सतपुड़ा-मैकल और विंध्य पर्वत श्रृंखला के संधि स्थल पर सुरम्य नील वादियों में बसा अमरकंटक एक अनुपम पर्यटन स्थल है। हमारा देश शीतकालीन पर्यटन स्थलों से भरा है लेकिन अमरकंटक ग्रीष्मकालीन पर्यटन स्थलों में से एक है। इसे प्रकृति और पौराणिकता ने वैविध्य संपदा की धरोहर बख्शी है। चारों ओर हरियाली, दूधधारा और कपिलधारा का झरना जैसा मनोरम दृश्य, सोननदी की कलकल करती धारा, नर्मदा कुंड की पवित्रता और जहां एक ओर पहाड़ी की हरी-भरी ऊंचाईयां है तो दूसरी ओर खाई का प्रकृति प्रदत्त मनोरम दृश्य मन की गहराईयों को छू जाता है। अमरत्व बोध के इस अलौकिक धाम की यात्रा सचमुच उसके नाम के साथ जुड़े ‘कंटक‘ शब्द को सार्थक करती है। हम जहां दुनिया के छोटी हो जाने का जिक्र करते थकते नहीं, वहीं अमरकंटक की यात्रा आज भी अनुभवों में तकलीफों के शूल चुभो जाता है। लेकिन एक बार सब कुछ सहकर वहां पहुंच जाने के बाद यहां की अलभ्य सुषमा और पौराणिक आभा सब कुछ बिसार देने को बाध्य करती है।

पिछले दिनों कालेज के विद्यार्थियों ने अमरकंटक जाने का प्रस्ताव मेरे पास लाया। ऐसे पतित पावन जगह को कौन जाना नहीं चाहेगा? मेरे जाने की स्वीकृति मिलते ही छात्र-छात्राओं की संख्या इतनी बढ़ गयी कि एक बस में सबको समाना मुश्किल हो गया। विद्यार्थियों के उत्साह को देखते हुये एक और जीप की व्यवस्था करके विद्यार्थियों का दल अमरकंटक के लिए रवाना हुआ। सांप जैसी घाटियों को पार करते हुए प्रातःकालीन बेला में हम अमरकंटक पहुंचे। केंवची के ढाबा की गरम चाय और कबीर चौराहा का मनोरम दृश्य हमारे मन में अमिट पहचान बनाने में सफल रहा। स्वामी रामकृष्ण परमहंस के आश्रम में दैनिक कर्म से निपटकर नर्मदा कुंड में स्नान किये। नर्मदा मैया के दर्शन करके हम पकृति के इस अलौकिक धाम का भ्रमण करने निकल पड़े।


अमरकंटक, मध्यप्रदेश के शहडोल जिलान्तर्गत दक्षिण-पश्चिम में लगभग 80 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। अनुपपुर रेल्वे जंक्शन से 60 कि.मी., पेंड्रा रोड रेल्वे स्टेशन से 45 कि.मी. और बिलासपुर जिला मुख्यालय ये 115 कि.मी. की दूरी पर पर स्थित है। यहां रूकने के लिए अनेक छोटे मोटे धर्मशालाएं, स्वामी श्रीरामकृष्ण परमहंस का आश्रम, बरफानी बाबा का आश्रम, बाबा कल्याणदास सेवा आश्रम, जैन धर्मावलंबियों का सर्वोदय तीथ्र एवं अग्निपीठ, लोक निर्माण विभाग का विश्राम गृह, साडा का गेस्ट हाउस और म.प्र. पर्यटन विभाग को टूरिस्ट कॉटेज आदि बने हुए हैं। यहां घूमने के लिए तांगा, जीप, आटो रिक्सा आदि मिलता है। खाने के लिए छोटे-बड़े होटल हैं लेकिन 15 कि.मी. पर केंवची का ढ़ाबा में खाना खाने की अच्छी व्यवस्था रहती है। जंगल के बीच खाना खाने का अलग आनंद होता है।

अमरकंटक, शोण और नर्मदा नदी का उद्गम स्थली है जो 20 डिगरी  40‘ उत्तरी अक्षांश और 80 डिगरी 45‘ पूर्वी देशांश के बीच स्थित है। नर्मदा नदी 1312 कि.मी. चलकर गुजरात में 21 डिगरी 43‘ उत्तरी अक्षांश और 72 डिगरी 57‘ पूर्वी देशांश के बीच स्थित खंभात की खाड़ी के निकट गिरती है। यह नदी 1077 कि.मी. मध्यप्रदेश के शहडोल, मंडला, जबलपुर, नरसिंहपुर, होशंगाबाद, खंडवा और खरगौन जिले में बहती है। इसके बाद 74 कि.मी. महाराष्ट्र को स्पर्श करती हुई बहती है और जिसमें 34 कि.मी. तक मध्यप्रदेश और 40 कि.मी. तक गुजरात के साथ महाराष्ट्र की सीमाएं बनाती हैं। खंभात की खाड़ी में गिरने के पहले लगभग 161 कि.मी. गुजरात में बहती है। इस प्रकार इसके प्रवाह पथ में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, और गुजरात राज्य पड़ता है। नर्मदा का कुल जल संग्रहण क्षेत्र 98799 वर्ग कि.मी. है जिसमें 80.02 प्रतिशत मध्यप्रदेश में, 3.31 प्रतिशत महाराष्ट्र में और 8.67 प्रतिशत क्षेत्र गुजरात में है। नदी के कछार में 160 लाख एकड़ भूमि सिंचित होती है जिसमें 144 लाख एकड़ अकेले मध्यप्रदेश में है, शेष महाराष्ट्र और गुजरात में है।


विश्व की प्रमुख संस्कृतियां नदियों के किनारे विकसित हुई परन्तु भारत का प्राचीन सांस्कृतिक इतिहास तो मुख्यतः गंगा, यमुना, सरस्वती और नम्रदा के तट का ही इतिहास है। सरस्वती नदी के तट पर वेदों की ऋचाएं रची गई, तो तमसा नदी के तट पर क्रौंच वध की घटना ने रामायण संस्कृति को जन्म दिया। न केवल आश्रम संस्कृति की सार्थकता ओर रमणीयता नदियों के किनारे पनपीं, वरन् नगरीय सभ्यता का वैभव भी इन्हीं के बल पर बढ़ा। यही कारण है कि नदी के हर लहर के साथ लोक मानस का इतना गहरा तादात्म्य स्थापित हो गया कि जीवन के हर पग पर जल और नदी संस्कृति ने भारतीयता को परिभाषित कर दिया। छोटे से छोटे और बड़े से बड़े धार्मिक अनुष्ठान और यज्ञ आदि के अवसर पर घर बैठे सभी नदियों का स्मरण इसी भावना का तो संकेत है ?

गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति,
नर्मदे सिन्धु कावेरि, जले स्मिनऽसन्निधि कुरू।।

इस प्रकार मैकलसुत सोन और मैकलसुता नर्मदा दोनों का सामिप्य सिद्ध है। वैसे मैकल से प्रसूत सभी सरिताओं का जल तो अत्यंत पवित्र माना गया है-मणि से निचोड़े गये नीर की तरह..। ऐसे निर्मल पावन जल प्रवाहों की उद्गम स्थली के वंशगुल्म के जल से स्नान, आचमन, यहां तक कि स्पर्श मात्र से यदि अश्वमेघ यज्ञ का फल मिलना बताया गया हो तो उसमें स्नान अवश्य करना चाहिये। लेकिन यह विडम्बना ही है कि अब अमरकंटक की अरण्य स्थली में प्रमुख रूप से नर्मदा और सोन नदी के उद्गम के आसपास एक भी बांस का पेड़ नहीं है। यही नहीं यहां नर्मदा कुंड का पानी पीने लायक भी नहीं है। बल्कि इतना प्रदूषित है कि आचमन तक करने की इच्छा नहीं होती। इसके विपरीत सोन नदी के उद्गम का पानी स्वच्छ और ग्रहण करने योग्य है। नर्मदा कुंड को मनुष्य की कृत्रिमता ने आधुनिकृत करके सीमित कर दिया है। सोनुमुड़ा-सोन नदी की उद्गम स्थली अभी भी प्रकृति की रमणीयता और सहजता से अलंकृत है। वृक्षों पर बंदरों की उछलकूद और साधु संतों की एकाग्रता यहां की पवित्रता का बोध कराती है। यहां साडा द्वारा सीढ़ियों पर बैठने की व्यवस्था की गयी है। यहां पर प्रात सूर्योदय का दृश्य दर्शनीय होता है।

समुद्र से 3600 फुट की ऊंचाई पर स्थित अमरकंटक प्राचीन काल से ही ऋषि मुनियों की तपस्थली, लक्ष्मी जी की शरण स्थली और उमा महेश्वर के विहार स्थल के रूप में प्रसिद्ध है। यहां के पुजारी जी ने हमें बताया कि यहां आज भी शंकर जी के डमरू की आवाज सुनायी देती है। यही कारण है कि यहां झरनों के किनारे, पहाड़ों की गुफाओं में और आश्रमों में ऋषि मुनि ध्यानस्थ होते हैं। स्वामी रामकृष्ण परमहंस आश्रम के प्रभारी जी ने बताया कि अमरकंटक का वातावरण स्वस्थ है। साधना के लिए यह बहुत ही उपयुक्त है। यहां ब्रह्म के कण विद्यमान हें जो मन को शांति प्रदान करता है।


सूर्य सिर के उपर चढ़ आया था और हमें नास्ता नसीब नहीं हुआ था। या यूं कहें कि यहां के नैसर्गिक अलभ्य सुषमा के पान करते इतना समय गुजर गया। नास्ता करके फिर हमारा काफिला यहां के दर्शनीय स्थलों-माई का बगिया जो नर्मदा कुंड से मात्र 3 कि.मी. दूर है, सोनुमुड़ा जो उद्गम से 2 कि.मी देर है, देखने के बाद नर्मदा कुंड से लगे प्राचीन मंदिरों को देखने गये। यहां पर 9 वीं और 11-12वीं शताब्दियों में निर्मित अनेक मंदिर हैं। इनमें केशवनारायण, पंचमहला, कर्णेश्वर और जालेश्वर महादेव मंदिर प्रमुख है। इन मंदिरों के समीप स्थित कुंड को वास्तविक ‘नर्मदा कुंड‘ माना जाता है। बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि यहां नर्मदा और सोन नदी के अलावा अन्य किसी नदी का भी उद्गम है ? यहां से तीसरी ‘जोहिला नदी‘ निकली है। वास्तव में इन नदियों के बारे में यहां प्रचलित जनश्रुतियों के अनुसार ब्रह्मा की आंखों से दो अश्रु बूंदें टपके जो आगे नर्मदा और सोन नदी कहलाये। राजा मैकल के घर नर्मदा युवती के रूप में जन्मीं। उसके विवाह के लिए मैकल राजा ने घोषणा की कि जो कोई बकावली का फूल तीन महिने के भीतर लायेगा उसी से राजकुमारी नर्मदा का विवाह किया जायेगा। राजकुमार सोन (शोण) के रूप और गुण में नर्मदा पहले से ही मुग्ध हो गयी थी। वह बकावली का फूल भी ले आया मगर थोड़ी देर होने पर नर्मदा अपनी सहेली जोहिला को उसका पता करने भेजा। जोहिला भी अनिंद्य सुन्दरी थी। शोणभद्र जोहिला के अनिंद्य सौंदर्य पर मोहित हो गया। जोहिला के मन में भी कपट आ गया और वह अपना सब कुछ राजकुमार शोणभद्र के उपर निछावर कर बैठी। जोहिला को आने में विलंब होते देख राजकुमारी नर्मदा स्वयं गयी। वहां राजकुमार को जोहिला के साथ प्रेमालाप करते देख गुस्से से कांपने लगी और एक कुंड में कूदकर प्राण त्याग देती है। कुंड में ऐसा तूफान आता है कि कुंड की जलधारा पश्चिम (उल्टी दिशा में) की ओर बहने लगती है। शोणभद्र भी असफल प्रेमी की तरह अमरकंटक की पहाड़ी से कूदकर अपनी जान दे देता है। जोहिला के भ्रमजाल ने नर्मदा और शोणभद्र को मिलने नहीं दिया। तभी तो लोकगीतों में गाया जाता हैः-

माई नरबदा सोन बहादुर
जोहिला ला तई नई बिहाय
गोड़े के पैरी उतार नरबदिया
जोहिला ल लै पहिराय।

अमरकंटक में हमने देखा कि नर्मदा कुंड से 6 कि.मी. की दूरी पर कपिलधारा में नर्मदा 150 फीट नीचे गिरकर प्रपात बनाती है। यहां से थोड़ी दूर पर नर्मदा दूध की धारा बनाकर 10 फीट नीचे गिरती है। उसी तर्ज में सोन नदी 300 फीट नीचे गिरती है। यहां के गर्भ में बाक्साइट है जिसे निकालकर बाल्को भेजा जाता है। खानों के ब्लास्टिंग से यहां के वातावरण में कंपकपी पैदा कर देती है। इसी प्रकार ‘‘वंशगुल्म‘‘ के नाम से प्रसिद्ध अमरकंटक आज बांस के कंटिले पेड़ों से वंचित होता जा रहा है। अब तक हमारा मन यहां के मनोरम दृश्यों को देखकर प्रफुल्लित हुआ जा रहा था। अचानक हमारी नजर घड़ी के उपर पड़ी। चार बजने को आ रहा था और हमें बड़ी जोर की भूख लग रही थी। हम लोग वन के बीच ‘केंवची‘ में खाना खाकर थोड़ा विश्राम किये और एक यादगार स्मरण लिये वापसी के लिए रवाना हुए। तब हमारे मन में लोकगीत के ये बोल फूट रहे थे:-

चलो रे भैया, चलिहें नरबदा के तीर
परब के दिन आयो
दिन आयो रे अनमोल
परब के दिन आयो।
गंगा नहायो, जमुना नहायो
अब देखिहै मैया तेरी नीर
परब के दिन आयो रे भैया...।
==================== 
रचना, लेखन एवं प्रस्तुति:

प्रो. अश्विनी केशरवानी
‘राघव‘ डागा कालोनी, 
चांपा-495671 (छ.ग.)

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