

शूद्रों की उत्पत्ति का ब्राहम्णी सिध्दान्त - 2

इस अध्याय में लेखक अन्य वैदिक साहित्य में 'पुरूष सूक्त' से संबंधित ऐसे आनुषांगिक साक्ष्यों की तलाश करता है जो शूद्रों की समस्या से संबंधित है। इसमें कृष्ण एवं शुक्ल यजुर्वेद शपतथ ब्राहम्ण एवं तैत्तिरीय ब्राहम्ण से साक्ष्यों का अंकन है। इस अध्याय का समापन मैक्समूलर के ब्राहम्ण साहित्य के विषय में इस कथन से होता है - ''ये सारी अटकलें सचमुच मंदबुध्दियों का अनर्गल प्रलाप और पागलों की बड़बड़ है और इसीलिए एक मानवीय समस्या की एक प्राकृतिक व्याख्या की खोज में लगे इतिहास के विद्यार्थी के लिए ये किसी काम की नहीं है।

शूद्रों की उत्पत्ति का ब्राहम्णी सिध्दान्त - 2

अब हम शूद्रों की सामाजिक हैसियत संबंधी, ब्राहम्णी दृष्टिकोण की बात करं तो हमारा ध्यान अयोग्यताओं की एक लम्बी सूची पर जाता है और उसके साथ दिखाई देती है पीड़ा और दण्ड की एक दारूण व्यवस्था जिसका शिकार ब्राहम्णी विधिकारों ने शूद्रों को बनाया है''। इस प्रस्तावना के साथ लेखक विविध ब्राहम्णी साहित्य में शूद्रों के लिए कठोर दण्डव्यवस्थाओं का उल्लेख करता है। जिन ग्रंथो के सन्दर्भों का उल्लेख किया गया है वे हैं - काठक संहिता, मैत्रायणी संहिता, आपस्तम्ब धर्मसूत्र, विष्णु स्मृति, वसिष्ठ धर्मसूत्र, मनुस्मृति, गौतमधर्मसूत्र, बृहस्पति धर्मसूत्र आदि।

एक विशेष बात जो लेखक ऐतरेय ब्राहम्ण का प्रसंग उल्लिखित कर कहता है - आश्चर्य तब और भी बढ़ जाता है जब यह स्मरण किया जाता है कि प्राचीन ब्राहम्णी साहित्य में प्राचीन भारतीय आर्यों के समाज में शूद्र नहीं बल्कि वैश्य ही उत्पीड़ित जाति थी''। (इसी अध्याय के पृष्ठ 63 पर)

डा0 अम्बेडकर इस अध्याय में एक अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न उठाते हैं'' - शूद्र को त्रैवर्णिकों के नीचे रखा गया है और त्रैवर्णिकों से उसकी तुलना की गई है। इस स्थिति में सभी त्रैवर्णिकों को समान अधिकार मिलना चाहिए। किंतु तथ्य क्या है ? तथ्य ये है कि क्षत्रिय और वैश्व कों शूद्रों के विरूध्द कोई उल्लेखनीय अधिकार नहीं मिले ? जिस त्रैवर्णिक को विशेषाधिकार प्राप्त है वह अकेला ब्राहम्ण है। (इसी अध्याय का पृष्ठ 64)

लेखक शूद्रों की अयोग्यताओं को लेकर ब्राहम्णों पर प्रश्न करते हुए रोमन व्यवस्था से ब्राहम्णी संहिताओं द्वारा शूद्रों पर थोपी गयी अयोग्यताओं की तुलना करते हैं और निष्कर्षत: कहते हैं - ''अयोग्ताओं को थोपा जाना इतना अत्याचार पूर्ण नहीं होता। किंतु ब्राहम्णी विधान केवल अयोग्ताएं ही नहीं थोपता, बल्कि यह तो उन स्थितियों को जड़कर देने का प्रयास करता है और इस प्रयास में उसने उन स्थितियों के उल्लंघन को एक ऐसा अपराध बना दिया है जिसके उल्लंघन का दण्ड अत्यन्त कठोर है।'' (इसी अध्याय के पृ0 73 पर)

शूद्र बनाम आर्य - 4

यह अध्याय इतिहास के छात्रों अथवा इतिहास में रूचि रखने वालों, दलित चिंतकों, सेकुलर इतिहासकारों के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं। इस अध्याय में डा0 अम्बेडकर जिन प्रश्नों पर विचार करते हैं : वे हैं :-

1- वैदिक साहित्य की रचना करने वाले आर्य प्रजाति के थे।
2- यह आर्य प्रजाति भारत में बाहर से आई थी और उसने भारत पर आक्रमण किया।
3- भारत के मूल निवासी दास व दस्यु कहलाते थे तथा उनकी प्रजाति आर्यों से भिन्न थे।
4- आर्य गोरे रंग के थे दास व दस्यु काले थे।
5- आर्यों ने दास व दस्यु को पराजित किया।
6- पराजित होने वाले पराजित होने के बाद गुलाम बना लिए गए और शूद्र कहलाए।
7- आर्य लोग चमड़ी के रंग के बारे में पूर्वाग्रह ग्रस्त थे इसलिए उन्होने चार्तुवर्ण्य व्यवस्था कायम की और इसके अन्तर्गत गोरी प्रजाति (नस्ल) को काली प्रजाति जैसे दास और दस्यु से अलग कर दिया।

प्रश्न (1) पर डा0 अम्बेडकर पाश्चात्य विचारकों प्रो0 रिप्ले और प्रो0 मैक्समूलर के मतों पर विचार करते हुए अपना मंत्वय इन दोनो का खण्डन करते हुए रखते हैं - ऋग्वेद में दो शब्द आए हैं एक अर्य, दूसरा आर्य। अर्य शब्द 88 बार प्रयोग हुआ है और इसका अर्थ है - (1) शत्रु के अर्थ में (2) सम्मनीय व्यक्ति के अर्थ में (3) भारत के नाम के रूप में (4) स्वामी वैश्य अथवा नागरिक के रूप में।

आर्य शब्द 31 बार प्रयोग हुआ है और किसी में भी इस शब्द का प्रयोग प्रजाति के रूप में नही हुआ है।

इस चर्चा से एक निर्विवाद निष्कर्ष निकलता है कि वेद में आने वाले 'अर्य' और 'आर्य' शब्द का प्रयोग प्रजाति के अर्थ में बिल्कुल नहीं हुआ है।

प्रष्न 2/3- आर्यों का भारत पर आक्रमण व बाहर से आना

लेखक प्रो0 आइजक टेलर, बेनके, मान्यवर लोकमान्य तिलक, श्री पी.टी. अयंगर आदि के मतों का विद्वतापूर्ण खण्डन करते हुए अपना मत रखते हैं - ''ऋग्वेद के इन कथनों के आलोक में इस सिध्दान्त के लिए स्पष्ट ही कोई जगह नहीं है कि आर्य प्रजाति ने दासों और दस्युओं की अनार्य प्रजातियों पर सैनिक विजय हासिल की।'' पढ़ने-पढ़ाने वाला संपूर्ण भारतीय इतिहास का महल ही डा0 साहब ने गिरा दिया।

3- दास, दस्यु और शूद्र -

डा0 साहब का कथन है कि जो लोग दास दस्यु शब्दो को प्रजाति के रूप में मानते हैं वे इन दो परिस्थितियों (शब्दो) को आधार बनाते हैं। (1) ऋग्वेद में मृद्यावक और (2) अनास शब्दो का प्रयोग दस्युओं के विशेषण के रूप में हुआ है। (2) दासों को कृष्णवर्ण का बताया गया है। इन शब्दो के दो व्याख्याकार हैं :-
मैक्समूलर सायणाचार्य

मृद्यवाक प्रजाति का अंतर मानते हैं असभय, अपरिष्कृत भाषा बोलने वाला
अनासा अ+नासा - बिना नाक वाला अन+असा = ”

डा0 अम्बेडकर सायण को स्वीकार करते हुए दासों अथवा दस्युओं को एक अन्य प्रजाति मानने से इनकार कर देते हैं। भारत में पढ़ाये जाने वाले इतिहास का एक खम्भा और ढहा।

4- डा0 अम्बेडकर उपरोक्त विषयों पर पाश्चात्य सिध्दान्तों के ढह जाने का कारण अनुमानों पर टिका होना, वैज्ञानिक अनुसंधान का विकृत रूप होना, और पूर्वकल्पित होना मानते हैं।

डा0 अम्बेडकर यह भी बताते हैं कि आर्यों के आक्रमण का सिध्दांत डा0 बॉप की पुस्तक ''क्म्परेटिव ग्रामर (1835) में यूरोप और एशिया की भाषाओं के साझा उद्गम के सिध्दान्त से निकला। डा0 अम्बेडकर इस सिध्दान्त व उसके आधार पर आर्य प्रजाति को मानना अनुमान है। इस अनुमान को सही ठहराने के लिए ''आक्रमण का आविष्कार हुआ। इसके आधार पर योरोपियन ने दास दस्युओं पर आर्यों के विजय की कहानी गढ़ी। अपने पूर्वाग्रहों के कारण ''रंग संबंधी सिध्दान्त'' गाढ़ा और इसका प्रमाण चातुवर्ण्य में खोजा।

लेखक का मत है - आर्य लोग बाहर से आए और उन्होने भारत पर आक्रमण किया, इसका प्रमाण नहीं है, और यह भी गलत है कि दास और दस्यु आदिम जनजातियां हैं। (पृ0 89)

आर्य प्रजाति वाले सिध्दान्त के प्रचलन के बाहर न होने का कारण डा0 साहब यूरोपियन द्वारा ''वर्ण'' को रंग मानने का पूर्वाग्रह और ब्राहम्णों द्वारा इस मत को समर्थन दिया जाना मानते हैं।'' डा0 साहब वर्ण शब्द का ऋग्वेद और जेंद अवेस्ता के तुलनात्मक अध्ययन के बाद इसका अर्थ आस्था, मत, सिध्दान्त अथवा विश्वास मानते हैं न कि रंग।

पाश्चात्य सिध्दान्त की भीमांसा से डा0 अंबेडकर जो निष्कर्ष ग्रहण करते हैं, वे हैं :-

1- वेद तो आर्य जैसी किसी भी प्रजाति से अनभिज्ञ हैं।
2- वेंदों में इसका कोई प्रमाण नहीं है कि आर्य प्रजाति ने भारत पर आक्रमण किया था और भारत के मूल निवासी माने जाने वाले दासों और दस्युओं को अपने अधीन कर लिया।
3- इस बात का कोई प्रमाण नहीं कि आर्यो और दासों-दस्युओं के बीच का अंतर प्रजातिगत था।
4- वेद इस तर्क की पुष्टि नहीं करते कि आर्य लोग दासों और दस्युओं से भिन्न रंग के थे।

अगले अंक में जारी.. 

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