यह केदार जी का शताब्दी वर्ष है। केदार के चिंतन को आज के संदर्भ में कैसे समझा जाए, उसके भीतर ऐसे सूत्र कहां से तलाशे जाए कि केदार आज के लिए ज्यादा प्रासंगिक हो जाए या आज के समय के सरोकारों से केदार की कविता गहरे से संवाद कर सके। वह सामाजिक विषमता हो या समाज की अन्या अन्य समस्या हो केदार की कविता बच्चे द्वारा फेंका गया वह कंकड है जो अनंत काल को कंपा देता है। यह पुस्तक केदार के साथ लम्बे समय तक जुड़े रहे, वर्तमान में केदार शोध पीठ के सचिव और कवि नरेन्द्र पुण्डरीक द्वारा संपादीत है। इसमें केदार की वे कविताएं ली है जिनसे केदार की समग्र द्रष्टि को समझने में आसानी रहे। तकरीबन पच्चीस वर्ष पहले रामविलासजी ने केदार जी पर एक लम्बी भूमिका के साथ पुस्तक का संपादन किया था। वह पुस्तक केदारजी को समझने के लिए बहुत ही उपयोगी है। लेकिन जैसा कि रामविलास जी की अपनी द्रष्टि है उसके कारण उसमें केदार की राजनीतिक कविताएं ही केदार की द्रष्टि का प्रतिनिधित्व करती है। इस पुस्तक में यह देखने का प्रयास किया है कि केदार की समग्रता कहां है। वे प्रकृति प्रेम जीवन संघर्ष ,जीवन के राग के रचनाकार है। वे निरंतरता में परिवर्तन के कवि है। वे संक्रमण के कवि है।वे अपने समय में रुपान्तरण के कवि है। बसंत के कवि है। चुनौती देनेवाले चुनौती लेनेवाले कवि है। पुण्डरीक जी ने संपादन में किसी तरह की कालक्रमता नहीं बनायी, उन्होंने केदार की प्रतिनिधि कविताएं ली हैं। केदार की कविता बंसती हवा। क्या जीवन के राग की कविता है। मनुष्य के स्वच्छंद विचरण की कविता है। मनुष्य और प्रकृति के संगीत की कविता है। केदार की इस कविता में मनुष्य की प्रकृति के साथ जो स्वच्छंद कल्पना है वह जीवन का संगीत है। वहां थाप है जिसका राग प्रकृति का राग है मनुष्य का राग है। वहां कुंठा नहीं हैं। मांझी का संगीत है। केदार का काव्य राग जीवन की संघर्षधर्मिता से पैदा हुआ मानव मुक्ति का राग है।

कविता की यह पुस्तक केदार के कई पक्षों को एक साथ अभिव्यक्त करती है। यहां केदार अनास्था पर लिखे आस्था के शिलालेख है तो वे मृत्यु पर जीवन की जय की घोषणा करते है। वे किसी भी तरह से अपने में सिमटते नहीं। अपने को बाहर के समाज के साथ खड़ा किये हुए हैं। कवि कहता है

 ‘‘मार हथोड़ा/
कर कर चोट/लाल हुए काले लोहे को/
जैसा चाहे वैसा मोड़/
मार हथोड़ा/कर कर चोट/
दुनिया की जाती ताकत हो,/
जल्दी छवि से नाता जोड़!‘‘पृसं-49

अपनी कमजोर छवि से नाता तोड़कर ही यह वर्ग अपनी ताकत का अहसास करा सकता है दुनिया मजदूरों एक हो जाओ तुम्हारे पास पाने के लिए सारा जहान है और खोने के लिए कुछ नहीं है। आज अन्ना हजारे के सड़क पर उतरने पर जो जनता सड़को पर आयी है वह जनता की ही ताकत है। केदार उसी जनता को अपनी ताकत का अहसास करा रहे हैं जो अपने पर सबसे ज्यादा भरोसा करती है।

केदार की कविता के कई स्वर हैं। वहां राजनीतिक चेतना की प्रखरता हो या फिर प्रकृति के झंझावात में मानव का झंझावात हो। 

मुझे न मारो/मान-पान से,
माल्यार्पण से/यशोज्ञान से,
मिट्टी के घर से/ निकाल कर 
धरती से ऊपर उछाल कर। पृस-133

केदार पांव दुखानेवाले हैं न कि पांव पुजानेवाले। ऐसे में केदार को यह सब जिसका प्रचलन आजकल बहुत ज्यादा हो गया है। वह सम्मान के नाम पर हो या फिर किसी और तरह से,केदार को यह सब मंजूर नहीं है। वे अपनी धरती पर रहे हैं। वे कविता में ही नहीं जीवन में भी उतने ही प्रगतिशील है। यही वजह है कि केदार की कविता में तप की गहरी आंच है।

‘दुख ने मुझको /जब-जब तोड़ा,
मैंने/अपने टूटेपन को /कविता की ममता से जोड़ा,/
जहॉ गिरा मैं/
कविता ने मुझे उठाया,/
हम दोनों ने/ वहॉ प्रात का सूर्य उगाया।‘पृसं-176

दुख का कवि को तोड़ना और कवि का गिरना और कविता का उसे उठाना, यह मनुष्य के नैतिक पतन की कथा है। जिसके बारे में आचार्य शुक्ल कह गये कि मनुष्य को किसी की जरुरत हो या न हो पर कविता की जरुरत हमेशा रहेगी। जिससे कि वह मनुष्य बना रहे। यहां कवि का निहितार्थ वही है। कवि वहीं से गिरने और कविता द्वारा उठाना और वह भी प्रात का सूर्य। मनुष्य का सौंदर्यबोध और उसके भीतर का आभाबोध!

‘‘लिपट गयी जो धूल पॉव से
वह गोरी है इसी गॉव की ,
जिसे उठाया नहीं किसी ने
इस कुठॉव से।‘‘ पृसं-232

धूल और उसका पॉव से लिपटना और उसको किसी ने भी कुठॉव से न उठाना। विमर्शो के इस दौर में केदार उस जमीन पर जाते हैं जहॉ यह गोरी है और वह भी पॉव की धूल के रूप में।

इस संकलन में संपादक ने केदार की कविता को कई खण्डों में विभाजित किया है। प्रेम कविताएं ‘नदी एक नौजवान ढीठ लड़की है‘ शीर्षक के अंतर्गत है। यह तेज धार का कर्मठ पानी है तो यह जिसमें प्रतिवाद है। अज्ञेय कहीं पानी की गति को कामुकता के साथ जोड़ते हैं। केदार के यहां पानी अपने गहरे निहितार्थ में प्रेम की गहराई को व्यक्त करता है। वहां उदासी है तो उसका सम्मान भी है। केदार की कविता में यह नैतिकताबोध बहुत गहरे से पैठा है।

केदार की कविता में जनता के प्रति गहरा लगाव है। जनता के पुछने पर यह कवि हकलाता नहीं है यह साफ कहता कि मैं जन कवि हूं। आज के समय में जितनी समस्याएं सामने आ रही है वे इसी हकलाहट के कारण है। केदार इसको अस्वीकार करते हैं और इसी कारण केदार आपाताकाल का विरोध करते हैं। केदार अपने भीतर एक आलोचक को सदैव जीवित रखते हैं।

दूर कटा है कवि जनता का। यह कवि हथौड़े का गीत गाता है कटाई का गीत गाता है। बुंदेलखण्ड के आदमी का गीत गाता है जिसे आल्हा सुनकर सोने के अलावा कुछ नहीं दिखता जबकि वह हट्टा कट्टा है। वही ऐसी विषमता है कि पैतृक संपति के नाम पर बाप से सौगुनी भूख मिलती है। वह अपने पेट की आग के लिए संघर्ष करे या वह आजादी का जशन मनाये जिसके बारे में उसको कुछ खबर ही नहीं है। उसे क्या मतलब है कि लंदन जाकर कौन आजादी ला रहा है या अमरिका से डालर आ रहा है। उसे अपने पेट की चिंता है। वह परती जमीन जिसका कल तक कोई दाम नहीं था पर वही जमीन आज करोड़ो की हो चली है, उससे उसको क्या मिलने वाला है। वह तो वहीं पर है। बाजार के लुटेरे उसे लुट रहे हैं और वह कुछ नहीं कर सकता। उसको अपनी जमीन से ही बेदखल कर रही है उसी की लोकतांत्रिक सरकार।

हे मेरी तुम में पार्वती के का साहचर्य है जिसको पाकर कवि अपने को जरा मरण से परे कर लेता है। पार्वती की आत्मगंध केदार के बुढापे की बहुत बड़ी ताकत बन जाती है। केदार कहते हैं

 ‘ हे मेरी तुम! सुख का मुख तो/ यही तुम्हारा मुख है/
जिसको मैने,/ इस दुनिया के दुख-दर्पण में,/
अपने सिर पर मौन बॉध कर देखा/
और यह देख कर मुग्ध हुआ;/यह क्यों आज उदास है?‘ पृसं-157

हाथ मनुष्य के श्रम को अभिव्यक्त करते हैं। केदार कहते हैं कि वे हाथ जो कुछ न कर पाये वे हाथ टूट जाये। ‘ 

हाथ जो-/चट्टान को/तोड़े नहीं/
वह टूट जाये/लौह को/मोडे़ नहीं/सौ तार को/जोड़े नहीं/
वह टूट जाये!‘पृसं-261

जो हाथ कुछ नहीं कर सकते उनका टूटना ही श्रेयकर है। सवेरा होते ही जो हाथ कमल की तरह खिल उठते हैं यदि उनमें श्रम का ताप नहीं तो वे किस काम के हैं? जिंदगी को वही गढ़ते हैं जो शिलाएं तोड़ते हैं। केदार के यहां मनुष्य के श्रम का सौंदर्य है। वही समाज की जिंदगी को मोड़ता है।
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पुस्तक: केदारनाथ अग्रवाल चुनी हुई कविताऎं
चयन एवं संपादन-नरेन्द्र पुण्डरीक
अनामिका प्रकाशन इलाहबाद प्रसं- 2011 मूल्य-375

प्रस्तुति: 
कालुलाल कुलमी 
म गां अं हि वि अवि वर्धा

4 comments:

  1. विमर्श में उद्धरणों का चयन अच्छा है।

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  2. केदार को इस तरह याद किया जाना सुखद है। कुलमी धन्यवाद के पात्र हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  3. अच्छी पुस्तक चर्चा.... नरेन्द्र जी को धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं

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