(हालॉकि यह व्यंग्य लोकल मुद्दे पर लिखा गया है, फिर भी समाज से इसका सरोकार है, मैं मनीषा को अखबार और लोकल चैनल के माध्यम से ही जानता था, मनीषा आगरा की एक निम्न मध्यम वर्ग की गर्भवती महिला थी जो गर्भपात के लिये किसी प्राइवेट नर्सिंग होम में गई थी, गर्भपात के दौरान डाक्टरों ने उसकी बच्चेदानी काट दी, तब उसकी बच्चेदानी को निकालने का निश्चय किया, जिसका पूरा खर्चा भी मनीषा के पति से ही लिया गया, जब बच्चेदानी का आपरेशन किया तो बच्चेदानी के साथ ऑतें भी निकाल दीं और उसे नर्सिंग होम से विदा कर दिया गया, मनीषा को मैडीकल कालेज ले जाया गया जहॉ पता चला कि मनीषा की ऑतें ही निकाल ली गई थीं । लोकल मीडिया ने इस घटना को काफी जगह दी, मनीषा के पक्ष में राजनैतिक लोग, सामाजिक संगठन आये, मुकदमे दर्ज हुए, गिरफतारियॉ हुईं । उस दौरान हर सुबह जब मैं अखबार पढ़ता तो किचन से आवाज आती थी - क्यों जी मनीषा अब कैसी है ? ऐसा और भी कई घरों में निश्चय ही होता रहा होगा, अनजाने ही मनीषा हमारी और हम जैसे पचासों आगरा वासियों की रिश्तेदार बन गई थी, उसके मरने के दो दिन पहले जब नेताजियों ने आश्वासन दिया था कि उसे मरने नहीं दिया जायेगा, एम्स ले जाया जायेगा, तब उसका फोटो उसकी बच्ची के साथ अखबार में मैंने देखा था उसके चेहरे पर चमक थी, ऑखों में ममत्व था, जीवन से लबरेज थी मनीषा, लेकिन मनीषा नहीं रही , निरीह मनीषा जो जीना चाहती थी मर गई, मनीषा मर गई लेकिन ये तय है कि वो अपनी मौत नहीं मरी उसकी हत्या हुई है, उसके हत्यारे अकेले वो डाक्टर नहीं हैं, हम सब कहीं न कहीं इसके जिम्मेदार हैं, मैं इस पापबोध से मुक्ति चाहता था इसलिये लिखा, हालॉकि इस पापबोध से मुक्ति संभव नहीं । मुद्दा लोकल है मुझे कचोटा मैंने लिखा, आपको लगता है कि समाज से इसका सरोकार है तो पढ़ें, अन्यथा मनीषा की कहानी पढ़ने का धन्यवाद )

मुल्ला जी बिस्तर पर पड़े शून्य की ओर ऐसे ताक रहे थे जैसे किसी फाहशा औरत को सती मान कर उसके इश्क में खता खाया दयनीय आशिक खुदा से कयामत की भीख मॉग रहा हो, उनकी ऑखों में भविष्य के अनिष्ट की आशंका साफ साफ झलक रही थी । बेगम अल्ला से दुआ की मुद्रा में मुल्ला जी के चेहरे पर सकारात्मक भावों का इंतजार कर रही थीं ।

‘ क्या हुआ खातून? मुल्ला जी से इतनी शान्ति की उम्मीद तो तुर्बत में भी नहीं’ हमने पूछा

‘ वही तो भाई जान, कल जब से अखबार में मनीषा की मौत की खबर पढ़ी ऐ, तबसे ई.....’

‘ ये तो अच्छी बात है खातून, हमारे मुल्ला जी के दिल में कितनी दयानतदारी है, अजनबी औरत के लिये हलकान हुए पड़े हैं’

‘ ये होता तो भी अच्छा था मगर भाई जान मुझे तो कुछ और ई लग रिया ऐ, खबर पढ़ने के आधे घंटे बाद से कौमी दंगा कौमी दंगा चिल्ला रये ऐं, मुझे तो लग रिया ऐ किसी कसाई की कबर पे हाजत रफा हो लिये ऐं’

अब बात वाकई फिक्रमंद होने की थी, मैंने धीमे से कहा -
‘ अमॉ मुल्ला जी....’

‘ हूँ....’ उन्होने समाधि छोड़ी

‘ हुआ क्या?’

‘ हुआ नहीं लेकिन अब कौमी दंगा होगा’

‘ बड़े मियॉ मनीषा को तो हिन्दू डाक्टर ने ही मारा है, फिर कौमी दंगा कैसे ...?’

‘ नहीं उससे मतलब नहीं’

‘ फिर ...?’

‘ आपको नहीं पता ? हमने पिछले महीने ऑतों को रिप्लेस कराया था’

‘ पता है मगर ऑतों का कौमी दंगे से क्या मतलब?’

‘ होने को तो मनीषा की बच्चे दानी का भी मतलब ऑतों से नहीं था, फिर भी डाक्टर ने बच्चे दानी के साथ ऑतें भी बाई वन गेट वन स्कीम में निकाल दी ना’

‘ अमॉ आपके साथ ऐसा नहीं हो सकता मर्द के पेट में बच्चेदानी नहीं होती, हॉ किडनी लिवर या कुछ और निकाला हो तो दीगर बात है, लेकिन आपकी किडनी निकले तो भी कौमी दंगा कैसे हो जायेगा?’

‘ बात आपकी ठीक है मियॉ हमारा किडनी जिगर कुछ भी निकले तो हमें दिक्कत नहीं मगर फर्ज करो इन मरदूदों ने हमारे पेट में बच्चेदानी चस्पा कर दी हो तब?’

‘ तो अल्ला के फजलोकरम से बरकत होगी आपकी, कुनबा बढ़ेगा आपका’ हमने मजाक में कहा

‘ वही तो मियॉ, यही डर हमें खाये जा रहा है, इधर एकाध बार भी हमारे पॉव भारी हुए, उधर बी.जे.पी. को मुद्दा मिला, अभी तक तो हमारी औरतों को ही बारह बच्चों के लिये बदनाम करते थे, अब हमारे मर्दों को भी लपेटा जायेगा जबकि इसमें हमारी कोई गलती नहीं, हल्का हल्का दर्द तो महीने भर से था लेकिन जब से ये खबर पढ़ी है मियॉ मिट्टी और खट्टी चीजें खाने का मन कर रहा है, खुदा न करे कुछ हो गया तो कौमी दंगा शर्तिया होगा ’

‘ बेफिक्र रहिये मुल्ला जी हमारे डाक्टर सिर्फ आर्गन्स निकालते हैं, अपनी तरफ से चिपकाते कुछ नहीं’

‘ बाई वन गेट वन स्कीम निकालने पर लागू होती है तो डालने पर भी होती है, बच्चेदानी निकाली साथ में ऑतें निकाल दीं, ऑतें डालीं साथ में बच्चेदानी डाल दी ’

‘ निकालने में तो उनका फायदा है डालने में क्या फायदा?’

‘ मियॉ प्रक्टीकल तो कर ही सकते हैं हमारे उपर, अब आदमी के सीने में सूअर का दिल मनमोहन सिंह तो लगा के नहीं आये थे’

‘ एकाध केस ऐसा हो जाता है बड़े मियॉ इसे जनरलाइज नहीं कर सकते ’

‘ एकाध होता नहीं मियॉ एकाध पकड़ में आता है, होते तो हजारों हैं, एक डाक्टर शहर में छह जगह बैठता है, एक पैथेलॉजिस्ट या रेडियोलॉजिस्ट शहर में बारह जगह पैथोलॉजी चलाता है, एक फार्मासिस्ट पच्चीस दूकानों पर बैठता है, ऐसे में सही इलाज की क्या उम्मीद है? और तो और मरीजों पर छब्बी इसी नामाकूल बस्ती में है, फिर भी आप सोचते हैं कि एकाध ही केस होता होगा? ’

‘ मरीजों पर छब्बी?’

‘ कमीशन मियॉ, कमबख्त शाहजहॉ को भी यही शहर मिला था बरबाद करने को, अच्छा ताजमहल बनाया, विदेशी सैलानी आये तो छब्बी ऐसी शुरू हुई कि होटल, दूकानों से निकलकर डाक्टरों तक आ गई आपको नहीं पता यहॉ पे हर मुहल्ले हर गॉव में डाक्टरों ने खालानुमा औरतें और तैयब अली छाप आदमी पाल के रखे हैं जिन्हें मरीज लाने का कमीशन मिलता है, रिक्शे, ऑटो वाले, टैक्सी वाले तो खैर पहले से ही छब्बीखोर हैं, आप लाख डाक्टर शर्मा के पास जाना चाहो अल्ला के बंदे डाक्टर वर्मा के पास ही छोड़ के आयेंगे ’

‘ अब देखिये ये कमीशन तो सिस्टम एक्सेप्ट कर चुका है, हर इंसान ले दे रहा है, तो डाक्टरों पर सख्ती क्यों?’

‘ मियॉ हर आदमी पेशा शुरू करने से पहले ऊपर वाले को हाजिर नाजिर मान के ईमानदारी और खुदाई खिदमत की कसम भी नहीं खाता, हर आदमी अपना पेशा खुद चुनता है, मुल्ला जी या कवि जी ने डाक्टर साब के अब्बू को दरख्वास्त नहीं दी थी कि अपने लौंडे को डाक्टर बना के मुल्क पर मेहरबानी करो , जो पेशा चुना है उसके सारे फायदे नुकसान सब आपके हैं ’

‘ कसम तो नेता भी खाते हैं’

‘ बिलकुल, लेकिन यही डाक्टर नेताओं को खुले आम गालियॉ भी तो बकते हैं, कभी नेता को देखा है डाक्टरों के लिये उफैल तुफैल बकते हुए? फिर डाक्टर और नेता मे फर्क होता है, कहते हैं आपका ईश्वर एक साथ हजार जगह खुद नहीं पहुॅच सकता था इसलिये उसने डाक्टर बैद या हकीम की शक्ल ईजाद की’

‘ हमारा ईश्वर ...? आपका खुदा नहीं ?’

‘ हमें उतना बोलने से पहले इमाम साब से मशविरा करना पड़ता है, खैर फिलहाल ईश्वर से काम चला लो कहने का मतलब जिसे आप ईश्वर की जगह बैठाते हैं उससे कुछ मॉरल्स की उम्मीद तो कर ही सकते हैं’

‘ मारल्स से पेट नहीं भरता बड़े मियॉ’

‘ बात पेट भरने की हो तो रिक्शेवाला भी छह लोगों का पेट शाम को देशी दारू के साथ भर ही लेता है, पेट भरने की दिक्कत कम अज कम डाक्टर को तो नहीं होती, एक मामूली डाक्टर जंगल में बैठे तो पचास हजार से एक लाख के बीच माहवार कमा ले, लेकिन इन्हें अय्याशियों के लिये चाहिये, सात पुश्तों के लिये चाहिये, क्लीनिक को नर्सिंग होम बनाने के लिये चाहिये, नर्सिंग होम को हस्पताल बनाने के लिये चाहिये, हस्पताल के बाद भी हसरतें कम नहीं होतीं तभी आई.सी.यू. में पड़े मरीज की आधी दवाइयॉ वापस मैडीकल स्टोर पर भिजवा देते हैं, इन्हें भर्ती के समय पता होता है कि मरीज मरने वाला है फिर भी वैन्टिलेटर पर पंद्रह दिन तक जिन्दा रखते हैं, मरीज ऐसी हालत में भी नहीं होता कि दबा गढ़ा भी बता सके फिर दस लाख का पर्चा चिपका कर एक दिन उसे मार डालते हैं, इतना सब होने के बाद एक्सरे, पैथोलॉजी, दवाइयों पर भी कमीशन तय होता है, बताइये इसमें पेट की दिक्कत कहॉ आई?’

‘ नहीं अब जब योग्य डाक्टर देखता है कि झोलाछाप उससे ज्यादा कमा रहा है तो नेचुरली....’

‘ झोलाछाप किसकी मर्जी से दूकान चलाता है, मुल्ला जी या कवि जी ? मियॉ झोलाछाप भी डाक्टरों की मर्जी से ही चल रहे हैं, अभी सुना कि किसी भले मानस ने आर.टी.आई. में कहीं सरकारी डाक्टर साब से पूछा कि हमारे शहर में झोलाछाप कितने हैं, जवाब मिला - एक भी नहीं और अगर आप किसी झोलाछाप को जानते हैं तो उसका नाम बतायें ( ताकि हम उस झोला छाप को आपका पता बता सकें और वो आपको लिटरली शान्त कर सके ) अब बताओ मियॉ मनीषा का हत्यारा पंद्रह दिन पहले ही शहर में आया था क्या? हमें या आपको दिन में दस बीस भी झोलाछाप नहीं दिखते? फिर ये सरकारी डाक्टरों को क्यों नहीं दिखते?’

‘ देखिये अब तो कार्यवाही हो रही है धरपकड़ चल रही है’

‘ सब जानते हैं मियॉ पब्लिक की याददाश्त कितनी मजबूत होती है, पंद्रह दिन में मामला ठंडा हो जायेगा, मनीषा के रिश्तेदार समझौता कर लेंगे , सरकारी अफसर ही करायेंगे, मनीषा तो अब लौटनी नहीं , घर आई रकम क्यों लौटे? फिर कोई रेशमा इनका शिकार बनेगी, फिर कोई आकॉक्षा फिर शायद कोई मुल्ला जी.......मेरे पेट में दर्द हो रहा है कवि जी , बेगम किसी दाई को बुलाओ , देखो कानोंकान किसी को खबर न हो, किसी हिन्दू को तो कतई नहीं .... नहीं तो कौमी दंगा हो जायेगा....आप तो हमारे गमगुसार हैं कवि जी....’

कहते हुए निराश मुल्ला जी ने मेरा हाथ अपने दोनों हाथों से जकड़ लिया और पेट के साथ भींच लिया, मैं आश्चर्य चकित था उनके पेट से मुझे लगातार धड़कने महसूस हो रहीं थीं , मैं डाक्टर नहीं इसलिये पहचान नहीं पाया कि मुल्ला जी के पेट में डाक्टरों ने किसका बीज रोपा था कौमी दंगे का या भ्रष्टाचार का । मुल्ला जी बिस्तर पर पड़े शून्य की ओर ऐसे ताक रहे थे जैसे किसी फाहशा औरत को सती मान कर उसके इश्क में खता खाया दयनीय आशिक ख़ुदा से कयामत की भीख मॉग रहा हो, उनकी ऑखों में भविष्य के अनिष्ट की आशंका साफ साफ झलक रही थी । मैं उस तथाकथित ईश्वर से दुआ की मुद्रा में मुल्ला जी के चेहरे पर सकारात्मक भावों का इंतजार कर था जिसने कभी डाक्टर नाम का अवतार लिया था ।

6 comments:

  1. मुल्ला जी की व्यथा तो बहुत ही सटीक है. कमीशन-खोरी के इस दौर में हम उम्मीद भी और क्या करें.. शक्ति प्रकाश जी को बधाई..

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  2. अनिरुद्ध9 मई 2011 को 12:24 pm

    शक्ति जी के व्यंग्य सधे हुए होते हैं। बधाई।

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  3. आपके व्यंग्य नें संवेदना से भर दिया।

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  4. यह किसी भी कोण से लोकल मुद्दा तो नहीं है। इसपर लेखन के लिये धन्यवाद

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