ऐ जिन्दगी हम पे भी मेहरबान दिखाई दे
थोड़े ही सही लेकिन लब खन्दान दिखाई दे

जुनून-ए-तामीर रगो में अब भी जवां है
लिखें नया फसाना गर उन्वान दिखाई दे

किस मोड़ बिछड़ जाए हमसे कोई हमसफर
दूरियां अब न दिलों के दरमियान दिखाई दे

बहुत देख ली इन आंखों में खौफ़ तारी
दुनिया में अब अम्नो अमान दिखाई दे

रफ्ता-रफ्ता बढ़ रही है धूप की ये तल्खियां
लुत्फ़-ए-हयात दूर तलक बे-निषान दिखाई दे

खेंच जाती है रोज़ ग़मों की हज़ार लकीरें
ज़िन्दगी दम-कदम नया इन्तेहान दिखाई दे

ये गर्दिषे-दौरां, है हर नज़र हैरां-हैरां
चेहरों की भीड़ में कोई इन्सान दिखाई दे

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खन्दान: हंसता हुआ
गर्दिषे-दौरां: कालचक्र
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हिमकर श्याम
5, टैगोर हिल रोड
मोराबादी, रांचीः 8

परिचय: वाणिज्य एवं पत्रकारिता में स्नातक। प्रभात खबर और दैनिक जागरण में उपसंपादक के रूप में काम। विभिन्न विधाओं में लेख वगैरह प्रकाशित। कुछ वर्षों से कैंसर से जंग। फिलहाल इलाज के साथ-साथ स्वतंत्र रूप से रचना कर्म। कुमुद सिंह की मैथिली ई पत्रिका समाद से भी संबद्ध।

8 comments:

  1. ये गर्दिषे-दौरां, है हर नज़र हैरां-हैरां
    चेहरों की भीड़ में कोई इन्सान दिखाई दे

    बहुत सुन्दर।

    उत्तर देंहटाएं
  2. गम के समुंदर पार कर लेंगे हौसले से हम
    मगर ये ख़ुदा तेरे तिनके का सहारा दिखाई दे

    उत्तर देंहटाएं
  3. चेहरों की भीड़ में कोई इन्सान दिखाई दे | वाह वाह वाह !!

    उत्तर देंहटाएं
  4. मेरी रचनाओं को पसंद करने के लिए आप सबों का हार्दिक आभार.

    आपका स्नेह और प्रोत्साहन ही मुझे और लिखने के लिए प्रेरित करता है.

    उत्तर देंहटाएं

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