याची आज फिर इस द्वार
मैं अकिंचन
स्नेह सिंचन
रिक्त वसना सी धरा पर
हृदय आकुल ...
भटकता ले तमस में
नयन अविरल धार ...
आज बारम्बार ...
हां मैं आज फिर इस द्वार

तड़्पता हूं मीन
सूखा सर निरन्तर
विहग दल की कूक से
आतप निरन्तर...
खींचता वो कौन ..
अनजाने ड्गों से
देखता है कौन ..
अनजाने दृगों से..
कण्टकों से ढ्का ये पथ
विलोपित रसधार ...

है क्यों बन्द अब भी द्वार
याची मैं निरन्तर
एक तेरे द्वार
बस मैं एक तेरे द्वार

5 comments:

  1. sundar rachnaa !


    Avaneesh
    Mumbai

    उत्तर देंहटाएं
  2. आतप निरन्तर...
    खींचता वो कौन ..
    अनजाने ड्गों से
    देखता है कौन ..
    बहुत खूबसूरत भाव की पंक्तियाँ श्री कान् भाई। वाह।
    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
    कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
    www.manoramsuman.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  3. तड़्पता हूं मीन
    सूखा सर निरन्तर
    विहग दल की कूक से
    आतप निरन्तर...
    खींचता वो कौन ..
    अनजाने ड्गों से
    देखता है कौन ..
    sunder
    rachana

    उत्तर देंहटाएं
  4. Acchii rachana Badhaaii
    Prabhudayal Shrivastava

    उत्तर देंहटाएं

आपका स्नेह और प्रस्तुतियों पर आपकी समालोचनात्मक टिप्पणियाँ हमें बेहतर कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करती हैं.

पुस्तकालय

~~~ साहित्य शिल्पी का पुस्तकालय निरंतर समृद्ध हो रहा है। इन्हें आप हमारी साईट से सीधे डाउनलोड कर के पढ सकते हैं ~~~~~~~

डाउनलोड करने के लिए चित्र पर क्लिक करें...

आइये कारवां बनायें...

साहित्य शिल्पी, हिन्दी और साहित्य की सेवा का मंच, एक ऐसा अभियान.. जो न केवल स्थापित एवं नवीन रचनाकारों के बीच एक सेतु का कार्य करेगा अपितु अंतर्जाल पर हिन्दी के प्रयोग और प्रोत्साहन का एक अभिनव सोपान भी है, अपने सुधी पाठको के समक्ष कविता, कहानी, लघुकथा, नाटक, व्यंग्य, कार्टून, समालोचना तथा सामयिक विषयो पर परिचर्चाओं के साथ साहित्य शिल्पी समूह आपके समक्ष उपस्थित है। यदि राष्ट्रभाषा हिदी की प्रगति के लिए समर्पित इस अभियान में आप भी सहयोग देना चाहते हैं तो अपना परिचय, तस्वीर एवं कुछ रचनायें हमें निम्नलिखित ई-मेल पते पर प्रेषित करें।
sahityashilpi@gmail.com
आइये कारवां बनायें...

Followers

Google+ Followers

Get widget