बात उन दिनों की है जब हमारे चेहरों से बाल नदारद थे| उम्र यहीं कोई १३-१४ साल रही होगी| काम था पढ़ना| हम उन लोगों में से थे जिन्होंने तमाम उम्र अपना काम बखूबी नहीं निभाया| उन दिनों मैंने कई दोस्त बनाये|   जिनमे से कुछ से तो अभी भी बातचीत हो जाती है| मुझे याद है की उन दिनों मेरा एक दोस्त हुआ करता था शाह सलीम अहमद|  बिलकुल मेरी ही तरह|  बातो और फेकने में तो मुझसे भी एक कदम आगे|  हम आंठ्वी में थे और दिसम्बर का महीना चल रहा था | रोज़ सुबह कड़ाके की ठण्ड में साढ़े छे बजे हमें अंगरेजी की कोचिंग पढ़ने के लिए शर्मा मास्टर जी के यहाँ जाना रहता था| इतनी सुबह रजाई छोड़ने का मन तो नहीं करता था पर घरवाले डंडा लिए तैयार खड़े रहते थे| मजबूरन मुझे लाल और अधसोई आँखों के साथ अपनी साइकिल पर रवाना होना पड़ता था| रस्ते मे सलीम का घर पड़ता था, वहा से मै उसे बैठाता और साइकिल दनदनाता हुआ मास्टर साहब के घर पहुँच जाता। इतवार छोड़ रोज़ हमारा यही नियम था।

दिसम्बर का आखिरी हफ्ता चल रहा था। मै साइकिल समेत सलीम के घर पंहुचा। सलीम को हम प्यार से सत्तू कहकर बुलाते थे। वहा मैंने देखा सलीम एक कुत्ते के साथ छेड़ छाड़ करने मै मशगूल था। वो पहले उसे रात की बची हुई रोटी का टुकड़ा फेकता और जैसे ही वो खाने के लिए आगे आता घुमा के एक पत्थर उसके पेट पर जड़ देता। कुत्ता थोड़ी देर चिल्लाता और दूर भाग जाता। उस वक्त मुझे भी यह खेल बहुत रोचक लगा। मैंने भी शौक शौक मै एक पत्थर उठा लिया और हम दोनों  अपने अपने निशाने की आजमाइश करने लगे। 

धीरे धीरे हमारी हिम्मते बढ़ने लगी। हम कुत्ते को दौड़ा दौड़ा के पत्थर मारने लगे। सत्तू कुछ ज्यादा ही खुराफाती था। वो कुत्ते का पीछा छोड़ ही नहीं रहा था। थोड़ी देर बाद ,मेरी हिम्मत ने जवाब दे दिया। पर सत्तू अभी भी चालू था। मै रूककर उसे देखने लगा। तभी देखता हूँ की कुत्ते ने अपने नुकीले दांत सत्तू के पैर पर गड़ा दिए है। सत्तू लगातार कुत्ते को घूरे जा रहा है। चेहरे पर कोई शिकन नहीं कोई दर्द नहीं। थोड़ी देर मे कुत्ते का विकराल रूप मेरे सामने आ गया। उसने अपने जबड़े खोल दिए और मेरी तरफ गुर्राना शुरू कर दिया। उस वक्त वो कुत्ता 'घातक' फिल्म का सन्नी देओल लग रहा था और मानो चीख चीख के कह रहा हो ' चीर दूंगा फाड़ दूंगा साले ...' । मेरी घिग्ही बंध गयी मै सब कुछ छोड़छाड़ साइकिल लेकर चम्पत हो गया  और सीधे मास्टर साहब के घर पंहुचा।

 जैसे ही मै घर मे घुसा मास्टर साहब की आवाज आई -कहाँ घुसे चले आ रहे ? खड़े रहो। देर कैसे हो गयी? 

मैंने हडबडाते हुए जवाब दिया -सर सलीम को कुत्ते ने काट लिया है।

मास्टर साहब -तो तू क्या उसकी मरहम पट्टी कर रहा था? ये बात सुनकर सब बच्चे हंसने लगे और मास्टर साहब खुद भी। 

मुझे उनकी हंसी से कोई फर्क नहीं पड़ा पर कोचिंग में कुछ लड़कियां भी पढ़ती थी। जिन्हें हँसते देख मुझे बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई।  मास्टर साहब पे उस वक्त तो बड़ा गुस्सा आया। पर फिर सोचा की अगर गुस्सा आयेगा भी तो मै क्या उखाड़ लूँगा। फालतू मे दो तीन चांटे मेरे गाल पर रशीद हो जायेंगे। खैर जैसे तैसे वो दिन गुजरा। शाम को मै सत्तू के घर पहुंचा ,वो खाट पर लेटा हुआ था। 

मैंने पूछा-क्या बे! ज्यादा गहरा जख्म हो गया क्या ? 

सत्तू की दबी सी आवाज आयी-जख्म तो भाड़ में गया,मेरी तो इन्जेक्सन ने हवा टाईट कर दी है, अब रोज १४ दिनों तक डॉक्टर के यहाँ जाना पड़ेगा। और साले ने इन्जेक्सन भी तो पेट मे लगाया पीछे लगा देता तो क्या उसकी माँ मर जाती।

थोड़ी देर बात चीत करके में वापस घर आ गया। अगली सुबह मै फिर सत्तू के घर पहुंचा। मैंने देखा की सत्तू उसी कुत्ते को एक भगोने मे दूध और रोटी डालकर खिला रहा था। उसका ह्रदय परिवर्तन देखकर मै दंग रह गया। मुझे कुछ ऐसा प्रतीत हुआ की कुत्तो के प्रति उसका प्रेमभाव जागृत हो चुका है। करीब तीन चार रोज तक ऐसे ही चलता रहा। वो रोज कुत्ते को दूध रोटी खिलाता और खिलाकर ही कोचिंग के लिए रवाना होता। 

इतवार का दिन था, कोचिंग की छुट्टी थी। उस रोज़ मै कुछ जल्दी ही उठ गया। घर पर रुकता तो घरवाले कुछ न कुछ काम बता ही देते। इसलिए मैं काम से बचने के लिए जल्दी सुबह ही नहा धोकर सत्तू के घर की तरफ निकला। सत्तू के घर के बाहर एक पुराना सा खंडहर था जिसमे एक पुराना सा सूखा हुआ आम का पेड़ था। जब मै वहा पहुंचा तो मैंने देखा की कुछ लोग खंडहर के बाहर खड़े थे। मुझे कुछ भीड़ सी महसूस हुई। मै भीं वहा पहुंचा। मैंने देखा की उस आम के पेड़ पर नारियल की रस्सी बंधी हुई थी जिसके निचले सिरे पर वही काला कुत्ता बंधा हुआ था। वह उस पेड़ पर ऊर्ध्वाधर टंगा हुआ था और गोल गोल घूम रहा था। उस कुत्ते को फाँसी दे दी गयी थी। पर उस कुत्ते के चेहरे पर अभी भी वही सन्नी देओल वाला रौब बरक़रार था। उसकी आँखे बाहर की ओर निकल आयी थी। रस्सी खिचने की वजह से उसका मुंह खुला रह गया था और दांत साफ़ साफ़ दिखाई दे रहे थे। सीधे शब्दों मे वो मरने के बाद भी खौफनाक लग रहा था। उसके काले पेट पर एक सफ़ेद कागज़ चिपकाया गया था जिसपर कुछ लिखा हुआ था। मै थोड़ी दूर खड़ा था इसलिए उसे ठीक से पढ़ नहीं पाया\ मै भीड़ को चीरते हुए आगे पहुंचा उस कागज़ पर लिखा हुआ था -'सत्तू का इन्साफ'!!!!!!!!......................

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नितीश सैनी
जामिया विश्वविद्यालय

3 comments:

  1. सैनी जी कहानी केवल बाल मन के प्रतिक्रियात्मक स्वभाव का चित्रण नहीं करती बल्कि इस कहानी में बहुत से एसे तत्व हैं जो इसे उठाते हैं। कुछ समय बाद इसे फिर से लिखेंगे तो और भी आयामों के साथ कहानी निखर कर आयेगी।

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  2. अनिरुद्ध10 जून 2011 को 4:14 pm

    अलग तरह की कहानी

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  3. अलग भाव प्रस्तुत करती कहानी...

    उत्तर देंहटाएं

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