मैं समय की धार में धॅस कर खड़ा हूँ। 

9-10 अप्रैल 2011 महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा द्वारा जन्म शतवार्षिकी पर आयोजित कार्यक्रमों का तीसरा आयोजन केदारनाथ अग्रवाल पर उनकी कर्मभूमि बॉदा में आयोजित किया गया। बॉदा का यह आयोजन केदार शोध पीठ; न्यासद्ध बॉदा और विश्वविद्यालय द्वारा संयुक्तरूप से आयोजन किया गया। ‘बीसवीं शताब्दी का अर्थ: जन्मशती का संदर्भ‘ विषय पर आयोजित इस जन्मशताब्दी वर्ष पर प्रथम सत्र की अध्यक्षता विश्वविद्यायल के कुलपति श्री विभूति नारायण रॉय ने की। इस सत्र में विश्वविद्यालय द्वारा केदारनाथ अग्रवाल पर प्रकाशित पुस्तकों का लोकार्पण किया

गया। इसमें ‘केदार शेष-अशेष‘,;अप्रकाशित रचनाएद्धं‘प्रिय प्रिय मन‘;पत्नी को लिखे पत्रद्ध,‘कविता की बात‘;कविता पर आलेखद्ध,‘उन्मादिनी‘;कहानी संग्रहद्ध,सभी का संकलन एवं संपादन-नरेन्द्र पुण्डरीक ,अनामिका प्रकाशन, इलाहबाद। केदारनाथ अग्रवाल संचयिता-सं-अशोक त्रिपाठी, साहित्य भण्डार प्रकाशन,इलाहबाद साथ ही ‘वचन‘ पत्रिका के केदारनाथ अग्रवाल विशेषांक पुस्तकों का लोकार्पण कथाकार से.रा यात्री, श्री विभूति नारायण रॉय केदारजी की नातिन सुनीता अग्रवाल ,प्रहलाद अग्रवाल और आलोचक और पुस्तकवार्ता के संपादक भारत भारद्वाज ने किया। इसी दौरान हर वर्ष की तरह 2010 का केदार सम्मान युवा कवि पंकज राग को उनके कविता संग्रह‘यह भूमण्डल की रात है‘ पर दिया गया। पंकज राग ने अपने वक्तव्य में कहा कि मैंने कविता की चली आ रही धारा को मोड़ने की कोशिश की है। ठहरे हुए समसामयिक समय को गति देने की कोशिश की है और जो लिखा जा रहा है उसमें वैचारिकता है या नहीं यह बहुत महत्वपूर्ण है। इतिहास के अंत के दौर में विचार का बचा रहना बहुत जरूरी है। 

प्रहलाद अग्रवाल ने अपने वक्तव्य में कहा कि केदार की तुलना यदि किसी से की जा सकती है तो वह नजीर अकबराबादी है। दोनों ने समाज के उस वर्ग पर अपनी कलम चलायी जो अपनी पहचान के लिए सदैव संघर्ष करता है और वह जन मारे नहीं मरता है। आलोचक और पुस्तक वार्ता के संपादक भारत भारद्वाज केदार को याद करते हुए भावुक हो गये। केदारजी के साथ अपने पैतींस वर्ष के पत्राचार को याद करते हुए उनकी लिखी बाते कि ‘अब तो बुढ़ा हो गया हूं ,अब कहीं जाना आना नही होता है।‘ केदार शोध पीठ के सचिव नरेन्द्र पुण्डरीक ने केदार को याद करते हुए बाबूजी की सरलता और सहजता औ स्नेह को हिन्दी कविता की थाती बताया। अध्यक्षा कर रहे कुलपति श्री विभूति नारायण रॉय ने बॉदा में आकर केदार को याद करना दिल्ली में जाकर याद करने से पूरी तरह से अलग और अनूठा है। अपनी वे यादे जो केदारजी के साथ इलाहबाद और गाजियाबाद जो बहसे हुई अनको सांझा किया। पटना में बाबा नागार्जुन को याद करना और इलाहबाद में उपेन्द्रनाथ अश्क को याद करने की कड़ी में बॉदा के इस आयोजन को महत्वपूर्ण बताया। कार्यक्रम का संचालन जन्मशती कार्यक्रम के संयोजक प्रो. संतोष भदौरिया ने किया।

शाम में काव्य पाठ का आयोजन किया। कार्यक्रम का संचालन महत्वपूर्ण युवा कवि पवन करण ने किया। काव्य पाठ में पकज राग,पुखराज जागिड़, नरेन्द्र,ज्योति किरण,अजित पुष्कल, जयप्रकाश धुमकेतु,श्रीप्रकाश मिश्र, अमरेन्द्र शर्मा,पवन करण जैसे महत्वपूर्ण कवियों ने अपनी कविताओं का पाठ किया।

दूसरे दिन प्रथम सत्र का आधार वक्तव्य देते हुए प्रहलाद अग्रवाल ने कहा कि केदारजी भी बुंदेलखण्ड के थे और मैं भी बुंदेलखण्ड का हूँ। केदार अपने स्वभाव के अनुसार सम्मान के लिए कभी लालायित नहीं रहे। वे अपनी काव्य साधना में लगे रहे बिना किसी की परवाह किये। वे केवल नाम के जनकवि नहीं थे वरन उनके जीवन में भी वही सरोकार थे। वे कहीं भी अपने को जनकवि कहने से नहीं हकलाते हैं। केरल से आयी शांति नायर ने कहा कि आज भौगोलिक एवं प्रशासनिक सीमाओं को एक करने का प्रयास किया जा रहा है। केदार ने इस भूमण्डलीकरण के प्रकोप को बहुत पहले पहचान लिया था और आगाह कर दिया था। केदार ने अपनी कविताओं में पूँजीवादी एवं श्रमजीवी संस्कृति को बहुत अच्छ से उकेरा है। जो हाथ सौ तार को नहीं जोडे़ बेहतर है टूट जाए। 

संजीव दुबे ने कहा कि मैं बॉंदा में हूँ यह केदार की जन्मभूमि है कर्म भूमि है। तुलसी की कविताओं में जो लोक मंगल है वही केदार की कविताओं में है। मुल्लों अहिरिन जैसी कविता केदार की लोकजीवन के प्रति अपनी गहरी आस्था को प्रकट करता है। यह विचार करन की बात है कि केदार ने आपातकाल पर कविता नहीं लिखी जबकि केदार का काव्य जिस स्वतंत्रताबोध के साथ अपनी अभिव्यक्ति पाता है वहां यह बहुत बड़ा आघात था कालुलाल कुलमी ने कहा कि केदार की कविता अनाआस्था पर लिखा आस्था का शिलालेख है। वहां जीवनसंघर्ष का गहरा आभास है। केदार की कविता को पढ़ते हुए यह महसूस होता है कि पत्नी उनके यहां प्रेम की मूर्ति है। यह कवि इस खोखली दुनिया में अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए वकालात को अपनाता है वहां वह पूरी निष्टा के साथ काम करता है। आनंद शुक्ल ने कहा कि तुलसी तत्सम के कवि है तो केदार तद्भव के कवि है। वकालात का पैशा केदार की कविता और जीवन का सोता बनता है केदार उसमें जाकर जीवन को बेहतर ढ़ग से देखते समझते हैं यानी वे समाज के ज्यादा निकट जाते हैं और समाज को अधिक रु-ब-रु हो कर देखते हैं। यह केदार की कविताओं में देखा जा सकता है। 

ज्योति किरण ने कहा कि गठरी चोरो की दुनिया में मैंने गठरी नही चुरायी इसीलिए भुक्कड़ शहंशाह हूं तुम्हारा यार हूं तुमसे पाता प्यार हूँ। केदार प्रेम के महान गायक है। उनकी कविता में प्रेम के कई रंग है। महत्वपूर्ण कवि पवन करण ने कहा कि केदार जी को पढ़ना जितना आसान है आत्मसात करना उतना ही कठिन है। नरेन्द्र पुण्डरीक ने कहा कि केदार शमशेर और बाबा नागार्जुन के सम्पर्क में आने साथ ही मार्क्सवादी होते हैं और उनकी जीवन और कविता की द्रष्टि ही बदल जाती है। केदार सम्मान से सम्मानित कवि दिनेश कुमार शुक्ल ने कहा कि मैंने अपने सेवा काल में लगभग चालीस वर्ष पहले केदार को देखा था। केदार लोकजीवन के कवि है। केदार अपने आसपास को बहुत सलीके से जीते हैं। अजित पुस्कल ने कहा कि केदारजी को समझने के लिए के लिए उनके गद्य को पढ़ने की जरुरत है। 

पुस्तक वार्ता के संपादक भारत भारद्वाज ने कहा कि केदार को गद्य और कविता दोनों पर लम्बे समय से चर्चा होती रही है। इसमें केदार के गद्य बात नहीं होती अब केदार का जो साहित्य छपकर आया है उसमें गद्य है इससे केदार का सम्पूर्ण मूल्यांकन संभव होगा। श्री प्रकाश मिश्र ने केदार के उपन्यास पतिया का जिक्र किया और उसके क्रांतिकारी पात्रों के स्वरुप पर विचार रखे। केदार काव्य के संपादक अशोक त्रिपाठी ने केदार के गद्य पर बात रखी और केदार के साहित्य में पत्र साहित्य की गंभीरता को बताया। केदार साहित्य के संपादन के साथ उनकी जीवनी पर काम करने की बात कही। अमरेन्द्र शर्मा ने केदार की पुस्तक‘मित्र संवाद‘ के आधार पर केदार पर के गद्य पर अपने विचार रखे। जयप्रकाश धुमकेतु ने केदार की कहानियों का विशलेषण किया और केदार को अपने गांव कमासिन के आलोक में याद किया। केदार की कहानियों को स्त्रीविमर्श के आलोक में व्याख्यायित किया। महेश कटारे ने केदार के गद्य पर बात करते हुए कहा कि यदि केदार के गद्य में लिख रहे होते तो केदार बड़े कथाकार होते। केदार की पहचान कविता ही नहीं कथा साहित्य कं आधार पर भी की जानी चाहिए। इसी दौहरान केदारजी की नातिन ने कुलपति श्री विभूतिनारायण राय को केदारजी की एक पाण्डुलिपि भेंट की। कुलपति ने कहा कि केदारजी की अन्य पुस्तकों की तरह इसका भी प्रकाशन किया जाएगा।

अंत में कार्यक्रम के संयोजक प्रो. संतोष भदौरिया ने सभी का धन्यवाद ज्ञापन किया।

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